महरौली: ढहाई गई '600 साल पुरानी' मस्जिद, अनाथ हुए बेघर

ढहाई गई मस्जिद जिस मदरसे को चलाती थी उसमें लगभग दो दर्जन बच्चे रहते थे, इनमें से ज़्यादातर अनाथ हैं

इमेज स्रोत, ANTARIKSH JAIN/BBC

इमेज कैप्शन, ढहाई गई मस्जिद जिस मदरसे को चलाती थी उसमें लगभग दो दर्जन बच्चे रहते थे, इनमें से ज़्यादातर अनाथ हैं
    • Author, ज़ोया मतीन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली

फ़वाद कहते हैं कि हरा उनका पसंदीदा रंग है.

बारह बरस के फ़वाद को मस्जिद के आस-पास घास, पत्तियों और पेड़ों को निहारना पसंद है. वो दिल्ली की उसी मस्जिद में रहते और पढ़ते थे. दो बरस पहले फ़वाद को दिल्ली के एक पड़ोसी राज्य से यहां तब आना पड़ा था, जब अचानक उनके अब्बू अम्मी की मौत हो गई थी.

दिल्ली में उनका घर अख़ुंदजी मस्जिद था. इस मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि वो कम से कम छह सौ बरस पुरानी थी और वो मस्जिद के साथ चलने वाले मदरसे में ही पढ़ते थे. मदरसे का रंग भी हरा था. मदरसे के खंभे, उसकी शहतीरें और मेहराबें भी हरे रंग से रंगी थीं.

एक नए शहर में जानी पहचानी रंगत देखकर फ़वाद ख़ुद को महफ़ूज़ महसूस करते थे. लेकिन, अब वो कहते हैं कि इन्हें देखकर उन्हें रोना आता है.

30 जनवरी को दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने मस्जिद पर बुलडोज़र चला दिया. डीडीए का इल्ज़ाम है कि मस्जिद को उसकी ज़मीन पर अवैध अतिक्रमण करके बनाया गया था.

डीडीए का बयान

डीडीए

इमेज स्रोत, Sanjeev Verma/Hindustan Times via Getty Images

डीडीए ने मस्जिद से लगे उस मदरसे को भी ढहा दिया था जिसमें फ़वाद और उनके 25 दूसरे साथी पढ़ा करते थे.

अवैध अतिक्रमण बताकर डीडीए ने एक सूफ़ी संत के मज़ार और एक क़ब्रिस्तान को भी ढहा दिया था. ये दोनों भी मस्जिद परिसर में ही आबाद थे.

ये मस्जिद दक्षिणी दिल्ली के मेहरौली के 784 एकड़ में फैले जंगलों में स्थित थी.

महरौली, दिल्ली के उन तमाम मध्यकालीन शहरों में से है, जो अब वीरान हो गए हैं. ये इलाक़ा भी खंडहरों और ऐतिहासिक इमारतों से लबरेज़ है, जो दिल्ली शहर के शानदार अतीत की गवाही देती हैं.

एक बयान में डीडीए ने कहा कि मस्जिद एक 'अवैध इमारत' है जिसको किसी रोक-टोक या परेशानी के बग़ैर ढहा दिया गया.

'लिखित नोटिस नहीं दिया...'

दिल्ली के महरौली इलाके के बाहर की सुरक्षा व्यवस्था

इमेज स्रोत, SAJJAD HUSSAIN/AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, दिल्ली के महरौली इलाके के बाहर की सुरक्षा व्यवस्था

लेकिन, मस्जिद के इमाम ज़ाकिर हुसैन और उनके वकील शम्स ख्वाजा इससे इनकार करते हैं.

वो कहते हैं कि ये संपत्ति दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड की थी, जो दिल्ली में इस्लामिक संपत्तियों की देख-रेख के लिए ज़िम्मेदार है.

ज़ाकिर हुसैन का दावा है कि अधिकारियों ने मस्जिद और मदरसे को ढहाने से पहले उन्हें कोई लिखित नोटिस भी नहीं दिया.

वो ये आरोप भी लगाते हैं कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर की गई इस कार्रवाई में मुक़द्दस (पवित्र) क़ुरान की प्रतियों को भी नुक़सान पहुंचा. बच्चों को उनका सामान तक नहीं निकालने दिया गया. यही नहीं, ये बताने वाले दस्तावेज़ भी अधिकारी अपने साथ ले गए, जो ये साबित करते थे कि मस्जिद अवैध नहीं है.

ज़ाकिर हुसैन कहते हैं कि, "उन्होंने इस भयंकर ठंड में हमें बस दुआओं के सहारे छोड़ दिया."

दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई

दिल्ली हाई कोर्ट

इमेज स्रोत, Mohd Zakir /Hindustan Times/Getty Images

डीडीए ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है. डीडीए का कहना है कि जिस ज़मीन पर मस्जिद बनी हुई थी, वो उसकी संपत्ति है.

डीडीए के बाग़बानी विभाग के मुख्य आयुक्त राजीव कुमार तिवारी ने बीबीसी से कहा कि, "वो जगह साफ़ करने के दौरान हमें कुछ किताबें मिली तीं और हमने मस्जिद के अधिकारियों से कहा है कि वो आकर हमसे ये किताबें ले लें."

इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में भी चल रही है.

गुरुवार को हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में ऐसे 'पर्याप्त ढांचे' हैं और उनको शहर के जंगलों को दोबारा बहाल करने की राह में आड़े नहीं आना चाहिए.

अदालत ने कहा कि जिन इमारतों को भारत का पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग मान्यता देता है, जो उनकी देख-रेख करता है, सिर्फ़ उन्हीं की हिफ़ाज़त की जाएगी.

सूफ़ी संत की मज़ार

जिस मस्जिद में फ़वाद रहते थे उसकी हरी छत और मेहराबों को निहारना उन्हें पसंद था

इमेज स्रोत, MUZAMMIL SALMANI

इमेज कैप्शन, जिस मस्जिद में फ़वाद रहते थे उसकी हरी छत और मेहराबों को निहारना उन्हें पसंद था

मस्जिद को ढहाए जाने के बाद अधिकारियों ने महरौली में कई और ऐतिहासिक ढांचों पर बुलडोज़र चलाया है. कहा जा रहा है कि इनमें से एक तो दिल्ली के पहले सूफ़ी संत की मज़ार भी थी.

पुरातात्विक विरासत के संरक्षण के लिए काम करने वालों और इतिहासकारों ने अवैध निर्माण ढहाने के नाम पर की जा रही इस कार्रवाई को 'पागलपन' क़रार दिया है.

उनका कहना है कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर शहर की उस सामूहिक विरासत को नष्ट किया जा रहा है, जो इस शहर की आत्मा हैं.

दिल्ली के ज़्यादातर कोनों में तारीख़ आबाद है. दिल्ली पर बार-बार हुए हमलों और तमाम बदलावों के बावजूद, इतिहास के ये पन्ने अब तक महफ़ूज़ रहे हैं.

दिल्ली में पुराना दौर, आज के दौर के साथ मिल-जुलकर रहता आया है. आप दिल्ली के किसी नए चमक-दमक वाले हिस्से में जाएं जहां आला दर्ज़े के पब और रेस्तरां हों.

दिल्ली का संजय वन

दिल्ली का संजय वन क्षेत्र

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

इमेज कैप्शन, दिल्ली का संजय वन क्षेत्र

वहीं, अगर आप आस-पास निगाह डालेंगे, तो शायद आपको गली के किसी कोने से झांकती बारहवीं सदी की कोई इमारत, कोई मकबरा या मज़ार भी दिख जाएगा.

इतिहासकार सोहैल हाशमी कहते हैं कि, "दिल्ली का बेहद समृद्ध अतीत रहा है, जिसने इसे एक अनूठा शहर बनाया है. उसके इस इतिहास को प्रगति या विकास के बरअक्स खड़ा करना एक झूठी दुविधा पेश करना है."

आलोचकों ने उन सदियों पुरानी इमारतों को अवैध क़रार देने के तर्क पर भी सवाल उठाए हैं, जो जंगलों और अपने आस-पास की बस्तियों से भी पुरानी हैं.

उनका ये इल्ज़ाम भी है कि योजनाबद्ध तरीक़े से चलाया जा रहा अतिक्रमण अभियान, पक्षपातपूर्ण है और इसके ज़रिए मुसलमानों की सांस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को निशाना बनाया जा रहा है.

डीडीए के मुताबिक़, संजय वन में जिन 20 धार्मिक इमारतों को अवैध चिह्नित करके ढहाया जाना है, उनमें से 16 मुस्लिम मज़ार और चार मंदिर हैं.

डीडीए का अतिक्रमण विरोधी अभियान

दिल्ली

इमेज स्रोत, ANANT PRAKASH/BBC

सोहैल हाशमी कहते हैं कि, "इससे साफ़ तौर पर एक पैटर्न देखने को मिल रहा है और ये भारत जैसे देश के लिए बेहद चिंताजनक मिसाल क़ायम करेगा, जहां पर सभी धर्मों से अब तक बराबरी का बर्ताव किया जाता रहा है."

लेकिन, राजीव कुमार तिवारी कहते हैं कि, डीडीए का अतिक्रमण विरोधी अभियान 'पूरी तरह से वैध' है, और इसको ज़बरदस्ती मज़हबी रंग दिया जा रहा है.

उन्होंने ये भी कहा कि डीडीए ने कई बार सरकारी ज़मीन पर किए गए अवैध क़ब्ज़ों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है.

इनमें मंदिर भी शामिल रहे हैं और डीडीए ने जिस दिन महरौली की मस्जिद पर बुलडोज़र चलाया था, उसी दिन दिल्ली के अलग अलग मुहल्लों में पांच मंदिर भी ढहाए गए थे.

तिवारी कहते हैं कि, "हम तो बस अपना काम कर रहे हैं."

दिल्ली

इस अतिक्रमण विरोधी अभियान से जो लोग प्रभावित हुए हैं, उनका कहना है कि मस्जिद को ढहाने का अभियान अराजक था और इसे बिना किसी चेतावनी के किया गया था.

बीबीसी ने नौ बच्चों से बात की जो मदरसे में मौजूद थे.

उन्होंने बताया कि सुबह पांच बजे जब वो नमाज़ के लिए उठे थे, तब उन्हें ज़ोर की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ी.

इन बच्चों में से एक उमर उस दिन को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने दर्जनों पुलिसवालों, कुछ बुलडोज़रों और ग़ुस्से से भरे कुछ लोगों को देखता था जो चीख-चीख़कर उनसे कह रहे थे कि बाहर आ जाओ.

इसके बाद मस्जिद के इमाम ज़ाकिर हुसैन भागते हुए अंदर आए. उन्होंने चिल्लाते हुए कहा कि, "भागो भागो. तुम्हारे हाथ में जो कुछ आए उसको लेकर निकल जाओ."

मस्जिद से लगे क़ब्रिस्तान में...

जहां सदियों से खड़ी मस्जिद ढहाई गई वहां फैला मलबा

इमेज स्रोत, MUZAMMIL SULEMAN

इमेज कैप्शन, जहां सदियों से खड़ी मस्जिद ढहाई गई वहां फैला मलबा

उमर अपने हाथ में सिर्फ़ एक स्वेटर और अपनी चप्पल लेकर बाहर भागे थे. उनके दोस्त मुरीद तो इतना सामान भी नहीं उठा पाए और वो नंगे पांव बाहर भाग आए थे. पांच और बच्चे भी थे जिनकी उम्र दस बरस है. उन्होंने बताया कि उन्हें अपने जैकेट या जूते पहने बग़ैर ही बाहर निकलना पड़ा था.

इनमें से एक बच्चे ज़फ़र ने बताया कि, "मैं ख़ुशक़िस्मत रहा कि मैं अपनी प्लेट अपने साथ लाने में कामयाब रहा."

इस घटना से सिर्फ़ बच्चे ही दहशतज़दा नहीं हैं. इमाम ज़ाकिर हुसैन, मस्जिद के पास एक छोटी सी इमारत में अपने परिवार के साथ रहते थे. अब वो भी बेघर हो गए हैं.

ज़ाकिर हुसैन कहते हैं कि वो रोज़ उस जगह पर आते हैं और मलबे के जितने क़रीब मुमकिन है, उतने पास तक जाते हैं. फिर, उस जगह की रखवाली कर रहे पुलिस वाले उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते हैं.

मस्जिद के साथ लगे मदरसे में हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले मुज़म्मिल सलमानी कहते हैं कि मस्जिद से लगे क़ब्रिस्तान में उनके चाचा दफ़्न थे. उसे ढहाए जाने के बाद उनके हाथ, चाचा की क़ब्र पर लगे स्मृति लेख के कुछ टुकड़े ही आए हैं.

रज़िया सुल्ताना के दौर में...

एडवोकेट प्रशांत भूषण

सलमानी कहते हैं कि, "लोगों को समझ में नहीं आता. ये महज़ एक पुरानी मस्जिद, क़ब्रिस्तान या फिर मदरसा भर नहीं था. ये उनके पनाह लेने का एक ठिकाना था."

मस्जिद के इतिहास के बार में बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है. कुछ लोग कहते हैं कि इसे तेरहवीं सदी में शहज़ादी रज़िया सुल्ताना ने बनवाया था.

रज़िया सुल्ताना को भारतीय उप-महाद्वीप की पहली मुस्लिम महिला शासक माना जाता है. कुछ और लोग कहते हैं कि ये मस्जिद और भी पुरानी थी.

सोहैल हाशमी का कहना है कि इसे बनाने में जिस भूरे पत्थर का इस्तेमाल किया गया था, उससे ऐसा लगता है कि ये दिल्ली सल्तनत के दौर में छह से सात सौ बरस पहले बनाई गई होगी.

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के रिकॉर्ड बताते हैं कि आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर में सन् 1853 में इस मस्जिद की मरम्मत की गई थी. इतिहासकार राना सफ़वी कहती हैं कि मस्जिद में ख़ुद बहादुर शाह ज़फ़र के हाथ का लिखा एक पत्थर भी लगा हुआ था.

इतिहासकारों के दावे

इतिहासकार राना सफ़वी

इमेज स्रोत, AmaL KS/Hindustan Times via Getty Images

इमेज कैप्शन, इतिहासकार राना सफ़वी

वैसे तो मस्जिद के ज़्यादातर हिस्सों का आधुनिक दौर में पुनर्निर्माण किया गया था. मगर, राना सफ़वी कहती हैं कि इन बदलावों के बावजूद, ये मस्जिद इतिहास का प्रमुख अंग थी, जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए था.

वो सवाल करती हैं कि, "जो मस्जिद आख़िरी मुग़ल बादशाह के लिए इतनी अहम थी, वो आज मामूली कैसे हो सकती है?"

हालांकि, डीडीए का कहना है कि उसके पास इस मस्जिद का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

राजीव कुमार तिवारी कहते हैं कि, "मस्जिद ढहाए जाने के बाद मुझे पता चला कि कुछ इतिहासकार उसको लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं. लेकिन, वो ढांचा पुराना तो बिल्कुल नहीं था. वो आज के दौर का लग रहा था."

डीडीए के अधिकारी राजीव तिवारी आगे कहते हैं कि, "जिन इमारतों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है, उनकी देख-रेख के लिए हमने बहुत कोशिशें की हैं. लेकिन इस मस्जिद का हमारे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है."

मस्जिद इसलिए ढहाई गई...

मस्जिद के इमाम ज़ाकिर हुसैन हर दिन मस्जिद के खंडहर देखने जाते हैं. उन्हें अपना घर याद आता है
इमेज कैप्शन, मस्जिद के इमाम ज़ाकिर हुसैन हर दिन मस्जिद के खंडहर देखने जाते हैं. उन्हें अपना घर याद आता है

महरौली के लोगों के लिए ये मस्जिद उनकी सामाजिक ज़िंदगी का एक हिस्सा थी.

इलाक़े में रहने वाले उसामा कहते हैं कि उनके लिए ये मस्जिद एक पनाहगाह और रोज़मर्रा के तनाव से बचकर कुछ लम्हे सुकून से बिताने का ठिकाना थी.

उसामा एक आर्टिटेक्ट हैं, जो अपने ख़ाली वक़्त में इस इलाक़े के इतिहास की कड़ियां जोड़ते हैं. वो उस वक़्त को याद करते हैं, जब वो बच्चों के साथ मिलकर यहां त्योहार मनाया करते थे और पूरे देश से आने वाले उन मुसाफ़िरों से मिला करते थे, जो यहां नमाज़ पढ़ने आते थे.

उसामा कहते हैं कि, "वैसे तो ये मस्जिद जंगल के भीतर बनी थी. फिर भी ये एक अहम सामुदायिक ठिकाना था, जहां तमाम तबक़ों के लोग इकट्ठे हुआ करते थे. उनके लिए ये मस्जिद केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी बेशक़ीमती थी."

डीडीए के अधिकारियों का कहना है कि इस मस्जिद को इसलिए ढहाया गया, क्योंकि इसे जंगल की बेशक़ीमती ज़मीन पर अवैध रूप से खड़ा किया गया था.

संरक्षित वन का दर्जा

बच्चे कहते हैं कि उन्हें अपना पुराना घर याद आता है
इमेज कैप्शन, बच्चे कहते हैं कि उन्हें अपना पुराना घर याद आता है

संजय वन, दिल्ली के बचे खुचे हरे-भरे इलाक़ों में से एक है.

1990 के दशक में शहरीकरण की बढ़ती चिंताओं के बीच इसे संरक्षित वन का दर्जा दिया गया था. हाल के दिनों में डीडीए ने इस इलाक़े में अतिक्रमण हटाने के अभियान कई बार चलाए हैं.

लेकिन, इतिहासकार कहते हैं कि ये मस्जिद तो जंगल को संरक्षित होने का दर्जा मिलने से भी पहले से आबाद थी. ऐसे में इसको अवैध अतिक्रमण कैसे कहा जा सकता है.

उनका कहना है कि इस अभियान के बाद महरौली की दूसरी ऐतिहासिक संरचनाओं पर भी ख़तरा मंडराने लगा है. क्योंकि उनकी हालत ख़राब है और उनके रख-रखाव की सख़्त ज़रूरत है.

सोहैल हाशमी कहते हैं कि, "इसमें कोई शक नहीं कि जंगल बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन, जंगलों और इनके भीतर मौजूद ऐतिहासिक इमारतों के बीच कोई टकराव नहीं होना चाहिए. संरक्षण की ज़रूरत दोनों को है."

धार्मिक समिति से 'मंज़ूरी'

दिल्ली

इमेज स्रोत, SAJJAD HUSSAIN/AFP via Getty Images

पिछले हफ़्ते, डीडीए ने कहा कि मस्जिद को ढहाने को उस धार्मिक समिति से 'मंज़ूरी' मिली थी, जिसे इस तरह के मामलों की समीक्षा के लिए बनाया गया था.

मस्जिद के अधिकारियों ने इस दावे को अदालत में चुनौती दी है. उनका आरोप है कि अधिकारियों ने अदालत के 2022 के एक आदेश की अनदेखी की थी, जिसमें डीडीए को कहा गया था कि वो अतिक्रमण हटाने का ऐसा कोई भी अभियान चलाने से पहले, वक़्फ़ के मालिकाना हक़ वाली ज़मीन की शिनाख़्त करके उसे चिह्नित करे.

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि ऐसा लगता है कि इस मामले में मौजूदा क़ानूनों को इकतरफ़ा ढंग से लागू किया गया है.

वो कहते हैं कि, "अगर डीडीए वन के क़ानून को लागू करने की बात कर रहा है, तो पहले तो उन्हें जंगल के भीतर रहने वालों के अधिकार सुनिश्चित करने चाहिए."

हालांकि, राजीव कुमार तिवारी कहते हैं कि ये ज़मीन शुरू से ही डीडीए की थी, तो इस मामले में 'ऐसे क़ानून लागू नहीं होते.'

दिल्ली

इमेज स्रोत, ANANT PRAKASH/BBC

इन विवादों से इतर, फ़वाद एक और मस्जिद के दालान में क्रिकेट खेल रहे हैं. ये मस्जिद उनका नया ठिकाना है.

उन्हें यहां रहना बुरा नहीं लगता. लेकिन, वो कहते हैं कि इस नई जगह में हरियाली कम है और उनके बग़ैर ये ठिकाना 'नया और अलग' लगता है.

लेकिन, वो ये भी कहते हैं कि, 'हो सकता है कि मैं किसी और रंग को पसंद करने लगूं.'

(बच्चों की पहचान छुपाने के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)