ऑस्ट्रेलिया में महंगाई और अपराध के अलावा मगरमच्छ भी चुनावी मुद्दा क्यों बना

ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी टेरेटरी (एनटी) में घरों में मगरमच्छ रखना कहानी नही हकीकत है

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    • Author, टिफ़नी टर्नबुल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

क्या आप अपने घरों में कुत्ते बिल्लियों की तरह मगरमच्छ भी पाल सकते हैं?

सुनने में तो ये बिल्कुल ऑस्ट्रेलिया में प्रचलित कोर कल्पित कहानी जैसी लगती है. बिलकुल वैसी ही जैसे की कंगारू पर चढ़कर स्कूल जाना.

लेकिन ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी टेरेटरी (एनटी) में यह कोई कोरी कहानी नहीं बल्कि हक़ीक़त है.

डॉर्विन से एक किलोमीटर दक्षिण बैचलर में ट्रेवर सुलिवन अपने घर में ग्यारह मगरमच्छों के साथ रहते हैं.

उन ग्यारह मगरमच्छों में से एक का नाम बिग जैक है, जिसका नाम जैक इन द बॉक्स खिलौने के नाम पर रखा गया है.

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क्या हैं नियमों में बदलाव

चुनावों से पहले मगरमच्छ को अपने घर में पालतू जानवर की तरह रखना एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है.

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बाईस साल पहले सुलिवन के घर बेटी के जन्म के दिन ही उस घर का हिस्सा बने बिग जैक को उसकी तमाम हरकतों और नखरों के बावजूद उस घर में भरपूर प्यार मिलता है.

सुलिवन अपने अस्सी एकड़ में फैले घर में रह रहे ग्यारह मगरमच्छों के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इन ग्यारह में से एक तो अभी बहुत छोटा है जबकि दूसरा 4.7 मीटर (15.4 फीट) का विशालकाय मगरमच्छ है जो शायद दो विश्व युद्ध देख चुका है.

उस बड़े मगरमच्छ के बारे में सुलिवन का दावा है कि उसने एक बार एक आदमी को मार दिया था. इसका इस्तेमाल वैज्ञानिक रिसर्च कार्य में भी किया जा चुका है.

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सुलिवन के घर आने से पहले क्वींसलैंड क्रोकोडाइल पार्क में एक लड़ाई में इस विशालकाय मगरमच्छ के निचले जबड़े का आधा हिस्सा टूट चुका है. एक बार तो वो ज़हर देने के कारण एकदम मरणासन्न अवस्था में पहुँच चुका था.

बीबीसी से अपने मगरमच्छों के बारे में बताते हुए साठ वर्षीय सुलिवन चहकते हुए कहते हैं कि मगरमच्छों जैसा कुछ भी नहीं और यही मगरमच्छ जानवर पालने वालों के हार्ले डेविडसन (मोटरसाइकिल) हैं.

लेकिन यहाँ शनिवार को चुनावों से पहले मगरमच्छ को अपने घर पालतू जानवर की तरह रखना एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है.

हालांकि मतदाताओं के लिए महंगाई और अपराध तो मुद्दा है ही लेकिन सुलिवन जैसों के लिए ये घर पर पालतू जानवर रखने वाला मुद्दा दिल टूटने वाली बात है. खासकर जब से सत्ताधारी लेबर पार्टी ने मगरमच्छों को घर में पालतू जानवर के रूप में रखने पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है.

ऑस्ट्रेलिया में उत्तरी टेरिटरी एक अंतिम स्थान में से एक हैं जहां मगरमच्छों को अपने घर पालतू जानवर के रूप में रखने की इजाज़त है लेकिन अब सरकार का कहना है कि वे इंसान और मगरमच्छ दोनों की भलाई के लिए चिंतित हैं.

हालांकि, विपक्षी कंट्री लिबरल पार्टी ने इसे जारी रखने के लिए अपना समर्थन देने का वादा किया है और कहा है कि सरकार बनने पर इस निर्णय की समीक्षा की जाएगी.

क्या हैं नियम

उत्तरी टेरिट्री (एन टी) में मगरमच्छ रखने के लिए परमिट धारकों की संख्या लगभग 100 ही हैं.

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उत्तरी टेरिटरी (एनटी) में रहनेवाले लगभग 250,000 लोगों में से कुछ के पास ही मगरमच्छ हैं.

पर्यावरण मंत्री के कार्यालय ने कहा कि वे इस पर एक आंकड़ा नहीं दे सकते क्योंकि सरकार चुनावी मोड में है. लेकिन पिछले अनुमानों के मुताबिक़ परमिट धारकों की संख्या लगभग 100 पर रखी है.

इन तरह के कई मगरमच्छों को या तो वो जब जन्म लेते हैं तब से पल जाता है या फिर खेतों या जंगलों में परेशानी पैदा करने के बाद लाया जाता है.

जानवरों को घर पर किन परिस्थितियों में और कहाँ रखा जा सकता है इसके लिए सख्त नियम भी बनाये गए हैं.

उदाहरण के लिए, शिशु अवस्था में 60 से.मी. की लंबाई तक ही इन्हें शहरी क्षेत्रों में रख सकते हैं.

आमतौर पर उनके एक वर्ष के हो जाने पर उन्हें अधिकारियों को सौंप दिया जाना एकदम आवश्यक है या फिर शहरी क्षेत्र से बाहर ले जाना ज़रूरी है.

उन नियमों के तहत मालिकों को मगरमच्छों को रखने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण या ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती थी.

जबकि टॉम हेस कहते हैं इस क्षेत्र में मगरमच्छ का मालिक होना या फिर उसे बचाना इस क्षेत्र की विशेषता होने के कारण ही उन्होंने और उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने इस क्षेत्र में आने का फैसला किया.

40 वर्षीय टॉम हेस अपने पिता के साथ एनटी की यात्रा के दौरान मैरी नदी में विशाल मगरमच्छों के साथ मछली पकड़ने और आखिरकार एक दिन अपना मगरमच्छ रखने का सपना देखते हुए बड़े हुए.

टैटू बनाने वाले और स्वयंभू संरक्षणवादी टॉम हेस बीबीसी से कहते हैं, “मैं उस तरह का व्यक्ति नहीं हूँ जिसे वीकेन्ड पर अपने दोस्तों के साथ साथ बारबेक्यू के लिए मगरमच्छ चाहिए हो. मेरी इच्छा थी कि मैं इन बेचारे जानवरों को यहां ला सकूँ ताकि वो अपना जीवन जी सकें और उन्हें गोली मारने वाले लोगों के बारे में चिंता करने की ज़रूरत न पड़े.”

जब वो एक बड़े मगरमच्छ को गोद लेने की प्रक्रिया में ही थे तभी एनटी सरकार ने घोषणा कर दी कि वह अब मगरमच्छों को पालतू जानवरों के रूप में रखने के लिए कोई नया परमिट जारी नहीं करेगी.

इस फैसले ने हेस को निराश कर दिया.

मगरमच्छ को कै़द में रखना कितना सही

नियमों में बदलाव की मांग के लिए जोर दे रहे पशु प्रेमियों के लिए यह एक बड़ी जीत है

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एनटी पर्यावरण मंत्री केट वर्डेन ने कहा कि यह फैसला "सार्वजनिक परामर्श के बाद" और "व्यक्तिगत सुरक्षा और पशु कल्याण चिंताओं को ध्यान में रखते हुए" लिया गया था.

मौजूदा परमिट वैध रहेंगे, लेकिन परमिट के हस्तांतरण की अनुमति नहीं दी जाएगी.

वर्डेन ने संवाददाताओं से बात करते हुए बताया, “हमें याद रखना चाहिए कि वे एक बड़े विशाल जानवर हैं जिन्हें कै़द रखना सही नहीं है.”

साथ ही उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस क्षेत्र में मगरमच्छों द्वारा अपने मालिकों पर हमला करने के मामले भी सामने आए हैं.

इन नियमों में बदलाव की मांग के लिए ज़ोर दे रहे पशु प्रेमियों के लिए यह एक बड़ी जीत है.

वर्ल्ड एनिमल प्रोटेक्शन की ओलिविया चार्लटन का तर्क है कि मगरमच्छ रखने वाले कुछ लोगों के इरादे तो अच्छे हो सकते हैं लेकिन कोई भी जंगली जानवर अपनी ज़रूरतों को कै़द में पूरा नहीं कर सकता है.

अपने बयान में वो कहती हैं, "70 साल तक जीवित रहने वाले इन मगरमच्छों को जंगल की तरह जगह और स्वतंत्रता कै़द में नहीं मिल सकती."

आरएसपीसीए एनटी के चार्ल्स गिलियम ने कहा कि मगरमच्छों की खतरनाक प्रवृत्ति के मद्देनज़र इन मगरमच्छों को स्वीकार्य मानक के अनुसार ही जीवन स्तर और चिकित्सा देखभाल मिले इसके लिए अधिकारियों के लिए योजनाओं को सुनिश्चित और संचालित करना कठिन बना दिया.

एक उदाहरण देते हुए वो बताते हैं, “मैं केवल एक पशु चिकित्सक को जानता हूं जो मगरमच्छों के साथ काम करने के लिए तैयार है."

लेकिन मगरमच्छ मालिकों का कहना है कि उन्हें नहीं पता था कि नियमों में ये बदलाव आ रहा है और अब वो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अब उनके पालतू जानवरों का क्या होगा?

हेस कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि आप कई रातों तक अपने साढ़े चार मीटर के मगरमच्छ के साथ सोफ़े पर टीवी देखते हुए झपकी ले सकते हैं. फिर भी एक भावनात्मक लगाव तो है ही."

इस मसले पर वो सरकार के ऊपर सही परामर्श से बचने के लिए व्यापक मगरमच्छ प्रबंधन योजना में नए नियमों को छिपाने का आरोप लगाते हैं.

पर्यावरण मामलों पर विपक्षी पार्टी के प्रवक्ता जो हर्सी कहते हैं, "कंट्री लिबरल पार्टी परमिट सिस्टम के तहत पालतू जानवरों के रूप में मगरमच्छों को रखने के क्षेत्रीय लोगों के अधिकारों का समर्थन करती है और वादा किया है कि चुने जाने पर इन नियमों पर विचार करेगी."

सारी उम्मीदें चुनाव पर क्यों हैं

पार्टी सम्मेलन

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हेस और सुलिवन दोनों ने कहा कि परमिट धारकों के लिए अधिक प्रशिक्षण और शिक्षा आवश्यकताओं के लिए व्यापक समर्थन है.

साथ ही दोनों उन तर्कों को भी अस्वीकार करते हैं जिसमें कहा जाता है कि मगरमच्छों को पालतू जानवरों के रूप में रखना हानिकारक है. मगरमच्छों की देखभाल करना आश्चर्यजनक रूप से आसान है.

सुलिवन कहते हैं, "जंगलों में उनके पास एक बाढ़ क्षेत्र होता है और वहाँ रहने के लिए उन्हें लड़ना पड़ता है. उन्हें भोजन के लिए हमेशा शिकार करना पड़ता है. हमेशा अपने दुश्मनों का पीछा कर रहे होते हैं. यहाँ तक की अपनी प्रेमिकाओं को भी ठीक रखने की भी कोशिश करनी पड़ती है. इसके कारण जंगल में जीवन बहुत कठिन हो जाता है और कै़द में उन्हें पानी, सूर्य की रौशनी, छाया और खाना सब कुछ मिलता है नियमित तौर पर मिलता है जिसे वो पसंद करते हैं."

इस नियम को ख़त्म करने का निर्णय सुलिवन के लिए सही समय पर नहीं आया है. अभी पिछले साल ही उन्होंने अपने घर और जानवरों की बिक्री के लिए सूचीबद्ध किया था ताकि वो न्यूजीलैंड में अपने साथी के साथ रह सकें.

सूचीबद्ध करना एक "विली वोनका" स्टोरी की तर्ज़ पर किया था जिसके तहत उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें सही स्वभाव के कुछ जवान बच्चे मिल जाएंगे जो जंगली जानवरों की देखभाल सही से कर सकें.

लेकिन अब आए नियमों में बदलाव ने सुलिवन को एक अजीब स्थिति में छोड़ दिया है. जैसे आपके पास 80 एकड़ और 11 मगरमच्छ तो हैं लेकिन ट्रांसफर के लिए शून्य परमिट ज़ीरो हैं. तो इसका जवाब क्या होगा?

वो आगे कहते हैं कि कोई चांस नहीं कि वो अपने मगरमच्छों को इच्छामृत्यु देकर मरने देंगे. "अब मुझे मरने तक यही रहना पड़ेगा या फिर जब तक फिर से नियम नहीं बदल जाते."

अब सुलिवन की सारी उम्मीदें स्थानीय चुनावों पर टिकी हुई हैं. उन्हें लगता है कि यह मुद्दा मतदाताओं को प्रभावित करेगा.

लेकिन दूसरी ओर हेस ऐसा नहीं मानते हैं. वो कहते हैं कि चुनाव में कई और मुद्दे हैं जिनके आधार पर वोटों का फ़ैसला करना चाहिए.

हालांकि वो आशावादी हैं और उम्मीद करते हैं कि एक दिन दोनों पार्टियों को यह बता समझ में आ जाएगी आएंगी कि यह एक तरह से जीवन जीने के तरीके़ पर हमला है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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