कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद इन मुद्दों पर अब तक क्या हुआ

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, श्रीनगर से
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर का कोई आयोजन होने जा रहा है.
भारत को इस वर्ष G-20 की अध्यक्षता मिली है, इसलिए केंद्र सरकार ने इस आयोजन के लिए जिन जगहों को चुना है, उनमें श्रीनगर भी शामिल है. यहाँ जी-20 के सदस्य देशों के टूरिजम वर्किंग ग्रुप के प्रतिनिधि एक बैठक में शामिल हो रहे हैं.
श्रीनगर में एक तरफ़, जहाँ सुरक्षा के इंतज़ाम कड़े कर दिए गए हैं, वहीं इस बात का भी ध्यान रखने की कोशिश की जा रही है कि पर्यटकों को भी ज़्यादा दिक़्क़तों का सामना न करना पड़े.
साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था, इसलिए ये समझना ज़रूरी है कि ज़मीन पर क्या कुछ बदला है और क्या कुछ नहीं बदला.

भारत सरकार ने साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के समय जिन पाँ मुद्दों पर ज़ोर दिया था उनमें से प्रमुख ये थे:
- जम्मू -कश्मीर से चरमपंथ ख़त्म होगा
- जम्मू -कश्मीर में विदेशी निवेश आएगा
- जम्मू-कश्मीर में एक नए सियासी दौर का आग़ाज़ होगा
- विकास का एक नया दौर शुरू होगा

पाँच अगस्त 2019 को, भारत सरकार ने जम्मू -कश्मीर से अनुछेद 370 हटाकर जम्मू -कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था.
लद्दाख जो कि जम्मू-कश्मीर का ही हिस्सा था, उसे एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया. जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के बाद कश्मीर एक लंबे समय तक बंद रहा था, जिसके तहत इंटरनेट और मोबाइल सेवाएँ भी बाधित रहीं.

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जम्मू-कश्मीर से 'चरमपंथ का सफाया'
जम्मू -कश्मीर में बीते तीन वर्षों में सुरक्षाबलों ने चरमपंथ के ख़िलाफ़ जो लड़ाई लड़ी है, उस में सुरक्षाबलों को कई कामयाबियां ज़रूर मिली हैं, लेकिन चुनौतियाँ अब भी बरक़रार हैं.
इस बीच कश्मीर में चरमपंथी हमलों में कमी आई और चरमपंथियों के आंकड़े भी कम हुए हैं.
जम्मू-कश्मीर पुलिस का दावा है कि इस समय कश्मीर में सक्रिय चरमपंथियों के सबसे कम आंकड़े मौजूद हैं और फ़िलहाल स्थानीय चरमपंथियों की तादाद लगभग 30 के आसपास है, जो पिछले 33 वर्षों में सबसे कम बताई जा रही है.
हालाँकि, पिछले दो वर्षों से चरमपंथी हमलों के ज़्यादा मामले कश्मीर के दक्षिण में स्थित जम्मू क्षेत्र में हुए हैं. सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कश्मीर में चरमपंथी गतिविधियाँ ज़रूर कम हुई हैं लेकिन जम्मू क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, वो अच्छे संकेत नहीं हैं.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व महानिदेशक शेष पॉल वेद बताते हैं, "स्थानीय लड़के अब कम संख्या में चरमपंथी दस्तों में शामिल हो रहे हैं. जो ऑपरेशन ऑल आउट शुरू किया गया, उसमें काफ़ी चरमपंथी मारे गए. इसका अंजाम ये दिखा है कि चरमपंथियों के कथित पाकिस्तानी हैंडलर्स ने कश्मीर में टारगेटेड किलिंग्स को अंजाम देना शुरू किया. अब उस पर भी काफ़ी हद तक क़ाबू पा लिया गया है. लेकिन ये भी सच है कि अब भी कश्मीर में चरमपंथ का एक अंडरकरंट मौजूद है."
2019 में अनुछेद 370 हटने के समय कहा गया था कि जम्मू -कश्मीर से चरमपंथ का सफ़ाया होगा, क्या ऐसा हुआ है?
शेष पॉल वेद ने कहा, "दावा ज़रूर किया गया लेकिन इतने बड़े काम को इतने कम समय में पूरा नहीं किया जा सकता है. अभी तीन ही साल गुज़रे हैं और जब तक पड़ोसी पाकिस्तान की सोच नहीं बदलेगी तब तक आप ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि आप चरमपंथ को इतनी जल्दी ख़त्म कर सकते हैं."

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जम्मू-कश्मीर की सियासत?
वर्ष 2014 के बाद से जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं. उस चुनाव में पीडीपी और बीजेपी ने एक गठबंधन सरकार बनाई थी. वर्ष 2018 में बीजेपी ने पीडीपी से अपना समर्थन वापस लिया था और सरकार गिर गई थी, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था.
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुछेद 370 हटाकर उपराज्यपाल की तैनाती की गई और अभी तक चुनाव नहीं हुए हैं. जम्मू-कश्मीर की सियासी जमातों ने कई बार केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव कराने की मांग की है.
हालाँकि, बीते दो वर्षों से जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की प्रक्रिया को शुरू किया गया था और जो अब पूरी हो चुकी है.
जम्मू-कश्मीर में चुनाव न कराने को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के स्टेट सेक्रेटरी यूसुफ़ तारिगामी पूछते हैं, "जब कश्मीर में सब कुछ नॉर्मल है और सभी चीज़ों को दुरुस्त किया गया है तो चुनाव क्यों नहीं कराए जा रहे हैं?"
बीबीसी से उन्होंने कहा, "सरकार कह रही है कि जम्मू-कश्मीर में विकास हो रहा है, सब कुछ सही चल रहा है, पर्यटक भी कश्मीर आ रहे हैं. परिसीमन और मतदान के आँकड़ों को भी सही किया गया है. अगर ये सब कुछ किया गया है तो जम्मू -कश्मीर में चुनाव क्यों नहीं कराए जा रहे हैं. वर्ष 2019 में लोकसभा के चुनाव भी हुए और अगले आम चुनाव भी क़रीब हैं. कर्नाटक में भी हाल के दिनों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं लेकिन सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर में ऐसा नहीं हो रहा है."
हालांकि इन आरोपों का जवाब देते हुए कश्मीर भारतीय जनता पार्टी के मीडिया इंचार्ज मंज़ूर भट का मानना है कि, "चुनाव होने चाहिए. पार्टी लोकतंत्र में यक़ीन करती है और चुनाव कराने या न कराने का फ़ैसला चुनाव आयोग का होता है."
जम्मू -कश्मीर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर को इसी साल मार्च के महीने में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पहला प्रोजेक्ट मिला है. ये प्रोजेक्ट 500 करोड़ रुपए का है. प्रोजेक्ट के उद्घाटन के समय बताया गया था कि इस प्रोजेक्ट से कश्मीर में दस हज़ार नौकरियां मिल सकेंगी.
इस अवसर पर जम्मू -कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बताया था कि ये पहला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है, जो यूएई स्थित एमआर ग्रुप के ज़रिए किया गया है. मनोज सिन्हा ने इस मौक़े को एक ऐतिहासिक घड़ी बताया था.
ये प्रोजेक्ट सयुंक्त अरब अमीरात के "एमआर ग्रुप" का है.
"श्रीनगर माल" नाम के इस प्रोजेक्ट का कश्मीर चेंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष शेख़ आशिक़ हुस्सियान बताते हैं कि जिस रफ़्तार के विदेशी निवेश आना चाहिए था, वह अभी तक नहीं आया है. "
कश्मीर चेंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के मौजूदा अध्यक्ष जावीद अहमद बट कहते हैं, "सरकार जम्मू-कश्मीर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने की कोशिश कर रही है और हमें उम्मीद है कि इस मामले में उसे कामयाबी मिलेगी. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अगर जम्मू-कश्मीर आता है तो वह केंद्र शासित प्रदेश के लिए बहुत अच्छी बात है और उसे हमारे नौजवान को रोज़गार मिल सकता है".

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पर्यटन में बढ़ावा लेकिन बाज़ार में मंदी?
बीते दो वर्षों में कश्मीर में पर्यटकों की बड़ी भीड़ उमड़ती दिखी है और ये सिलसिला जारी है. सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2022 में 1.88 करोड़ पर्यटकों ने इस केंद्र शासित प्रदेश का रुख़ किया है.
ज़ाहिर है, बड़ी संख्या में आने वाले पर्यटकों की वजह से स्थानीय बिज़नेस और ट्रैवेल इंडस्ट्री को फ़ायदा होगा ही. लेकिन एक दूसरा पहलू ये भी है कि कश्मीर के ट्रेड मार्केट से जुड़े लोगों का कहना है कि उनका कारोबार ठप पड़ा है.
कश्मीर इकनॉमिक अलायंस के अध्यक्ष मोहम्मद यासीर ख़ान बताते हैं, "कश्मीर के पर्यटन उद्योग पर हम कह सकते हैं कि ये बहुत बेहतरीन तरीक़े से चल रहा और ये सिर्फ़ दिखावे वाली बात नहीं है. 2021, 2022 और 2023 में बड़ी तादाद में पर्यटक कश्मीर आए. साथ ही कश्मीर के बाग़बानी सेक्टर, जिसमें सेब का कारोबार शामिल है, इन दोनों को मिलाकर क़रीब 20,000 करोड़ रुपए सालाना की आमदनी होती है."
हालांकि मोहम्मद यासीन ख़ान के मुताबिक़, "स्थानीय बाज़ारों में ये चीज़ दिखाई नहीं पड़ती. 2019 में आर्टिकल 370 हटने के बाद कश्मीर लंबे समय तक बंद रहा. फिर कोविड का प्रकोप झेलना पड़ा. कारोबारियों को बैंकों से क़र्ज़ा लेना पड़ा जो वे आज तक अदा नहीं कर सके हैं. ज़्यादातर लोगों का सवाल ये है कि अगर राज्य में इतना पैसा आ रहा है तो फिर वो बाज़ारों में और स्थानीय कारोबार में क्यों नहीं दिखता?".
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