अरुणाचल प्रदेश: क्या ब्रह्मपुत्र पर बैराज बनाकर चीन के ख़तरे को रोक सकता है भारत?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
अरुणाचल प्रदेश में बहने वाली सियांग नदी के प्रवाह के पैटर्न में हाल के कुछ सालों में अजीब तरह के बदलाव देखे गए हैं.
सियांग नदी के अजीब व्यवहार के कारण इसमें कई बार पानी का स्तर अप्रत्याशित तौर पर बढ़ जाता है.
इससे आसपास के इलाके जलमग्न हो जाते हैं. वहीं कई बार लोगों ने नदी को पूरी तरह सूखते भी देखा है.
ईस्ट सियांग ज़िले के मेबो तहसील के रहने वाले डॉ. डांगी पर्मे बचपन से सियांग नदी के इस व्यवहार को देखते आ रहे हैं.
लेकिन पिछले चार-पांच साल से वे बेहद चिंतित हैं.
वे कहते है, "सियांग नदी का पानी पहले बिलकुल साफ़ और नीले रंग का हुआ करता था लेकिन अब कुछ सालों में इस नदी का पानी कीचड़ से भरा और गंदा रहता है."
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि सियांग नदी की ऊपरी धारा (तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र) में जो जल विद्युत बांध है, वहां जब भी कोई निर्माण कार्य होता है तो सियांग नदी के पानी में पत्थर और कीचड़ नीचे की ओर आ जाते हैं."
चीन की प्रस्तावित बांध योजना का जवाब

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दरअसल सियांग नदी की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि पिछले बुधवार (6 सितंबर) को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने विधानसभा में बताया था कि केंद्र सरकार ने सियांग नदी पर एक बैराज बनाने का प्रस्ताव दिया है.
खांडू ने कहा है कि पड़ोसी तिब्बत क्षेत्र के यारलुंग त्संगपो नदी (सियांग नदी के अपस्ट्रीम) पर चीन द्वारा प्रस्तावित विशाल बांध के संभावित खतरों को देखते हुए ये प्रस्ताव दिया गया है.
मुख्यमंत्री खांडू का कहना था कि इस बैराज के निर्माण से सियांग नदी को 'जीवित' रखा जा सकता है.
तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में यारलुंग त्संगपो नदी पर साठ हज़ार मेगावाट के इस बांध की योजना की जानकारी सबसे पहले नवंबर 2020 में चीन के सरकारी स्वामित्व वाले मीडिया ने साझा की थी.
तिब्बत में हिमालय से शुरू होने वाली यारलुंग त्संगपो नदी दुनिया की सबसे लंबी नदियों में से एक है, जो करीब 2,880 किमी का मार्ग तय करती है.
यह नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग नाम से भारत में प्रवेश करती है, फिर असम में ब्रह्मपुत्र बनकर बांग्लादेश से होकर गंगा और मेघना के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है.
असम में प्रवेश करने से पहले यह नदी अरुणाचल प्रदेश में लगभग 300 किमी तक बहती है.
ख़तरनाक हो सकता है चीन का बांध?

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विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन सही में दुनिया के इस बड़े बांध का निर्माण करता है तो इसका प्रभाव न केवल नदी के नीचे की धारा को प्रभावित करेगा बल्कि बाढ़ग्रस्त असम और बांग्लादेश के लिए यह विनाशकारी हो सकता है.
अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में मेबो से कांग्रेस पार्टी के विधायक लोम्बो तायेंग ने शून्यकाल की चर्चा के दौरान चीन की 14वें पंचवर्षीय योजना के तहत इस विशाल बांध के निर्माण का मुद्दा उठाया था.
विधायक ने सदन में कहा था कि सियांग नदी बार-बार अपना रास्ता बदल रही है. इसके कारण कई लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि का बड़े पैमाने पर कटाव हो रहा है.
नदी के इस व्यवहार ने डी एरिंग वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र को भी कम कर दिया है.
कांग्रेस विधायक ने कहा कि 'अपस्ट्रीम में पानी को अनुचित ढंग से छोड़ने, रोकने और नदी में निर्माण सामग्री को बहाने में चीन की संभावित भागीदारी है.
अगर सियांग घाटी में बार-बार आने वाली बाढ़ की घटना को राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं किया गया और पर्याप्त उपाय नहीं किए गए तो यह निकट भविष्य में विनाशकारी हो सकता है.'
इसके जवाब में मुख्यमंत्री खांडू ने कहा था कि केंद्र सरकार ने भी चीनी परियोजना पूरी होने के बाद सियांग नदी की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की है.
मुख्यमंत्री ने कहा था, "हमें सियांग नदी को जीवित रखना होगा. यदि चीन द्वारा पानी के प्रवाह को मोड़ा जाता है, तो सियांग का आकार कम हो जाएगा. इसके अलावा बड़ी मात्रा में पानी छोड़ने पर सियांग घाटी और पड़ोसी असम तथा बांग्लादेश के निचले इलाकों में बड़े पैमाने पर बाढ़ आ सकती है. अत्यधिक पानी छोड़े जाने की स्थिति से खुद को बचाने के लिए बड़ी संरचनाओं की आवश्यकता है."
चीन के बांध की स्पष्ट जानकारी के बिना बैराज समाधान नहीं

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हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक चीन द्वारा प्रस्तावित इस 60 हजार मेगावाट बांध की पूरी और स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं होगी तब तक किसी भी तरह के बैराज की चर्चा करने का कोई मतलब ही नहीं है.
चीन के इस मेगा बांध और भारत सरकार के प्रस्तावित विशाल बैराज पर बांध, नदी और लोगों पर दक्षिण एशिया नेटवर्क के पर्यावरण कार्यकर्ता और जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर ने बीबीसी से बात की.
वो कहते हैं, "मेरी जानकारी के अनुसार ये अभी महज एक प्रोजेक्ट है. मुझे इस विशाल बांध के बनने की संभावना बहुत कम लग रही है. क्योंकि यह दुनिया का सबसे ज्यादा जोखिम वाला प्रोजेक्ट है. दूसरा यह दुनिया की सबसे ज्यादा लागत वाली और चुनौतीपूर्ण परियोजना होगी. इसके अलावा इस बांध को लेकर फिलहाल किसी के पास कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है."
ठक्कर कहते हैं, "सियांग नदी पर कोई भी बैराज बनाने से पहले हमारे पास यह जानकारी होनी ज़रूरी है कि अपस्ट्रीम में चीन जो बांध निर्माण करेगा उसका आकार क्या होगा? उसकी ऊंचाई कितनी होगी? बांध की स्टोरेज़ क्षमता कितनी होगी? बांध से बिजली उत्पादन के दौरान इस्तेमाल की क्षमता कितनी होगी? कितना पानी छोड़ा जाएगा? इन तमाम जानकारियों के बिना बैराज कितना कारगार होगा, यह कहना मुश्किल है."
जल विशेषज्ञ की मानें तो बैराज की कोई प्रामाणिक परिभाषा नहीं होती.
बैराज और बांध में कोई ज्यादा फर्क नहीं है. बैराज पानी को डाइवर्ट करने के लिए बनाया जाता है. इसमें पानी को स्टोर नहीं किया जाता.
वो कहते हैं, "यह बैराज 11 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाले बांध जैसा होगा. लिहाजा जब तक भारत और चीन दोनों देशों की इन परियोजनाओं को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आएगी तब तक सही आकलन नहीं किया जा सकता."
इस समय तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र में चीन के छह नदी बांध हैं जबकि भारत की तरफ से अरुणाचल प्रदेश में तीन नदी बांध हैं जिसमें दो परियोजना का काम पूरा नहीं हुआ है.
ये सभी छोटे नदी बांध ‘रन ऑफ द रिवर’ जल-विद्युत परियोजना के तहत बनाए गए हैं अर्थात ऐसे बांध जो जल प्रवाह में बिना बाधा डाले जल-विद्युत का उत्पादन करते हैं.
लेकिन अरुणाचल प्रदेश में नदी पर बांध निर्माण को लेकर सालों से विरोध होता रहा है.
साल 2007 से अरुणाचल प्रदेश सरकार ने क़रीब 140 बड़े बांधों के लिए सार्वजनिक और निजी निवेशकों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं. इनमें से 66 प्रोजेक्ट को बाद में रद्द कर दिया गया.
मुख्यमंत्री खांडू ने विधानसभा में कहा है कि वह व्यक्तिगत रूप से सियांग घाटी का दौरा कर स्थानीय ग्रामीणों से सहयोग करने और प्रस्तावित बैराज के लिए सर्वेक्षण और जांच कार्य की अनुमति देने का अनुरोध करेंगे.
चीन के ख़तरे के बारे में ग्रामीणों को समझाने की जरूरत

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अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पार्टी के प्रवक्ता डोमिनिक तदार कहते हैं, "सियांग नदी पर प्रस्तावित बैराज के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी नहीं है लेकिन चीन की तरफ से किसी भी तरह की गतिविधि का हमारी सरकार बराबर जवाब देती है.''
उन्होंने कहा, ''अभी मैं यह नहीं बता सकता कि इस प्रस्तावित बैराज से बिजली उत्पादन करने की कोई योजना है. जहां तक बांध और बैराज को लेकर स्थानीय लोगों के विरोध का सवाल है तो लोगों को चीन से पैदा होने वाले ख़तरे के बारे में सही तरीके से समझाने की जरूरत है."
एक सवाल के जवाब में तदार कहते हैं, "अरुणाचल प्रदेश को देश का पावर हाउस बनाने के लिए 58 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का जो हमारा सपना है, उसे पूरा करने के लिए स्थानीय लोगों को समझाया जा रहा है और बहुत लोग हमारी बात समझ भी रहे हैं."
भारत-चीन तनाव

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साल 2020 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच लद्दाख के गलवान में हुई हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों के सामान्य रिश्ते बाधित हैं.
लेकिन पिछले कुछ समय से भारत ने चीन की किसी भी गतिविधि का जवाब देने की रणनीति अपनाई हुई है.
भारत और चीन के बीच सीमा संघर्ष ब्रितानी दौर से जारी है. दोनों देशों के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा है.
साल 1914 में शिमला में तिब्बत, चीन और ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों की बैठक हुई और सीमा रेखा का निर्धारण हुआ.
लेकिन चीन इसको स्वीकार नहीं करता. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताता है.
भारत के पूर्वोत्तर और दक्षिण पूर्व एशिया के स्वतंत्र विश्लेषक डॉ. रूपक भट्टाचार्जी इस बात को स्वीकारते हैं कि अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती गांवों में बुनियादी ढांचे को ठीक करने की दिशा में कई काम किए गए हैं. लेकिन चीन की तरफ़ से ख़तरा बराबर बना हुआ है.
वो कहते हैं, "अपस्ट्रीम देश होने के कारण चीन बांध निर्माण की दिशा में मनमर्जी करता रहा है. भारत को अरुणाचल प्रदेश में चीन को काउंटर करने के लिए प्रौद्योगिकी और संसाधन की दिशा में और मजबूत आधार बनाने की ज़रूरत है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर सैन्य रणनीति तक हर दिशा में काम करना होगा."
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