अनंतनाग हमले की ज़िम्मेदारी लेने वाला चरमपंथी संगठन टीआरएफ़ क्या है?

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, श्रीनगर से
भारत प्रशासित कश्मीर में अनंतनाग ज़िले के ख़ूबसूरत पिकनिक स्पॉट कोकरनाग में सशस्त्र चरमपंथियों के हमले में भारतीय सेना के एक कर्नल, एक मेजर और जम्मू कश्मीर पुलिस के एक डीएसपी की मौत हो गई.
कश्मीर में तीन साल से सक्रिय अवैध घोषित सशस्त्र ग्रुप द रेज़िस्टेंस फ़्रंट (टीआरएफ़) ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
बुधवार के दिन अनंतनाग में भारतीय सेना ने सशस्त्र चरमपंथियों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया था.
इस दौरान होने वाले हमले में भारतीय सेना के कर्नल मनप्रीत सिंह और मेजर आशीष धोंचक के अलावा भारत प्रशासित कश्मीर पुलिस के डीएसपी हुमायूं मुज़म्मिल बट की मौत हो गई.
पुलिस का कहना है कि कोकरनाग के घड़ोल गांव में होने वाली इस मुठभेड़ के बाद बड़े पैमाने पर कार्रवाई जारी है जिसके दौरान भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों की भी मदद ली जा रही है.
सेना और स्थानीय पुलिस का दावा है कि कार्रवाई के दौरान "दो चरमपंथियों को घेर लिया गया है जिनमें टीआरएफ़ के उज़ैर ख़ान भी शामिल हैं."
उज़ैर ख़ान के बारे में पुलिस का कहना है कि वह पिछले साल जुलाई में भूमिगत होकर टीआरएफ़ में शामिल हुआ था.
चरमपंथी घटनाएं

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जम्मू के जिला पुंछ और राजौरी में पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान सशस्त्र चरमपंथी गतिविधियों में इज़ाफ़ा हुआ है.
मंगलवार के दिन ही राजौरी के नारला गांव में मुठभेड़ के दौरान रवि कुमार नाम के सैनिक की मौत हो गई थी जबकि भारतीय सेना ने कहा था कि ऑपरेशन के दौरान दो चरमपंथियों को भी मारा गया है.
राजौरी में हुए हमले के बारे में भारतीय सेना का कहना था कि इसमें कुछ साल पहले ही बनी पीपुल्स एंटी फाशिस्ट फ़ोर्स (पीएएफ़एफ़) का हाथ है
टीआरएफ़ और पीएएफ़एफ़ क्या हैं?

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साल 2019 के अगस्त में भारत सरकार की ओर से जम्मू कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा ख़त्म करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने की घटना तक कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिदीन, लश्करे तैयबा और जैशे मोहम्मद जैसे हथियारबंद संगठन सक्रिय थे.
2019 से चरमपंथी कार्रवाइयों की ज़िम्मेदारी टीआरएफ़ और पीएएफ़एफ़ जैसे संगठनों ने लेनी शुरू कर दी.
पुलिस के अनुसार टीआरएफ़ कश्मीर घाटी में जबकि पीएएफ़एफ़ जम्मू के राजौरी और पुंछ में अधिक सक्रिय है.
मार्च 2023 में संसद में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा था कि टीआरएफ़ और पीएएफ़एफ़ को आतंकवाद निरोधी कानून यूएपीए के तहत आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है “जो अपहरण और दूसरी हिंसक वारदातों में भी शामिल हैं."
जम्मू कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि 2016 के बाद अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से संबंधित उत्तरदायित्व तय करने वाली संस्था फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स ने पाकिस्तान पर दबाव डालना शुरू किया था और उसे ब्लैक लिस्ट होने का ख़तरा था.
उनका कहना है कि कश्मीर में सशस्त्र हिंसा को स्थानीय रंग देने और उसे धार्मिक आंदोलन की बजाय स्थानीय विरोध के तौर पर प्रोजेक्ट करने के लिए लश्करे तैयबा टीआरएफ़ के तौर पर और जैशे मोहम्मद पीएएफ़एफ़ के तौर पर दोबारा सक्रिय हुए.
पिछले तीन साल के दौरान कश्मीर और जम्मू के राजौरी-पुंछ क्षेत्रों में विभिन्न हमलों की ज़िम्मेदारी टीआरएफ़ ने स्वीकार की है.
इसी साल पांच अगस्त को कुलगाम ज़िले के हालन मंज़गाम क्षेत्र में ऐसे ही एक हमले में भारतीय सेना के तीन सैनिकों की मौत हुई थी.
मार्च 2020 में उत्तरी कश्मीर के हिंदवाड़ा क़स्बे में भी ऐसा ही हमला हुआ था जिसमें सेना के एक कर्नल, एक मेजर और पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर मारे गए थे.
पुलिस सूत्रों ने बताया है कि बुधवार को कोकरनाग में होने वाला हमला हिंदवाड़ा के बाद सबसे बड़ा हमला है.
क्या चरमपंथी घटनाएं घटीं?

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भारतीय सेना, पुलिस और नागरिक प्रशासन पिछले तीन साल से लगातार यह कहते रहे हैं कि अनुच्छेद 370 के ख़ात्मे ने सशस्त्र चरमपंथ को भी ख़त्म कर दिया और “जम्मू कश्मीर विकास, शांति और ख़ुशहाली के नए दौर में दाख़िल हो चुका है."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कश्मीर के लेफ़्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा तक, सभी ने पिछले हफ़्तों के दौरान पिछले साल घाटी की सैर पर आए डेढ़ करोड़ पर्यटकों के आगमन को शांति का सबसे बड़ा सबूत घोषित किया था जबकि लेफ्टिनेंट गवर्नर सिन्हा ने इस साल दो करोड़ से अधिक पर्यटकों के आगमन का दावा किया है.
जम्मू कश्मीर पुलिस के प्रमुख दिलबाग़ सिंह ने हाल के दिनों में सोपोर में एक समारोह को संबोधित करने के दौरान कहा था कि कुल मिलाकर “जम्मू कश्मीर के सभी क्षेत्रों में शांति पाई जाती है और अब आतंकवाद नहीं, बल्कि व्यापार और शिक्षा की गतिविधियां जारी हैं."
भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांड के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कोकरनाग की मुठभेड़ से केवल दो दिन पहले ऐसा ही दावा किया था और कहा था “इस साल 46 चरमपंथी मारे गए जिनमें विदेशी चरमपंथियों की संख्या 37 थी."
इन आंकड़ों से यह बताने की कोशिश की जा रही है कि स्थानीय युवा अब चरमपंथ की और आकर्षित नहीं हो रहे हैं.
लेफ़्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी का कहना था, “पाकिस्तान इस स्थिति से परेशान होकर एलओसी पर घुसपैठ करवा रहा है."
सुरक्षाबलों के लिए चुनौती

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एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटाया गया था तो साथ में बड़े पैमाने पर सशस्त्र समूहों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन शुरू किया गया और इसमें शक नहीं कि ऑपरेशन कामयाब रहे.
वे दावा करते हैं कि अब तक 500 से अधिक चरमपंथी मारे गए हैं.
उन्होंने कहा, "प्रदर्शन और पथराव अब पुरानी बातें हैं. अब तो लोकल लड़कों की संख्या भी कम है. लेकिन चरमपंथी गतिविधियां पूरी तरह अंडरग्राउंड हो गई हैं जो सुरक्षा बलों के लिए एक नई चुनौती है."
पुलिस प्रमुख दिलबाग़ सिंह के अनुसार पिछले साल 65 चरमपंथियों को मारा गया जबकि 17 को गिरफ़्तार किया गया.
सरकारी आंकड़ों से तो लगता है कि भारत प्रशासित कश्मीर में हिंसक कार्रवाइयों में कमी हुई है और हथियार उठाने को अब बहुत कम स्थानीय युवा तैयार हैं लेकिन क्या इसको चरमपंथ का ख़ात्मा कह सकते हैं?
कोकरनाग घटना की निंदा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने गुरुवार को अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “चरमपंथ ख़त्म नहीं हुआ है, हमें कठोर सैनिक कार्रवाइयों के साथ-साथ स्वीकार करना होगा कि केवल बातचीत से ही स्थायी शांति स्थापित हो सकती है."
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