नंद कुमार बघेल: बेटे के मुख्यमंत्री रहते जो पिता अपने विवादित विचारों के लिए जेल गया

नंद कुमार बघेल और भूपेश बघेल की फ़ाइल फ़ोटो

इमेज स्रोत, BHUPESH BAGHEL@X

इमेज कैप्शन, नंद कुमार बघेल और भूपेश बघेल की फ़ाइल फ़ोटो
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

यह अक्टूबर 2001 का किस्सा है, जब छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बने एक साल भी नहीं हुआ था.

राजधानी रायपुर में नंद कुमार बघेल ने अपनी किताब 'रावण को मत मारो' की कुछ प्रतियाँ कुछ पत्रकारों को भेंट की थीं लेकिन दो दिन भी नहीं गुज़रे होंगे कि इस किताब को लेकर हंगामा हो गया.

नंद कुमार बघेल की 236 पेज की इस किताब में विभिन्न धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए भगवान राम की आलोचना की गई थी और रावण की प्रशंसा करते हुए लिखा था, "रावण ने समतावादी धर्म के लिए अपने कुटुम्ब-परिवार की बलि चढ़ा दी, उस रावण को हर वर्ष मत मारो."

विपक्षी दल भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया और 20 अक्टूबर, 2001 को गृह विभाग ने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया. इसके बाद 4 नवंबर, 2001 को नंद कुमार बघेल को गिरफ़्तार किया गया.

यह तब हुआ, जब उस समय की अजीत जोगी की कांग्रेस सरकार में नंद कुमार बघेल के बेटे भूपेश बघेल राजस्व मंत्री के पद पर थे.

सोमवार को रायपुर में 89 साल की उम्र में नंद कुमार बघेल का निधन हो गया, लंबे समय से बीमार चल रहे नंद कुमार बघेल, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता थे.

हमेशा से बाग़ी रहे बघेल

नंद कुमार बघेल

इमेज स्रोत, Devendra Shukla

2001 में हुई गिरफ़्तारी उनकी अंतिम गिरफ़्तारी नहीं थी, नंद कुमार बघेल ने विवादों से अपना नाता कभी नहीं तोड़ा.

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को विदेशी कहने और उनका बहिष्कार करने के आह्वान को लेकर सितंबर, 2021 में छत्तीसगढ़ की पुलिस ने नंद कुमार बघेल को फिर गिरफ़्तार करके रायपुर जेल भेज दिया.

2021 में जब नंद कुमार बघेल की गिरफ़्तारी हुई तो उस समय राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल थे. किसी मुख्यमंत्री के बुज़ुर्ग पिता की गिरफ़्तारी एक हैरतअंगेज़ घटना ही है, इसके बारे में भूपेश बघेल यही कहते रहे हैं कि "कानून अपना काम कर रहा है और कोई कानून से ऊपर नहीं है."

नंद कुमार बघेल को नज़दीक से जानने वाले लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र पहचान उस दौर में गढ़ी थी, जब भूपेश बघेल राजनीति के मैदान में उतरे भी नहीं थे.

खेती-किसानी में अभिनव प्रयोग करने वाले नंद कुमार बघेल, सर्वोदयी राजनीति से लेकर समाजवादी राजनीति और बहुजन राजनीति से लेकर किसान आंदोलन तक, वैचारिक तौर पर लगातार बदले लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ़ अपने विवादास्पद बयानों के लिए वे आजीवन चर्चा में रहे.

पिता-पुत्र विवाद

नंद कुमार बघेल

इमेज स्रोत, Devendra Shukla

नंद कुमार बघेल और उनके बेटे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच के वैचारिक रिश्ते, कभी भी ठीक नहीं रहे.

भूपेश बघेल ने कहा था, "मैं उनसे कभी बहस नहीं करता, हमेशा बचता रहा. बहस होगी तो झगड़ा होगा. फिर महीनों वो घर नहीं आएंगे. 1989 में तो उनसे झगड़े के बाद मैंने घर छोड़ दिया था."

असल में नंद कुमार बघेल शुरु से ही बागी तेवर के थे. 70 के दशक में उन्होंने हिंदू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म अपना लिया था.

नंद कुमार बघेल ने पिछड़ा वर्ग में गिने जाने वाली अपनी कुर्मी जाति को लेकर किताब लिखी थी, जिसका शीर्ष था- "कुर्मी ब्राह्मण की नज़रों में क्या? क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, मनुस्मृति के अनुसार."

बाद में जनगणना के दौरान उन्होंने अपने आप को हिंदू दर्ज किए जाने का विरोध किया था. इसके उलट उनकी पत्नी बिंदेश्वरी बघेल हिंदु धर्म में गहरी आस्था रखने वाली धर्म परायण महिला थीं.

नंद कुमार बघेल

इमेज स्रोत, Devendra Shukla

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

अपनी पत्नी के बारे में नंद कुमार बघेल ने अपनी क़िताब में लिखा, "बिंदेश्वरी रामायण की प्रकांड विद्वान हैं. अनेक प्रसंगों में हमारा उनका सार्थक वाद-विवाद होता रहा और मैं रावण को मत मारो, लिखता रहा. यद्यपि बिंदेश्वरी बाई राम भक्त हैं, फिर भी रावण को मत मारो पुस्तक लिखने में वे समय-समय पर मेरा मार्गदर्शन करती रहीं, ताकि मैं रामायण के सत्य को ठीक से समझ पाया. इसके लिए मैं उनका ऋणी हूं."

जुलाई 2019 में जब नंद कुमार बघेल की पत्नी यानी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मां बिंदेश्वरी बघेल का निधन हुआ तो नंद कुमार बघेल उनका अंतिम संस्कार बौद्ध रीति रिवाज से करने को लेकर अड़ गए.

उनके रिश्तेदार और राजनीतिक आंदोलनों के सहयोगी ललित बघेल बताते हैं कि यह हम सब लोगों के लिए बेहद मुश्किल समय था. एक तरफ़ भूपेश बघेल ने हिंदू विधि-विधान से मां का अंतिम संस्कार किया तो दूसरी ओर नंद कुमार बघेल ने गांव में बौद्ध मत के अनुसार दूसरे सारे कार्यक्रम संपन्न किए.

ललित बघेल कहते हैं, "वे एक प्रयोगधर्मी इंसान थे और अपने विचारों को लेकर हमेशा अडिग रहे. उन्होंने अपनी सैद्धांतिक लड़ाइयों के सामने, कभी व्यक्तिगत और पारिवारिक रिश्तों की भी परवाह नहीं की. उन्होंने तो बहुत पहले अपने अंतिम संस्कार को लेकर भी घोषणा कर दी थी कि उनका अंतिम संस्कार, उनके छोटे बेटे हितेश बघेल, बौद्ध रीति रिवाज़ से करेंगे."

अस्वस्थ पिता की सेहत का हालचाल लेते भूपेश बघेल (फाइल फोटो)

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, अस्वस्थ पिता की सेहत का हालचाल लेते भूपेश बघेल (फाइल फोटो)

समर्थकों के बीच 'छत्तीसगढ़ का पेरियार' कहे जाने वाले नंद कुमार बघेल अपने बेटे हितेश बघेल को राक्षस कुल का बताते थे और कहते थे कि हितेश रावण के भक्त हैं, इसलिए उन्होंने अपने बेटे का नाम इंद्रजीत रखा. यहां तक कि हितेश बघेल ने अपने गांव बलौदी के अलावा आसपास के कई गांवों में युवाओं को रावण की पूजा के लिए प्रेरित किया.

जातिवाद, धर्म, रावण दहन, राम की पूजा जैसे मुद्दों पर उन्होंने लगातार ग्रामीण क्षेत्रों में आंदोलन किया. नंद कुमार बघेल के समर्थकों का दावा है कि बिना लाग-लपेट के और बिना उसके परिणाम की परवाह किए अपनी बात कहते थे.

उनके एक समर्थक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि 16 अप्रैल 2001 को कसडोल में अपने छत्तीसगढ़ किसान संघ के सम्मेलन में नंद कुमार बघेल अध्यक्षता कर रहे थे. उन्होंने मंच पर बैठे तब के मुख्यमंत्री अजीत जोगी को चेतावनी दी कि छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 में से 46 उन सामान्य सीटों पर सवर्णों को टिकट न दी जाए, जहां दूसरी जाति के लोग बहुसंख्यक हैं, अन्यथा हम किसान उन्हें हराने का काम करेंगे. उन्होंने कांग्रेस-भाजपा के सवर्ण विधायकों का नाम लेकर उनके बीच गठजोड़ का आरोप लगाया.

नंद कुमार बघेल ने कहा था, "मुख्यमंत्री जी, आपके लिए संभव नहीं है कि 46 सामान्य विधानसभा सीटों में सभी में पिछड़े वर्ग से टिकट दे पाएं परंतु यह हमारे लिए अवश्य संभव है कि आपके ग़लत टिकट को हम अपने संगठन से ठीक कर देंगे."

इसी सम्मेलन में उन्होंने 85 फ़ीसदी आरक्षण की भी मांग की.

किताब पर प्रतिबंध और गिरफ़्तारी

नंद कुमार बघेल

विनोबा भावे, दादा धर्माधिकारी, जयप्रकाश नारायण जैसे लोगों के साथ काम कर चुके नंद कुमार बघेल ने 1984 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में दुर्ग लोकसभा से चुनाव भी लड़ा. वे बहुजन आंदोलन से भी जुड़े रहे, 'ब्राह्मणवाद' के ख़िलाफ़ उनके तेवर कभी कमज़ोर नहीं पड़े.

उन्होंने राम की जगह, रावण को स्थापित करने की अपनी कोशिश लगातार जारी रखी. इसी कोशिश का परिणाम था उनकी किताब-'रावण को मत मारो.'

इस किताब की छपाई करने वाले प्रदीप जैन पुरानी बातों को याद करते हुए बताते हैं कि किताब की सामग्री देखकर उन्हें इस बात की आशंका तो हुई कि इस किताब पर कोई हंगामा हो सकता है. लेकिन किताब की भूमिका में प्रेरणास्रोत के तौर पर शुरुआती अध्याय ही तब के मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर केंद्रित था.

प्रदीप जैन कहते हैं, "मुझे लगा कि इनके बेटे राज्य के ताक़तवर मंत्री हैं, ऐसे में मुझे इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए."

नंद कुमार बघेल

इमेज स्रोत, ANI

प्रदीप जैन कहते हैं, "इन सबके बाद भी मन के किसी कोने में आशंका ज़रूर थी. यही कारण है कि किताब के शुरुआती हिस्सों में ही मैंने इस बात को दर्ज़ कर दिया था कि किताब में उल्लेखित बातें लेखक के अपने विचार हैं. किसी की भावना को ठेस पहुंचाने की मंशा कतई नहीं. इन विचारों से असहमत लोगों से क्षमा-याचना के साथ सर्वाधिकार सुरक्षित. लेकिन यह लिखना काम नहीं आया."

प्रदीप जैन के अनुसार शुरुआती सौ प्रतियां बाइंड कराकर नंद कुमार बघेल को दी गई थीं और एक-दो दिन में ही हंगामा मच गया.

विवाद बढ़ा तो पुलिस ने प्रिंटिंग प्रेस पर छापा मारा और किताब की 180 हार्डकवर और दो हज़ार से अधिक पेपरबैक प्रतियां जब्त कर लीं. प्रदीप जैन को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया. किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह पहली ऐसी क़िताब थी, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया था. इस प्रतिबंध को हाईकोर्ट में चुनौती भी दी गई थी. लेकिन हाईकोर्ट की फुलबेंच ने कई सालों तक चली सुनवाई के बाद 2017 में किताब पर लगे प्रतिबंध को हटाने से इनकार कर दिया और याचिका ख़ारिज कर दी गई. आज भी इस क़िताब पर प्रतिबंध जारी है.

कांग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ाई

कांग्रेस

इमेज स्रोत, ANI

एक तरफ़ भूपेश बघेल अविभाजित मध्य प्रदेश के दौर में कांग्रेस सरकार में मंत्री थे, वहीं उनके पिता नंद कुमार बघेल कांग्रेस के कट्टर आलोचक. हालांकि एकाध अवसर ऐसा भी आया, जब उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी की तारीफ़ की, कांग्रेस से चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी मांगी लेकिन ज्यादातर अवसरों पर वो कांग्रेस के ख़िलाफ़ मुखर रहे.

यहां तक कि दिसंबर 2018 में भूपेश बघेल जब मुख्यमंत्री बने तो उनके सवर्ण मंत्रियों के ख़िलाफ़ नंद कुमार बघेल ताल ठोककर उतर गए. कांग्रेस के ब्राह्मण विधायक, मंत्री और न्यायिक पदों पर बैठे लोगों की उन्होंने खुलकर आलोचना की. उनका कहना था कि ब्राह्मणों के कारण राज्य के दलित और पिछड़े लोगों के साथ न्याय नहीं हो रहा है.

नंद कुमार बघेल ने अपने मुख्यमंत्री बेटे के सामने यह शर्त रख दी कि वो दिल्ली और केरल जैसे राज्यों से भी बड़े बस्तर में आदिवासियों को न्याय देना चाहते हैं तो वहां के सारे सवर्ण अफ़सरों को बर्ख़ास्त करें और उनकी जगह पिछड़ी जाति के अफ़सरों को नियुक्त किया जाए.

भूपेश बघेल की सरकार ने राज्य में राम वनगमन पथ बनाना शुरू किया तो नंद कुमार बघेल उसके ख़िलाफ़ खड़े हो गए. एकाध जगहों पर तो उन्होंने अपने समर्थकों के साथ सरकारी बोर्ड उखाड़ कर, उस स्थान को बौद्ध मठ घोषित कर दिया.

नंद कुमार बघेल

इमेज स्रोत, Devendra Shukla

नंद कुमार बघेल ने इस मुद्दे पर बीबीसी से बातचीत में कहा था, "ऐसा कोई पथ नहीं है, यह केवल ब्राह्मणों के दिमाग़ की उपज है और संघ का एजेंडा है. मैंने आदिवासी इलाक़ों का दौरा किया है. उन इलाक़ों में अपार जड़ी-बूटी है. अगर भूपेश बघेल को कुछ करना ही है तो इस इलाक़े में रिसर्च सेंटर बनाएं, जिससे दुनिया को उसका लाभ मिले. इस राम मंदिर और राम वन गमन पथ से किसको लाभ होगा?"

नंद कुमार बघेल भाजपा के ख़िलाफ़ भी लगातार मुखर रहे, लेकिन नंद कुमार बघेल ने कई अवसरों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार भी किया. यहां तक कि उन्होंने अपने बेटे के कई निर्णयों के ख़िलाफ़ भी मोर्चा खोलने में उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "भूपेश बघेल ने चाहे कितनी भी कोशिश की हो, वे अपने पिता को समझाने में नाकाम रहे. वे पिता के तौर पर तो उनका सम्मान करते थे लेकिन अलग-अलग मुद्दों पर उनकी अतिरेक भरे विचारों ने भूपेश बघेल को कई बार मुश्किलों में डाला. रिश्ते बने-बचे रहें, इसलिए दोनों अलग-अलग रहते थे. वैचारिक धरातल पर अलग-अलग होने के बाद भी, दोनों एक दूसरे का सम्मान भी करते थे. नंद कुमार बघेल अपने को भूपेश बघेल का गर्वित पिता कहते थे. एक पिता-पुत्र के इस विडंबना भरे रिश्ते को समझ पाना आसान नहीं है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)