दिल्ली दंगे: अपने-अपने चश्मे, अपना-अपना सच

दिल्ली दंगे: अपने-अपने चश्मे, अपना-अपना सच

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    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हिंदू और मुसलमान समुदायों के बीच फ़रवरी में राजधानी दिल्ली में हुए दंगों की हिंसा से किस समुदाय को ज़्यादा नुकसान हुआ, उन्हें किसने भड़काया, इसमें राजनीतिक नेताओं की क्या भूमिका थी और पुलिस का रवैया कैसा था- इन्हीं सवालों की पड़ताल के लिए ग़ैर-सरकारी फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग कमेटियां बनीं.

लेकिन एक ही दंगे की तहकीकात करने वाली इन कमेटियों ने एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दावे पेश किए हैं.

'सेंटर फॉर जस्टिस'(सीएफ़जे) नाम के एक ट्रस्ट ने अपनी रिपोर्ट 'डैली रायट्स: कॉन्सपिरेसी अनरैवल्ड' गृह मंत्री अमित शाह को मई में सौंपी और दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग (डीएमसी) की रिपोर्ट जुलाई में प्रकाशित की गई.

सरकार को सौंपी गई एक रिपोर्ट ने दंगों को 'हिंदू विरोधी' तो दूसरे ने 'मुस्लिम विरोधी' बताया है. एक ने पुलिस पर सवाल नहीं उठाए हैं तो दूसरे ने दंगों में पुलिस को शामिल बताया है. दंगों के पीछे की 'साज़िश' और उनमें राजनेताओं की भूमिका पर निष्कर्ष भी दोनों रिपोर्ट में एक-दूसरे से उलट हैं.

दिल्ली दंगों में 53 लोगों की मौत हुई, सैकड़ों लोग घायल हुए और घरों, दुकानों, धार्मिक स्थलों का सामान लूटकर वहां आग लगा दी गई थी.

दोनों रिपोर्टों के जांचकर्ताओं ने ज़मीनी हक़ीक़त जानने के लिए हिंसा के चश्मदीदों से बात की, हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा किया, पुलिस से जानकारी मांगी और सोशल मीडिया पर शेयर किए वीडियो और तस्वीरों पर ग़ौर किया. फिर इनके विपरीत आकलन दंगों के बारे में हमें क्या बताते हैं?

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किन पीड़ितों से की गई बातचीत?

सीएफ़जे की टीम ने चार इलाकों में क़रीब 30 पीड़ितों से बातचीत के अंश साझा किए हैं, इनमें से सिर्फ एक मुसलमान है.

वहीं दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने 20 इलाकों में 400 स्थानीय लोगों से जानकारी लेने के लिए विस्तृत फॉर्म भरवाए, जिनमें से क़रीब 50 पीड़ितों के बयान छापे गए हैं. इनमें से सिर्फ़ एक हिंदू है.

सीएफ़जे की रिपोर्ट में यमुना विहार, चांद बाग, ब्रिजपुरी और शिव विहार के लोगों से बातचीत की गई है. इनमें से कई ने पत्थरबाज़ी और आगज़नी की शिकायत की और कहा कि 19-25 साल के युवकों समेत बाहरी लोगों की भीड़ पेट्रोल बम, एसिड और डंडे लेकर आई थी.

कइयों ने मुसलमानों की दुकानें छोड़ हिंदुओं के व्यवसायों और नर्सिंग होम को आग लगाए जाने का दावा किया. एक व्यक्ति के मुताबिक ब्रिजपुरी की मस्जिद से मुसलमानों को सड़क पर आकर लड़ने के लिए उकसाने वाली घोषणाएं की गईं.

कुछ लोगों ने मुस्तफ़ाबाद से आम आदमी पार्टी के विधायक हाजी यूनुस पर स्थानीय लोगों की जानकारी दंगाइयों के साथ बांटने और उन्हें भड़काने का आरोप लगाया.

शिव विहार के डीआरपी कॉनवेन्ट पब्लिक स्कूल में आग लगा दी गई और सारा फर्नीचर बाहर निकालकर जला दिया गया. इसके लिए राजधानी पब्लिक स्कूल की ऊंची इमारत के इस्तेमाल के दावा किया गया.

डीआरपी स्कूल के मालिक हिंदू और राजधानी स्कूल के मालिक मुसलमान हैं.

बृजपुरी में अरुण मॉडर्न स्कूल पर भीड़ के हमला करने और आगज़नी का विवरण है. इस स्कूल के मालिक भी हिंदू हैं.

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दूसरी रिपोर्ट

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट का दायरा काफ़ी बड़ा है. इसमें शिव विहार, भागीरथी विहार, भजनपुरा, करावल नगर, खजूरी ख़ास, पुराना मुस्तफ़ाबाद, गंगा विहार, बृजपुरी, गोकुलपुरी, ज्योति कॉलोनी, घोंडा चौक, अशोक नगर, चंद्र नगर, नेहरू विहार, राम-रहीम चौक, मुंगा नगर, चांद बाग, शानबाग, कर्दम पुरी इलाकों में हुई हिंसा का उल्लेख है.

हिंसा के दौरान हेलमेट और मास्क पहने, गैस सिलेंडर, पेट्रोल बम और केमिकल्स से लैस दंगाइयों ने सांप्रदायिक नारे लगाते हुए आगज़नी और लूटपाट करने का ज़िक्र है. कइयों ने कहा है कि मुसलमान समुदाय के घरों और दुकानों से सामान लूटा गया और फिर उन्हें जला दिया गया, जबकि हिंदुओं के घर और व्यवसायों को छोड़ दिया गया.

तय्यबा मस्जिद, फ़ारुकिया मस्जिद, चांद मस्जिद समेत मुसलमानों के 17 धार्मिक स्थलों को आग लगाकर तहस-नहस करने के विस्तृत विवरण रिपोर्ट में हैं.

साथ ही रिपोर्ट में ये कहा गया है कि न ही किसी मंदिर को नुक़सान की जानकारी मिली और न ही मुस्लिम बहुल इलाकों में स्थित मदिरों का खुद दौरा करने पर ऐसा पाया गया.

बृजपुरी के बारे में एक बयान में औरतों को लाठियों से पीटे जाने और पुलिस के दंगाइयों के साथ मिलकर मारपीट करने का दावा भी किया गया है.

गोकुलपुरी की टायर मार्केट में 23 तारीख़ की शाम को पत्थरबाज़ी की घटना के बाद 24 तारीख़ को आग लगा दी गई जो तीन दिन तक जलती रही, इस बाज़ार में मुसलमानों की दुकानें हैं.

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क्या हमले सुनियोजित थे?

सीएफ़जे के सारे बयानों में दर्ज हमलों की तारीख़ 24 फ़रवरी है. सिर्फ अरुण मॉडर्न स्कूल पर 25 फरवरी को हमले का उल्लेख है यानी हिंदुओं पर हमले सिर्फ़ 24 फरवरी को हुए.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में दंगों की पूरी मियाद यानी 24 से 26 फरवरी के दौरान हुई हिंसा का उल्लेख है यानी मुसलमानों पर हमले पूरे दंगे के दौरान हुए.

2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर-पूर्वी दिल्ली की आबादी का 30 फ़ीसदी मुसलमान और बाकी 70 प्रतिशत हिंदू हैं. राजधानी के 11 ज़िलों में से यहां सबसे ज़्यादा घनी आबादी है.

दिसंबर 2019 में नागरिकता क़ानून पारित होने के बाद सीलमपुर में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. फ़रवरी की 23 तारीख़ को कानून के विरोध और समर्थन में प्रदर्शन करने वालों के बीच उत्तर-पूर्वी दिल्ली में पत्थरबाज़ी हुई और 24 घंटों में ही इसने हिंसक रूप ले लिया. दिल्ली दंगों की हिंसा मुख्य तौर पर 24 से 26 फरवरी 2020 यानी तीन दिनों तक जारी रही.

सीएफ़जे की रिपोर्ट में स्कूलों का उदाहरण देकर ये निष्कर्ष निकाला गया है कि दंगों में 24 फरवरी को हिंदुओं को निशाना बनाए जाने की तैयारी थी.

मिसाल के तौर पर यमुना विहार में मुसलमानों के स्कूल, जैसे फ़हान इंटरनेशनल स्कूल को 24 फ़रवरी को बंद कर दिया गया था और बाक़ी स्कूलों में मुसलमान परिवारों ने अपने बच्चे उस दिन या तो भेजे नहीं या 11 बजे से पहले ही वापस बुला लिए.

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इसी तरह से एक जगह जहां बैंक मैनेजर मुसलमान थे, उन्होंने ब्रांच बंद कर दी और घरों में काम करने वाली मुसलमान औरतें 24 तारीख को काम पर नहीं आईं.

इस रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया है कि ऐसा दंगों के फैलने के डर से भी हो सकता है.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ दंगे सुनियोजित थे, सैकड़ों की भीड़ ख़ास तौर पर मुसलमान घरों और दुकानों को निशाना बना रही थी.

दंगाइयों के पास लाठी, पेट्रोल बम, सिलेंडर और पिस्तौल तक थीं जबकि रिपोर्ट के लिए जुटाए बयानों के मुताबिक हिंसा के जवाब में मुसलमान समुदाय के पास सिर्फ़ पत्थर थे.

रिपोर्ट के मुताबिक़ सीएए के समर्थन में प्रदर्शन एक योजना के तहत शुरू किए गए ताकि बड़े पैमाने पर हिंसा की जा सके.

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क्या पुलिस ने भेदभाव किया?

सीएफ़जे की रिपोर्ट में पुलिस की ग़ैर-मौजूदगी की चर्चा है पर इसकी वजह दंगों की अभूतपूर्व स्थिति बताई गई है. वहीं अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट का कहना है कि पुलिस ने मुसलमानों के साथ भेदभाव किया और कई वारदातों में हिंसा में शामिल भी रही.

सीएफ़जे की रिपोर्ट में पीड़ितों ने पीसीआर कॉल न लगने, पुलिस के बहुत कम संख्या में मौजूद होने और मदद के लिए कहने पर भी 'कार्रवाई करने के ऑर्डर नहीं हैं' जैसे जवाब मिलने की बात कही है.

वहीं अल्पसंख्यक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस के असहयोग और जानकारी ना देने को रेखांकित करते हुए उसकी भूमिका पर कई सवाल उठाए हैं.

इनमें मुसलमान समुदाय की शिकायतों पर कार्रवाई न करने, मुसलमानों के ख़िलाफ़ पहले चार्जशीट दायर करने और मुसलमानों को निशाना बनाने की साज़िश को दो समुदायों के बीच का झगड़ा बनाकर पेश करने के आरोप शामिल है.

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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पुलिस ने आम जनता की नज़र में सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों की छवि ख़राब की.

एक गर्भवती महिला समेत कई पीड़ितों के बयानों में पुलिस से मदद न मिलने, बल्कि पुलिस के हाथों पिटने और हिंसा की शिकायतें हैं. एक महिला ने दावा किया है कि दंगाइयों के साथ खड़े कुछ पुलिस वालों ने उन्हें और अन्य मुसलमान औरतों को अपने गुप्तांग दिखाकर हिंसा की धमकी देते हुए कहा, 'ये लो आज़ादी, ये है तुम्हारी आज़ादी'.

रिपोर्ट में पुलिस के हाथों पाँच मुसलमानों के पीटे जाने के वीडियो का भी ज़िक्र है जिन्हें पुलिस "भारत माता की जय" बोलने और "जन गण मन" गाने को कह रही है. इनमें से एक व्यक्ति की मौत पिटाई की वजह से हो गई और बाक़ियों को गंभीर चोटें आईं.

कई पीड़ितों ने पुलिस पर एफ़आईआर दर्ज न करने, समझौता करने के लिए धमकाने और उन्हीं पर हिंसा का आरोप लगाकर दूसरे मामलों में अभियुक्त बनाने की शिकायत भी की है.

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किसने भड़काए दंगे?

सीएफ़जे के मुताबिक़ दिल्ली के दंगे सीएए-विरोधियों ने भड़काए क्योंकि नागरिकता क़ानून का 'विरोध फीका पड़ता जा रहा था' और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के दौरे के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी ओर ध्यान खींचा जा सकता था.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के मुताबिक़ सीएए-एनआरसी का विरोध कर रहे मुसलमान समुदाय को सबक सिखाने के लिए दंगे करवाए गए, जिनके लिए बीजेपी नेताओं ने साम्प्रदायिक माहौल बनाया और ख़ास तौर पर कपिल मिश्रा के भाषण के बाद हिंसा भड़की.

सीएफ़जे की रिपोर्ट मानती है कि नागरिकता क़ानून का विरोध ग़लत है और इसके मुस्लिम-विरोधी होने का डर बेमानी है. ये एक भ्रांति है जो आम अशिक्षित लोगों को सरकार के ख़िलाफ़ उकसाने के लिए फैलाई गई है.

रिपोर्ट में क़ानून का विरोध करने वाले छात्र संगठनों, जैसे पिंजरा तोड़, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी इत्यादि को वो 'रैडिकल' क़रार देती है. इनमें केरल के विवादित संगठन पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) का भी उल्लेख है.

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एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा गया है कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों के लिए वित्तीय सहायता पीएफ़आई की तरफ़ से दी गई. पीएफ़आई के तार आतंकवादी संगठन, आइसिस से जुड़े होने का दावा भी किया गया है. ये दोनों दावे मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से किए गए हैं. पीएफ़आई इनसे साफ़ इनकार करती है.

दलित संगठन भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद के 23 फरवरी को भारत बंद के आह्वान और छात्र नेता उमर ख़ालिद के सीएए विरोधी भाषण को भी साज़िश का हिस्सा बताया गया है.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों के दिसंबर के सोशल मीडिया पोस्ट्स का हवाला दिया गया है जिनमें वो 'जिहाद' की बात कर रहे हैं.

जामिया नगर में हुई हिंसा में 'हिंदुओं से आज़ादी'के नारे लगने का ज़िक्र है. दिल्ली सुन्नी व़क्फ़ बोर्ड के चेयरमैन अमानतुल्लाह ख़ान पर उस हिंसा में शामिल होने और उसको बढ़ाने का आरोप लगाया गया है.

सड़कों को बंद करने और बसों को आग लगाने जैसी वारदातों का उल्लेख देकर कहा गया है कि विरोध करने की आज़ादी ये नहीं होती.

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दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग नागरिकता क़ानून के विरोध को सही बताता है. रिपोर्ट के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट में अब तक इस क़ानून के ख़िलाफ़ 200 से अधिक याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं.

आयोग संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार हाई कमिश्नर की दिसंबर 2019 की प्रेस वार्ता का हवाला देता है जिसमें नागरिकता क़ानून को भेदभाव करने वाला बताया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक़ नागरिकता क़ानून के पारित किए जाने के बाद देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) लागू किए जाने की घोषणा से मुसलमान समुदाय में डर फैला और जगह-जगह शांतिपूर्वक प्रदर्शन होने लगे. इन प्रदर्शनों में संविधान का पाठ होता था और समान अधिकारों की बात होती थी.

रिपोर्ट के मुताबिक़ इसी दौरान दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार में बीजेपी के कई नेताओं ने खुले तौर पर साम्प्रदायिक बयान देने शुरू कर दिए.

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इनमें बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर का बयान, "देश के गद्दारों को, गोली मारो **** को" और 23 फरवरी को ट्रंप दौरे से ठीक पहले नेता कपिल मिश्रा के दिल्ली पुलिस के डीसीपी के सामने "पुलिस की भी नहीं सुनेंगे, सड़कों पर उतर आएंगे" की धमकी भरे बयानों का उल्लेख है.

रिपोर्ट ने चिन्हित किया है कि चुनाव आयोग ने इन्हें आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाते हुए बीजेपी सांसद परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी थी.

कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के ख़िलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में भी याचिकाएं दाख़िल हुईं. राजनेताओं के बयानों के अलावा रिपोर्ट में सीएए-विरोधी प्रदर्शनों में गोली चलाने के दो वाक़यों का भी ज़िक्र है.

रामभक्त गोपाल के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के सामने गोली चलाने और कपिल गुर्जर के शाहीन बाग़ में हवा में फायरिंग करने की घटनाओं का ज़िक्र किया गया है, और कहा गया है कि इनकी वजह से डर फैला.

रिपोर्ट के मुताबिक़ आख़िरकार कपिल मिश्रा के भड़काऊ बयान के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी.

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