पीरपंजालः जम्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र में फिर सिर क्यों उठा रहा है चरमपंथ?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए श्रीनगर से
केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ों से घिरे पुंछ और राजौरी ज़िलों में भारतीय सेना पर ताज़ा चरमपंथी हमलों के बाद ये क्षेत्र एक बार फिर सुर्ख़ियों में है.
बीते दो सालों से यह क्षेत्र चरमपंथी हमलों और सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच मुठभेड़ों के कारण सुर्ख़ियों में रहा है.
इस साल 21 दिसंबर को चरमपंथियों ने भारतीय सेना के दो वाहनों पर घात लगाकर हमला किया था. इस हमले में भारतीय सेना के चार जवान मारे गए और दो अन्य घायल हो गए थे.
साल 2021 के बाद से जम्मू क्षेत्र के पुंछ-राजौरी में सेना और आम लोगों पर चरमपंथियों ने कई हमले किए.
सेना पर हमले के बाद पूछताछ के लिए बुलाए गए आठ आम लोगों में से तीन की सेना के कैंप में कथित उत्पीड़न के बाद मौत हो गई. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इन नागरिकों के घर पहुंचकर अफ़सोस जताया है और सेना से पेशेवर बने रहने के लिए भी कहा है.
स्थानीय पुलिस सेना के कैंप में आम नागरिकों की कथित टॉर्चर की वजह से हुई मौत की जांच कर रही है.
पुंछ -राजौरी का क्षेत्र

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जम्मू क्षेत्र के पुंछ और राजौरी दो अलग-अलग ज़िले हैं, जिनको पीरपंजाल भी कहा जाता है. ये घने जंगलों से घिरा इलाक़ा है जहां के दुर्गम ऊंचे पहाड़ों के बीच लोग रहते हैं.
पुंछ में मुसलमानों की आबादी क़रीब 90 प्रतिशत है, जबकि राजौरी में ये संख्या 56 प्रतिशत है.
भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा के नज़दीक इन क्षेत्रों में आम लोगों को हमेशा हिंसा का सामना करना पड़ा है.
श्रीनगर से पुंछ की दूरी क़रीब 140 किलोमीटर है.
साल 2021 से पहले, इन क्षेत्रों में आए दिन भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं सामने आती रही हैं. दोनों देश इसके लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं.
भारत -पाकिस्तान सीमा पर होने वाली गोलीबारी का शिकार कभी-कभी आम लोगों भी को होना पड़ता था.
दोनों देशों ने जम्मू -कश्मीर को लेकर दो जंगें भी लड़ी हैं. दोनों ही इस समूचे क्षेत्र पर अपनी-अपनी दावेदारी करते हैं, लेकिन अलग-अलग हिस्सों पर नियंत्रण करते हैं.
भारत और पाकिस्तान के बीच 2021 में फिर से संघर्ष विराम हुआ था और इसके बाद से पीरपंजाल और जम्मू-कश्मीर के दूसरे इलाक़ों की नियंत्रण रेखाओं पर ख़ामोशी है. लेकिन हाल के दिनों में पीरपंजाल क्षेत्र में चरमपंथी हमले और मुठभेड़ें बढ़ने लगी हैं.
पुंछ और राजौरी में गुज्जर, पहाड़ी और बकरवाल समुदाय के लोग रहते हैं. इस इलाक़े में रहने वाली अधिकतर आबादी पहाड़ी भाषा बोलती है.
यहां की आबादी दस लाख से अधिक है. यहां रहने वाले अधिकतर लोगों के रिश्तेदार पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में रहते हैं.
भारत प्रशासित कश्मीर के इस क्षेत्र को पीरपंजाल कहते हैं, जबकि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर वाले उस पार के हिस्से को नीलम घाटी कहा जाता है.
दोनों देशों के बीच 200 किलोमीटर लंबी और 30 किलोमीटर चौड़ी नियंत्रण रेखा है. ये दुनिया की सबसे ख़तरनाक सरहदों में शुमार होती है.
पीरपंजाल क्षेत्र के ऊंचे पहाड़, घने जंगल और दुर्गम रास्ते कश्मीर के दक्षिण हिस्सों को आपस में मिलाते हैं.
कुछ सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि सीमा के इस पार घुसपैठ करने वाले चरमपंथी दक्षिण कश्मीर और पीरपंजाल की पहाड़ियों के रास्तों का इस्तेमाल आसानी से कर पाते हैं और पीरपंजाल से दक्षिण कश्मीर पहुंच जाते हैं.
क्या पीरपंजाल में इंटेलिजेंस ग्रिड से कोताही हो रही है?

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पीरपंजाल क्षेत्र में चरमपंथ की लगातार घटनाओं के बाद इस क्षेत्र में सुरक्षा इंटेलिजेंस को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व महानिदेशक शेषपाल वैद पीरपंजाल में चरमपंथियों के बढ़ते हमलों के सवाल पर कहते हैं कि इंटेलिजेंस की कमज़ोरी किसी ना किसी रूप में नज़र आ रही है. इसके कारण सेना पर इस तरह के हमले हो रहे हैं.
वो बताते हैं, "इस साल पीरपंजाल में सेना पर चार बड़े हमले हुए और सेना को जानों का नुक़सान उठाना पड़ा. अगर क्षेत्र में इंटेलिजेंस ग्रिड मज़बूत होता तो इस तरह के हमले नहीं हो पाते. अगर इन बातों पर नज़र रहती कि घुसपैठ कहां से हुई है तो शायद इतने बड़े हमले ना होते और जवानों की जानें नहीं जातीं. जब आप के पास अधपकी सूचना हो तब ही इस तरह की घटनाएं पेश आती हैं."
पीरपंजल का क्षेत्र क़रीब बीते पंद्रह सालों में चरमपंथ मुक्त बन चुका था.
जब साल 1989 में कश्मीर में भारत विरोधी हिंसक आंदोलन शुरू हुआ तो इसके कुछ समय बाद ही पीरपंजाल में भी हिंसा के शोले भड़क उठे. लंबे समय तक ये क्षेत्र चरमपंथ झेलता रहा.
लेकिन साल 2007 तक सुरक्षाबलों ने इस क्षेत्र से चरमपंथ का सफ़ाया कर दिया था. तब से लेकर अभी तक कभी-कभी घुसपैठ की कुछ घटनाएं अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पेश आती रहीं, हालांकि सुरक्षाबल इससे निपट लेते थे.
शेषपाल वैद कहते हैं कि बीते दो सालों में इस क्षेत्र में 28 चरमपंथी मारे गए हैं और अभी 20-25 बाक़ी हैं, तो इसका मतलब है कि पचास से अधिक चरमपंथी घुसपैठ करके इस तरफ़ आए हैं. सीमा पार से घुसपैठ हो चुकी है, जिसकी जवाबदेही होनी चाहिए.
भारतीय सेना के नार्दन कमांडर उपेंद्र द्विवेदी ने 24 नवंबर 2023 को बताया था कि जम्मू के पीरपंजाल क्षेत्र में अभी भी 20 से 25 चरमपंथी सक्रिय हैं.
भारतीय सेना के पूर्व जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग (नार्दन कमांड) दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी इस बात को मानते हैं कि पीरपंजाल के क्षेत्र की ज़मीनी संरचना सख़्त होने के कारण वहां अधिक सुरक्षाबलों को तैनात किया जाना चाहिए और इंटेलिजेंस ग्रिड को मज़बूत करना होगा.
हुड्डा ये भी कहते हैं, "जिस तरह से घात लगाकर दो बार सेना पर हमला हो चुका है, वो नहीं होना चाहिए था, और ऐसे हमले हमारी कमज़ोरी को ज़ाहिर करते हैं."
वो बताते हैं, "कभी-कभी ये समझा जाता है कि यहां कुछ नहीं हो रहा है और आपके प्रोटोकॉल, प्रोसीजर और ड्रिल्स कमज़ोर पड़ जाते हैं. ये मान लिया जाता है कि कुछ नहीं हो रहा है इसलिए सब सही है. अब तो पीरपंजाल में घटनाएं बढ़ गई हैं. अब यहां के लिए रणनीति को देखना पड़ेगा, रोड ओपनिंग पार्टीज़ के कामकाज को बेहतर करना होगा."
ग्राउंड पर कुछ काम नहीं हुआ है?

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चरमपंथ के ख़िलाफ़ काम करने वाले जम्मू -कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्त पर बताया कि पीरपंजाल को पंद्रह साल पहले चरमपंथ से आज़ाद कराया गया था और अब फिर इस क्षेत्र में चरमपंथ की घटनाएं हो रही हैं.
उनका ये भी कहना था कि ग्राउंड पर अभी और काम करने की ज़रूरत है और चरमपंथ को एक बार फिर पनपने से रोकना होगा.
शेषपाल वैद भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. वो कहते हैं कि बीते पंद्रह सालों में पीरपंजाल क्षेत्र हिंसा से मुक्त रहा है, लेकिन अब फिर वही सब देखने को मिल रहा है जो डेढ़ दशक पहले हो रहा था.
दीपेंद्र सिंह हुड्डा पीरपंजाल की मौजूदा तस्वीर को कुछ इस तरह बयान करते हैं, "ग्राउंड पर क्या हुआ कैसे हो गया, हम बता नहीं सकते. लेकिन हमने जिस तरह यहां आतंकवाद को ख़त्म किया था, उसमें वहां की स्थानीय बकरवाल और गुज्जर समुदाय का बड़ा सहयोग रहा था. अगर अब उधर फिर से आतंकवाद सिर उठा रहा है तो हमें फिर से स्थानीय समुदायों तक पहुंचने के बारे में सोचना होगा."
हुड्डा का यह मानना है कि पीरपंजाल में सुरक्षाबलों और इंटेलिजेंस की मौजूदगी कश्मीर के मुक़ाबले में कम है, जिसके कारण चरमपंथियों ने इसका फायदा उठाया और नुक़सान सेना को उठाना पड़ा.
हुड्डा का ये भी कहना था कि अगर इस तरह की घटनाओं को रोकना है तो वहां की इंटेलिजेंस को बेहतर करना होगा. वह अंग्रेज़ी वाक्य का इस्तेमाल करते हुए कहते हैं कि, ये "गो बैक टू द ड्रॉइंग बोर्ड" वाला मामला है, यानी "सफल होने के लिए फिर से तैयारी करनी होगी."
सुरक्षाबलों की क्या हैं चुनौतियां

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हुड्डा बताते हैं कि कश्मीर में मैदानी इलाक़ा भी है लेकिन कश्मीर की तुलना में पीरपंजाल क्षेत्र दुर्मग पहाड़ियों वाला क्षेत्र है. यहां हर चीज़ तक पहुंच हासिल करना आसान काम नहीं है.
वो कहते हैं, "पीरपंजाल मुश्किल इलाक़ा है, यहां सुरक्षाबलों की संख्या भी कम है. इन हालात में कोई सूचना निकालना मुश्किल काम है. सभी गांवों में घूमना, स्थानीय लोगों से मिलना कोई आसान नहीं है."
कश्मीर में चरमपंथ और हिंसा का क्या हाल है?

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05 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर में चरमपंथ और अलगाववाद के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर अभियान चल रहा है.
इस अभियान से सुरक्षाबलों को चरमपंथ को काबू करने में काफी हद तक सफलता मिली है.
कश्मीर में ख़ामोशी को लेकर सुरक्षा एजेंसियों पर सख़्त कदम उठाने के भी आरोप भी लग रहे हैं.
हालांकि, कश्मीर में टार्गेट किलिंज़ का सिलसिला जारी है. बीते दो महीनों में जम्मू-कश्मीर पुलिस के तीन कर्मियों को निशाना बनाकर उनकी हत्या की गई.
बीते साल कश्मीर में कई कश्मीरी पंडितों, ग़ैर कश्मीरी प्रवासी मज़दूरों और कश्मीर में काम करने वाले ग़ैर कश्मीरी सरकारी कर्मचारियों की गोली मारकर हत्या की गई थी.
साल 2019 में अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के बाद शुरू हुआ पत्थरबाज़ी और हड़तालों का सिलसिला बंद हो चुका है और साथ ही सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच एनकाउंटर होने की घटनाएं भी कम हो चुकी हैं.
शेषपाल वैद बताते हैं कि जिस तरह से कश्मीर में चरमपंथ पर काबू पाया गया है, उसको बरकरार रखने के लिए एक दबाव बना के रखना पड़ेगा, तब जाकर कश्मीर के हालात नियंत्रण में रह सकते हैं.
अक्तूबर 2023 में उस समय के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने बताया था कि 2010 की तुलना में 2023 में अब तक कश्मीर के 10 स्थानीय युवा चरमपंथी गुटों में शामिल हुए, जबकि साल 2010 में 210 युवाओं ने हथियार उठाए थे.
सरकार के दावे

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भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने 08 दिसंबर 2023 को लोकसभा में जम्मू -कश्मीर में हिंसा के ताज़ा आंकड़े पेश किए थे.
अमित शाह ने कहा कि उन्होंने पहले ही कहा था कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने से कश्मीर में हिंसा की घटनाएं कम होंगी.
गृह मंत्री की तरफ़ से पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक़, "साल 2004 से साल 2008 तक जम्मू -कश्मीर में आतंकवाद की कुल 40,164 घटनाएं पेश आई थीं, जबकि 2008 से 2014 के बीच 7,217. अब ये सिमट कर 2,197 तक नीचे आ गई हैं और इन घटनाओं में 70 प्रतिशत कमी आई है."
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2023 में घुसपैठ की 48 घटनाएं पेश आई हैं, जबकि 2010 में ये संख्या 489 थी.
हालांकि, कश्मीर घाटी में इस साल दो बड़े चरमपंथी हमलों में सेना के कर्नल, मेजर समेत एक पुलिस अधिकारी के अलावा चार जवान मारे गए.
पुंछ और राजौरी की तरह ही यह दोनों घटनाएं अनंतनाग और कुलगाम के घने जंगलों में पेश आई थीं.
पीरपंजाल में चरमपंथी घटनाएं

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पीरपंजाल क्षेत्र में बीते दो सालों में दो दर्जन से ज्यादा सुरक्षाबल के जवान और एक दर्जन के क़रीब आम नागरिक मारे गए हैं.
अक्तूबर 2021 में पीरपंजाल में 17 दिन का सबसे लंबा एनकाउंटर चला था, इसमें नौ भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. पीरपंजाल में लंबे समय के बाद चरमपंथ की ये सबसे बड़ी घटना थी.
अक्तूबर 2021 के हमले के बाद से 21 दिसंबर 2023 की घटना इस तरह की पीरपंजाल इलाक़े में हुई, चौथी घटना है.
इस साल अब तक जम्मू क्षेत्र में सेना के कुल 19 जवान मारे गए हैं. बीते दो सालों में दो दर्जन से अधिक सेना के जवान पीरपंजाल में मारे गए हैं.
इस साल 20 अप्रैल को 5 जवानों की जान गई थी. इसके अलावा 5 माई को 5, 22 नवंबर को 5 और 21 दिसंबर को 4 जवानों की जान गई.
साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक़, जम्मू -कश्मीर में साल 2022 के मुक़ाबले में साल 2023 में सुरक्षाबलों को ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ा है. साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल कश्मीर में चरमपंथी घटनाओं के आंकड़े इकट्ठा करता है.
साल 2022 में कुल 30 सुरक्षाबल चरमपंथी हमलों और चरमपंथ विरोधी अभियानों में मारे गए जबकि 2023 में अभी तक 33 सुरक्षाबलों की जान गई.
हालांकि, 2018 में 95 सुरक्षाबलों की जान गई थी, जबकि 2019 में 78 और 2020 में 56 और 2021 में ये संख्या 45 थी.
साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक़, बीते दो सालों में सुरक्षाबलों पर हमलों के बाद चरमपंथियों और सुरक्षाबलों की मौतों का अनुपात बदल गया है.
पहले छह चरमपंथियों की जान के अनुपात में एक सुरक्षाबल की जान थी, अब सिर्फ़ ये ढाई चरमपंथी के अनुपात में एक सुरक्षाकर्मी है.
जानकार कहते हैं, "इसका मतलब है कि सुरक्षाबलों की जान अब पहले से अधिक जा रही है."
हालांकि, यहां इस बात को स्पष्ट करना जरूरी है कि पीरपंजाल की सभी घटनाएं सेना पर सीधे तौर हमले नहीं थे, बल्कि सुरक्षाबलों को कई जगहों पर चरमपंथियों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद चरमपंथी अभियान शुरू किए थे, जहां सुरक्षाबलों को नुक़सान उठाना पड़ा.
जनवरी 2023 से लेकर नवंबर 2023 तक नियंत्रण रेखा और भीतरी इलाक़ों में सेना और पुलिस ने 27 चरमपंथियों को मारा है. इस समय के भीतर मुठभेड़ों में सेना के 16 जवानों की जान गई.
जनवरी 2023 में चरमपंथियों ने राजौरी के डोंगरगांव में सात नागरिकों की हत्या की थी, जो हिंदू थे.
कई हमलों में ऐसा भी हुआ जब हमलावर चरमपंथियों का कोई पता नहीं चल पाया जैसा 21 दसंबर 2023 के हमले में हो रहा है.
पीरपंजाल में सेना पर हमलों की ज़िम्मेदारी पीपल्ज़ एंटी फ़ासिस्ट फ़्रंट (पीएपीएफ़) ने स्वीकार की है. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि (पीएपीएफ़) जैश -ए-मोहम्मद चरमपंथी संगठन का फ़्रंट है.
(पीएपीएफ़) 2019 में पहली बार उस वक्त सामने आया जब जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया गया.
स्थानीय आबादी का क्या कहना है?

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पीरपंजाल में चरमपंथ की इन घटनाओं से आम लोगों में एक तरह का ख़ौफ़ पैदा हो गया है. वो ये समझ नहीं पा रहे हैं कि अचानक पीरपंजाल में क्या हो रहा है.
पुंछ के एक स्थानीय नेता सफ़ीर सोहरवर्दी ने बताया की जिस तरह से पीरपंजाल में चरमपंथ अपने पैर पसार रहा है उससे आम लोगों में बड़ा डर पैदा हुआ है.
वो बताते हैं कि डेढ़ दशक तक ये क्षेत्र चरमपंथ से ख़ाली रहा है और अब अचानक चरमपंथ की बढ़ती घटनाओं ने सभी को चिंतित कर दिया है.
उन्होंने कहा "जब इस क्षेत्र में पंद्रह साल पहले चरमपंथ चरम पर था, तब भी यहां की स्थानीय आबादी सुरक्षाबलों के साथ-साथ खड़ी थी और उनका पूरा साथ दिया. लेकिन आज हालात अलग हैं. सुरक्षाबलों और आम लोगों में कोई तालमेल नहीं है. किसी जगह चरमपंथ की कोई घटना होती है तो आम लोगों को सुरक्षाबल परेशान करते हैं."
पुंछ के एक दूसरे स्थानीय निवासी मोहम्मद सैयद कहते हैं कि आम आबादी ख़ुद परेशान हैं कि पीरपंजाल में ये सब क्या हो रहा है.
उनका सवाल है कि यहां की शांति को क्यों भंग किया जा रहा है?
चरमपंथी घटनाओं के लिए पीरपंजाल को ही क्यों चुना जा रहा है?

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जानकारों का मानना है कि जिस तरह से कश्मीर घाटी में चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान चलाया गया और बीते चार सालों में बड़ी संख्या में चरमपंथी मारे गए, चरमपंथियों के लिए घाटी में रहना मुश्किल हो गया है. हालात देखते हुए चरमपंथियों ने उन पहाड़ी क्षेत्रों का रुख़ किया है जहां उनके सामने सुरक्षाबलों से बचे रहने में अधिक चुनौतियां नहीं हैं.
जानकर ये भी कहते हैं कि इस इलाक़े के नियंत्रण रेखा से क़रीब होने के कारण भी इस क्षेत्र को चुना गया है.
शेषपाल वैद कहते हैं, "कश्मीर में बीते कुछ समय से चरमपंथ का ग्राफ़ नीचे आ चुका है, वहां पनाह लेना इनके लिए मुश्किल हो रहा है. अब जम्मू के पीरपंजाल क्षेत्र को चुना गया है. इस क्षेत्र से इन्हें नियंत्रण रेखा के क़रीब रहने का फ़ायदा मिलता है. यहां वो आसानी से घुसपैठ कर पाते है और आसानी से छुप भी पाते हैं. इस क्षेत्र में पहाड़ों के बीच कई गुफाएं हैं, घने जंगल हैं और यह चारों तरफ़ से घिरा है. इन सब बातों का फ़ायदा चरमपंथी उठा रहे हैं."
जानकर ये भी मानते हैं कि चरमपंथी जम्मू में सक्रिय होकर लद्दाख़ क्षेत्र में सेना का दबाव कम करने की कोशिश करना चाहते हैं. उनका ये भी कहना है कि बीते पंद्रह सालों में सुरक्षाबलों की तादाद जम्मू क्षेत्र में कम हो गई है, जिसका फ़ायदा उठाकर चरमपंथियों ने अपने क़दम फिर से जमाने शुरू किए हैं.
शेषपाल वैद पीरपंजाल में हो रही घटनाओं को "गुर्रिला युद्ध" के रूप में देखते हैं. वो बताते हैं जिस तरह से हमले हो रहे हैं, उससे ये संकेत मिल रहा है कि सीमापार से भी चरमपंथी इस तरफ़ भेजे गए हैं.
पीरपंजाल को चरमपंथ के लिए चुने जाने का एक और कारण जानकर ये बताते हैं कि पीरपंजाल का इलाक़ा ऐसा है कि अगर इस क्षेत्र में चरमपंथियों पर दबाव बनाया गया तो वो वापस सीमा पार जा सकते हैं.
हालांकि, दीपेंद्र सिंह हुड्डा का मानना है कि पाकिस्तान ऐसा नहीं चाहता है कि सिर्फ़ कश्मीर में चरमपंथ को सक्रिय रखा जाए, बल्कि वो चाहता है कि जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों को निशाना बनाया जाए.
उनका कहना था कि साल 2013 में भी जम्मू क्षेत्र में कई बड़े हमले किए गए और वहां घुसपैठ की घटनाएं भी बढ़ गईं थीं, लेकिन बाद में इसमें उन्हें बहुत अधिक कामयाबी नहीं मिली. उसके बाद अब फिर से इन शोलों को हवा दी जा रही है.
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