जम्मू-कश्मीर: पुंछ में सेना के वाहनों पर चरमपंथी हमला, चार सैनिकों की मौत

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- Author, मोहित कंधारी
- पदनाम, जम्मू से, बीबीसी के लिए
गुरुवार को जम्मू-कश्मीर के पुंछ ज़िले में सेना के दो वाहनों पर घात लगाकर चरमपंथी हमला हुआ जिसमें चार सैनिकों की मौत हो गई है.
अधिकारियों के मुताबिक़, सूरनकोट पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले इलाके़ में डेरा की गली और बुफलियाज़ के बीच एक मोड़ पर गुरुवार दोपहर पौने चार बजे चरमपंथी हमला हुआ.
सेना ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि सूरनकोट के पास हुए हमले में चार जवानों की मौत हुई है.
अधिकारियों ने बताया है कि मारे गए दो सैनिकों के शव क्षत-विक्षत अवस्था में मिले थे.
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राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों--महबूबा मुफ़्ती, गुलाम नबी आज़ाद और फ़ारूख़ अब्दुल्ला-- ने इस ‘हमले की कड़ी निंदा’ की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैबा की शाखा पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ़) ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
जम्मू स्थित डिफेंस पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल सुनील बर्थवाल ने कहा कि "आतंकवादियों की मौजूदगी को लेकर खुफ़िया जानकारी के आधार पर बुधवार रात पुंछ के थानामंडी-सूरनकोट क्षेत्र में ज्वाइंट सर्च ऑपरेशन चल रहा था."
सेना का कहना है कि जब सैनिकों के एक ट्रक और जिप्सी पर हमला किया गया तो सैनिकों ने भी इसका तुरंत जवाब दिया.

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सेना की गाड़ियों पर घात लगाकर हुआ हमला
घायलों को अस्पताल में भर्ती किया गया है. अधिकारियों के मुताबिक़ ऑपरेशन जारी है और आगे और भी जानकारियाँ सामने आ सकती हैं.
पुंछ और राजौरी के बीच ये जंगल का इलाक़ा है और इस जगह को 'डेरा की गली' कहते हैं.
अक्टूबर 2021 के बाद से इस इलाक़े में ये इस तरह की चौथी घटना है.
सेना ने जो आधिकारिक जानकारी दी है उसके अनुसार, 20 दिसंबर की रात से खुफ़िया जानकारी के आधार पर डेरा की गली इलाक़े में एक सर्च अभियान चलाया जा रहा था.
सेना का कहना है कि इस रास्ते से जिप्सी और ट्रक गुज़र रहे थे, जिसमें सेना के जवान थे. उन पर वहां पहाड़ी इलाक़े में छिपे हुए चरमपंथियों ने घात लगाकर हमला किया था.
पहले उन्होंने गाड़ियों के टायर पंचर किए, फिर ग्रेनेड फेंके और गोलीबारी की.
सेना के काफिले पर अचानक हमला हुआ और इसके बाद चरमपंथी कहां चले गए किसी को पता नहीं है. फिलहाल इस इलाक़े में चरमपंथियों की तलाश जारी है.
घटनास्थल से सामने आ रही तस्वीरें और वीडियो परेशान करने वाली हैं. तस्वीरों में देखा जा सकता है कि गाड़ियों के पास सड़क पर खून फैला है, सैनिकों के टूटे हुए हेलमेट बिखरे पड़े हैं. साथ ही सेना के दो वाहनों के टूटे हुए शीशे के टुकड़े सड़कों पर पड़े दिख रहे हैं.
आबादी से दूरी पर है ये जगह

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इस इलाक़े से रिहाइशी इलाक़ा कम से कम पांच से छह किलोमीटर की दूरी पर है.
ऐसा लगता है कि चरमपंथियों ने इस इलाक़ों को जानबूझ कर चुना. उन्हें पता था कि इस रास्ते से सेना की गाड़ियों का आना-जाना होता रहता है,
एक और बात ये है कि यहां पर थोड़ी सड़क भी ऊबड़-खाबड़ है तो जब बड़ी गाड़ी यहां से गुज़रती है तो वो धीमी हो जाती है.
ऐसे में उन्हें निशाना बनाना चरमपंथियों के लिए आसान होता है और चूंकि आस-पास आबादी नहीं है तो उनके पास मौक़ा होता है कि पीछे से मदद आने तक वो भाग सकें.

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जम्मू में बढ़ती चरमपंथी घटनाएँ
चरमपंथी हमले के बाद कहां गुम हो जाते हैं इसका पता लगाने के लिए पहले भी सेना ने यहां तीन-तीन हफ्तों तक अभियान चलाए हैं.
सवाल ये है कि क्या चरमपंथियों को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिल रहा है या फिर वो बंदूक की नोंक पर लोगों से ज़रूरत का सामान ले पा रहे हैं.
इससे पहले कुछ अधिकारी कह चुके हैं कि ये चरमपंथी छोटे समूहों में काम करते हैं.
नॉर्दन कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र दीक्षित ने भी कहा था कि इस इलाक़े को साफ करने में उन्हें एक साल तक का वक्त लग सकता है.
पिछले महीने ही राजौरी के पास बाजीमल फॉरेस्ट एरिया के धर्मसाल बेल्ट पर सुरक्षबलों और चरमरपंथियो के बीच मुठभेड़ हुई थी जिसमें सेना के पांच जवानों की मौत हो गई थी.
पहले के हमलों में सेना के ठिकानों को निशाना बनाया जाता था, उदाहरण के लिए उरी और श्रीनगर का हमला देख सकते हैं. लेकिन अब पैटर्न बदल गया है अक्टूबर 2021 के बाद से सड़क के बीचोबीच हमले हो रहे हैं.
आप ये भी देखेंगे कि इस बीच कश्मीर में कोई बड़ा हमला नहीं हुआ बल्कि राजौरी और पुंछ में हमले बढ़े हैं.
इसकी एक वजह ये है कि ये इलाक़ा अपेक्षाकृत शांत हुआ करता था, तो सरकार का दावा था कि ये इलाक़ा चरमपंथ मुक्त है. चरमपंंथी एक तरह से सरकार को भी चुनौती दे रहे हैं.

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इस साल जम्मू क्षेत्र में सेना के 19 जवानों की मौत
पिछले महीने भी राजौरी के पास पांच आर्मी जवान मारे गए थे. दो दिनों तक चले सैन्य ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैबा के शीर्ष कमांडर और उसके एक साथी को मारा गया था.
मई में सेना के ऑपरेशन में राजौरी में पांच जवान मारे गए और एक अधिकारी घायल हो गए थे. ऑपरेशन में एक विदेशी चरमपंथी की भी मौत हुई थी.
इस साल राजौरी, पुंछ और रिआसी ज़िलों में कई चरमपंथी हमले हुए जिनमें सेना के 19 जवान मारे गए. (20 अप्रैल, 5 की जान गई; 05 मई, 5 की जान गई; 22 नवंबर, 5 की जान गई और 21 दिसंबर, 4 की जान गई)
अधिकारियों का कहना है कि "हताशा में सीमा पार से इस इलाके में आतंकवाद को दोबारा बढ़ावा देने की कोशिशें की जा रही हैं."

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कश्मीर के नेता इस हमले पर क्या कह रहे हैं?
डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी (डीपीएपी) के अध्यक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने गुरुवार को हुए इस हमले की निंदा करते हुए एक्स पर लिखा कि ये "विनाशकारी" है हमें हताहतों की संख्या को लेकर बेहद दुखद है.
उन्होंने लिखा, "जम्मू में आतंकवाद की बढ़ी घटनाएं हैरान करने वाली हैं. सरकार से अपील करता हूं कि तुरंत इस पर कोई निर्णायक फैसला लें. घायलों के ठीक होने की प्रार्थना करता हूं."
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने भी इस घटना को ‘भयानक’ बताया है.
उन्होंने इस "कायरतापूर्ण हमले" की निंदा की और मारे गए सैनिकों के परिवारों और प्रियजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की.
अपनी पार्टी के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री अल्ताफ़ बुखारी ने कहा है कि वह सैनिकों की मौत के बारे में सुनकर व्यथित हैं.
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