पाकिस्तान: बिलावल का समर्थन मिला फिर भी नवाज़ शरीफ़ क्यों नहीं बना पा रहे हैं सरकार

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, शुमाइला जाफरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
पाकिस्तान में चुनाव के क़रीब 11 दिन बाद भी यह साफ़ नहीं हो पाया कि सरकार कौन सा दल या गठबंधन बना रहा है.
नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल-एन या इमरान ख़ान की तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई). पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के बिलावल भुट्टो इस समय किंग मेकर की भूमिका में हैं.
वहीं दूसरी तरफ हर राजनीतिक दल, चाहे वह चुनाव में हारा हो या जीता हो, चुनाव में धांधली का आरोप लगा रहा है. कई निर्वाचन क्षेत्रों में फिर मतगणना की मांग को लेकर उन्होंने क़ानून की शरण ली है.
दबाव बनाए रखने के लिए कुछ राजनीतिक दल सड़क पर भी उतरे हैं. बलूचिस्तान के चार प्रमुख दलों ने प्रांत को देश से जोड़ने वाले चार प्रमुख रास्तों पर जाम लगाया.
जमात-ए-इस्लामी, फजल-उर-रहमान की जमियत-ए-इस्लाम और तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान जैसे धार्मिक दलों ने धरना-प्रदर्शन किया है.
वहीं पीएमएल-एन और पीपीपी जैसे दल, जिनको कुछ राजनीतिक दल कथित धांधली का लाभार्थी बता रहें है, उन्होंने भी कुछ निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव परिणाम पर चिंता जताई है.
इस विरोध-प्रदर्शन में सबसे आगे इमरान ख़ान की पीटीआई है. उसका दावा है कि उनके बहुमत को चुरा लिया गया. दर्जनों सीटों पर चुनाव के दौरान उनके साथ धांधली की गई और उनके विरोधियों को इसलिए जिता दिया गया कि पीटीआई सत्ता में वापस न लौट सके.
सप्ताहांत में देश के कई शहरों में पीटीआई कार्यकर्ताओं को पुलिस का सामना करना पड़ा है.
रावलपिंडी के कमिश्नर ने क्या कहा?

इमेज स्रोत, Getty Images
रावलपिंडी के पूर्व कमिश्नर लियाक़त अली ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रावलपिंडी डिविजन के छह जिलों में 13 नेशनल असेंबली निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव परिणामों को बदलने की ज़िम्मेदारी ली. दिलचस्प बात यह हुई कि उन्होंने सेना को क्लीन चिट दे दी.
उन्होंने चुनावी धांधली में शामिल होने का दोष चुनाव आयोग और मुख्य न्यायाधीश काजी फैज ईसा पर लगाया. उनके इस दावे का चुनाव आयोग और मुख्य न्यायाधीश ने खंडन किया.
लियाक़त के इन आरोपों से सोशल मीडिया पर बवाल मच गया. इसने हाल में हुए चुनाव की विश्वसनीयता पर और सवाल खड़े कर दिए. इसके बाद से पाकिस्तान में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रोक लगा दी गई.
अब पाकिस्तान में मार्शल लॉ और आपातकाल लगाने की अटकलों का बाज़ार गर्म है. कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का दावा है कि राजनेताओं को यह बता दिया गया है कि अगर वे झगड़ा बंद कर अगले कुछ हफ्तों में सत्ता में हिस्सेदारी के किसी फॉर्मूले पर सहमत नहीं होंगे तो वर्तमान की कार्यवाहक सरकार को बनाए रखने को पूरी तरह से ख़ारिज नहीं किया जा सकता है.
सरकार गठन में इतना समय क्यों लग रहा है?

इमेज स्रोत, Getty Images
इसका एक प्रमुख कारण खंडित जनादेश है. केंद्र में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. पीटीआई समर्थित 93 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है. लेकिन साधारण बहुमत के लिए उसके पास अब भी क़रीब 40 सीटों की ज़रूरत है.
पीटीआई ने तीन बड़ी पार्टियों पीएमएल-एन, पीपीपी और एमक्यूएम पाकिस्तान के साथ किसी भी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है. ऐसे में उनके पास बहुमत जुटाने का कोई रास्ता नहीं है.
पीटीआई ने विपक्ष में बैठने के संकेत दिए हैं, लेकिन वह अब भी सरकार बनाने के अपने दावे से पीछे नहीं हट रही है. अब उसे अपने 'चोरी हुए जनादेश' की वापसी की उम्मीद है, जो क़ानूनी रास्ता अपनाने पर उन्हें जल्द नहीं मिलने वाला है.
ऐसे में अब गेंद पीएमएल-एन और पीपीपी के पाले में है. चुनाव में पीएमएल-एन ने 75 और पीपीपी ने 54 सीटें जीती हैं. अगर ये दोनों दल गठबंधन कर लें तो आसानी से सरकार बन सकती है.
हालांकि, पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने चुनाव प्रचार के दौरान नवाज़ शरीफ़ की जमकर आलोचना करते नज़र आए. अब वो इस बात पर अड़े हैं कि पीएमएल-एन के साथ सरकार में वो किसी भी तरह से शामिल नहीं होंगे.
पिछले हफ़्ते अपनी पार्टी की केंद्रीय कार्यकारी समिति की बैठक के बाद बिलावल ने यह कहकर सबको आश्चर्य में डाल दिया कि उनकी पार्टी पीएमएल-एन को अगली सरकार बनाने में हर तरह से मदद करेगी और सदन में मतदान में उनका समर्थन करेगी, लेकिन वो सरकार में शामिल नहीं होंगे.
राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि इसके बाद समितियों के स्तर पर हुई बातचीत में यह सबसे विवादास्पद मुद्दा बन गया है.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नजम सेठी ने अपने कार्यक्रम 'सेठी से सवाल' में दावा किया कि पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने पीएमएल-एन को समर्थन देने के लिए 28 मांगों की एक सूची सौंपी है. लेकिन नवाज़ शरीफ़ ने उन्हें ख़ारिज कर दिया है.
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने पीएमएल-एन को समर्थन देने के लिए 28 मांगों की एक सूची सौंपी है. लेकिन नवाज शरीफ ने उन्हें खारिज कर दिया है.
सेठी के मुताबिक़, नवाज़ शरीफ़ ने अपने वार्ताकारों से कहा है कि वे पीपीपी की समिति को बता दें कि इन शर्तों पर गठबंधन नहीं होगा.
ऐसे में सवाल यह है कि अगर पीएमएल-एन सरकार बनाने से पीछे हटती है तो सरकार कौन बनाएगा. नजम सेठी को लगता है कि आसिफ़ अली ज़रदारी लचीला रुख़ दिखाएंगे, लेकिन समस्या यह है कि बिलावल भुट्टो ने अपना रुख़ और सख़्त कर दिया है.
उनका मानना है कि सेना इस मामले में हस्तक्षेप की चेतावनी देकर राजनीतिक दलों पर दबाव डाल सकती है. सेना उन्हें देश में स्थिरता लाने के जल्द से जल्द अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए मजबूर कर सकती हैं.
नजम सेठी की राय में अगर पीएमएल-एन बिना पीपीपी को सरकार में शामिल किए आगे बढ़ती है, तो वह पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगी. यह क़दम पीएमएल-एन के लिए राजनीतिक आत्महत्या होगी.
नजम सेठी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ अगले कार्यक्रम के लिए होने वाली बातचीत का ज़िक्र कर रहे थे. पाकिस्तान में बनने वाली नई सरकार को अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय क़र्ज़दाताओं के साथ अगली व्यवस्था करनी होगी.
आईएमएफ की योजना में ऊर्जा और ईंधन की क़ीमतों में बढ़ोतरी समेत कई कठिन परिस्थितियां शामिल होंगी. पाकिस्तान के लोग पहले से ही महंगाई के बोझ तले दबे हुए हैं. इसलिए यह बेहद अलोकप्रिय साबित होने जा रहा है. इसकी वजह से सत्तारूढ़ दल को अपनी राजनीतिक पूंजी गंवानी पड़ेगी.
सैन्य तख्तापलट की आशंका

इमेज स्रोत, Getty Images
वहीं खोजी पत्रकार उमर चीमा बाहरी हस्तक्षेप या दूसरे शब्दों में कहें तो सेना के हस्तक्षेप के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते हैं.
अपने ब्लॉग में, उन्होंने मार्शल लॉ की संभावना को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है. इसका कारण बताते हुए वो लिखते हैं, ''18वें संवैधानिक संशोधन के बाद, न केवल उस जनरल पर देश द्रोह की धाराओं में मुक़दमा चलाया जाएगा जो तख्तापलट करेगा बल्कि उस न्यायाधीश पर भी मुक़दमा चलाया जा सकता है जो इसे वैध ठहराएगा. इसलिए मार्शल लॉ का सवाल ही नहीं उठता है, अब उन्हें हाइब्रिड शासन से समझौता करना होगा.''
इसका मतलब यह नहीं है कि सेना पीएमएल-एन और पीपीपी पर सत्ता में हिस्सेदारी के किसी समझौते पर सहमत होने का दबाव नहीं डाल रही होगी. सेना ने इमरान ख़ान और उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर रखने के लिए सेना ने अपनी साख को दांव पर लगाया है.
संघीय सरकार का हिस्सा बने बिना प्रमुख संवैधानिक और ताक़तवर प्रशासनिक पदों को हासिल कर बड़ी हिस्सेदारी लेने की पीपीपी की जिद अभी तक किसी समझौते तक न पहुंच पाने में बाधा साबित हुई है.
अब पीएमएल-एन में इस बात पर आम सहमति बन रही है कि पीपीपी की ज़िद के आगे न झुकते हुए उसे पीटीआई के साथ मिलकर सरकार बनाने देना चाहिए और ख़ुद विपक्ष में बैठना चाहिए. राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि इस क़दम के साथ-साथ पर्दे के पीछे से सेना के दबाव से पीपीपी को और आधार मिल सकता है. इससे दोनों पक्ष जल्द ही बातचीत ख़त्म कर सकते हैं.
कब है सरकार बनाने की अंतिम तिथि

पीएमएल-एन नेता इरफ़ान सिद्दीक़ी को उम्मीद है कि दोनों दल अपने राजनीतिक हित से ऊपर उठकर देश को संकट से बाहर निकालने के लिए एक साथ आएंगे.
वो कहते हैं, ''स्थिति सहयोग की मांग करती है. हम दोनों तंत्र में बहुत ज़िम्मेदार साझेदार हैं. हमने अतीत में लोकतंत्र के चार्टर पर दस्तखत किए हैं और हम एक-दूसरे की सरकार का हिस्सा रहे हैं, मुझे उम्मीद है कि हम इस पर फिर काम करेंगे.''
पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक़ नेशनल असेंबली का सत्र 29 फ़रवरी से पहले बुलाया जाना चाहिए. ऐसे में पार्टियों के पास अब भी समय है, लेकिन अगर वे 29 फ़रवरी तक किसी समझौते पर नहीं पहुँच पाते हैं तो देश में एक और संवैधानिक संकट खड़ा होने का डर है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















