जब एक गाना सुनकर भड़के थे जनरल ज़िया उल हक़, बदल दिया था पीटीवी का पूरा स्टाफ़

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- Author, रियाज़ सोहेल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, कराची
पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल ज़िया-उल-हक़ एक “हिंदुआना” गाने को सुनते ही भड़क गए थे.
जिसके बाद इस गाने का प्रसारण करने वाले पाकिस्तान टेलीविज़न केंद्र के सभी अधिकारियों को बदल दिया गया था.
इस वाकये को पाकिस्तान टेलीविज़न के पूर्व प्रबंध निदेशक अख़्तर वकार अजीम ने अपने 'हम भी वहीं मौजूद थे' संस्मरण में विस्तार से लिखा है.
इस घटना की पृष्ठभूमि के बारे में वो लिखते हैं कि राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जब जनरल ज़िया उल हक़ ने देश में इस्लाम लागू करने पर अपने विचार व्यक्त किए तो सभी को चिंता हुई कि इस भाषण के बाद कौन सा कौमी नग़मा प्रसारित किया जाए.
किताब में वो लिखते हैं, “उस समय आगा नासिर प्रबंध निदेशक थे और संबंधित विभाग के प्रमुख ने उन्हें कई नग़मे दिखाए, लेकिन कुछ में गायकों के पहनावे और कुछ में अलग-अलग अर्थ होने के कारण आगा साहब को पसंद नहीं आए.”
अख़्तर वकार के मुताबिक़, वह पाकिस्तान टेलीविज़न (पीटीवी) कराची सेंटर में जनरल मैनेजर थे और उन्हीं की सलाह से तय हुआ कि भाषण के बाद 'सोहनी धरती अल्लाह रहे कदम-कदम आबाद' गाना प्रसारित किया जाए.
इसके बाद गाना प्रसारित हुआ और शाम अच्छी गुजरी.
लेकिन अगली सुबह राष्ट्रपति के सैन्य सचिव उनके कार्यालय में आए और कहा कि राष्ट्रपति पिछले दिन अपने भाषण के बाद शाम के प्रसारण की रिकॉर्डिंग देखना चाहते हैं.

क्यों भड़क गए थे जनरल ज़िया?

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अख़्तर वकार आगे लिखते हैं कि कुछ देर बाद राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल हक़ आए, मुस्कुराए और परंपरा के मुताबिक सभी से हाथ मिलाया.
उन्होंने सबका हालचाल पूछा और बैठ गए. जब भाषण की रिकॉर्डिंग राष्ट्रपति को दिखाई गई तो उन्होंने कहा कि इसे छोड़िए, आगे का दिखाइए.
जब 'सोहनी धरती' की धुन बजी तो राष्ट्रपति और अन्य लोग भी नग़मे के बोल गुनगुनाने लगे. इसके बाद बारी थी विज्ञापनों की और फिर ख़बरों की.
पाकिस्तान टेलीविज़न के पूर्व प्रबंध निदेशक का कहना है कि आधे घंटे की खबरों में से 20 मिनट राष्ट्रपति के भाषण को दिए गए और बाकी दस मिनट दूसरी ख़बरों को.
जैसे ही ख़बर के बाद बेंजामिन सिस्टर्स का गाना 'ख्याल में एक रोशनी है' प्रसारित किया गया, राष्ट्रपति भड़क गए.
नाराज़ होकर तत्कालीन पाकिस्तान टीवी (पीटीवी) के एमडी आगा नासिर समेत सभी अधिकारियों को बदल दिया गया.
जिस वक्त यह घटना हुई वह 1980 का दशक था. ईसाई समुदाय की तीन बहनें नरीसा, बीना और शबाना, जिन्हें बेंजामिन बहनें कहा जाता था, अपनी अनूठी गायन शैली के लिए पाकिस्तान टेलीविज़न पर लोकप्रिय थीं.
'ख्याल में एक रोशनी है' नाम का ये गाना भी इन बहनों ने गाया था और इसके वीडियो में इन्हें हाथों में दीया लेकर सीढ़ियां चढ़ते हुए दिखाया गया था.
इस वीडियो को देखकर जनरल ज़िया उल हक़ को तुरंत गुस्सा आ गया और उन्होंने कहा, "मैं इस्लामी व्यवस्था की बात कर रहा हूं और आप किस तरह का हिंदुआना नग़्मा प्रसारित कर रहे हैं."
उन्होंने ने आगे कहा “इन लड़कियों के कपड़े भी मुनासिब नहीं. कोई मेरी बात, मेरी सोच को समझने को कोशिश नहीं कर रहा है.”
जब गीत को भाषण के बाद किया गया प्रसारित

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अख़्तर वकार अजीम ने अपनी पुस्तक में पाकिस्तान में प्रसारित होने वाले मिल्ली नग़मों पर भी विस्तार से लिखा है.
अख़्तर वकार के मुताबिक, जनरल ज़िया उल हक़ के मार्शल लॉ से लेकर उनके राष्ट्रपति पद तक अख़्तर वकार अजीम पीटीवी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे. उन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मनोरंजन और समाचार के लिए पीटीवी ही एकमात्र चैनल था.
वो लिखते हैं कि राष्ट्रपति ज़िया चाहते थे कि उनके हर भाषण के बाद एक नया गाना प्रसारित किया जाए. कभी-कभी वे शब्दों को स्वयं ही अंकित कर देते थे. एक बार उन्होंने एक शेर का इस्तेमाल अपने भाषण में किया.
वह शेर था-
"ख़ुदा ने आज तक उस कौम की हालत नहीं बदली,
ना हो जिसको ख़्याल अपनी हालत बदलने का."
भाषण ख़त्म करने के बाद जनरल ज़िया ने आदेश दिया कि इस शेर को और इसके पहले और पीछे के कुछ शेर को भाषण के बाद किसी अच्छे गायक की आवाज़ में लिया जाए और प्रसारित किया जाए.
अख़्तर वकार के मुताबिक, उन्होंने इन शेर को खोजने की बहुत कोशिश की, लेकिन जब यह होता तब तो मिलता. इस बारे में पीटीवी के एमडी जिया जालंधरी को सूचना दी गई.
उन्होंने जवाब दिया, "मैंने राष्ट्रपति के आदेश से आपको अवगत करा दिया है, बाकी आप जानें."
काफी खोजबीन के बाद यह शेर मौलाना जफ़र अली ख़ान की एक ग़ज़ल में मिला और इसके पहले और बाद के शेर इस अवसर के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त थे.
अगर इसे रिकॉर्ड किया गया होता तो सेंसर कर दिया गया होता.
इसके बाद मशहूर शायर कतील शिफाई से मदद मांगी गई और उनसे इस शेर में कुछ जोड़ने का अनुरोध किया गया.
कतील शिफाई ने कहा, "मैं इसमें क्या इज़ाफा करूंगा? इसे दोहे के अंदाज़ में पेश कर मेरे तराने के साथ जोड़ देना."
इस शेर के बाद कतील शिफाई का नग़मा प्रसारित किया गया, "ऐ मेरे देश के प्यारे लोगों, देश का शान बढ़ाये रखना."
मेहदी हसन ने कैसे रिकॉर्ड किया ये गाना?

अख़्तर वकार के मुताबिक, इस गीत के प्रसारित होने के दूसरे दिन राष्ट्रपति भवन से बधाई संदेश आया.
अख़्तर वकार अजीम ने अपनी किताब में जनरल ज़िया के भाषणों के बाद प्रसारित होने वाले नग़मों में उनकी रुचि का विस्तार से वर्णन किया है.
वह लिखते हैं कि एक अवसर पर राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद राष्ट्रपति ज़िया ने फ़रमाइश की कि भाषण के तुरंत बाद इक़बाल के भाषण के चयनित अंशों, विशेष रूप से 'खुदी का सर-ए-नहां, लाइलाह इल-लल्लाह' जैसे शेरों को प्रसारित किया जाए.
आदेश दिया गया कि राष्ट्रपति की बात का पालन किया जाये. उस वक्त दोपहर के दो बजे थे और भाषण शाम साढ़े सात बजे प्रसारित होना था. समय कम था इसलिए गीत का चयन किया गया और संगीतकार खलील अहमद को धुन तैयार करने का काम दिया गया.
उन्होंने सलाह दी कि अख़लाक़ अहमद को बुलाया जाए. नायब कासिद को उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया. वो तो नहीं मिले, लेकिन नायब कासिद वापसी के वक्त शौक़त अली को उनके घर से लेते आए और इस तरह शौक़त अली ने यह गीत गाया.
मेहदी हसन ने पीटीवी पर बहुते से कौमी नग़मे (राष्ट्रीय गीत) और जंगी तराने (युद्ध गीत) गाए, जिनमें से 'ये वतन तुम्हारा है, तुम हो पासबान इसके' उन्होंने खड़े होकर हारमोनियम बजाते हुए गाया था.
अख़्तर वकार इस गाने की रिकॉर्डिंग का बैकग्राउंड बताते हैं, 'दिसंबर का दूसरा पखवाड़ा चल रहा था. क़ायदे आजम दिवस (मोहम्मद अली जिन्नाह की जन्मतिथि) में सिर्फ दो दिन बचे थे. कलीम उस्मानी का लिखा गाना ले जाकर संगीतकार निसार बज़्मी को सौंप दिया गया. मेहदी हसन भी उन दिनों लाहौर में थे, उन्होंने गाना सुना और बोल देखे तो हामी भर दी.'
अख़्तर वकार के मुताबिक, मेहदी हसन के साथ वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए छह बजे का समय तय किया गया था और सेट की व्यवस्था इस तरह की गई थी कि गायक खड़े होकर नग़मा रिकॉर्ड करेगा.
जब मेहदी हसन आये तो उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. यह थकावट या वे जहां से आए थे वहां की मेजबानी का प्रभाव था. मेहदी हसन के लिए खड़े होकर रिकॉर्डिंग करना मुश्किल था, इसलिए एक ऊंचे स्थान से एक स्टूल पर हारमोनियम रखकर समस्या का समाधान किया गया.
वे इसके सहारे झुक कर खड़े हो गये और फिर एक ही बार में रिकॉर्डिंग पूरी कर ली गई.
इस दौरान जहां भी मेहदी हसन के होंठ उनके बोल के मुताबिक नहीं चलते थे, वहां नग़मे की फ़ाइनल एडिटिंग में बच्चों की तस्वीरें इस्तेमाल की गईं और इस तरह यह लोकप्रिय हो गया.
वो गाना जो पहले एक विज्ञापन का हिस्सा था

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युवा अबसार अहमद ने मिल्ली नग़मों पर शोध करने के बाद 'पाकिस्तान के कौमी नग़मात' नामक किताब संकलित की है, जिसमें उन्होंने 'जीवे-जीवे पाकिस्तान' बनने के पीछे की कहानी बताई है.
इस नग़मे को जमीलुद्दीन अली ने लिखा था. अबसार अहमद बताते हैं, "जीवे-जीवे पाकिस्तान' की रचना सबसे पहले पाकिस्तान एयरलाइंस के जिंगल के रूप में की गई थी, जिसे ताहिरा सैयद ने जमीलुद्दीन अली की शैली में गाया था."
इसका पहला शेर इस तरह था, "पाकिस्तान एयरलाइंस, ले जाए संदेशे और संदेशे लाये, सुनने वाले सुनें तो उनमें एक ही धुन लहराए."
1971 के युद्ध के बाद इस नग़मे को सोहेल राणा ने एक नए और रोमांचक अंदाज में रूपांतरित किया, जिसमें अली ने गीत को इस प्रकार संपादित किया, "मन पंछी जब पंख हिलाए क्या क्या सर बिखराए, सुनने वाले सुनें तो उनमें एक ही धुन ठहराए."
इस नग़मे के बारे में एक इंटरव्यू में जमीलुद्दीन अली ने कहा था कि उन्होंने यह नगमा 1971 में लंदन में लिखा था जब पाकिस्तान के बंटवारे के बाद देश के हालात बहुत अलग थे.
'सोहनी धरती अल्लाह रहे, कदम-कदम आबाद तुझे'

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मशहूर पाकिस्तानी मिल्ली नग़मा 'सोहनी धरती अल्लाह रहे, कदम-कदम आबाद तुझे' बहुत लोकप्रिय हुआ.
यह नग़मा 1971 में पाकिस्तान के विभाजन से पहले बनाया गया था, जिसे पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान के बीच एकता और एकजुटता दिखाने के लिए पीटीवी पर प्रसारित किया गया था.
ढाका में जन्मी शहनाज़ बेगम ने इस गीत को गाया था, जबकि सोहेल राणा ने संगीत तैयार किया था. यह नागरिकों और सैन्य नेतृत्व दोनों के बीच लोकप्रिय रहा है.
जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के नेतृत्व में सेना ने मियां नवाज़ शरीफ़ की सरकार को बर्ख़ास्त कर सत्ता हासिल की थी और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने आधी रात को देश को संबोधित किया था, उस समय भी 'सोहनी धरती अल्लाह रहे' बजाया गया था.
अख़्तर वकार अजीम लिखते हैं कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के भाषण की रिकॉर्डिंग प्रसारित होने से पहले नग़मे प्रसारित होने थे.
उनका कहना है कि ऐसे मौकों के लिए पाकिस्तान टेलीविज़न में नग़मे की एक फ़ेहरिस्त बनाई गई है, जिनके बोलों में भावुकता के लिए जगह नहीं है. यह सूची और ये नग़मे सभी केन्द्रों पर उपलब्ध हैं ताकि ज़रूरत पड़ने पर इनका इस्तेमाल किया जा सके.
अख़्तर वकार अजीम के मुताबिक़, उस रात कराची सेंटर से जो नग़मे प्रसारित हुए, उनमें शहनाज़ बेगम की आवाज़ में 'सोहनी धरती', मेहदी हसन की आवाज़ में 'ये वतन तुम्हारा है', शौकत अली का 'खुदी का सर नहां' और नीरा नूर का 'हमारा परचम, ये प्यारा परचम' शामिल थे.
जब नूरजहाँ ने अपने गाने के प्रसारण का समय भी बता दिया

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पाकिस्तान में जंगी तराने (युद्ध गीत) ज्यादातर मैडम नूरजहाँ की आवाज़ में रिकॉर्ड किए गए थे. इनके प्रशंसकों में से एक तत्कालीन राष्ट्रपति याहया ख़ान भी थे.
रेडियो पाकिस्तान से दो दशकों से ज्यादा समय तक जुड़े रहने वाले ब्रॉडकास्टर जमील ज़ुबेरी अपने संस्मरण "याद-ए-ख़ज़ाना, रेडियो पाकिस्तान में 25 साल" में लिखते हैं कि पिछली जंग (1965) का अनुभव देश के सामने था, लेकिन इस बार लोगों में ना वो जज़्बा था ना ही कोई जुनून. जिसके चलते रेडियो पाकिस्तान ने उसी तरह से कार्यक्रम प्रसारित करना शुरू कर दिया था, जिसमें कौमी और मिल्ली नग़मे शामिल थे.
उनके मुताबिक, जब लड़ाई चल रही थी तो वह नग़मे तैयार करने में व्यस्त थे.
वे लिखते हैं कि लंदन से कराची लौटने के बाद एक दिन मैडम नूरजहाँ रेडियो स्टेशन पहुँचीं. उनकी मौजूदगी का फायदा उठाया गया और साथ ही उनकी आवाज़ में तीन गाने रिकॉर्ड करने की व्यवस्था भी की गयी.
जमील जुबेरी के मुताबिक, नग़मे रिकॉर्ड करने के बाद वो स्टूडियो से निकलीं और स्टेशन डायरेक्टर ताहिर शाह के कमरे में आकर उनसे याहया ख़ान को फ़ोन पर बुलाकर बात कराने का इसरार करने लगीं.
स्टेशन मास्टर के घबराने पर वो बोलीं- "आप डरें नहीं, रिंग करें और फोन मुझे दे दें."
इसके बाद फ़ोन किया गया, शायद राष्ट्रपति के सचिव फ़ोन पर पहले थे, फिर जब वो ख़ुद फ़ोन पर आए तो नूरजहाँ ने कहा, "मैंने आज कराची में तीन नग़मे रिकॉर्ड किए हैं, उन्हें रात आठ बजे रेडियो पर सुन लें." और इतना कहकर उन्होंने रिसीवर रख दिया.
जमील ज़ुबैरी लिखते हैं, "हम लोगों को आश्चर्य हुआ कि नूरजहाँ ने नग़मे प्रसारित होने का समय खुद ही तय किया और राष्ट्रपति को बताया."
समस्या यह थी कि उस समय समाचार प्रसारित हो रहे थे. युद्ध चल रहा था और नग़मों के लिए समाचार का समय नहीं बदला जा सकता था.
जिसके बाद ताहिर शाह ने डीजी से बात की. उन्होंने कहा, "चिंता मत करो, मैं राष्ट्रपति के सचिव से बात करूंगा."
पाकिस्तान के क़ौमी तराने

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पाकिस्तान के कौमी नग़्मों के शोधकर्ता अबसार अहमद के अनुसार, पाकिस्तानी गायकों को मज़हब से परे कौमी नग़्मों (राष्ट्रीय गीतों) से भावनात्मक लगाव है.
दिवंगत गायक सलीम रज़ा को सितंबर की जंग में सबसे लोकप्रिय गीत गाने का सम्मान प्राप्त है.
अबसार अहमद बताते हैं कि 13 सितंबर को जब सियालकोट में युद्ध चल रहा था, तब किश्वर नाहिद का लिखा गाना 'ओ अहल सियालकोट तुम को मेरा सलाम' सलीम रज़ा को मिला, जिसे वह रिकॉर्ड करने जा रहे थे, लेकिन उनका छोटा बेटा मृत्यू शैया पर था.
सलीम रज़ा ने अपने बेटे से ज्यादा देश को तरजीह दी और वह गाना रिकॉर्ड करने के लिए लाहौर रेडियो पर आए.
सलीम रज़ा का जन्म अमृतसर के एक ईसाई परिवार में हुआ था, बाद में उन्होंने अपना धर्म बदल लिया.
ईसाई समुदाय से ताल्लुक रखने वाली तीन बहनें नरीसा, बीना और शबाना और अन्य गैर-मुस्लिम गायक भी शामिल हुए, जिन्होंने पाकिस्तान के प्रति अपना प्यार व्यक्त करने के लिए मिल्ली और कौमी नग़मे गाए.
अबसार अहमद ने बीबीसी को बताया कि मिल्ली नग़मा गाने वाले पाकिस्तान की पहली हिंदू गायक झुनो भौमिक थीं, जिन्होंने 1950 में ढाका रेडियो पर अल्लामा मुहम्मद इकबाल की नज़्म बर तराज़-ए-अंदेशा सूद-ओ-ज़्याँ है ज़िंदगी' गाया.
इसके अलावा बंगाली मिल्ली नग़्मा 'शोनार मोनीर देश पाकिस्तान' भी गाया.
13 अगस्त 1950 को एसबी जून ने कराची रेडियो पर इक़बाल की नज़्म 'हो तेरे बयाबाँ कि हुआ तुझको गवारा, इस दश्त से बेहतर है दिल्ली ना बुख़ारा' पढ़ी और उन्हें एक अनोखा सम्मान मिला.
आधिकारिक तौर पर, पाकिस्तान में कोई यहूदी आबादी नहीं है, लेकिन 1980 तक यहूदी समुदाय पाकिस्तान में रहता था.
1959 में, यहूदी गायिका डेबोरा डेनियल ने रेडियो पाकिस्तान कराची पर अल्लामा मोहम्मद इक़बाल का मिल्ली कलाम (राष्ट्रीय कविता) 'सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक्श गर हादसात' गाया, जिसे पाकिस्तान के संदर्भ में रिकॉर्ड किया गया था.
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