लद्दाख का वो मुद्दा, जिससे उबाल पर है लोगों का गुस्सा

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, लेह (लद्दाख) से
लद्दाख के लोगों की निगाहें अब 24 फ़रवरी पर टिकी हैं.
अगर इस दिन छठी अनुसूची से संबंधित होने वाली बातचीत नाकाम होती है तो अगले दिन यानी 25 फ़रवरी से लद्दाख में अनशन का नया दौर शुरू हो सकता है.
केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लेह की रहने वाली पद्मा बीते तीन फ़रवरी को कड़ाके की ठंड में अपने परिवार समेत लेह के पोलो ग्राउंड में पहुंच गई थीं, जहाँ उस दिन लद्दाख क्षेत्र के हज़ारों लोग छठे शेड्यूल और स्टेटहुड की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे.
पद्मा लेह में रेडीमेड गारमेंट्स की एक छोटी सी दुकान चलाती हैं. इतिहास में एमए करने के बाद जब उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिली तो कमाने के लिए दुकान शुरू करने के अलावा उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था.
पद्मा कहती हैं कि बीते चार-पांच वर्षों से धंधा ठप है.
उनका कहना है, "जहाँ तक मेरे बिज़नेस का सवाल है तो ये समझिए कि वो ठप पड़ा है. कोई ख़ास कमाई नहीं हो रही. पढ़ाई के बाद लगा था कि सरकारी नौकरी मिलेगी, लेकिन नहीं मिली. तब कारोबार शुरू करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था.”
वे कहती हैं, “कारोबार तो शुरू कर दिया लेकिन इसका भविष्य भी अंधेरे में नज़र आ रहा है. यहाँ हर बेरोज़गार अपनी दुकान खोल रहा है, इसके चलते काम कम हो रहा है. दूसरी वजह ऑनलाइन मार्केटिंग भी है. लद्दाख एक छोटी जगह है. यहाँ सिर्फ़ तीन लाख लोग रहते हैं."
वो कहती हैं, "इतनी छोटी आबादी में इतनी सारी दुकानें और इतने अधिक लोग बेरोज़गार. तो ख़रीदारी करने कितने लोग ही आएंगे."

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अपने कारोबार से अधिक लद्दाख की चिंता
एक तरफ़ अपने कारोबार की फ़िक्र तो दूसरी ओर लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल न किया जाना पद्मा को काफी मायूस करता है.
वे कहती हैं, “मुझे अपने कारोबार से भी अधिक फ़्रिक लद्दाख की है. ऐसा महसूस हो रहा है कि हम अपनी ज़मीन को खोने जा रहे हैं और बीते दिनों उस सख़्त ठंड में हम ज़मीन बचाने को लेकर प्रदर्शन मार्च करने पर मजबूर हो गए.”
केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में आजकल तापमान शून्य से भी कम है लेकिन इसके बावजूद छठी अनुसूची की मांग को लेकर माहौल काफी गर्म नज़र आ रहा है.
तीन फ़रवरी को लेह में हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किया तो लद्दाख के दूसरे इलाक़ों में भी बंद देखा गया.
तीन फ़रवरी को अपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायन्स (केडीए) ने बंद और प्रदर्शन बुलाया था.
अपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायन्स (केडीए) सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठन हैं जो लद्दाख की चार मांगों को लेकर अपना आंदोलन चला रहे हैं.
19 फ़रवरी 2024 को दिल्ली में लद्दाख के नुमाइंदों और सरकार के बीच बातचीत हुई. अब इस बातचीत का अगला दौर 24 फ़रवरी को होगा.

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लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राय
लद्दाख के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने बीबीसी को बताया कि फ़िलहाल अनशन का कार्यक्रम रुका हुआ है.
वे कहते हैं कि अगर 24 फ़रवरी को बातचीत विफल रही तो अगला दिन यानी 25 फ़रवरी लद्दाख के लोगों के लिए बहुत अहम है क्योंकि उस दिन से अनशन शुरू करेंगे.
सोनम वांगचुक ने बताया कि सरकार अपने सभी वादों से मुकर गई है. उनका कहना था कि वह इस लड़ाई को मांगें पूरी होने तक जारी रखेंगे.
वे कहते हैं, "पहले हमें केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद सुनहरे ख़्वाब दिखाए गए. लेकिन समय के साथ ही सरकार अपने वादों से हटती नज़र आई. उम्मीद थी कि केंद्र शासित प्रदेश बनेगा तो उसके साथ विधानमंडल भी होगी."
"लेकिन, लद्दाख को विधानमंडल के बग़ैर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया. इसका मतलब ये हुआ कि यह क्षेत्र हमेशा राज्यपाल के शासन में रहेगा.”
वांगचुक कहते हैं, “हमारी नाज़ुक परिस्थितियों के सेफ़गार्ड के लिए छठी अनुसूची लागू की जाए. पहले जम्मू-कश्मीर के हिस्से के रूप में हमें अनुच्छेद 370 का सेफ़गार्ड मिलता था."
"केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लोगों में काफ़ी ख़ुशी थी. पर कुछ महीने बाद ही इस पर आपत्ति ज़ाहिर की जाने लगी कि हम छठी अनुसूची की बात नहीं करेंगे.''
साल 2019 में बीजेपी सरकार ने अपने चुनावी मैनिफ़ेस्टो में लद्दाख़ को सारे अधिकार देने का वादा किया था लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हुआ है.
वे कहते हैं, “हाल में ही कहा गया कि जम्मू-कश्मीर का स्टेटहुड बहाल किया जाएगा लेकिन लद्दाख को नहीं मिलेगा. तो इसका मतलब ये हुआ कि हमें लोकतंत्र के बग़ैर रखा जाएगा. अब तो चार साल बीत गए हैं, हमें उम्मीद नहीं दिख रही है."
लेह में अंजुमन मोइन-उल-इस्लाम नामक संगठन की महिला विंग की अध्यक्ष एशिया मालू ने भी तीन फ़रवरी को लेह में हुए प्रदर्शन में भाग लिया था.
बीबीसी से वो कहती हैं कि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश तो बन गया, लेकिन छठा शेड्यूल और स्टेटहुड न मिलने से यहां के लोग अपनी पहचान और तहज़ीब खो रहे हैं.
वो कहती हैं, "हमारे बच्चों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं. केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जो वादे किए गए थे, उनको पूरा नहीं किया जा रहा है. हम अब अपनी पहचान ही खो रहे हैं. जब हमारा लद्दाख ही सुरक्षित नहीं है तो लद्दाख की महिलाएं कहाँ सुरक्षित रह सकती हैं. अगर हमारी मांगें पूरी नहीं होती हैं तो आगे भी हम प्रदर्शनों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे."
अंजुमन मोइन-उल-इस्लाम लेह में महिलाओं की बेहतरी के लिए काम करने वाला एक संगठन है.

लेह के रहने वाले टूंडूप थांलिस ने कुछ वर्ष पहले अर्थशास्त्र में मास्टर्स की डिग्री इस उम्मीद में हासिल की थी कि उन्हें गज़ेटेड ऑफ़िसर की नौकरी मिलेगी.
टूंडूप ने सरकारी नौकरी के लिए काफ़ी संघर्ष किया लेकिन उम्र निकल गई नौकरी नहीं मिली और अब वो मानसिक तनाव भी महसूस कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "2016 में मैंने मास्टर्स किया. मैं एक गज़ेटेड पद चाहता था. मैंने काफी तैयारी की थी. पहले मैं जम्मू-कश्मीर पब्लिक सर्विस कमिशन (जेकेपीसी ) में अप्लाई करता था. लेकिन, 2019 में लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया."
"तब से लेकर आजतक लद्दाख में गैज़ेटेड भर्ती नहीं हुई है. अब मेरे पास कोई विकल्प ही मौजूद नहीं है. आज भी बेरोज़गार हूँ और संघर्ष कर रहा हूँ. लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद सरकार ने बहुत कुछ कहा था और हमें भी उम्मीदें थीं."
लद्दाख के अलग होने से पहले जम्मू-कश्मीर पब्लिक सर्विस कमिशन में लद्दाख के लोग भी भर्ती किए जाते थे. लेकिन अब अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद ऐसा होना मुमकिन नहीं है.

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कारगिल ज़िले के रहने वाले सादिक़ अली का हाल भी टूंडूप जैसा है. उन्होंने बहुत पहले स्नातक किया था लेकिन आजतक नौकरी नहीं मिली है.
कारगिल के रहने वाले हाजी मुस्तफा बताते हैं कि अनुछेद 370 हटने से पहले लद्दाख के लोगों को जनजातीय दर्जा होने की वजह से एक प्रोटेक्शन था जो अब नहीं रहा.
मुस्तफा अपैक्स बॉडी लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के लीगल एडवाइजर हैं.
कारगिल में बीबीसी से बातचीत के दौरान उनका कहना था कि लद्दाख को जनजातीय बहुमत होने के बावजूद वो दर्जा नहीं दिया गया है. उनका कहना था कि कई सारे मंत्रालयों की सिफ़ारिशों के बावजूद हमें वो दर्जा नहीं मिला.
उनका ये भी कहना था कि हमारी जो विशेष मांग है वो छठी अनुसूची की है जैसा कि असम, त्रिपुरा, मिजोरम जैसे राज्यों को प्राप्त है.

लद्दाख के लोगों की शिकायत
केंद्र शासित बनने से पहले लद्दाख के लोग जम्मू -कश्मीर पब्लिक सर्विस कमीशन में गैज़ेटेड पदों के लिए अप्लाई कर सकते थे. लेकिन केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद ये सिलसिला बंद हो गया.
वर्ष 2019 से पहले नॉन गैज़ेटेड नौकरियों के लिए जम्मू कश्मीर सर्विस सेलेक्शन बोर्ड भर्ती करता था और उस में लद्दाख के उमीदवार भी होते थे. लेकिन, अब ये नियुक्तियां कर्मचारी चयन आयोग की ओर से की जा रही हैं.
यह आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो केंद्र सरकार के लिए भर्ती करता है. अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने से लेकर आजतक लद्दाख में बड़े स्तर पर नौकरियों के लिए नॉन -गैज़ेटेड भर्ती अभियान नहीं चलाया गया है, जिसको लेकर लद्दाख के युवाओं में गुसा है.
लद्दाख प्रशासन ने अक्टूबर 2023 में अपने आधिकारिक बयान में बताया था कि केंद्र शासित प्रदेश में भर्ती करने की प्रक्रिया जारी है.
लद्दाख के लोग ये उम्मीद कर रहे थे कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ-साथ लद्दाख को विधानमंडल भी दिया जाएगा और छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा भी दी जाएगी.
बीजेपी ने साल 2019 के अपने चुनावी घोषणापत्र में और बीते वर्ष लद्दाख हिल काउंसिल चुनाव के में भी लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का वादा किया था.
लोगों का आरोप है कि बीजेपी इन वादों से मुकर गई. असंतोष ने प्रदर्शन का रूप ले लिया.
भारतीय संविधान के अनुछेद 244 के तहत छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त ज़िला परिषदों (एडीसी ) के स्वायत्त प्रशासनिक क्षेत्रों के गठन का प्रावधान करता है. उन्हें राज्य के भीतर विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक मामलों पर कुछ हद तक स्वायत्तता प्राप्त है.
जिला परिषदों में कुल 30 मेंबर होते हैं. चार मेंबर्स को राज्यपाल नियुक्त करता है.
छठी अनुसूची के मुताबिक़ ज़िला परिषद की अनुमति से ही क्षेत्र में उद्योग लगाए जा सकेंगे.
बीते वर्ष सितम्बर में पीटीआई को दिए गए एक इंटरव्यू में लद्दाख के उपराज्यपाल जीडी मिश्रा ने बताया था कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद विकास के क्षेत्र में एक बड़ी तबदीली है.

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लद्दाख के बीजेपी नेता क्या बोलते हैं?
वहीं लद्दाख में बीजेपी के नेताओं का कहना है कि जिस तरह से चीज़ों को पेश किया जा रहा है वो सच नहीं है. वो यह भी कहते हैं कि बीजेपी ने ही लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया है.
लद्दाख में बीजेपी के प्रवक्ता पिटी कुंगजांग ने बीबीसी को बताया कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब लद्दाख में आहिस्ता-आहिस्ता हर काम पूरा हो रहा है और कई मुद्दों पर काम चल रहा है.
वे कहते हैं, "जहाँ तक लद्दाख को स्टेटहुड देने की मांग है तो अभी ऐसा मुमकिन नहीं है. स्टेट बनने के लिए हमारे पास अपने संसाधन होने चाहिए. हर बात के लिए हमें केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहना होगा. मेरे ख्याल से आने वाले कुछ वर्षों में यह स्टेट बन सकता है. रही बात छठी अनुसूची की तो उस पर हमने बहुत काम किया है.''
पिटी कुंगजांग कहते हैं, ''जिन जगहों पर छठी अनुसूची लागू है, हमने वहां भी राब्ते किए हैं. अगर हमें उस तरह छठी अनुसूची मिलती है तो उस पर फिर से सोचने की ज़रूरत है.''
बीजेपी प्रवक्ता पिटी कुंगजांग कहते हैं, “हम नहीं चाहते कि यहां विकास के काम पर रोक लगे. हम चाहते हैं कि कुछ अच्छे प्रावधान हों जिसके तहत लद्दाख को प्रोटेक्शन दिया जा सके."
ये पूछने पर कि सरकार यहां की बेरोज़गारी पर कुछ क्यों नहीं करती?
वे कहते हैं, "लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से अब तक साढ़े तीन हज़ार नॉन गैज़ेटेड नौकरियां दी गई हैं. ढाई हज़ार के क़रीब आउटसोर्सिंग और साथ ही कॉन्ट्रैक्चुअल नौकरियां भी दी गई हैं. मतलब ये कि हमने क़रीब छह हज़ार नौकरियां दी हैं."
"अभी एक दूसरा मुद्दा गैज़ेटेड पदों को भरने का है. उस पर काम चल रहा है. यहाँ के प्रशासन ने केंद्र सरकार को इसके लिए लिखित रूप में कहा है. हमारे सांसद ने भी सरकार को कई बार कहा है और ये मामला बहुत जल्द हल होगा."

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सरकार की मंशा पर सवाल
सोनम वांगचुक कहते हैं कि बीजेपी ने लोगों को आश्वासन दे कर दो चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल की और लोगों के बीच उनको (बीजेपी को) लेकर एक पॉजिटिव सोच थी.
वो कहते हैं कि दोनों चुनाव में बीजेपी ने स्टेटहुड और छठी अनुसूची को लेकर वादा किया था.
वो आरोप लगाते हैं कि सरकार की मंशा बदलने के पीछे एक गुट काम कर रहा है.
वो कहते हैं, “ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार की मंशा बदलने के पीछे कोई लॉबी काम कर रही है. माना जा रहा है कि इसके पीछे उद्योगपति या माइनिंग गुट है. छठी अनुसूची में ऐसा भी नहीं है कि यहां कोई कुछ नहीं कर सकता है.”
बीजेपी के प्रवक्ता पिटी कुंगजांग ने इन आरोपों का खंडन किया और वो कहते हैं, “मुझे एक ऐसा सबूत दिया जाए कि बाहर के व्यक्ति को ज़मीन या नौकरी दी गई हो.”
वहीं लद्दाख कांग्रेस का कहना है बीजेपी जो कुछ कह रही है वो लोगों को गुमराह करने का एक तरीक़ा है.
लेह ज़िला कांग्रेस के युवा अध्यक्ष टूंडूप नोरबू कहते हैं, “लद्दाख में लोगों को कई समस्याएं हैं. सबसे बड़ी तो बेरोज़गारी की समस्या है.”
बीते चार वर्षों में लद्दाख में विकास पर टूंडूप कहते हैं, “विकास की जो बातें सरकार ने बताईं, बीते चार वर्षों में ज़मीन पर उसका दस प्रतिशत भी हमने नहीं देखा.”

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लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलबीए) के युवा अध्यक्ष रिग्जन जोरे भी दूसरे लद्दाख के लोगों की तरह ही केवल केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिलने से निराश हैं.
वे कहते हैं, “हमें अब फिर सोचना पड़ेगा. लद्दाख में जो हाल में माहौल हो रहा है उसे लेकर डर लगता है. हमारे पास सेफगार्ड नहीं है.”
वो बताते हैं कि लद्दाख के पास पहले चार विधायक थे जो हमारे नुमाइंदे थे.
ये पूछने पर कि बीते चार सालों में लद्दाख कितना बदल गया है?

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वे कहते हैं, "अभी लद्दाख में एक बड़ा प्रदर्शन चल रहा है. ग्लोबल वॉर्मिंग या विकास कार्यों की वजह से लद्दाख में बर्फ़ पहले से कम पड़ती है तो मुश्किलें और बढ़ेंगी. ऐसा न हो कि हमें भारत के किसी और कोने में यहां से चले जाना पड़े.”
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक कहते हैं, “जिस तरह कोई गुट सरकार पर दबाव बना रहा है उसी तरह यहां के लोगों को भी सरकार पर दबाव बनाना ज़रूरी है ताकि सरकार न्यूट्रल होकर हमारी मांगों को स्वीकार कर सके."
वो कहते हैं, "हम सरकार या उस गुट के दबाव में नहीं आ सकते क्योंकि लद्दाख में हालात बिगड़ रहे हैं.”
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