केरल में प्रियंका, यूपी में राहुल: कितना कारगर है कांग्रेस का ये दांव?

केरल की वायनाड लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ेंगी प्रियंका गांधी

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सियासी तौर पर देश के सबसे अहम सूबे उत्तर प्रदेश में जीत का स्वाद चखने के बाद कांग्रेस पार्टी ने जो राहुल गांधी को वायनाड की सीट छोड़कर राय बरेली की सीट पर ध्यान देने के लिए कहा है उसे अब एक रणनीतिक चाल की तरह देखा जा रहा है.

साल 2019 के लोकसभा चुनावों में जीती 52 सीटों के मुकाबले 2024 में लगभग दोगुनी 99 सीटें जीतने का श्रेय राहुल गांधी के 'गेम चेंजिंग' कैंपेन 'भारत जोड़ो यात्रा' और 'न्याय यात्रा' को दिया जा रहा है. बताया जा रहा है कि इसकी वजह से पार्टी ने लोगों तक सीधी पहुंच बनायी.

ये सब एक तेज़ तर्रार कैंपेन में तब्दील हो गया जिसमें ये कहा गया था कि संविधान में बदलाव कर दिया जाएगा जिससे दलितों को आरक्षण नहीं मिलेगा. राहुल गांधी के इस कैंपेन के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत को उतारना पड़ गया.

दूसरे दलों के नेताओं के साथ करीबी संबंध बनाकर इंडिया गठबंधन के लिए आक्रामकता से कैंपेन करने ने भी राहुल के कद में इज़ाफ़ा किया.

जानें माने राजनीतिक टिप्पणिकार आनंद सहाय ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''आज राहुल गांधी की कांग्रेस में वो स्थिति हो गई है जो बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. आज राहुल गांधी भी उसी आवेग से कोई बात कह सकते हैं जैसे मोदी करते हैं. क्या आपको लगता है कि बीजेपी इसे नकारेगी? राहुल गांधी का भी मोदी जैसा ही प्रभाव है.''

प्रियंका गांधी को चुनावी राजनीति में उतारने का फैसला भी अच्छा माना जा रहा है. इससे गांधी परिवार का दक्षिण भारत से जुड़ाव बना रहेगा जहां केरल, कर्नाटक, तेलंगाना में कांग्रेस मजबूत है और द्रविड़ राजनीति वाले तमिलनाडु में भी अपना आधार बरक़रार रखा है.

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''ये प्रियंका गांधी के लिए बेहद आसान रास्ता होने वाला है और जिन्हें इससे परेशानी होने वाली है वो हैं वामपंथी दल जो पहले ही लोकसभा चुनाव में हार का सामना कर चुके है.''

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राहुल गांधी के लिए चुनौतियां

लेकिन ये फैसला उत्तर प्रदेश में संगठन को ज़मीनी स्तर से खड़ा करने जैसे बेहद जटिल चुनौती के साथ लिया गया जहां से केरल की 20 सीटों के मुकाबले 80 लोकसभा की सीटें आती हैं. इस राज्य में मिली जीत ने उत्तर भारत के उन राज्यों में कांग्रेस के लिए रास्ते खोल दिया है जहां पार्टी अस्तित्व के लिए जूझ रही है.

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राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान ने लखनऊ से बीबीसी हिंदी को बताया, ''राहुल गांधी के लिए असली चुनौती 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में पार्टी को तैयार करना है. राहुल के पास परिणाम दिखाने के लिए सिर्फ 3 साल का समय है. ये एक ऐसा प्रदेश है जहां पर पार्टी ने बार-बार अध्यक्ष बदले हैं जो किसी भी दल की बुरी छवि बनाता है.''

जब न्याय यात्रा अपने चरम पर थी उस वक्त शरत प्रधान ने बीबीसी से कहा था कि यात्रा भले ही अच्छी हो रही है लेकिन जमीनी स्तर पर जनता तक संदेश ले जाने के लिए कोई कार्यकर्ता नहीं है.

शरत प्रधान ने कहा , ''पार्टी में कोई तंत्र नहीं है. सिर्फ 'वर्ड ऑफ माउथ' यानी कि सिर्फ बोलकर ही राहुल गांधी दलितों से संवाद कर रहे थे - कि अगर बीजेपी को बड़ा बहुमत आ गया तो वो संविधान बदल देगी. ये गेम चेंजर था.''

लोकसभा चुनाव से पहले पूरे उत्तर प्रदेश में घूमे आनंद सहाय ने जो उदाहरण दिया वो शरत प्रधान की बात को ही आगे बढ़ाता है.

आनंद सहाय ने बताया, ''कांग्रेस के लिए जिस काडर ने काम किया वो समाजवादी पार्टी(इंडिया गठबंधन की सहयोगी पार्टी) का काडर था. अपने जीवन में पहली बार राहुल गांधी ने ऐसी धमाकेदार एंट्री की है. यूपी में राहुल गांधी के प्रचार को महसूस किया जा सकता था. मैंने वाराणसी में आरएसएस के कुछ लोगों से बात की थी जिन्होंने कहा कि कांग्रेस या समाजवादी पार्टी को वोट देने का उनका मन नहीं है. वो नरेंद्र मोदी को वोट देने की जगह नोटा पर बटन दबा देंगे. लेकिन ये भी देखने वाली बात थी कि वो कह रहे थे कि राहुल गांधी जो कह रहे हैं वो सही है.''

सहाय ने देश में कांग्रेस पार्टी की निराशाजनक स्थिति की तरफ भी इशारा किया.

उन्होंने कहा, "कांग्रेस का दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत में आधार है लेकिन राजस्थान को छोड़कर उत्तर भारत या पूर्वी भारत में कहीं नहीं है. मध्य प्रदेश में हिंदुत्व आधारित, सांस्कृतिक क्रांति ने जगह बना ली है, और कांग्रेस बीते 20 सालों से हार रही है.''

कैसे बन गई राहुल गांधी की बात?

राहुल गांधी के सामने है यूपी में संगठन को खड़ा करने की चुनौती

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हालांकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजस्थान, महाराष्ट्र में अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन कर्नाटक जहां पिछले साल कांग्रेस सत्ता में आई थी वहां पार्टी को निराशा हाथ लगी. इस बार यहां पर निंदा करने वाली सिविल सोसायटी ने भी राहुल गांधी को पहली बार अलग नज़रिए से देखा था.

रणनीतिक रूप से राहुल गांधी ने शुरुआत में जातीय जनगणना का मुद्दा उठाया जिसकी आलोचना हुई और कइयों को हैरानी में भी डाला कि क्यों गांधी परिवार का एक शख्स जातिवाद की बात कर रहा है. लेकिन इससे ओबीसी वोट सधे जो उत्तर भारत के राज्यों में कई सालों से क्षेत्रीय पार्टियों के पाले में जाते रहे हैं.

सामाजिक धुरि को पार्टी के मैनिफेस्टो के साथ जोड़ने की राहुल की क्षमता ने पार्टी के संभावनाओं को बल दिया.

इसके साथ ही राहुल गांधी के प्रचार का फायदा यूपी में सहयोगी दल समाजवादी पार्टी को भी मिला.

शरत प्रधान ने बीबीसी हिंदी को बताया , ''राहुल गांधी के प्रचार के बगैर अखिलेश यादव को कुछ नहीं मिलता. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जब बीजेपी की सरकार लोगों के ख़िलाफ़ बुलडोज़र चला रही थी तब अखिलेश यादव चुप थे.''

लेकिन राहुल गांधी के सामने एक मुश्किल काम है. शरत प्रधान बताते हैं, ''अगर कांग्रेस यूपी में बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो ये तलवार की धार पर चलने जैसा हो जाएगा. समाजवादी पार्टी सिकुड़ जाएगी और ये अखिलेश यादव को भी पता है.''

क्या वायनाड की जनता के साथ धोखा हुआ है?

वायनाड में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी

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किसी भी राजनीतिक विश्लेषक या टिकाकार ने ये नहीं कहा है कि राहुल गांधी का वायनाड सीट से इस्तीफा देना उनकी बहन प्रियंका गांधी के राजनीतिक सफर में मुश्किलें पैदा करेगा.

क्या वायनाड की जनता को ये नहीं लगेगा कि कांग्रेस पार्टी ने पहले राहुल गांधी को और फिर प्रियंका को उतारकर उन्हें हल्के में लिया है?

शरत प्रधान कहते हैं, ''एक तरीके से हां. लेकिन जनता को ये कहने में भी गर्व महसूस होता है कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के सदस्य केरल से लड़ रहे हैं. वायनाड कांग्रेस का एक मजबूत गढ़ है. राहुल गांधी की लोकप्रियता सिर्फ वायनाड तक ही सीमित नहीं है केरल में बड़ी संख्या में मलयाली कांग्रेस को वोट देते हैं.''

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन के इस बारे में कहते हैं, ''देखने वाली बात ये होगी की प्रियंका गांधी की जीत का मार्जिन क्या रहता है.''

साल 2019 में राहुल गांधी ने 4.31 लाख वोटों से चुनाव जीता था. इसी महीने की शुरुआत में आए नतीजों में राहुल ने वायनाड से 3.64 लाख वोटों से जीत दर्ज की.

सहाय कहते हैं, ''गांधी परिवार का नाम चलता है. भले ही राहुल गांधी मलयालम भाषा न बोलें लेकिन वो एक ब्रांड हैं. ये नाम मूल्यवान है.''

प्रधान ने कहा, ''देखा जाए तो, दोनों भाई और बहन को लेकर कांग्रेस पार्टी पूरे देश को कवर कर लेगी''

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