कश्मीर: 14 साल के चरमपंथी की मुठभेड़ में मौत और युवाओं को लेकर उठते सवाल

फ़ैसल गुलज़ार

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत प्रशासित कश्मीर के शोपियां ज़िले में बीते शनिवार को सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मरने वाले चरमपंथियों में 14 साल का फ़ैसल गुलज़ार भी शामिल था.

कहा जा रहा है कि वह दो दिन पहले ही चरमपंथी गुट में शामिल हुए थे. इस मुठभेड़ के बाद कश्मीरी युवाओं के भविष्य को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं.

कश्मीर में चरमपंथियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ कोई नई बात नहीं है, लेकिन तीन साल बाद ऐसा हुआ है जब सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में एक 14 साल का किशोर मारा गया है.

शोपियां ज़िले के हदीपोरा में बीते शनिवार को सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच एक मुठभेड़ हुई जो क़रीब 18 घंटे तक चलती रही.

इस मुठभेड़ में सेना ने अल-बदर के तीन चरमपंथियों को मारने और उनसे हथियार बरामद करने का दावा किया.

इससे पहले साल 2018 में भी श्रीनगर के मलूरा इलाके में जो तीन चरमपंथी मारे गए थे, उनमें 14 वर्षीय किशोर भी शामिल था.

फ़ैसल का गाँव

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'हमें नहीं मालूम, वो चरमपंथियों के बीच कैसे चला गया'

फ़ैसल के पिता गुलज़ार अहमद कहते हैं कि उन्हें ख़ुद भी मालूम नहीं कि उनका बेटा कैसे चरमपंथियों के समूह में शामिल हो गया.

शोपियाँ के चित्रगाम स्थित अपने घर से फ़ोन पर बात करते हुए उन्होंने बीबीसी को बताया, "इसी महीने की छह तारीख़ से वो ग़ायब था. कई बार फ़ोन किया लेकिन उसने नहीं उठाया."

वो याद करते हैं, "जिस दिन एनकाउंटर हुआ, उस दिन फ़ैसल ने हमें फ़ोन किया और बताया कि फ़ौज ने उन्हें घेरा है वो फँसे हैं. उसने कहा कि कि मुझे माफ़ करना, अगर कभी मुझसे कोई ग़लती हो गई हो. मैंने पूछा कि तुम कहाँ फँसे हो? उसने कहा कि मैं सतरज इलाक़े में एक बाग़ में हूँ."

इसके बाद फ़ैसल के परिवार ने घटनास्थल पर पहुँच कर उसे सरेंडर करने की अपील भी की थी. इस एनकाउंटर के बाद पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा है कि फ़ैसल के माता-पिता को एनकाउंटर स्थल पर लाकर बहुत देर तक यह कोशिश की गई कि वो आत्मसमर्पण कर दे लेकिन उनके बार-बार कहने और सुरक्षाबलों के आश्वासन के बावजूद उसने ऐसा नहीं किया.

दसवीं कक्षा में पढ़ने वाला फ़ैसल चार बहनों में इकलौता भाई था. उसके पिता खेती के अलावा पुरानी गाड़ियाँ ख़रीदने और बेचने का काम करते हैं.

फ़ैसल के चचेरे भाई यासिर अहमद ने बीबीसी से कहा, "हम खु़द नहीं समझ पा रहे हैं कि वो चरमपंथी कैसे बन गया. वो घर में बिल्कुल सामान्य था. पाँच वक़्त का नमाज़ी था और हमारे सामने कभी चरमपंथ से जुड़ी कोई बात नहीं करता था."

अपने फ़ोन में फ़ैसल की तस्वीर दिखाते यासिर अहमद

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सोशल मीडिया के ज़रिए साइबर ग्रूमिंग

जम्मू और कश्मीर पुलिस के पूर्व डायरेक्टर जनरल डॉक्टर शेषपाल वैद कहते हैं कि किशोरों का चरमपंथी संगठनों में शामिल होना कट्टरपंथ का नतीजा है.

वो कहते हैं, "पुलिस में रहने के दौरान मैंने देखा है कि कैसे चरमपंथी छोटे बच्चों और किशोरों को बहला-फुसलाकर चरमपंथ की ओर उनका रुझान बढ़ाते हैं. छोटे बच्चों को अच्छे-बुरे का फ़र्क़ नहीं मालूम होता है, उनसे जैसा कहा जाता है, वो वैसा ही करते हैं."

वैद कहते हैं कि ऐसे बच्चों को कट्टरपंथ की ओर मोड़ने में सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल किया जाता है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "पहले सोशल मीडिया के ज़रिए किशोरों और कम उम्र के लड़कों से दोस्ती की जाती थी फिर उन्हें जिहाद का सबक़ सिखाया जाता था. जब मैं कार्यरत था, उस समय सीमा पार से ऐसे कई सोशल मीडिया अकाउंट सक्रिय रहते थे."

डॉक्टर वैद कहते हैं कि छोटे लड़कों को चरमपंथ से दूर रखने की कुछ कोशिशें ज़रूर की गई हैं लेकिन वो उन कोशिशों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं.

उन्होंने कहा, "किशोरों को चरमपंथ से दूर रखने का काम अकेले पुलिस नहीं कर सकती. इसमें समाज के हर वर्ग को शामिल करना होगा. इसमें शिक्षकों, धार्मिक विद्वानों और दूसरे लोगों को भी साथ आना होगा."

जम्मू और कश्मीर पुलिस के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि कम उम्र के लड़कों का मिलिटेंसी में शामिल होने का कारण 'साइबर ग्रूमिंग' भी है. साइबर ग्रूमिंग यानी फ़ेसबुक, वॉट्सऐप और इंटरनेट के अन्य माध्यमों से किशोरों को चरमपंथ की ओर खींचना.

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'सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नाइंसाफ़ी'

कुछ लोग इस विषय पर पुलिस अधिकारियों के विश्लेषण से भिन्न राय रखते हैं.

कश्मीर यूनिवर्सिटी में नागरिक शास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद अमीन का मानना है कि कश्मीर का कट्टरपंथ वैसा नहीं है, जैसा उसे पेश किया जाता है.

वो कहते हैं, "कश्मीरी समाज बहुत ही सुलझा हुआ है. कट्टरपंथ की थ्योरी पर बात करने की बजाय हमें यह देखना है कि कश्मीर में बीते 30 वर्षों में जैसा 'इंस्टीट्यूशनल ब्रेकडाउन' हुआ है, उसे सरकार और सिविल सोसायटी के लोग देखें-परखें."

प्रोफ़ेसर अमीन का मानना है कि कई बार इंस्टिट्यूशनल ब्रेकडाउन की वजह से इंसान अनचाहे हालात में फँस जाता है.

प्रोफ़ेसर अमीन मानते हैं कि कश्मीर में 14-15 साल के किशोरों का बंदूक़ उठाना चिंताजनक है. वो कहते हैं, "कम उम्र के लड़कों को किताबें छोड़कर बंदूक़ें उठाना रोंगटे खड़े करने वाला है. सरकार और समाज, दोनों को इस ओर ध्यान देना चाहिए."

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ख़तरनाक रुझान

कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक गौहर गिलानी कहते हैं की इस मामले में जिस हद तक चरमपंथी ज़िम्मेदार हैं, वैसी ही ज़िम्मेदारी सुरक्षाबलों पर भी है.

वो कहते हैं, "यह ख़तरनाक रुझान है. मेरे ख़याल में बच्चों को चरमपंथ में शामिल करने वाले और उन्हें मारने वाले, दोनों ही क़सूरवार हैं. दोनों पर है नैतिक सवाल उठते हैं और दोनों ही इसे न्यायसंगत नहीं ठहरा सकते."

कश्मीरी विश्लेषकों का एक तबक़ा कहता है कि मिलिटेंसी से जुड़ा 'ठाट-बाट' भी किशोरों को चरमपंथ की ओर खींचता है.

विदेश से 'पीस ऐंड कन्फ़्लिक्ट' की पढ़ाई कर चुके कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक रौफ़ रोसोल कहते हैं, "जिस समाज में मिलिटेंट होते हैं, वहाँ बच्चों को लग सकता है कि वो भी चरमपंथी बनकर आम ज़िंदगी से ऊपर उठ सकता है. कश्मीर में वैसे भी अवसरों की कमी है, जिनके ज़रिए ज़िंदगी संवारी जा सके."

रौफ़ कहते हैं कि इसके लिए सामाजिक बदलाव भी ज़िम्मेदार है.

वो कहते हैं, "पहले माता-पिता अपने बच्चों को लेकर ज़्यादा जवाबदेह थे. मसलन, जब हम घर देर से पहुँचते थे तो हमसे पूछताछ होती थी लेकिन अब ऐसा कम हो गया है."

हमने इस इतनी कम उम्र में चरमपंथ से जुड़ने के बारे में आला पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन फ़िलहाल उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया है. अगर जवाब आता है तो उसे यहां जोड़ दिया जाएगा.

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