अरुणाचल प्रदेश पर फिर भारत और चीन में तकरार, क्या है विवाद की जड़?

अरुणाचल प्रदेश

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इमेज कैप्शन, चीन अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत के दावे पर सवाल उठाता रहा है

अरुणाचल प्रदेश को लेकर एक बार फिर भारत और चीन में विवाद खड़ा हो गया है.

मामला चीन में होने वाली एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता से जुड़ा है.

भारतीय वुशु टीम के तीन खिलाड़ियों को चीन ने स्टैपल वीज़ा जारी किया था.

भारतीय पासपोर्ट होने के बावजूद चीन के इस क़दम को लेकर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई और पूरी टीम इस प्रतियोगिता से हट गई है.

गुरुवार को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि भारतीय नागरिकों के वीज़ा को लेकर भेदभाव नहीं किया जा सकता.

उन्होंने कहा- हमें ये जानकारी मिली है कि चीन में एक अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता के लिए हमारे कुछ नागरिकों को स्टैपल्ड वीज़ा जारी किया है. ये अस्वीकार्य है. हमने चीन को अपने विरोध से अवगत करा दिया है.

चीन अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत के दावे पर हमेशा से सवाल उठाता रहता है. वो किसी भी भारतीय नेता के अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर भी आपत्ति जताता रहा है.

हालाँकि भारत ने बार-बार ये कहा है कि अरुणाचल भारत का अभिन्न हिस्सा है और इसे अलग नहीं किया जा सकता है.

चीन ने 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अरुणाचल जाने पर भी विरोध जताया था. 2020 में गृह मंत्री अमित शाह के अरुणाचल जाने पर भी चीन ने आपत्ति जताई थी.

चीन की आपत्ति

भारत और चीन सीमा

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इमेज कैप्शन, भारत और चीन के बीच सीमावर्ती इलाक़ों में कई बार झड़पें हुई हैं
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हर बार भारत चीन की आपत्ति को ख़ारिज करता रहा है. चीन अरुणाचल प्रदेश में 90 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर अपना दावा करता है जबकि भारत कहता है कि चीन ने पश्चिम में अक्साई चिन के 38 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर रखा है.

चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताता है. दोनों देशों के बीच 3,500 किलोमीटर (2,174 मील) लंबी सीमा है. 1912 तक तिब्बत और भारत के बीच कोई स्पष्ट सीमा रेखा नहीं खींची गई थी.

इन इलाक़ों पर न तो मुग़लों का और न ही अंग्रेज़ों का नियंत्रण था. भारत और तिब्बत के लोग भी किसी स्पष्ट सीमा रेखा को लेकर निश्चित नहीं थे.

ब्रितानी शासकों ने भी इसकी कोई जहमत नहीं उठाई. तवांग में जब बौद्ध मंदिर मिला तो सीमा रेखा का आकलन शुरू हुआ. 1914 में शिमला में तिब्बत, चीन और ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों की बैठक हुई और सीमा रेखा का निर्धारण हुआ.

चीन ने तिब्बत को कभी स्वतंत्र देश नहीं माना. उसने 1914 के शिमला समझौते में भी ऐसा नहीं माना था. 1950 में चीन ने तिब्बत को पूरी तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया. चीन चाहता था कि तवांग उसका हिस्सा रहे जो कि तिब्बती बौद्धों के लिए काफ़ी अहम है.

वर्षों पुराना है विवाद

जवाहर लाल नेहरू और माओ

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इमेज कैप्शन, 1954 में जवाहर लाल नेहरू ने चीन की यात्रा की थी और माओत्से तुंग से मिले थे

1949 में माओत्से तुंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना का गठन किया. एक अप्रैल 1950 को भारत ने इसे मान्यता दी और राजनयिक संबंध स्थापित किए.

चीन को इस तरह प्राथमिकता देने वाला भारत पहला ग़ैर-कम्युनिस्ट देश बना.

1954 में भारत ने तिब्बत को लेकर भी चीनी संप्रभुता को स्वीकार कर लिया. मतलब भारत ने मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है. 'हिन्दी-चीनी, भाई-भाई' का नारा भी लगा.

साल 1914 में शिमला समझौते के तहत मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना गया, लेकिन 1954 में नेहरू ने तिब्बत को एक समझौते के तहत चीन का हिस्सा मान लिया.

जून 1954 से जनवरी 1957 के बीच चीन के पहले प्रधानमंत्री चाउ एन लाई चार बार भारत के दौरे पर आए. अक्तूबर 1954 में नेहरू भी चीन गए.

1950 में चीन ने तिब्बत पर हमला शुरू कर दिया और उसे अपने नियंत्रण में ले लिया. तिब्बत पर चीनी हमले ने पूरे इलाक़े की जियोपॉलिटिक्स को बदल दिया.

चीनी हमले से पहले तिब्बत की नज़दीकी चीन की तुलना में भारत से ज़्यादा थी. आख़िरकार तिब्बत एक संप्रभु मुल्क नहीं रहा.

भारतीय इलाक़ों में भी अतिक्रमण की शुरुआत चीन ने 1950 के दशक के मध्य में शुरू कर दी थी. 1957 में चीन ने अक्साई चिन के रास्ते पश्चिम में 179 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई.

सरहद पर संघर्ष

भारत चीन संबंध

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सरहद पर दोनों देशों के सैनिकों की पहली भिड़ंत 25 अगस्त 1959 को हुई. चीनी गश्ती दल ने नेफ़ा फ़्रंटियर पर लोंगजु में हमला किया था. इसी साल 21 अक्तूबर को लद्दाख के कोंगका में गोलीबारी हुई.

इसमें 17 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी और चीन ने इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बताया था. भारत ने तब कहा था कि 'उसके सैनिकों पर अचानक हमला कर दिया गया.'

एलएसी भी बना एलओसी?

चीनी हमले के बाद ही तिब्बती बौध धर्म गुरु दलाई लामा को भागना पड़ा था. 31 मार्च 1959 को दलाई लामा ने भारत में क़दम रखा था. 17 मार्च को वो तिब्बत की राजधानी ल्हासा से पैदल ही निकले थे और हिमालय के पहाड़ों को पार करते हुए 15 दिनों बाद भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे.

अप्रैल, 2017 में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश की यात्रा की थी तो चीन ने कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि भारत को इसकी इजाज़त नहीं देनी चाहिए थी और इससे भारत को कोई फ़ायदा नहीं होगा.

दो जून 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में इंटरनेशनल इकोनॉमिक फ़ोरम के पैनल डिस्कशन में कहा था कि "चीन और भारत में भले सीमा विवाद है, लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा पर पिछले 40 सालों में एक भी गोली नहीं चली है.''

चीन ने प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान का स्वागत किया था और हाथोंहाथ लिया था.

लेकिन भारत अब यह भी कहने की स्थिति में नहीं है. जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिक के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था. भारत के 20 सैनिकों की मौत हुई थी और चीन से आई जानकारी के मुताबिक़ उसके चार सैनिक मरे थे.

उसके बाद भी दोनों देशों के सैनिकों के बीच सीमावर्ती इलाक़ों में हल्की-फुल्की झड़पें होती रही हैं.

शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, गलवान घाटी में हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के बीच तनाव और बढ़ा है

दावे प्रतिदावे

भारत चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. ये सीमा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुज़रती है.

ये सरहद तीन सेक्टरों में बंटी हुई है - पश्चिमी सेक्टर यानी जम्मू-कश्मीर, मिडिल सेक्टर यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और पूर्वी सेक्टर यानी सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश.

दोनों देशों के बीच अब तक पूरी तरह से सीमांकन नहीं हुआ है क्योंकि कई इलाक़ों के बारे में दोनों के बीच मतभेद हैं.

भारत पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चिन पर अपना दावा करता है लेकिन ये इलाक़ा फ़िलहाल चीन के नियंत्रण में है. भारत के साथ 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने इस पूरे इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

वहीं पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता है. चीन कहता है कि ये दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है. चीन तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के बीच की मैकमोहन रेखा को भी नहीं मानता है.

चीन का कहना है कि 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने ये समझौता किया था, तब वो वहां मौजूद नहीं था. उसका कहना है कि तिब्बत चीन का अंग रहा है इसलिए वो ख़ुद कोई फ़ैसला नहीं ले सकता.

दरअसल 1914 में तिब्बत एक स्वतंत्र लेकिन कमज़ोर मुल्क था लेकिन चीन ने तिब्बत को कभी स्वतंत्र मुल्क नहीं माना. 1950 में चीन ने तिब्बत को पूरी तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

कुल मिलाकर चीन अरुणाचल प्रदेश में मैकमोहन लाइन को नहीं मानता और अक्साई चिन पर भारत के दावे को भी ख़ारिज करता है.

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