अरुणाचल में चीनियों को उनकी ही 'जुबां' में जवाब देने की पुलिस अफ़सरों की तैयारी- प्रेस रिव्यू

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अरुणाचल प्रदेश के पुलिस अधिकारियों को चीन की मंदारिन भाषा में प्रशिक्षण दिया जा रहा है. अंग्रेज़ी अख़बार 'इकोनॉमिक टाइम्स' ने अपनी एक ख़ास रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी है.
ये ट्रेनिंग ऐसे समय दी गई है जब अरुणाचल प्रदेश में भारत के पड़ोसी देश चीन ने अपनी गतिविधियां तेज़ की हैं. आज प्रेस रिव्यू में सबसे पहले यही ख़बर पढ़िए.
अख़बार के अनुसार, राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी ने अरुणाचल प्रदेश के 16 पुलिस अधिकारियों को चीनी भाषा मंदारिन में प्रशिक्षण दिया है. यही नहीं, अब भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), हिमाचल और लद्दाख पुलिस के जवानों को भी इसी तरह की ट्रेनिंग देने की तैयारी शुरू हो गई है.
ये सभी राज्य चीन के साथ सीमा साझा करते हैं.
इकोनमॉमिक टाइम्स से बातचीत में यूनिवर्सिटी के आउटरीच ऑफ़िसर कुमार सब्यासाची ने कहा, "हमारा मकसद पूरे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सम्पूर्ण रक्षा और रणनीतिक शिक्षा देना है. हमने सीमा पर तैनात अरुणाचल पुलिस के 16 अधिकारियों को चीनी भाषा सिखाई है और पसीघाट में अपनी शाखाएं खोलने के लिए अरुणाचल प्रदेश की सरकार के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर किए हैं."
सब्यासाची ने कहा, "राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी (आरआरयू) फिलहाल आईटीबीपी, हिमाचल और लद्दाख प्रशासन से भी उनके अधिकारियों को इसी तरह की ट्रेनिंग देने के संबंध में बातचीत कर रही है. इसके अलावा सीमाई इलाकों में आरआरयू के केंद्र खोलने पर भी विचार-विमर्श हो रहा है ताकि सीमा पर तैनात बलों के आगे मौजूद चुनौतियों से निपटा जा सके."
ख़बर के अनुसार, भारत और चीन की पेट्रोलिंग यूनिट्स के बीच कई बार भाषाई उलझनों के कारण झड़प जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है. अधिकारियों के अनुसार, ये प्रशिक्षण ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करने में भी मदद करेगा.
चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आईटीबीपी के साथ मिलकर भारतीय सेना करती है. भारत-चीन सीमा पर 3,488 किलोमीटर इलाके की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आईटीबीपी की है. हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तीनों ही राज्यों की सीमा चीन से लगती है.

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राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी को जानते हैं आप?
गुजरात के गाँधीनगर के इस विश्वविद्यालय को पहले रक्षा शक्ति यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता था. इसकी स्थापना साल 2010 में गुजरात सरकार ने की थी. उस समय राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे.
अक्टूबर 2020 में संसद ने राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी को राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया. अरुणाचल के अलावा इस यूनिवर्सिटी ने उत्तर प्रदेश सरकार, नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स, भारतीय नौसेना और दिल्ली पुलिस के साथ भी सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर प्रशिक्षण के लिए समझौते किए हैं. यूनिवर्सिटी के अनुसार, गाँधीनगर ब्रांच में करीब 1000 छात्रों ने दाखिला लिया है और पासीघाट सेंटर पर भी 40 छात्र पढ़ रहे हैं.
अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों पर केंद्र सरकार ने जारी किया अलर्ट

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केंद्र सरकार ने भारत में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर अलर्ट जारी किया है.
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को ऐसे अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है, जो बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में घुसे और अब भारत में बस गए हैं.
अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया है कि सुरक्षा एजेंसियों को पश्चिम बंगाल में स्थानीय लोगों और एजेंटों के नेटवर्क की जानकारी मिली थी, जो विदेशियों को भारत में घुसने, फ़र्ज़ी पते पर असली दस्तावेज़, पहचान पत्र वगैरह बनवाने में मदद कर रहे हैं.
सूत्रों के हवाले से अख़बार ने लिखा कि आधार कार्ड पा चुके कुछ अवैध प्रवासी देश के अलग-अलग हिस्सों में नौकरी पाकर वहीं रहने लगे हैं. इनमें से कुछ लोग बैंक पासबुक, वोटर आईडी और पैन कार्ड जैसे अन्य दस्तावेज़ हासिल कर चुके हैं.
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फर्ज़ी पहचानपत्र
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अख़बार से कहा, "इन फ़र्जी दस्तावेज़ों के ज़रिए वो फर्ज़ी पहचान और नौकरी पाने में मदद कर रहे हैं. बहुत से लोग इन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल कर के पासपोर्ट बनवा रहे हैं और विदेश आ-जा रहे हैं. चूंकि ये पासपोर्ट वैध प्रणाली से हासिल किए गए हैं, इसलिए ऐसे अभियुक्त पकड़े नहीं जा रहे हैं."
केंद्र सरकार की ओर से जारी किए गए अलर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल के कुछ स्थानीय लोग ही एजेंट बनकर अच्छी खासी रकम के बदले इन लोगों को भारतीय पहचान पत्र बनवाने में मदद कर रहे हैं, ख़ासतौर पर आधार कार्ड.
केंद्र सरकार के अनुसार, इन फ़र्ज़ी दस्तावेजों के सहारे विदेशी नागरिक अब तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक सहित देश के अलग-अलग राज्यों में रहने लगे हैं.
ये अलर्ट जारी करने के कुछ दिन बाद ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुजरात के मेहसाणा और आणंद ज़िलों के अधिकारियों को पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, पारसी, ईसाई, बौद्ध और जैनियों को भारतीय नागरिकता देने का निर्देश दिया था.
जम्मू-कश्मीर: पैलेट गन से जख़्मी हुए 80 फ़ीसदी पीड़ितों ने आंशिक रूप से खोई दृष्टि

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अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 के जुलाई से नवंबर महीने के बीच जम्मू-कश्मीर में हुई हिंसक झड़प के दौरान पैलेट गन से घायल हुए 80 फ़ीसदी लोग अब ठीक से देख नहीं पाते.
एक रिसर्च पेपर के हवाले से रिपोर्ट में लिखा गया है कि इन 80 प्रतिशत लोगों की दृष्टि अब सिर्फ़ 'उंगलियां गिन पाने' तक सीमित हैं. ये शोध पैलेट गन से जख़्मी होने वाले 777 लोगों पर किया गया है.
इस शोध में आम नागरिकों पर पैलेट गन के इस्तेमाल को बंद करने पर ज़ोर दिया गया है. पीड़ितों में अधिकांश 20 से 29 साल के युवक हैं. रिपोर्ट के अनुसार, चोट से पीड़ितों पर शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक-आर्थिक दबाव बढ़ा. इसके पीछे कम देख पाना, महंगा इलाज और पुनर्वास में लगने वाला लंबा समय बहुत बड़े कारण बताए गए हैं.
'द इंडियन जर्नल ऑफ़ ऑप्थोमलॉजी' में छपे इस रिसर्च पेपर में मुंबई के रेटीना सर्जन डॉक्टर एस. नटराजन ने भी सहयोग दिया है. उन्होंने पैलेट गन से घायल हुए लोगों के ऑपरेशन के लिए साल 2016 में पाँच बार श्रीनगर का दौरा किया. उनके साथ दिल्ली और चेन्नई के भी एक-एक डॉक्टर थे. कश्मीर में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच उस साल कई महीनों तक झड़प जारी रही थी. प्रदर्शनकारियों की ओर से पत्थरबाज़ी किए जाने का दावा किया गया था और इसके जवाब में सुरक्षाबलों की ओर से पैलेट गन चलाए जाने की बात कही गई थी.
रिपोर्ट के अनुसार 98.7 फ़ीसदी घायलों को अस्पताल में भर्ती होने के दिन या उसके अगले ही दिन ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ी. इन तीन डॉक्टरों ने मिलकर 777 मरीज़ों का इलाज किया और करीब 370 ऑपरेशन किए.
डॉक्टर नटराजन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि श्रीनगर में मरीज़ों की मदद के लिए उनसे पुणे के एनजीओ बॉर्डरलेस वर्ल्ड फ़ाउंडेशन ने संपर्क किया था. उन्होंने कहा, "मैंने ऐसे दो डॉक्टर खोजे जो हिंसा के वक्त कश्मीर जाने के तैयार थे. इनमें चेन्नई के ऑप्टिमस मक़बूल अस्पताल के सैयद असग़र हुसैन और नई दिल्ली से किंशुक मारवाह शामिल थे."
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