महंगे आटे और बिजली पर बरसा पाक प्रशासित कश्मीरियों का ग़ुस्सा, सड़कों पर उतरे लोग

सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल महिलाएं

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    • Author, मोहम्मद ज़ुबैर
    • पदनाम, पत्रकार

"मेरा दो महीने का बिजली का बिल अस्सी हज़ार रुपये आया है. मैं बेकरी चलाता हूं. समझ में नहीं आ रहा कि बिजली का बिल दूं, महंगा आटा ख़रीदूं, स्टाफ़ को तनख़्वाह दूं या दूसरे बिल अदा करूं? अगर यही स्थिति रही तो कारोबार बंद करना पड़ेगा. दूसरी स्थिति यह है कि अपने अधिकार के लिए प्रदर्शन करूं और अब मैं यही कर रहा हूं."

यह कहना है पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के शहर रावला कोट में बेकरी के कारोबार से जुड़े राजा वक़ार का.

राजा वक़ार कहते हैं कि महंगाई का एक ऐसा तूफ़ान उमड़ आया है कि मुझ समेत "औसत और ग़रीब वर्ग के लिए शरीर और आत्मा का संबंध बनाए रखना भी मुश्किल हो चुका है."

वह कहते हैं, "हम इस साल मई से प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार चाहे गिरफ़्तार करे, हम अब प्रदर्शन से रुकने वाले नहीं. कश्मीरियों के सब्र का पैमाना भर चुका है और छलकने वाला है.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में पिछले कई महीनों से जारी प्रदर्शन उस समय बड़े हंगामे में बदल गया जब मुज़फ़्फ़राबाद और रावला कोट के ज़िलों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई और इसके बाद कश्मीर पुलिस ने कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज किए और उनकी गिरफ़्तारियां कीं.

इन गिरफ़्तारियों के बाद कश्मीर की महिलाओं ने भी विभिन्न शहरों में धरने देना शुरू कर दिया.

रावला कोट से संबंध रखने वाली एडवोकेट नौशीन कंवल का कहना था कि जब आंदोलन के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर मुक़दमे दर्ज हुए तो इसके बाद महिलाएं भी मैदान में निकल आईं हैं.

उनका कहना था कि वर्तमान महंगाई के इस तूफ़ान में सबसे अधिक प्रभावित महिलाएं ही होती हैं और अब वे अपनी भूमिका अदा करने के लिए मैदान में हैं.

हालात तनावपूर्ण कैसे हुए?

शनिवार से विरोध प्रदर्शन और भी तेज हुए

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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में प्रदर्शन तो कई सप्ताह से जारी था.

लेकिन स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब पिछले शनिवार को विरोधस्वरूप बिजली के बिलों के जहाज़ बनाकर नीलम नदी में फेंके गए.

इस पर अवामी ऐक्शन कमेटी के सदस्य और प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज करके न केवल उन्हें गिरफ़्तार किया गया बल्कि धरने के स्थान पर लगे कैंप को भी उखाड़ दिया गया.

इसके कारण मुज़फ़्फ़राबाद समेत कश्मीर के विभिन्न शहरों में प्रदर्शनकारी सड़कों पर निकल आए और बाज़ार बंद करवा कर सड़कें ब्लॉक कर दीं.

पुलिस को प्रदर्शनकारियों को तितर बितर करने के लिए आंसू गैस इस्तेमाल करना पड़ा.

सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच वार्ता के बाद हालांकि अवामी ऐक्शन कमेटी के नेताओं को रिहा कर दिया गया लेकिन गुरुवार पांच अक्टूबर को कश्मीर भर में एक बार फिर चक्का जाम और शटर डाउन हड़ताल की गई और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए गए.

कश्मीर के पत्रकार तारिक़ नक़्क़ाश के अनुसार कश्मीर की जनता में पिछले कुछ समय से बेचैनी पाई जाती है, जिसके कई कारण हैं.

"हाल के प्रदर्शन की वजह बुनियादी तौर पर दो ख़ास मामले बने हैं: एक तो आटा और दूसरे खाद्य पदार्थों पर सरकारी सब्सिडी कम करना और दूसरा बिजली के बिलों में इज़ाफ़ा है."

उनका कहना था कि प्रदर्शन मई माह में शुरू हुए और इसकी शुरुआत रावला कोट से हुई थी जहां पर आटा और खाद्य पदार्थ पर सब्सिडी ख़त्म या कम करने के मामले पर धरना कैंप लगाए गए.

वहां पर यह प्रदर्शन कई सप्ताह जारी रहा, इसके बाद यह कश्मीर के विभिन्न शहरों तक फैल गया.

तारिक़ नक़्क़ाश के अनुसार, "अभी यह मामला चल ही रहा था कि बिजली की बढ़ी दर का मामला सामने आ गया और इसमें तेज़ी कुछ दिन पहले उस समय आई जब मुज़फ़्फ़राबाद और रावला कोट में लोगों ने बिजली के बिलों को आग लगाने के अलावा नदी में फेंक दिया था.

उनका कहना था कि उस अवसर पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस में झड़पें भी हुईं,

इसके बाद पुलिस ने मुक़दमे दर्ज किए हैं. "उन मुक़दमों में कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं पर आतंकवाद से संबंधित क़ानून की धाराएं भी लगाई गई हैं. वह कार्यकर्ता और नेता जिन पर आतंकवाद संबंधी धारा नहीं लगाई गई है उनकी ज़मानत हो चुकी है.

आटे और बिजली की क्या समस्या है?

5 अक्टूबर को बंद का आह्वान किया गया था

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इमेज कैप्शन, 5 अक्टूबर को पूरे पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में बंद का आह्वान किया गया था

पाकिस्तान शासित कश्मीर में दिसंबर 2022 के बिलों में बिजली नौ रुपये प्रति यूनिट थी जो अगस्त 2023 में 32 रुपए प्रति यूनिट तक बढ़ा दी गई. कश्मीर में जारी प्रदर्शन के बाद सितंबर के बिलों नई दरें स्थगित करके बिजली को 19 रुपये प्रति यूनिट कर दिया गया.

प्रदर्शनकारियों की मांग है कि चूंकि कश्मीर में पैदा होने वाली बिजली 'वापडा' बेहद सस्ते दामों यानी 1.30 रुपए प्रति यूनिट में ख़रीदती है इसलिए कश्मीर वालों को इस दर या कम से कम रियायती दर पर दी जाए.

इस बारे में बीबीसी ने जब कश्मीर मामलों के जनसंपर्क अधिकारी मुजीब क़ादिर खोखर से संपर्क किया तो उनका कहना था कि बिजली और बजट के मामले 'वापडा' का विभाग और वित्त मंत्रालय देखता है.

दूसरी और 'वापडा' विभाग के एसडीओ राजा अरशद का कहना था कि बिजली के बिलों में टैक्स और वृद्धि पाकिस्तान सरकार के निर्देश पर किया जाता है और डिस्ट्रीब्यूटर कंपनी सरकार की नीतियों पर अमल करती है.

पाकिस्तान के कार्यकारी सूचना मंत्री मुर्तज़ा सोलंगी से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने जवाब दिया कि इस मामले पर वित्त मंत्रालय से संपर्क किया जाए.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बाज़ारों में 20 किलो आटे के थैले की क़ीमत तीन हज़ार रुपये है जबकि सरकार की ओर से सब्सिडाइज़्ड दर 1590 रुपए है.

अनुमान है कि इस समय पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में गेहूं की सालाना मांग पांच लाख टन है जबकि सरकार सब्सिडाइज़्ड दरों पर तीन लाख टन गेहूं ही मुहैया कर पाती है.

आटे की मांग और सप्लाई में बहुत अधिक अंतर भी इस समस्या को गंभीर बनाता है.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के खाद्य सचिव मोहम्मद रक़ीब का बीबीसी की संवाददाता ताबिंदा कौकब को बताया था कि सरकार प्रति 40 किलो तीन हज़ार रुपये सब्सिडी दे रही है लेकिन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की जनता चाहती है कि उन्हें गिलगित बल्तिस्तान की तरह की सब्सिडी दी जाए.

उनका कहना था कि गिलगित का अपना क्षेत्र और मार्केट है, "उनकी केंद्रीय बाज़ार से दूरी की वजह से पाकिस्तान सरकार ने विशेष व्यवस्था की होगी लेकिन हम मार्केट के पास हैं इसलिए हमारे लिए अधिक सब्सिडी देना संभव नहीं."

आटे की अनुपलब्धता की समस्या पर मोहम्मद रक़ीब का कहना था, "जब ओपन मार्केट और सरकारी दर पर मिलने वाले आटे की क़ीमतों में अधिक अंतर नहीं था तो अधिकतर लोग निजी मार्केट से आटा लेना पसंद करते थे क्योंकि वह फ़ाइन आटे की जगह शुद्ध आटे को पसंद करते थे. अब आटा महंगा होने की वजह से वह लोग भी सरकारी आटे की तरफ़ आ गए हैं."

कुछ लोगों की राय है कि कश्मीर में अधिकतर लोग चावल शौक़ से खाते हैं लेकिन उसकी क़ीमतों में वृद्धि की वजह से भी आटे की मांग पर असर पड़ा है.

इस पर मोहम्मद रक़ीब का कहना था, " मांग बढ़ गई है और सरकार को सप्लाई पर समीक्षा करनी है, जो हर तीन महीने पर की जाती है. अब समीक्षा में मांग को कंट्रोल करने के लिए आमतौर पर लागत बढ़ा दी जाती है लेकिन सरकार ने ऐसा न करने का फ़ैसला किया है लेकिन सप्लाई बढ़ाने के लिए भी सरकार के पास आर्थिक संसाधन नहीं हैं."

लेकिन उन्होंने यह बात मानी कि प्रबंधन की समस्या हर जगह होती है इसमें कोई शक नहीं, इसलिए चेक एंड बैलेंस होना ज़रूरी है.

"हमारे संसाधनों के बदले कुछ नहीं दिया जाता"

बीती मई से ही चल रहे हैं सरकार विरोध प्रदर्शन

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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की केंद्रीय एक्शन कमेटी के सदस्य और मुज़फ़्फ़राबाद में व्यावसायिक नेता शौकत नवाज़ मीर का कहना था कि हाल के प्रदर्शन की वजह तो बिजली की क़ीमतों में इज़ाफ़ा और आटा व दूसरे खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी का ख़त्म करना और कम करना शामिल है मगर जनता के अंदर लावा 75 साल से तैयार हो रहा है.

उनका कहना था कि कश्मीर के संसाधन पूरा पाकिस्तान इस्तेमाल करता है मगर बदले में कश्मीर को कुछ नहीं दिया जाता.

उनका कहना था, "कश्मीर के पानी से चार हज़ार मेगावाट बिजली पैदा की जा रही है. कश्मीर की अपनी ज़रूरत केवल और केवल 400 मेगावाट है. वह भी इतनी अधिक महंगी कर दी गई है कि कश्मीरी अब दोबारा लालटेन ले रहे हैं क्योंकि बिजली इस्तेमाल करने का करके उसका बिल अदा नहीं कर सकते."

रावला कोट से एक्शन कमेटी के सदस्य और व्यापारी नेता उमर अज़ीज़ कहते हैं कि हाल के दिनों में बिजली के बिलों को देखें तो इसमें इतने अधिक टैक्स हैं जो समझ भी नहीं आ रहे.

उनका कहना था कि उन टैक्सों का उद्देश्य क्या है? "कश्मीर में विकास का काम तो नहीं हो रहा है. कोई यूनिवर्सिटी, कॉलेज और व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थान भी नहीं बन रहे हैं तो फिर यह टैक्स कहां ख़र्च हो रहा है?"

एक्शन कमेटी के सदस्य एडवोकेट राजा मज़हर इकबाल ख़ान का कहना है, 'हमारी मांग है कि ब्यूरोक्रेसी, अधिकारियों और जजों की बड़ी-बड़ी तनख़्वाहों और भत्तों को कम किया जाए और इसके बदले हमें उचित दर पर बिजली सस्ता आटा और खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराए जाएं."

पाक प्रशासित कश्मीर की सरकार क्या कर रही है?

प्रदर्शनकारियों से समझौता करना चाहती है सरकार

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जनता की शिकायत पर पाक प्रशासित कश्मीर की सरकार क्या कर रही है और क्या ये आरोप सही हैं?

इस सवाल के जवाब पर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के मंत्री चौधरी मोहम्मद रशीद का कहना था, "कश्मीर से कोई भी भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं हो रहा बल्कि पाकिस्तान की मदद से कश्मीर के मामले चल रहे हैं. अब पाकिस्तान में आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं तो कश्मीर में भी इसके प्रभाव देखे जा सकते हैं."

उनका कहना था, "यह बात बिल्कुल ग़लत है कि आटे पर सब्सिडी ख़त्म कर दी गई है बल्कि लोगों की डीलरों से कोई समस्या है. अब जनता से बातचीत का सिलसिला शुरू कर दिया गया है. उनकी मर्ज़ी और राय से डीलर्स को नियुक्त किया जाएगा ताकि शिकायतों का सिलसिला ख़त्म हो सके."

बिजली के बिलों के बारे में जनता की शिकायतों पर चौधरी मोहम्मद रशीद का कहना था कि बिजली के बिलों में वृद्धि नहीं चाहते हुए भी की गई है. "पाकिस्तान में जब बिजली के बिलों में वृद्धि हुई है तो हमने कश्मीर में बिलों में वृद्धि करने से इनकार कर दिया था मगर दो माह पहले मजबूरी में ऐसा करना पड़ा."

चौधरी रशीद का कहना था कि अभी जो बिजली का मुद्दा पैदा किया गया है कि कश्मीर चार हज़ार मेगावाट बिजली पैदा करता है और 'हमारी ज़रूरत कोई 400 मेगावाट है', तो यह भी सही नहीं है.

उनका कहना था कि पहले एक यूनिट पर कश्मीर को 15 पैसे मिलते थे, फिर 40 पैसे हुए और अब एक रुपये 10 पैसे मिल रहे हैं और इकट्ठी होने वाली सभी रक़म कश्मीर का बजट बनाने में इस्तेमाल होती है. "इसके अलावा 2010 से कश्मीर में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत बिजली पैदा की जा रही है. समझौते के तहत यह सभी सिस्टम 25 साल के बाद सरकार के स्वामित्व में होगा जिससे स्थिति और भी बेहतर हो जाएगी."

अवामी एक्शन कमेटी और प्रदर्शनकारियों की गिरफ़्तारियों के बारे में चौधरी रशीद का कहना था कि जब शांति व्यवस्था की समस्या पैदा की जाएगी तो फिर क़ानून सक्रिय होगा. कश्मीर में मुक़दमे दर्ज किए गए हैं लेकिन साथ ही वार्ता भी जारी करने की दावत दी गई है.

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