कश्मीर: मुठभेड़ के तीन दिन बाद भी फ़रार क्यों हैं चरमपंथी?

सेना का सर्च अभियान

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में आज चौथे दिन भी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ भारतीय सेना का तलाशी अभियान जारी है.

इस तलाशी अभियान की निगरानी सेना और पुलिस के आला अधिकारी कर रहे हैं.

भारतीय सेना ने अनंतनाग में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान में हेलीकॉप्टर और ड्रोन का इस्तेमाल भी किया है. हेलीकॉप्टर और ड्रोन की मदद से चरमपंथियों के छिपने की जगह का पता लगाने की कोशिश की जा रही है. सेना ने चरमपंथियों की तरफ़ कई गोले भी दागे हैं.

बीते बुधवार भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस एक सूचना के आधार पर अनंतनाग ज़िले के गड़ोल इलाक़े में चरमपंथियों के लिए तलाशी अभियान शुरू किया था.

इस तलाशी अभियान के दौरान ही चरमपंथियों की ओर से सेना और पुलिस पर अंधाधुंध गोलियां चलाए जाने से सेना के एक कर्नल, मेजर और जवान के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक डीएसपी की मौत हुई है.

लेकिन सेना और पुलिस के चरमपंथियों की पनाहगाह तक पहुंचने से पहले से वहां मौजूद चरमपंथियों ने सेना और पुलिस पर हमला किया.

कथित ठिकाने तक पहुंचने से पहले ही चरमपंथियों ने सेना और पुलिस पर हमला बोल दिया.

इसके बाद से सुरक्षाबल इन चरमपंथियों की तलाश कर रहे हैं.

कहां हुई ये मुठभेड़

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इस बीच जम्मू कश्मीर पुलिस ने ट्वीट कर साफ़ लहज़ों में कहा है कि, "पूर्व पुलिस/सेना अधिकारी 'घात लगाकर हमले' की बात न कहें. यह पूरी तरह से इनपुट पर आधारित ऑपरेशन है, जो अभी जारी है और सभी दो-तीन आतंकवादी ख़त्म किए जाएंगे."

श्रीनगर से क़रीब सौ किलोमीटर दूर दक्षिणी कश्मीर में अनंतनाग ज़िले में घने जंगलों में ये सर्च ऑपरेशन जारी है.

इस इलाके में ऊँची पहाड़ियों और घने जंगलों के निचले हिस्से में रिहायशी बस्ती है. इस इलाके में पेड़ पौधों की भी घनी आबादी है और दाएं -बाएं खेत खलिहान हैं.

अनंतनाग पार करने के बाद एक पर्यटन के लिए मशहूर क़स्बा कोकरनाग आता है. और कोकरनाग से क़रीब बीस किलोमीटर के फासले पर गड़ोल इलाका है, जहां तलाशी अभियान चल रहा है.

अनंतनाग और कोकरनाग के बीच 30 किलोमीटर की दूरी है. और मुठभेड़ जंगलों के बीचों-बीच हुई है जहां पहुंचने के लिए चढ़ाई चढ़नी पड़ती है.

इस पहाड़ी के पिछले हिस्से में जम्मू क्षेत्र का बानिहाल और रामबन इलाका पड़ता है.

ऑपरेशन के दूसरे दिन घटनास्थल के पास से दिन भर गोलियों और धमाकों की आवाज़ें आ रही थी. संभवत: सुरक्षाबलों को ये अंदाज़ा रहा होगा कि जंगल के दाएं -बाएं चरमपंथियों का ठिकाना है, जिसे निशाना बनाया जा रहा था.

आज शुक्रवार तीसरे दिन तड़के सुबह भी कुछ गोलियां चलने की आवाज़ें सुनी गयीं हैं. इस ऑपरेशन को शुरू हुए दो दिन से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है.

कितना कठिन है ये इलाक़ा

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सुरक्षाबलों की ओर से इन चरमपंथियों पर काबू पाने के लिए पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं. पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी गई है.

सुरक्षाबलों ने इस इलाके में कई जगहों पर तेज रोशनी वाली फ़्लड लाइट्स भी लगाई हैं.

लेकिन इन तमाम इंतज़ामों के बावजूद अभी भी तलाशी अभियान ख़त्म होता नहीं दिख रहा है और न ही किसी चरमपंथी के मारे जाने की ख़बर आ रही है.

हालाँकि, सुरक्षाबलों ने चरमपंथियों को खोजने के लिए ड्रोन्स के साथ-साथ उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है.

रिहायशी बस्तियों में चरमपंथियों को खोजना और उन पर काबू पाना उतना चुनौतीपूर्ण नहीं होता जितना जटिल भौगोलिक पृष्ठभूमि में होता है.

जम्मू -कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजी शेषपाल वैद कहते हैं, "अभी जिस जगह पर ऑपरेशन चल रहा है, वो काफ़ी मुश्किल जगह है. यहां जंगल, ऊँची पहाड़ियां, और चढ़ाई है. दूसरी बात ये है कि जो सुरक्षाबल वहां मौजूद हैं, उनकी जगह दूसरे सुरक्षाकर्मियों को लेनी होती है. एक ही जवान चौबीस घंटे काम नहीं कर सकता. दूसरी बात वहां खाना पहुंचाना पड़ता है, लाइट्स लगानी पड़ती हैं, हथियार लाने पड़ते हैं और भी ज़रूरत की दूसरी चीज़ें भी ठिकाने पर पहुंचानी होती हैं. ऐसे हालात में आतंकवादियों की तलाश में समय भी लगता है."

वह बताते हैं, "मैं समझता हूँ कि ये संभव है कि अधिकारियों को खुद भी उस जगह की जानकारी नहीं रही होगी जहां पर ये चरमपंथी छिपे हुए थे. नतीजा ये निकला कि वे उनके जाल में फँस गए. दूसरी संभावना ये भी है कि मारे गए अधिकारी इलाके का घेरा डालकर सीधा उधर चले गए होंगे. और उन्हें चरमपंथियों की पोजिशन का अंदाज़ा नहीं रहा होगा.”

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आशंका

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया है कि जब भी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कोई अभियान चलाया जाता है तो इसमें कुछ भी होने की आशंका रहती है.

शेषपाल वैद कहते हैं, "मुझे यहां पर लगता है कि ऑपरेशन का जो सूत्र था, कभी-कभी वह डबल एजेंट भी होता है. सूत्र दूसरी तरफ (चरमपंथियों) से भी मिले होते हैं. इस बात को देखना चाहिए कि जिसने भी सूचना दी थी, क्या वो चरमपंथियों के साथ मिला हुआ तो नहीं था? ऑपरेशन के बाद इस बात को देखना चाहिए."

"एक और अहम बात वो ये कि अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद कश्मीर से आतंकवाद ख़त्म होता नज़र आ रहा है. अब चरमपंथी शहरों की जगह जंगलों में रहने लगे हैं ताकि सुरक्षाबलों को ज़्यादा नुकसान पहुंचाया जा सके. ये भी देखने की ज़रूरत है कि चरमपंथियों को ये सूचना कैसे मिली कि सुरक्षाबल आ रहे हैं?"

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जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अनंतनाग ऑपरेशन के अगले दिन यानी बीते बुधवार को ट्वीट कर बताया कि ‘कर्नल मनप्रीत सिंह, मेजर आशीष धोंचक और डीएसपी हुमांयू भट्ट की अटूट वीरता को सच्ची श्रद्धांजलि, जिन्होंने इस जारी ऑपरेशन के दौरान सामने से नेतृत्व करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए. हमारी सेनाएं उज़ैर खान सहित लश्कर के दो आतंकवादियों को घेरने में संकल्प के साथ जुटी हुई हैं."

पुलिस ने जिस चरमपंथी उज़ैर ख़ान का ज़िक्र किया है वो कोकरनाग इलाके का स्थानीय निवासी है. इब्तिदाई रिपोर्ट्स के मुताबिक़, उज़ैर ख़ान वर्ष 2022 में चरमपंथी धड़ों में शामिल हो गया था.

13 जून 2023 से अब तक, कश्मीर में कुल आठ मुठभेड़ हो चुकी हैं. पुलिस ने दावा किया है कि इन मुठभेड़ों में 15 चरमपंथी मारे गए हैं. पुलिस ने बताया है कि इन चरमपंथियों से कुछ विदेशी शामिल थे.

इन आठ मुठभेड़ों में सेना और पुलिस के तीन अधिकारियों समेत छह जवान मारे गए हैं. ये मुठभेड़ें कश्मीर के कुपवाड़ा, पुलवामा, कुलगाम और अनंतनाग में हुई हैं.

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