एडम ब्रिटन: जानवरों को चाहने वाले शख़्स में कैसे छिपा था एक ‘शैतान’

- Author, टिफ़नी टर्नबुल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, सिडनी
जानवरों के लिए हमेशा प्यार और सम्मान की बात करने वाले 53 वर्षीय एडम ब्रिटन ने अपनी छवि एक शांत और भावुक किस्म के इंसान के रूप में बेजुबां जानवरों की हिमायत करने वाले दुनिया के एक जाने माने मगरमच्छ एक्सपर्ट की बना रखी थी.
लेकिन अब जो बातें सामने आ रही हैं उसके अनुसार एडम ब्रिटन जानवर प्रेमी नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बुरे पशु दुर्व्यवहारियों में से एक है.
इसी हफ्ते, ब्रिटन को दर्जनों कुत्तों के साथ यौन शोषण और यातना देते हुए फ़िल्म बनाने के आरोप में एक दशक से भी ज़्यादा की जेल की सज़ा सुनाई गई है.
पशु क्रूरता और पाशविकता के 56 मामलों में एडम ब्रिटन ने बाल शोषण से संबंधित चार सामग्रियों को एक्सेस करना भी स्वीकार कर लिया है.
जिस ब्रिटन को लोगों ने हमेशा एक पशुप्रेमी और उनके अधिकारों की वकालत करते हुए पाया और अब उसी ब्रिटन के बारे आई यह ख़बर दुनिया भर में उन्हें जाननेवालों के लिए सदमे और घृणा जैसी थी .
दुनिया ने ब्रिटन को सबसे बड़े मगरमच्छ के साथ तैरते देखा था, तो अपने पालतू मगरमच्छ स्मॉग को उन्होंने कई फ़िल्मों और डॉक्युमेंट्री में शूट के लिए उधार देते सुन रखा था अब दुनिया उसी ब्रिटन के बारे में पूछ रही है कि आखिर वो "मैकमिन्स लैगून का राक्षस” कैसे बन गया?

"मैकमिन्स लैगून का राक्षस”

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“मैकमिन्स लैगून” ब्रिटन का एक विशाल घर है जहां पशुओं के साथ यौन शोषण और प्रताड़ना के मामले दर्ज किए गए हैं.
ब्रिटन ऑस्ट्रेलिया के डार्विन में अपने घर पर सर डेविड एटनबरो की मेज़बानी भी कर चुके हैं.
बीबीसी से बातचीत में कई लोगों ने ब्रिटन को एक शर्मीले स्वभाव का लेकिन मिलनसार आदमी बताया तो कुछ ने उसे एक अभिमानी व्यक्ति बताया जिसने उन चीज़ों का भी क्रेडिट स्वयं ले लिया जो उसका काम था ही नहीं.
लेकिन एक बात पर सब सहमत थे कि ब्रिटन के बारे में दिमागी घोड़े दौड़ाने के बाद भी लोगों को ऐसी कोई बात याद नहीं आई जो अब ब्रिटन के बारे में ख़बरों के रूप में आई है.
ब्रिटन के पूर्व सहयोगी ब्रैंडन सिडलेउ इसकी तुलना अमेरिकन सीरियल किलर टेड बंडी प्रकरण से करते हुए कहते हैं, "वास्तव में यह एक ऐसी स्थिति है जहां आप कभी भी ऐसी चीज़ सोच ही नहीं सकते कि कुछ ऐसा भी हुआ होगा.”
मगरमच्छों के साथ ब्रिटन का शुरुआती आकर्षण

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1971 में वेस्ट यॉर्कशायर में जन्मे ब्रिटन के बारे में कोर्ट के दस्तावेज़ बताते हैं कि ब्रिटन ने बचपन से “परपीड़क" यौन इच्छा को छिपा रखा था और उसने 13 साल की उम्र से ही घोड़ों के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी.
ब्रिटेन में ब्रिटन की युवावस्था के बारे में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है.
अपने ब्लॉग में, ब्रिटन ने बताया है कि अपने जीवन में वो तीन लोगों से प्रभावित होकर प्राणी वैज्ञानिक बना.
ब्रिटन को प्रभावित करने वाले उन तीन लोगों के नाम हैं – उनकी माँ, उनके जीव विज्ञान के शिक्षक वैल रिचर्ड्स और तीसरे सर डेविड एटनबरो.
लीड्स विश्वविद्यालय में विज्ञान स्नातक का अध्ययन कर ब्रिटन ने 1992 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की. उसके बाद चमगादड़ के शिकार के तरीकों पर ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से 1996 में जूलॉजी में पीएचडी पूरी की.
लेकिन ब्रिटेन से बाहर मगरमच्छों पर रिसर्च करना ब्रिटन का सपना बचपन से ही था. ऐसा ब्रिटन ने स्वयं 2008 में एक इंटरव्यू में कहा था.
बचपन से ही ब्रिटन मगरमच्छों के प्रति मोहित थे.
मनोरंजन सेगमेंट की न्यूज़ वेबसाइट डेन ऑफ गीक के साथ बातचीत में ब्रिटन ने कहा था कि जब तक लोग जानवरों को ख़ुद नहीं समझेंगे तब तक लोगों को जानवरों के संरक्षण के बारे में समझाने का कोई फ़ायदा नहीं होगा.
इसलिए 1990 के दशक के मध्य में, ब्रिटन उत्तरी क्षेत्र (नॉर्दर्न टेरिट्री) पहुँच गए जहां दुनिया भर में सबसे ज़्यादा आबादी में खारे पानी का मगरमच्छ पाया जाता है.
ब्रिटन वहीं नॉर्दर्न टेरिट्री में ही इस फील्ड के जाने माने एक्सपर्ट ग्राहम वेब के पास पहुंचे जिनका एक छोटा सा चिड़ियाघर और रिसर्च सेंटर “क्रोकोडायल्स पार्क” के नाम से था.
यहाँ फिल्मांकन परियोजनाओं की ओर रुख करने के साथ साथ ब्रिटन ने अनुसंधान कार्यों में भी हिस्सा लिया.
यहीं पर अनुसंधानों में से एक 2005 में किए गए एक अनुसंधान ने विश्व भर में सुर्खियां बटोरीं.
ब्रिटन का यह अनुसंधान मगरमच्छ के रक्त की पावरफुल एंटीबायोटिक शक्तियों के बारे में था.
2006 में ब्रिटन ने क्रोकोडायल्स पार्क छोड़कर अपनी पत्नी के साथ एक नया मगरमच्छ परामर्श सेंटर शुरू किया.
बाद में ब्रिटन ने चार्ल्स डार्विन विश्वविद्यालय में एक सहायक अनुसंधानकर्ता के रूप में भी भूमिका निभाई.
पहले तो ब्रिटन को यहाँ लोगों ने शर्मीला लेकिन "ठीक-ठाक" माना लेकिन अब उसे एक सामाजिक रूप से अजीब "अलग आदमी" के रूप में देखा जाने लगा है.
क्रोकोडायल्स पार्क के लिए फील्ड अनुसंधान का काम आयोजित करनेवाले जॉन पोमेरॉय कहते हैं कि वो खुद में रहते थे इसलिए शायद वो काफी पोपुलर नाम नहीं थे लेकिन वो अपने काम में अच्छे थे.
ब्रिटन को इस इंडस्ट्री में और फिल्मांकन की कला सीखने में एक नई शुरुआत देने वाले प्रोफेसर वेब खुद को ब्रिटन के एक मेंटर के रूप में देखते थे लेकिन ब्रिटन ने उनके यहाँ काम छोड़ते ही सारे रिश्ते खत्म कर लिए थे.
अब प्रोफ़ेसर वेब का आरोप है कि ब्रिटन एक ईगोइस्ट व्यक्ति था जिसने क्रोकोडायल्स पार्क में टीम के अन्य सदस्यों के काम को भी खुद के काम के रूप में बताकर उनके कलाएंट्स को अपनी तरफ तोड़कर ले आए.
बीबीसी से बातचीत में प्रोफेसर वेब कहते हैं, “वहाँ सिर्फ वैज्ञानिक और सिर्फ वैज्ञानिक ही हैं. एडम ब्रिटन वहाँ सबको जानते थे और उसके पास ज्ञान भी बहुत है लेकिन यह एक अलग बात है. लाइब्रेरियन के पास भी बहुत ज्ञान होता है. लेकिन एडम ब्रिटन जैसे लोग सिर्फ खबरों में रहना चाहते थे.”
2013 में ब्रिटन के साथ मिलकर क्रोकबाइट नाम की एक डेटाबेस कंपनी की स्थापना करने वाले सिडेल्यू भी बीबीसी को कुछ ऐसी ही कहानी बताते हैं.
सिडेल्यू कहते हैं कि ब्रिटन ने इस काम में वेबसाइट के डोमेन के लिए भुगतान के सिवा किसी और प्रकार का कोई योगदान नहीं दिया था लेकिन उन्हें क्रेडिट लेना बहुत पसंद था.
ब्रिटन और उनके मगरमच्छ

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लेकिन आगे चलकर इंडस्ट्री में ब्रिटन और उनके पालतू मगरमच्छ एक स्टार की तरह एक नाम बन गए.
नॉर्दर्न टेरिट्री में प्रोफेसर वेब के क्रोकोडायल्स पार्क छोड़ने के बाद ब्रिटन ने खुद को एक मगरमच्छ के व्यवहार पर एक एक्सपर्ट के रूप में स्थापित करते हुए शुरुआती दौर में अपने आठ मगरमच्छों के घर 'मैकमिन्स लैगून' को एक वैश्विक फिल्मांकन डेस्टिनेशन बना दिया.
नाम न लिए जाने की शर्त पर बात करते हुए ब्रिटन के पूर्व मित्र और वाइल्ड्लाइफ रिसर्चर कहते हैं “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसने अपनी एक ऐसे जगह बना ली थी जिसका कोई मुकाबला नहीं था."
2006 में सर डेविड की एक डॉक्युमेंट्री “लाइफ इन कोल्ड ब्लड” में शूटिंग के लिए ब्रिटन ने एक विशेष तौर पर बाड़े का निर्माण कराया जिसमें मगरमच्छों के संभोग करते हुए दृश्यों को शूट किया गया. जिसकी काफी चर्चा हुई थी.
इसके बारे में बात करते हुए ब्रिटन ने डेली टेलग्राफ को इंटरव्यू में कहा था कि इस शूट में उनके अपने आदर्श के साथ काम करना उनके लिए एक सपने के पूरे होने जैसा था.
चूंकि मगरमच्छों के व्यवहार को शूट करना बहुत मुश्किल काम होता है यहाँ मैकमिन्स लैगून पर ब्रिटन के मगरमच्छों के व्यवहार को शूट करने के लिए टीवी क्रू की भीड़ लगने लगी.
2018 में एनटी न्यूज़ से बात करते हुए गर्व से ब्रिटन कहते हैं, “अगर आपने कहीं भी कभी खारे पानी के मगरमच्छ का पानी के नीचे का शॉट देखा है, तो आप जान लीजिए की वो यहां के स्मॉग का ही है."
उसी तरह स्टीव बैकशेल ने अपनी साठ डॉक्यूमेंट्री के लिए यहाँ शूट किया तो मैन वर्सेस वाइल्ड बीयर ग्रील्स भी यहाँ आ चुके हैं.
यहाँ तक की फिल्म निर्माता भी अपने पास एडम ब्रिटन के नंबर रखने लगे.
मगरमच्छ पर उनकी विशेषज्ञता की पूछ विदेशों में भी बढ़ गई.
ब्रिटन ने 2011 में फिलीपींस में पकड़े गए दुनिया के सबसे लंबे मगरमच्छ को मापने में मदद की थी.
फिर 2016 में सीबीएस के टीवी होस्ट एंडरसन कूपर के साथ चैनल के शो “60 मिनट” के एक एपिसोड के लिए बोत्सवाना में जंगली मगरमच्छों के साथ गोता लगाकर शूट करवाने में मदद की थी.
बीबीसी को ऑस्ट्रेलियन डायरेक्टर और लेखक एंड्रू ट्राउकी कहते हैं, “अपनी फील्ड में वो एक लीडर के साथ साथ एक अच्छे इंसान भी थे."
ब्रिटन का गुनाह

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2018 में ट्राउकी ने ब्रिटन के साथ अपने क्रॉक हॉरर फिल्म ब्लैक वाटर की शूटिंग के वक्त और बाद में फिर इसके सीक्वल के लिए 2019 में काम किया था.
उस दौरान ब्रिटन के साथ उनकी जगह पर बिताए गए समय को ट्राउकी “आनंददायक समय” बताते हैं और खासकर उनके “बहुत बढ़िया” स्विस शेफर्ड का भी ज़िक्र किया.
ब्रिटन के बारे में कोर्ट में बताया गया कि इस समय तक यह प्राणी वैज्ञानिक सिर्फ अपने पालतू जानवरों का शोषण कर रहा था और अन्य कुत्तों के मालिकों को उन्हें देने के लिए जोड़ तोड़ करते थे.
ब्रिटन ऑस्ट्रेलियन ऑनलाइन बाज़ार गमट्री पर वैसे लोगों की खोज करता था जो किसी न किस कारण से अपना जानवर हटाना चाहते थे. बदले में ब्रिटन उन्हें एक अच्छा घर देने का वादा करता था.
और अगर कोई अपडेट के लिए आता था तो उन्हें वह वह या तो "झूठी कहानी" बताता था या फिर पुरानी तस्वीरें दिखाता था.
अधिकतर मामलों में तो कन्टेनर के अंदर रिकॉर्डिंग के लिए इस्तेमाल किये गए उपकरणों से हो रही असुविधा के कारण तो कुत्ते पहले ही मर चुके होते थे.
इन्हीं कन्टेनर को ब्रिटन “टॉर्चर रूम” कहते थे.
अपनी गिरफ़्तारी से पहले के 18 महीनों में, ब्रिटन ने कम से कम 42 कुत्तों को यातना दी जिसमें से 39 की मौत हो गई.
ट्राउकी कहते हैं, “यह सब ब्रिटन के बारे में जब से मैंने सुना है, बहुत डिस्टर्ब महसूस कर रहा हूँ. ब्रिटन को इसके लिए गिरफ्तार किया जाएगा सोच भी नहीं सकते.”
एक तरह से इस खबर ने दुनिया भर के पशुप्रेमियों को हिलाकर रख दिया था. दुनिया भर से सैकड़ों लोग सोशल मीडिया पर इकट्ठे होकर और कुछ तो इस मामले की सुनवाई वाले कोर्ट में उपस्थित होकर ब्रिटन को मौत की सज़ा देने की मांग करने लगे.
हालांकि ऑस्ट्रेलिया में मौत की सज़ा 1985 में ही ख़त्म कर दी गई है.
ब्रिटन को सज़ा पाते देखने के लिए कुछ लोग तो डार्विन तक पहुँच गए और वहाँ अदालत के अंदर रोते हुए दिखे जब ब्रिटन के अपराधों के बारे में कोर्ट में बताया जा रहा था.
ये लोग ब्रिटन द्वारा ठगे गए पशुप्रेमियों की आवाज़ बनना चाहते हैं लेकिन उनमें से कई तो अभी तक ट्रॉमा में हैं.
अदालत में उपस्थित लोगों में से एक नताली करे कहती हैं, “मैं उस आदमी के बारे में क्या सोचती थी कि वो बुद्धिमान और दयालु आदमी है. और अब यह सब जानने के बाद तीन सप्ताह तक सो नहीं पाई हूँ."
लेकिन सभी यह भी कहते हैं कि वास्तव में ऐसा कोई संकेत नहीं था जिससे यह कह सकें कि ब्रिटन हिंसक या क्रूर था.
ब्रिटन के वकील ने तर्क दिया कि वह एक अजीब किस्म के विकार से पीड़ित था जिसके कारण उसमें बचपन से ही तीव्र और असामान्य यौन संबंधों की इच्छा होती थी.
हालांकि अपने माफ़ी पत्र में, ब्रिटन ने "दर्द और ट्रॉमा" की "पूरी ज़िम्मेदारी" स्वीकार कर लिया है और अपना इलाज कराने के वादे के साथ चीज़ों को सही करने का रास्ता भी खोजने की बात कही है.
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