चीन ने अरुणाचल प्रदेश को लेकर उठाया ये क़दम, भारत का भी आया जवाब

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चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों के नाम बदलने को मंज़ूरी दी है.
भारत इन इलाक़ों को अपने पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश का हिस्सा मानता है, जबकि चीन भी इन पर अपना दावा करता है.
चीन, अरुणाचल प्रदेश में 90 हज़ार वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर अपना दावा करता है जबकि भारत कहता है कि चीन ने पश्चिम में अक्साई चिन के 38 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर रखा है.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने 11 जगहों के नाम चीनी, तिब्बती और पिनयिन भाषा में रखे जाने को मंज़ूरी दी है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन की कैबिनेट की स्टेट काउंसिल के नियमों के तहत इन नामों को बदला गया है. रिपोर्ट के अनुसार चीन ने 'दक्षिण पश्चिमी चीन के शिजांग स्वायत्त क्षेत्र' में इन नामों को बदला है.
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भारत ने चीन के इस प्रयास को सिरे से ख़ारिज किया है. भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने एक बयान में कहा है, "हमने ऐसी रिपोर्टें देखी हैं. ये पहली बार नहीं है जब चीन ने इस तरह का प्रयास किया है. हम इसे सिरे से ख़ारिज करते हैं. अरुणाचल प्रदेश हमेशा से भारत का हिस्सा है और हमेशा भारत का अभिन्न अंग बना रहेगा. नए नाम रखने के प्रयासों से ये सच्चाई नहीं बदलेगी."
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ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, चीन के विशेषज्ञों ने जगहों के नाम को अपने हिसाब से रखने के चीन के इस क़दम को 'क़ानूनी' बताया है.
रविवार को चीन के मंत्रालय ने इन जगहों के बारे में सटीक भोगौलिक जानकारी देते हुए नाम बदलने की ये घोषणा की है. इनमें दो रिहायशी इलाक़े हैं, पाँच पर्वतों की चोटियाँ हैं, दो नदियाँ हैं और दो अन्य इलाक़े हैं.
ये तीसरी बार है, जब चीन ने इस विवादित क्षेत्र में नामों को अपने हिसाब से बदला है.

चीन ने पहली बार साल 2017 में छह जगहों के और फिर 2021 में 21 जगहों के नामों को अपने हिसाब से बदला था.
चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोकता है और नाम बदलने की इस कार्रवाई को चीन का दावा मज़बूत करने के लिए उठाए गए क़दम के रूप में देखा जा रहा है.
वहीं भारत, चीन के इस तरह के क़दमों को सिरे से ख़ारिज करता रहा है.
इससे पहले जब चीन ने नाम बदले थे, तब भारत ने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा भारत का हिस्सा बना रहेगा.
दिसंबर 2021 में जब चीन ने जगहों के नाम बदले थे तब भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था, "ये पहली बार नहीं है जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश में जगहों के नाम बदलने की कोशिश की है. अरुणाचल प्रदेश हमेशा से भारत का अंग है और हमेशा भारत का अभिन्न अंग बना रहेगा. अरुणाचल प्रदेश में जगहों के नए नाम रखने से ये तथ्य बदल नहीं जाएगा."
अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा
चीन ने साल 1962 में भारत के साथ युद्ध में अरुणाचल प्रदेश के आधे से भी ज़्यादा हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
इसके बाद चीन ने एकतरफ़ा युद्ध विराम घोषित किया और उसकी सेना मैकमोहन रेखा के पीछे लौट गई.
चीन अरुणाचल प्रदेश को 'दक्षिणी तिब्बत का इलाक़ा' बताता आया है और तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से लेकर भारतीय प्रधानमंत्री के अरुणाचल दौरे पर आपत्ति जताता रहा है.
चीन ने 2009 में पीएम मनमोहन सिंह और 2014 में पीएम मोदी के दौरे पर आपत्ति जताई थी.

चीन मैकमोहन लाइन क्यों नहीं मानता?
साल 1914 से पहले तक तिब्बत और भारत के बीच कोई तय सीमा रेखा नहीं थी.
इस दौर में भारत में ब्रितानी हुक़ूमत हुआ करती थी.
ऐसे में सीमा निर्धारण के लिए भारत और तिब्बत की सरकारों के बीच शिमला में समझौता हुआ.
इस समझौते पर ब्रितानी हुक़ूमत के प्रशासक सर हेनरी मैकमोहन और तत्कालीन तिब्बत की सरकार के प्रतिनिधि ने हस्ताक्षर किए थे.
भारत में तत्कालीन ब्रितानी हुक़ूमत ने मैकमोहन लाइन दर्शाता हुआ मानचित्र पहली बार वर्ष 1938 में ही आधिकारिक तौर पर प्रकाशित किया.
वहीं, पूर्वोत्तर सीमांत प्रांत 1954 में अस्तित्व में आया. इस हस्ताक्षर के साथ ही भारत के तवांग सहित पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र और बाहरी तिब्बत के बीच सीमा मान ली गई.
भारत को आज़ादी 1947 में मिली. वहीं, पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना 1949 में अस्तित्व में आया.
लेकिन चीन शिमला समझौते को ये कहकर ख़ारिज करता रहा कि तिब्बत पर चीन का अधिकार है और तिब्बत की सरकार के किसी प्रतिनिधि के हस्ताक्षर वाले समझौते को वो स्वीकार नहीं करेगा.

भारत और चीन के बीच कब शुरू हुआ विवाद?
भारत और चीन के रिश्तों में तनाव के शुरुआती संकेत 1951 में चीन के तिब्बत पर क़ब्ज़े के साथ दिखाई देना शुरू हुए.
चीन का कहना था कि वो तिब्बत को आज़ादी दिला रहा है. इसी दौरान भारत ने तिब्बत को अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता दी.
इस समय तक अरुणाचल प्रदेश एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में नहीं आया था और साल 1972 तक अरुणाचल प्रदेश नॉर्थ ईस्ट फ़्रंटियर एजेंसी के नाम से जाना जाता था.
इसके बाद साल 1972 की 20 जनवरी को इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाकर इसका नाम अरुणाचल प्रदेश रखा गया और साल 1987 को अरुणाचल प्रदेश को एक अलग राज्य का दर्जा दिया गया.
तवांग में एक चार सौ साल पुराने बौद्ध मठ की मौजूदगी भी चीन के दावे की एक वजह बताई जाती है.
इस क्षेत्र में बौद्ध मठ मिलने के साथ ही भारत और तिब्बत के बीच सीमारेखा निर्धारित करने का सिलसिला शुरू हुआ था.
भारत-चीन मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन ने लद्दाख में टकराव होने के बाद बीबीसी को बताया था, 'चीन तवांग के मठ पर क़ब्ज़ा कर बौध धर्म को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है. तवांग मठ 400 साल पुराना है और ये माना जाता है कि छठे दलाई लामा का जन्म भी तवांग के पास वर्ष 1683 में हुआ था.'
चीन इस क्षेत्र में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के जाने पर आपत्ति जताता आया है.
साल 2009 में दलाई लामा के तिब्बत पहुँचने पर चीन ने कड़े शब्दों में विरोध दर्ज कराया था.
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