लोकसभा चुनाव 2024: कर्नाटक में सरकार चला रही कांग्रेस बीजेपी से कैसे पिछड़ गई

कर्नाटक

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक में बीजेपी और जनता दल सेकुलर के रणनीतिक गठबंधन से पैदा हुए जातीय ध्रुवीकरण ने राज्य की 28 लोकसभा सीटों में से कम से कम आधी सीटें जीतने की उम्मीद कर रही कांग्रेस पार्टी की कोशिशों पर पानी फेर दिया.

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'कम होती लोकप्रियता' से भी कांग्रेस को मदद नहीं मिली जबकि साल 2023 के विधानसभा चुनाव में किए गए पांच गारंटी के वायदों को कामयाबी के साथ लागू करने का सेहरा उसके सिर पर था.

राज्य की नौ लोकसभा सीटों पर कांग्रेस पार्टी की जीत ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके प्रदर्शन की यादें ताज़ा कर दी हैं.

वैसे पिछले साल की जीत इस बात की गारंटी नहीं थी लोग लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को ही तरजीह देंगे.

असल में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अंतर करने का कर्नाटक के वोटरों का रिकॉर्ड इतना अच्छा रहा है कि 1984 और 1985 के बाद से उन्होंने दोनों चुनावों में लगातार अलग-अलग पार्टियों को चुना है.

जातीय धुव्रीकरण के साथ कुछ ओबीसी और अनुसूचित जातियों (मैडिगा) के समीकरण ने वह भूमिका निभाई है जो इससे पहले 1994 के विधानसभा चुनावों में देखने को मिली थी.

इसी ध्रुवीकरण के सहारे 1994 में जनता दल को जीत मिली थी. तब एचडी देवेगौड़ा, रामकृष्ण हेगड़े की मदद से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे.

इसी समीकरण का फायदा पार्टी को साल 1996 में भी मिला था जब जनता दल ने 28 में से 16 लोकसभा सीटें जीतने का काम किया था. इसी के बाद देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे.

मैसूर यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर मुजफ़्फ़र असदी बीबीसी से कहते हैं, "बीजेपी और जेडीएस के बीच गठबंधन ने निश्चित तौर पर दक्षिणी कर्नाटक में वोक्कालिगा और उत्तरी कर्नाटक में लिंगायत जैसे बड़े जाति समूहों को एकजुट करने में मदद की. इसके अलावा हिंदुत्व का फ़ैक्टर और प्रधानमंत्री मोदी का घटता करिश्मा भी एक कारण रहा है."

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जाति का फ़ैक्टर

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अपनी पहचान उजागर न करते हुए कांग्रेस और बीजेपी के कुछ नेताओं ने जातीय ध्रुवीकरण पर प्रोफ़ेसर असदी के आकलन से सहमति जताई.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए एक भाजपा नेता ने कहा, "हम गोविंद करजोल के चित्रदुर्ग से चुनाव लड़ने को लेकर चिंतित थे, क्योंकि वे बीजापुर ज़िले से थे. शुरू में हमें बताया गया कि वे बाहरी हैं, लेकिन उन्हें छोटे ओबीसी समूह मिल गए जो प्रमुख कुरुबा समुदाय के ख़िलाफ वोट करना चाहते थे. जबकि कुरुबा कांग्रेस का समर्थन कर रहे थे."

बीजेपी के पारंपरिक समर्थक वोक्कालिगा और लिंगायत जाति समूहों की एकजुटता ने दक्षिणी कर्नाटक के साथ-साथ उत्तरी कर्नाटक की सीटों को भी प्रभावित किया है.

वोक्कालिगा दक्षिण कर्नाटक में एक प्रमुख समुदाय है जहां जेडीएस का जनाधार है.

लिंगायत पूरे राज्य में फैले हुए हैं, लेकिन उत्तरी कर्नाटक के चुनावी क्षेत्रों में उनका दबदबा है.

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बेंगलुरु की चार सीटों - बेंगलुरु उत्तर, बेंगलुरु मध्य, बेंगलुरु दक्षिण और बेंगलुरु ग्रामीण - पर वोक्कालिगा समुदाय के मतदाताओं ने भी बीजेपी को वोट किया और बड़े पैमाने पर भारत के अन्य राज्यों से आने वाले अपार्टमेंटों में रहने वाले लोगों ने भी बीजेपी को वोट किया जिसकी वजह से पार्टी ने इन सीटों पर क्लीन स्वीप किया है.

नाम न बताने की शर्त पर एक कांग्रेस नेता ने कहा, "आप बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा सीट का उदाहरण दे सकते हैं, जहां हमारे पार्टी नेता (मंसूर अली खान) एक समय 70,000 से ज़्यादा वोटों की बढ़त बनाने के बाद 37,000 वोटों के मामूली अंतर से हार गए. ऐसा अपार्टमेंट में रहने वालों की बड़ी संख्या के कारण हुआ."

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में गवर्नेंस एंड पॉलिसी के प्रोफेसर नारायण ए ने बीबीसी हिंदी को बताया कि दो प्रमुख जाति समूहों वोक्कालिगा और लिंगायत लोगों के वोटों के एकजुट होने के कारण अंतर बढ़ा है.

उन्होंने कहा, "दोनों समुदाय हमेशा अपने-अपने समुदायों के मज़बूत उम्मीदवारों का समर्थन करते हैं, जैसा कि उन्होंने जनता पार्टी या जनता दल के शासन के दौरान भी किया था."

जीत का बड़ा अंतर

एचडी कुमारस्वामी

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इमेज कैप्शन, एचडी कुमारस्वामी ने मांड्या की सीट 2.84 लाख के अंतर से जीती है.

जातिगत कारक और उम्मीदवारों की शख़्सियत ने जीत के अंतर में एक प्रमुख भूमिका निभाई, विशेष रूप से भाजपा या उसके गठबंधन सहयोगी जेडीएस के उम्मीदवारों की.

यह अंतर इंदिरा गांधी के ज़माने की याद दिलाता है जब उम्मीदवार दो लाख या एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीतते थे.

पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के दामाद डॉ. सीएन मंजूनाथ ने बेंगलुरु ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा. यह एकमात्र सीट थी जिसे कांग्रेस ने 2019 के चुनाव में जीता था.

प्रोफेसर नारायण कहते हैं, "डॉ. मंजूनाथ की जीत का अंतर इस तथ्य को भी दिखाता है कि लोग अधिक आक्रामक भाइयों- कांग्रेस उम्मीदवार डीके सुरेश (राज्य के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डीके शिवकुमार के भाई) के बजाय एक नरम व्यक्तित्व और प्रतिष्ठित डॉक्टर को पसंद करते हैं."

डॉ मंजूनाथ 2.69 लाख वोटों के अंतर से जीते.

लेकिन जिस अंतर से पूर्व स्पीकर विश्वेश्वर हेगड़े कागेरी ने करवार सीट से जीत हासिल की, लेकिन जीत के इस अंतर को कोई पीछे नहीं छोड़ सका. यह सीट विवादास्पद बयान देने वाले अनंत कुमार हेगड़े की थी.

कागेरी भी एक मृदुभाषी व्यक्ति हैं, जिन्होंने स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अंजलि निंबालकर को 3.37 लाख वोटों के अंतर से हराया.

देवेगौड़ा के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी ने मांड्या की सीट 2.84 लाख के अंतर से जीती.

उनके भतीजे प्रज्वल रेवन्ना, जो बलात्कार के आरोपों में एसआईटी की हिरासत में हैं, 42,649 वोटों के मामूली अंतर से हार गए.

केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने 2.59 लाख के अंतर से, तेजस्वी सूर्या ने 2.68 लाख के अंतर से जीत हासिल की.

कांग्रेस से सुनील बोस ने चामराजनगर सीट पर 1.74 लाख के अंतर से जीत दर्ज की, ई तुकाराम ने बेल्लारी सीट 99,768 वोटों से जीती, 26 वर्षीय सागर खांडरे ने 1.28 लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की.

कांग्रेस की ग़लती भारी पड़ी

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राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर संदीप शास्त्री ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कांग्रेस का नौ सीटें जीतना साफ़ तौर पर उसकी साख बचाने वाला है. जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई, तो हर कोई बीजेपी के भीतर मतभेदों पर चर्चा कर रहा था और जीत के अंतर पर इसके असर के बारे में बात कर रहा था. लेकिन यह कहा जाना चाहिए कि भाजपा ने अपनी साख बचा ली और 17 सीटें जीतने का श्रेय उसे दिया जाना चाहिए."

राजनीतिक टिप्पणीकार डी. उमापति ने बीबीसी हिंदी से कहा, "इसमें कोई शक नहीं है कि जेडीएस के साथ गठबंधन भाजपा के लिए कारगर रहा है. ऐसा लगता है कि मोदी की छवि बरकरार रही. बेशक, कांग्रेस पार्टी के ढीले रवैये का असर दिखा. उनमें इस कहावत 'जीती हुई बाजी हारना' को निभाने की अद्भुत क्षमता है."

उन्होंने कहा, "इस रवैये से अभी उबरना बाकी है. वे चुनाव आने पर ही सक्रिय होते हैं. वे अपनी गारंटी पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गए. पार्टी अच्छी तरह जानती है कि मतदाता विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में अलग-अलग पार्टियों को चुनते हैं."

फिर भी, पार्टी के लोगों ने तमिलनाडु में डीएमके पार्टी के विपरीत एक लापरवाह रवैया बनाए रखा, जिसके कैडर ने मतदान या फॉर्म 17 (सी) का विवरण बड़ी मेहनत से इकट्ठा किया.

प्रोफेसर नारायण की राय में कांग्रेस पार्टी की "भाजपा के सांप्रदायिक नैरेटिव का मुक़ाबला करने के प्रति उदासीनता ने भी वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों के युवा मतदाताओं को उसका समर्थन करने देने में भूमिका निभाई."

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