जम्मू और कश्मीर: डर और अविश्वास के बीच हो रहे चुनाव में क्या हैं मुद्दे

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- Author, आमीर पीरजादा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल विशेष राज्य का दर्जा खत्म होने के बाद पहली बार जम्मू और कश्मीर में चुनाव हो रहे हैं. लेकिन ये चुनाव आम तौर पर जम्मू और कश्मीर में होने वाले चुनावों की तुलना में बहुत अलग है.
जम्मू और कश्मीर के 20 ज़िलों में विकास परिषदों के लिए सीधे तौर पर पहली बार चुनाव हो रहे हैं. इन चुनावों में हिस्सा ले रहीं 32 साल की राबिया खुर्शीद को लगता है कि "कश्मीर में कोई लोकतंत्र नहीं है."
पहले इन विकास परिषदों के सदस्य विधायक हुआ करते थे लेकिन पहली बार प्रत्यक्ष तौर पर इनका चुनाव हो रहा है. परिषद के लिए निर्वाचित सदस्य अब स्थानीय स्तर पर तय होने वाली योजनाओं में भागीदार होंगे. इसमें सड़क से लेकर अस्पताल तक की योजनाएँ शामिल हैं.
लेकिन राबिया खुर्शीद इन सब से प्रभावित नज़र नहीं आती. वो कहती हैं, "हमारे पास चुनाव में हिस्सा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. नहीं तो हमारी अगली पीढ़ियों का क्या होगा?"
इस तरह की बगावत और हताशा की भावना कश्मीर घाटी में बहुत आम है. भारत सरकार को लेकर लंबे वक्त से घाटी में तनावपूर्ण संबंध रहे हैं. भारतीय फ़ौज को खुली छूट दिए बिना चरमपंथ से निपटने में सरकारें नाकाम रही है लेकिन इसके बाद दशकों तक भारतीय फौज पर मानवाधिकार के उल्लंघन के आरोप भी लगते रहे हैं.

बीजेपी की उम्मीद
अगस्त, 2019 में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाया तब से यह खाई और चौड़ी हुई दिखती है. अनुच्छेद 370 की वजह से कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था. इसके तहत राज्य को कुछ मामलों में स्वायत्ता मिली हुई थी.
सरकार के इस कदम के बाद राज्य में इंटरनेट और सूचना के दूसरे साधनों को बंद करने जैसे कदम उठाए गए. इसके साथ ही सासंदों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और दूसरे नेताओं को गिरफ़्तार करने की कार्रवाई की गई. इसके ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में विरोध-प्रदर्शन हुए और सरकार की आलोचना हुई.
इसे बीजेपी के दक्षिणपंथी एजेंडे के तौर पर भी देखा गया था. पार्टी की विभाजनकारी लफ्फाजी और राजनीति पर लंबे समय से इस बात के आरोप लगते रहे हैं कि इससे वो देश के मुसलमानों को निशाना बना रहे हैं.
इन चुनावों के साथ पहली बार बीजेपी घाटी में अपनी पकड़ मज़बूत करने की उम्मीद लगाए बैठी है.
इतिहासकार सिद्दीक वाहीद कहते हैं, "दिल्ली के लिए यह चुनाव काफी अहम हैं. जम्मू और कश्मीर के लिए ये उतना अहम नहीं है क्योंकि ये चुनाव एक नियुक्त किए गए शासक के अंतर्गत हो रहे है ना कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के शासन में."
वो आगे कहते हैं कि बीजेपी इन चुनावो के सहारे 'मान्यता' पाने की कोशिश में है. पार्टी संयुक्त विपक्ष के ख़िलाफ़ है तो वहीं, नाराज़ जनता चुनावों को लेकर संशकित है.

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एक असामान्य चुनाव
पहली बार सात विपक्षी पार्टियाँ एक साथ मिलकर चुनाव में उतरी हुई है और उनका मकसद कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को फिर से बहाल करना है.
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना है, "चुनाव उन असल मुद्दों से भटकाने की कोशिश है जिसकी वजह से लोगों में धोखा और अलगाव की भावना पैदा हुई है."
उन्हें एक साल तक हिरासत में रखने के बाद अक्टूबर में रिहा किया गया है.
राबिया खुर्शीद जैसी निर्दलीय उम्मीदवार का कहना है कि वो खुद को किसी भी पार्टी के साथ जोड़ना नहीं चाहती हैं लेकिन उन्होंने बीजेपी के उदय को रोकने के लिए कड़ी मशक्कत की है.
राबिया उन 2,000 उम्मीदवारों में से एक हैं जो जम्मू और कश्मीर के 280 सीटों पर इस चुनाव में उतरे हुए हैं. ये चुनाव आठ चरणों में हो रहे हैं. इनमें से छह चरण के चुनाव अब तक हो चुके हैं.
राबिया उत्तरी कश्मीर के बारामुला से उम्मीदवार हैं. यहाँ पर सात दिसंबर को चुनाव हो चुके हैं. करीब 57.6 लाख कश्मीर में पंजीकृत वोटर हैं लेकिन इन चुनावों को लेकर जनता में उतना उत्साह अब तक नहीं दिखा है जितना पिछले चुनावों में देखने को मिलता रहा है.
जम्मू के पत्रकार अनिल गुप्ता कहते हैं, "बीजेपी ने इन चुनावों में केंद्रीय मंत्रियों को प्रचार के लिए उतार कर बड़ा दांव खेला है. ये सिर्फ गांव स्तर के चुनाव हैं और आम लोगों के लिए उतनी अहमियत नहीं रखते हैं."
हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र में ज्यादा मतदान देखने को मिला है. अमूमन 60 फ़ीसद से अधिक मतदान यहाँ हुए हैं जबकि घाटी में ये 41 फ़ीसद से कम रहा है. अब तक सबसे कम मतदान 1.9 फ़ीसद दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ ज़िले में हुआ है. इस ज़िले में चरमपंथ हमेशा व्यापक पैमाने पर रहा है.
दक्षिणी कश्मीर में चुनाव प्रचार बहुत चुनौतीपूर्ण और असामान्य रहा.

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यहाँ चुनाव प्रचार महामारी की वजह से नहीं बल्कि चरमपंथ और राजनीतिक हिंसा में इजाफा होने से चुनौतीपूर्ण रहा. कम से कम नौ बीजेपी कार्यकर्ताओं की संदिग्ध चरमपंथियों ने इस साल हत्या की है.
इसकी वजह से उम्मीदवारों की सुरक्षा को लेकर अधिकारियों को अधिक सतर्कता बरतनी पड़ी. होटलों और सरकारी आवासों में उन्हें कड़ी सुरक्षा के अंदर रखा गया.
एक अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "हर उम्मीदवार को व्यक्तिगत स्तर पर सुरक्षा देना मुमकिन नहीं था इसलिए उन्हें इन जगहों पर शिफ्ट किया गया."
दक्षिणी कश्मीर के जिले पुलवामा से बीजेपी के उम्मीदवार नज़ीर अहमद डार बताते हैं, "मुझे कहीं भी जाने के लिए पुलिस को पूर्व सूचना देनी होती है. पुलिस को जब लगता है कि वहाँ जाना सुरक्षा के लिहाज से ठीक है तब वो मुझे पुलिस की सुरक्षा में वहाँ जाने की इजाज़त देते हैं. मैं पुलिस को इसके लिए जिम्मेवार नहीं ठहरा सकता. वो हमारी सुरक्षा के लिए ही ऐसा कर रहे हैं."
वह बताते हैं कि वो अपने निर्वाचन क्षेत्र में अब तक सिर्फ़ चार बार ही जा सके हैं और हर बार उन्हें सिर्फ़ चुनाव प्रचार के लिए दो घंटे का वक्त मिल पाया.
दरवाजे-दरवाजे जाकर होने वाले चुनाव प्रचार में पुलिस साथ रह रहती है. उम्मीदवारों को इस बात की शिकायत है कि उन्हें प्रचार के लिए पर्याप्त वक्त नहीं मिल पा रहा है लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वो ये सब उनकी सुरक्षा संबंधी आशंकों को देखते हुए कर रहे हैं.
लेकिन विपक्ष ने इस पर गंभीर आरोप लगाए हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने ट्वीट किया है कि, "स्थानीय प्रशासन बीजेपी को मदद पहुँचा रही है और बीजेपी के ख़िलाफ़ खड़े उम्मीदवारों को सुरक्षा के नाम पर बंद कर के रख रहा है. अगर सुरक्षा के हालात अनुकूल नहीं थे तब क्या जरूरत थी चुनाव की घोषणा करने की?"
लेकिन प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी उम्मीदवार को चुनाव प्रचार करने से रोका नहीं गया है. प्रत्येक उम्मीदवार को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई गई है.

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डर और अविश्वास
मतदान केंद्रों पर भारी सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं और मतदान से पहले मतदाताओं की तलाशी ली जा रही है. शोपियाँ के केलेर निर्वाचन क्षेत्र के बाहर तैनात अधिकारी ने कहा, "हमें सर्तक रहना है."
नौजवानों का एक समूह मतदान केंद्र के बाहर यूँ ही घूम रहा है. उन लोगों का कहना है कि वो मतदान करने नहीं आए हैं बल्कि, "जो लोग मतदान करने आ रहे हैं उन पर नज़र रख रहे हैं."
उनमें से एक का कहना है कि सिर्फ़ बुजुर्ग ही मतदान कर रहे हैं क्योंकि "वो अब भी पुराने पार्टी कैडर में यकीन रखते हैं लेकिन हम नहीं रखते इसलिए आप ज्यादा नौजवानों को मतदान करते हुए नहीं देखेंगे."
इस समूह से एक दूसरे नौजवान का कहना था,"हम जानते हैं कि सभी पार्टियाँ और चुनाव एक ही है. इससे कुछ भी नहीं बदलने वाला है."
ये सभी नौजवान ख़ुद की पहचान नहीं बताना चाहते. जिनलोगों ने मतदान किया है उनका कहना है कि वो विकास होने की उम्मीद कर रहे हैं.

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शोपियाँ के 20 साल के मोहम्मद अल्ताफ कहते हैं, "हम अपने इलाके में विकास चाहते हैं. अभी हमारा स्थानीय प्रतिनिधि चुनाव में खड़ा है तो इसलिए मैंने वोट किया है. मुझे लगता है कि उन तक हमारा पहुँचना आसान होगा."
दक्षिण कश्मीर में महिलाओं के समूह का कहना था कि वे सड़क बनवाने के मुद्दे पर वोट कर रही हैं क्योंकि उन्हें उम्मीदवारों से मिलने जाने में भी दो घंटे का समय लग जाता है.
इनमें से एक फरीदा अख्तर कहती हैं, "हमारे पास बिजली की सुविधा नहीं है. हमारे बच्चे शाम में लिख-पढ़ नहीं पाते हैं. हमारी ज़िंदगी तो बर्बाद हो चुकी है लेकिन हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चों को भी इन सब से गुजरना पड़े. मैंने इस उम्मीद से वोट किया है."
कुछ ऐसे लोग भी है जिन्होंने इस उम्मीद में वोट किया है कि जब उनके दरवाजे पर पुलिस पहुँचे तब कोई ऐसा हो जिसके पास वो मदद मांगने जा सके.
48 साल की एक महिला ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, "अगर पुलिस या फ़ौज यहाँ किसी को पकड़ती है तो ऐसा कोई नहीं होता जिसके पास हम मदद मांगने जा सके. मुझे लगता है कि मैंने जिसे वोट दिया है कम से कम वो एक ऐसा शख्स तो होगा जिसके पास ऐसी हालत में मैं जा सकती हूँ. इसलिए मैंने वोट किया है."
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