स्कर्दू की घेराबंदी: वो शहर जिसके लिए छह महीने तक लड़े भारत और पाकिस्तान

स्कर्दू शहर आज पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बल्तिस्तान बन चुका है

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    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता

मेजर विलियम ब्राउन साल 1947 में गिलगित स्काउट्स के ब्रितानी कमांडर थे. वो एक ऐसी बग़ावत का हिस्सा बनने वाले थे जिसके नतीजे में आज़ाद होने वाली नई रियासत पाकिस्तान में 'आज़ाद कश्मीर' कहलाने वाला था.

उनके मुताबिक़, "गिलगित में यह अफ़वाह फैल चुकी थी कि कश्मीर के महाराजा अपनी रियासत का भारत में विलय करने वाले हैं. इसके साथ ही स्काउट्स की संभावित बग़ावत के बारे में भी बात होने लगी."

"गर्वनर हाउस के गेट समेत दीवारों पर हर तरफ़ ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ और ‘कश्मीर के महाराजा मुर्दाबाद’ के नारे लिखे थे."

"मैंने उन्हें (गवर्नर को) ख़ुद यह नारा मिटाते देखा. लेकिन अगली सुबह मेरे घर के गेट पर भी ये नारे फिर से लिखे जा चुके थे."

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इस इलाक़े में गिलगित के साथ-साथ स्कर्दू शहर भी शामिल था जो आज पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बल्तिस्तान बन चुका है. लेकिन इस कहानी की शुरुआत 1947 में गिलगित से ही होती है.

यह वह ज़माना था जब पाकिस्तान और भारत आज़ाद हो चुके थे लेकिन जम्मू और कश्मीर की रियासत समेत कुछ दूसरी रियासतों के विलय का मामला विवादित बन चुका था.

उस वक़्त गिलगित में मौजूद मेजर ब्राउन अपनी किताब ‘गिलगित रिबेलियन’ यानी ‘गिलगित विद्रोह’ में लिखते हैं कि 25 अक्टूबर 1947 की शाम को ख़बरों से मालूम हुआ कि भारत सरकार ने कश्मीर में सेना भेजने का फ़ैसला कर लिया है.

कुछ ही दिन पहले 'क़बायली लड़ाकों' ने मुज़फ़्फ़राबाद के रास्ते कश्मीर पर हमला कर दिया था और श्रीनगर के पास पहुंच चुके थे. तब गिलगित-बल्तिस्तान जम्मू कश्मीर रियासत का हिस्सा था.

समाजशास्त्र के शिक्षक सईद अहमद अपनी किताब ‘दि गिलगित-बल्तिस्तान कॉन्ड्रम: डाइलेमाज़ ऑफ़ पॉलिटिकल इंटीग्रेशन’ में लिखते हैं कि उस वक़्त जम्मू कश्मीर के चार हिस्से थे; सूबा जम्मू, सूबा कश्मीर, ज़िला गिलगित और ज़िला लद्दाख.

लेकिन साल 1935 में अंग्रेज़ों ने गिलगित की व्यवस्था डोगरा शासक से 60 साल के लीज़ पर ले ली थी जबकि बल्तिस्तान का इलाक़ा सीधे डोगरा सरकार के शासन में ही रहा.

गिलगित बग़ावत, गवर्नर घनसारा सिंह और मेजर ब्राउन

मेजर ब्राउन

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सईद अहमद लिखते हैं कि भारत और पाकिस्तान की आज़ादी से दो हफ़्ते पहले अंग्रेज़ों ने यह लीज़ अचानक रद्द कर दी. उसके बाद 30 जुलाई 1947 को कश्मीर की आर्मी के ब्रितानी कमांडर इन चीफ़ मेजर जनरल स्कॉट गिलगित पहुंचे.

उनके साथ ब्रिगेडियर घनसारा सिंह भी थे जिन्हें कश्मीर के महाराजा ने गवर्नर बनाकर गिलगित भेजा था.

तब तक कश्मीर के महाराजा ने अपनी रियासत का पाकिस्तान या भारत में विलय का फ़ैसला नहीं किया था. लेकिन ब्रिटिश शासन के ख़ात्मे के साथ ही कश्मीर के अलग-अलग इलाक़ों में महाराजा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे.

इसी दौरान क़बायलियों की श्रीनगर की ओर चढ़ाई के बाद महाराजा ने 27 अक्टूबर 1947 को कश्मीर का भारत में विलय का ऐलान कर दिया.

मेजर ब्राउन की किताब के अनुसार गिलगित स्काउट्स ने पहले ही एक क्रांतिकारी काउंसिल बना लिया था. इन हालात में 31 अक्टूबर 1947 को ‘ऑपरेशन दिता ख़ेल’ के नाम से बग़ावत की शुरुआत कर दी.

इस बग़ावत की शुरुआत गिलगित के पास बोंजी से हुई. जहां मिर्ज़ा हसन ख़ान के नेतृत्व में कश्मीर रियासत की सेना के मुसलमान सिपाहियों ने छठे कश्मीर इन्फ़ैंट्री की सिख कंपनियों पर हमला किया.

इधर गिलगित में गवर्नर घनसारा सिंह ने कुछ प्रतिरोध के बाद सूबेदार मेजर बाबर के सामने हथियार डाल दिए. मेजर ब्राउन का भी इस दस्तावेज़ पर दस्तख़त करवाने का दावा है.

एक नवंबर 1947 को गिलगित में अस्थाई सरकार बनाई गई जिसने पाकिस्तान के साथ बिना शर्त विलय किया.

16 नवंबर 1947 को पाकिस्तान सरकार के प्रतिनिधि सरदार मोहम्मद आलम ख़ान पॉलिटिकल एजेंट के तौर पर गिलगित पहुंचे.

स्कर्दू की जंग

गवर्नर घनसारा सिंह और सूबेदार मेजर बाबर

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रिटायर्ड पाकिस्तानी ब्रिगेडियर मसूद अहमद ख़ान लिखते हैं कि उस वक़्त मेजर असलम ख़ान (बाद में ब्रिगेडियर) को गिलगित में तैनात किया गया. जिन्होंने हालात का अंदाज़ा लगाते हुए स्थानीय स्काउट्स समेत रज़ाकारों को ट्रेनिंग देनी शुरू की.

इसके तहत चार अलग-अलग लश्कर तैयार किए जिनमें से एक का नाम ‘आई बेक्स फ़ोर्स’ रखा गया था.

असलम ख़ान आठ बहन-भाइयों में से एक थे, जिनमें असग़र ख़ान भी शामिल थे, जो बाद में पाकिस्तान की वायु सेना के एयर चीफ़ मार्शल और प्रमुख बने.

मसूद अहमद ख़ान के अनुसार स्कर्दू सिंध नदी के किनारे समुद्र तल से 7400 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित था और रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण भी था.

ऐसे में पाकिस्तान और भारत दोनों को ही यह एहसास था कि स्कर्दू पर नियंत्रण करना ज़रूरी है. हालांकि उस ज़माने में गिलगित से स्कर्दू की 160 मील की दूरी 20 दिन के सफ़र में पूरी होती थी.

स्कर्दू बल्तिस्तान का राजनीतिक केंद्र और कश्मीर के लद्दाख की एक तहसील का मुख्यालय था. जहां मंत्रालय का अमला हर साल छह महीने गुज़ारता था जबकि बाक़ी छह महीने लेह में तैनात रहता था.

‘डिबेकल इन बल्तिस्तान’ नाम की किताब के लेखक एस कुमार महाजन के अनुसार मेजर शेर जंग थापा के नेतृत्व में छह बटालियन की एक कंपनी लेह में मौजूद थी.

उन्हें गिलगित में बग़ावत की ख़बर मिलते ही लेफ़्टिनेंट कर्नल के ओहदे पर तरक़्क़ी देते हुए स्कर्दू की सुरक्षा के लिए रवाना होने का आदेश दिया गया.

महाजन के अनुसार शेर जंग थापा 3 दिसंबर 1947 को स्कर्दू पहुंचे तो उन्होंने महसूस किया कि उनकी स्थिति मज़बूत नहीं थी. उन्होंने और फ़ोर्स का अनुरोध किया जिसे रद्द कर दिया गया.

उनसे कहा गया कि आख़िरी आदमी और आख़िरी राउंड तक मुकाबला करें. शेर जंग थापा ने इसके लिए शहर से बाहर एक घेराबंदी की.

स्कर्दू की घेराबंदी

गिलगित स्काउट्स

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महाजन के मुताबिक़ उस समय स्कर्दू में मौजूद लद्दाख के ज़िला मजिस्ट्रेट अमरनाथ बता चुके थे कि लद्दाख, कारगिल और स्कर्दू में भारतीय सेना को तुरंत पहुंचाने के लिए जहाज़ किस जगह उतर सकते हैं.

लेकिन भारतीय सेना उस समय कश्मीर के दूसरे मोर्चों पर लगी हुई थी और महाजन के अनुसार एक समस्या यह भी थी कि भारतीय वायु सेना के पास मौजूद जहाज़ उन जगहों पर लैंडिंग नहीं कर सकते थे.

अहमद हसन दानी की किताब ‘तारीख़-ए-शुमाली इलाक़ाजात’ (उत्तरी क्षेत्रों का इतिहास) के अनुसार इस बात का अंदाज़ा मेजर असलम ख़ान को भी था कि अगर भारतीय सेना श्रीनगर की तरह जहाज़ से स्कर्दू पहुंच गई तो यह शहर उनके हाथ से निकल जाएगा.

ऐसे में उनके पास समय कम था.

लेकिन स्कर्दू के पास स्थित रोंदो के राजा की मदद और व्यवस्थित योजना से मेजर एहसान के नेतृत्व में आई बेक्स फ़ोर्स पहली रक्षा घेराबंदी पार करने और स्कर्दू तक पहुंचने में सफल हुई.

बोंजी से भागने वाले छठी जम्मू कश्मीर लाइट इन्फ़ैंट्री बटालियन के दस्ते स्कर्दू शहर के खरपोचो क़िले में ग्राउंड पॉइंट 8853 पर और छावनी के अंदर और उसके आसपास भी तैनात थे.

ऐसे में भारतीय हाई कमान ने कुमक के तौर पर दो अतिरिक्त कंपनियां श्रीनगर से स्कर्दू रवाना कर दीं, जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर फ़क़ीर सिंह कर रहे थे.

स्कर्दू छावनी पर पहला हमला 11 फरवरी 1948 को किया गया जिसमें दोनों तरफ़ से जमकर फ़ायरिंग हुई.

बी चक्रवर्ती की किताब ‘स्टोरीज़ ऑफ़ हीरोइज़्म’ के मुताबिक़ 11 फ़रवरी 1948 को आई बेक्स फ़ोर्स और क़िलाबंद फ़ौजियों के बीच छह घंटे तक जारी रहने वाली लड़ाई के बाद हमलावर पीछे हट गए.

यहाँ फ़रवरी और मार्च के दौरान और हमले किए गए, जिनमें मसूद ख़ान के अनुसार पॉइंट 8853 समेत आधी पोज़िशन पर क़ब्ज़ा कर लिया गया.

उनके मुताबिक़, “इसी बीच ख़बर आई कि ब्रिगेडियर फ़क़ीर सिंह के नेतृत्व में एक ब्रिगेड घिरी हुई फ़ौज को बचाने के लिए स्कर्दू आ रही है. इसके लिए दो प्लाटून को कारगिल- स्कर्दू सड़क से आ रही थी, जहां भारतीय सैनिकों पर घात लगाकर फ़ायरिंग की गई."

भारतीय सैनिकों पर ऊंचाई से भारी पत्थर भी बरसाए गए.

“ब्रिगेडियर फ़क़ीर सिंह और उनके सलाहकार कम रौशनी की वजह से कुछ सैनिकों के साथ फ़रार होने में कामयाब हो गए, जबकि बहुत से लोग सिंध नदी में कूद कर डूब गए.”

जब शेर जंग थापा ने हथियार डाल दिए

शेर जंग थापा

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महाजन के अनुसार ऐसे में स्कर्दू में घिरे भारतीय सैनिकों और उनके कमांडर शेर जंग थापा के हौसले और रसद दोनों ही कम होते जा रहे थे. इस दौरान भारतीय वायुसेना ने किसी हद तक रसद का सामान क़िले तक पहुंचाया.

इस बीच मेजर एहसान ने कुछ लश्कर स्कर्दू से आगे कारगिल और ज़ोजीला की ओर रवाना किया और मई 1948 में आई बेक्स फ़ोर्स के लोग एस्किमो फ़ोर्स के ज़रिए कारगिल और द्रास पर क़ब्ज़ा करने में कामयाब हो गए थे.

बाद में भारतीय सेना की ओर से की गई कार्रवाइयों के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा.

इस दौरान चित्राल स्काउट्स और चित्राल बॉडीगार्ड्स के 300 जवान शहज़ादा मताउल मुल्क और मेजर बुरहानुद्दीन के नेतृत्व में स्कर्दू पहुंचे, जहां मताउल मुल्क ने हथियार डालने का संदेश भेजा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

चंदर बी खंडूरी लिखते हैं कि अगस्त 1948 के मध्य तक स्कर्दू गैरिसन बुरी हालत में था.

चंदर बी खंडूरी, “13 अगस्त 1948 को स्कर्दू में मौजूद कश्मीरी और भारतीय सेना ने छोटी-छोटी टुकड़ियों में क़िला छोड़ दिया."

"14 अगस्त 1948 को पांच महीने की लंबी घेराबंदी के बाद लेफ़्टिनेंट कर्नल थापा, कैप्टन गंगा सिंह, कैप्टन पी सिंह और लेफ़्टिनेंट अजीत सिंह ने ढाई सौ जवानों के साथ हथियार डाल दिए.”

इतिहासकार डॉक्टर अहमद हसन दानी के अनुसार, आख़िरी फ़तह चित्राल के जवानों की मदद से मिली जिन्होंने कर्नल मताउल मुल्क की कमान में आख़िरी चोट लगाई.

14 अगस्त 1948 के दिन एक बजे पाकिस्तान का झंडा पहाड़ की चोटी पर स्थित ऐतिहासिक क़िला खरपोचो पर लहराया गया और स्कर्दू दक्षिणी बल्तिस्तान के साथ पाकिस्तान प्रशासित उत्तरी इलाक़ों का हिस्सा बन गया.

मेजर एहसान अली को पाकिस्तान सरकार ने सितारा-ए-जुर्रत से नवाज़ा जबकि लेफ़्टिनेंट कर्नल शेर जंग थापा को बाद में भारत में महावीर चक्र मिला.

जंग ख़त्म होने के बाद उन्हें और दूसरे क़ैदियों को भारत वापस भेज दिया गया था.

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