झारखंड: 1932 का खतियान क्या हेमंत सोरेन का मास्टरस्ट्रोक है

खतियान की मांग करता हुआ एक शख़्स

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए

झारखंड के सियासी आसमान पर छाए अनिश्चिचता के बादलों की घूमक्कड़ी के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने मजबूत निर्णयों की बारिश की है. 14 सितंबर को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में सरकार ने राज्य के निवासियों के लिए स्थानीयता तय करने का फ़ॉर्मूला प्रस्तावित किया है.

ताजा प्रस्ताव के मुताबिक़, उन लोगों को झारखंड का स्थायी निवासी माना जाएगा जिनके पूर्वजों के नाम साल 1932 या उससे पहले का खतियान है. मतलब अंग्रेज़ी हुकूमत में 1932 तक कराए गए जमीनों के सर्वे सेटलमेंट के दौरान इस इलाके में रह रहे परिवार ही झारखंड के डोमिसाइल (स्थानीय) माने जाएंगे. बशर्ते, केंद्र सरकार इसे नौवीं अनुसूची में शामिल करने का राज्य का प्रस्ताव स्वीकार कर ले.

इसके लिए झारखंड सरकार एक विधेयक लाएगी, फिर उसे केंद्र की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा.

राज्य सरकार ऐसा ही एक विधेयक आरक्षण को लेकर भी लाने जा रही है ताकि अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा 27 फ़ीसदी की जा सके. इस प्रस्ताव को भी नौवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिया गया है.

हेमंत सोरेन कैबिनेट के इन दोनों निर्णयों के बाद राज्य की सियासत में चर्चाओं का बाजार फिर से गर्म हो गया है. अधिकतर लोग और राजनीतिक विश्लेषक इसे सरकार का मास्टरस्ट्रोक करार दे रहे हैं, वहीं कुछ लोगों ने इस पर सवाल भी उठाए हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कैबिनेट मीटिंग के बाद मीडिया से कहा कि उनकी सरकार जनता की भलाई के लिए काम करने वाली सरकार है, लिहाज़ा वे मज़बूत निर्णयों को लेने से पीछे नहीं हटेंगे.

खतियान

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1932 के खतियान की पूरी कहानी

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झारखंड में 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार मानने की मांग यहां के लोग झारखंड गठन के बाद से ही करते रहे हैं.

यहां के आदिवासी और मूलवासी हमेशा से कहते रहे हैं कि झारखंड में बाहर से आकर बसे लोगों ने यहां के स्थानीय बाशिंदों के अधिकारों का अतिक्रमण किया है, उनका शोषण किया है. लिहाज़ा, यहां की स्थानीय नीति 1932 के खतियान के आधार पर बनाई जानी चाहिए.

बिरसा जयंती के मौके पर 15 नवंबर 2000 को झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद यहां बीजेपी के नेता बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में पहली सरकार का गठन हुआ था.

उनकी सरकार ने साल 2002 में यहां की डोमिसाइल पॉलिसी घोषित की थी. उसके तहत भी 1932 के सर्वे सेटलमेंट को स्थानीयता का आधार माना गया था जिसके बाद हिंसा भड़क गई और उस हिंसा में छह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

तब उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने ही उनका विरोध किया और बाद के दिनों में बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी.

उसके बाद झारखंड हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी के गुप्ता, जस्टिस गुरुशरण शर्मा, जस्टिस एस जे मुखोपाध्याय, जस्टिस एल उरांव और जस्टिस एम वाइ इकबाल की खंडपीठ ने इससे संबंधित जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए सरकार के उस निर्णय पर तत्काल रोक लगा दी थी.

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हाईकोर्ट ने सरकार ने कहा था कि वह अपनी स्थानीय नीति लेकर आए.

उसके बाद राज्य में कई सरकारें बनीं, लेकिन किसी सरकार ने स्थानीयता की नीति नहीं बनाई.

सरकारें इसे विवादास्पद मानकर इससे बचती रहीं. लेकिन, साल 2013 में अपने पहले मुख्यमंत्री काल में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेता हेमंत सोरेन ने स्थानीय नीति पर सुझाव देने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी. हालांकि तब यह नीति नहीं बन सकी.

उनके पिता और जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन भी 1932 के खतियान को आधार मानकर स्थानीय नीति बनाए जाने की वकालत करते रहे हैं, लेकिन उनके ख़ुद के मुख्यमंत्री रहते यह नीति नहीं बन सकी.

साल 2014 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद हेमंत सोरेन की सरकार गिर गई और रघुबर दास के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन की सरकार ने कामकाज संभाला.

बीजेपी और सुदेश महतो के नेतृत्व वाली आजसू पार्टी के गठबंधन की रघुबर दास सरकार ने साल 1985 को कट आफ़ डेट मानते हुए स्थानीय नीति की घोषणा की जिसका व्यापक विरोध हुआ.

तब भी लोगों ने साल 1932 को कट ऑफ़ मानकर स्थानीय नीति बनाने की अपनी सालों पुरानी मांग दोहराई.

साल 2019 के विधानसभा चुनाव में रघुबर दास ख़ुद का विधानसभा चुनाव हार गए. बीजेपी गठबंधन बहुमत से काफ़ी पीछे रहा. जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी के गठबंधन को बहुमत मिला और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में नई सरकार बनी.

जेएमएम के नेताओं-कार्यकर्ताओं और स्वयं जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन ने भी 1932 के खतियान के पक्ष में बयान दिए और स्थानीय नीति घोषित करने की मांग की. तबसे यह मामला झारखंड की सियासत का केंद्र बिंदु बन गया.

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क्या यह राजनीतिक मुद्दा है

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वरिष्ठ पत्रकार और प्रभात खबर अख़बार के स्थानीय संपादक संजय मिश्र इसे हेमंत सोरेन के राजनीतिक दांव के तौर पर देखते हैं. उन्होंने कहा कि इस निर्णय से हेमंत सोरेन को सियासी फ़ायदा होगा.

संजय मिश्र ने बीबीसी से कहा, "हेमंत सोरेन ने यह गेंद अब केंद्र के पाले में डाल दी है. केंद्र सरकार अगर राज्य के इस प्रस्ताव को मानेगी तो 1932 के सर्वे सेटलमेंट के आधार पर बनी स्थानीय नीति का मामला नौवीं अनुसूची में शामिल हो जाएगा. उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी.

अगर केंद्र सरकार इसे नहीं मानती है तो हेमंत सोरेन अपने मतदाताओं को बताएंगे कि हमने तो निर्णय लिया था, लेकिन बीजेपी की केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया. दोनों ही स्थितियों में जेएमएम और हेमंत सोरेन को इसका राजनीतिक फ़ायदा होगा. हालांकि, इस कारण डेमोग्राफी से उपजी राजनीतिक ज़मीन में बहुत सारी दरारें भी दिख सकती हैं. सरकार को उससे भी निपटना होगा."

आदिवासी मामलों पर लगातार काम करने वाले पत्रकार सुरेंद्र सोरेन भी संजय मिश्र की इन बातों से इत्तेफ़ाक रखते हैं. उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन ने बड़ा सियासी दांव खेला है. इस मुद्दे पर अगर उनकी नीयत साफ़ है तो यह एक क्रांतिकारी क़दम है.

सुरेंद्र सोरेन ने बीबीसी से कहा, "1932 के सर्वे सेटलमेंट को आधार बनाने की अपनी पेचीदगियां भी हैं. झारखंड के कई इलाकों में ज़मीनों का सर्वे अलग-अलग सालों में हुआ है. कुछ सर्वे तो 1880 के दशक में भी हुए हैं. कैडस्ट्रल और रिविजन सर्वे अलग-अलग सालों में हुए. ऐसे में 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाने के निर्णय के साथ ही सरकार को यह ख्याल भी रखना होगा कि यहां सदियों से रह रहा कोई परिवार इस आधार पर मिलने वाले लाभ से वंचित न रह जाए. कई आदिवासी परिवारों के पास भी खतियान नहीं हैं."

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सियासी दलों की प्रतिक्रिया

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हेमंत सोरेन की सरकार में शामिल कांग्रेस की विधायक दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि यह ऐतिहासिक निर्णय है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

दीपिका पांडेय सिंह ने कहा, ''आज संघर्ष रंग लाया है. झारखंड के आदिवासी-मूलवासी को उनका असली हक़ मिल रहा है. 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नियोजन नीति बनाने का प्रस्ताव पारित हो गया है. इसके साथ ही पिछड़े वर्ग के लोगों को 27 फ़ीसदी आरक्षण देने, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं का मानदेय बढ़ाने जैसे निर्णयों के लिए सरकार को धन्यवाद देती हूं. आंगनबाड़ी सेविकाओं के मुद्दे पर मैं लगातार प्रयासरत रही थी. सरकार ने इसकी गंभीरता को समझा और इसे अपनी स्वीकृति दी. मैं इसका स्वागत करती हूं.''

हालांकि, कांग्रेस पार्टी के ही नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा इससे उलट राय रखते हैं.

उन्होंने कहा, "हेमंत सोरेन ने 1932 के खतियान को जल्दीबाजी में लागू किया है. इसे आधार मानने से कोल्हान प्रमंडल के 45 लाख लोगों को एक तरह से रिफ्यूजी घोषित कर दिया गया है. सरकार को लास्ट सर्वे सेटलमेंट को आधार बनाना चाहिए."

विपक्षी बीजेपी ने इस मुद्दे पर फ़िलहाल चुप्पी साध रखी है. बीजेपी विधायक दल के नेता फ़िलहाल दिल्ली में हैं. वे 15 सितंबर को रांची वापस लौटंगे. समजा जाता है कि बीजेपी उनकी वापसी के बाद इस मसले पर आधिकारिक बयान जारी करेगी.

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