छत्तीसगढ़: सीएम भूपेश बघेल का अपने पिता से क्यों है विवाद

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ में 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, कांग्रेस पार्टी ने अपने पदाधिकारियों और विधायकों को एक परिपत्र जारी कर चेतावनी दी थी कि अगर किसी भी कांग्रेसी ने, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल के साथ, किसी भी गतिविधि में हिस्सा लिया तो उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.
असल में तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल के घर में ही, उनके पिता नंद कुमार बघेल न सिर्फ़ अपनी तरफ़ से चुने गए कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों की लगातार बैठकें कर रहे थे, बल्कि प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कांग्रेस सरकार बनाने का फ़ॉर्मूला भी तय कर रहे थे.
इसके बाद कांग्रेस पार्टी को इस मामले में सफ़ाई देनी पड़ी थी कि नंद कुमार बघेल कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य भी नहीं हैं और न ही उनको कांग्रेस पार्टी की ओर से किसी भी प्रकार की गतिविधि संचालित करने के लिए अधिकृत किया गया है.
अब एक बार फिर, जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निकटवर्ती कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने वहां पिछले कई महीनों से प्रशिक्षण से लेकर चुनाव की रणनीति तक का कामकाज संभाला है, तब नंद कुमार बघेल को उत्तर प्रदेश में ही ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ कथित रुप से आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में छत्तीसगढ़ की पुलिस ने गिरफ़्तार कर, जेल भेज दिया है.
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुलिस के मामला दर्ज करने से पहले ही एक बयान में कहा था, ''एक पुत्र के रूप में मैं अपने पिता का सम्मान करता हूँ लेकिन एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी ऐसी किसी ग़लती को माफ़ नहीं किया जा सकता, जो सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने वाली हो.''
राज्य में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष विष्णुदेव साय भी राज्य सरकार की इस कार्रवाई पर संतोष जता रहे हैं. विष्णुदेव साय ने कहा, "कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से ही बघेल लगातार देश-धर्म-जातियों के ख़िलाफ़ भड़काऊ और उकसावे वाली बयानबाज़ी करते रहे थे. इस समय कारवाई के लिए हरी झंडी दिखाने के भले अलग सियासी कारण हों, फिर भी इस कार्रवाई पर संतोष व्यक्त किया जा सकता है."
वहीं, राज्य के वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध का कहना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके पिता नंद कुमार बघेल, वैचारिक तौर पर पिछले कई सालों से दो छोर पर खड़े रहे हैं और नंद कुमार बघेल ने कई अवसरों पर भूपेश बघेल के लिए असहज स्थिति पैदा की है.
ताज़ा घटनाक्रम में, जब जेलों में कोरोना संक्रमण का ख़तरा बना हुआ है, तब भूपेश बघेल ने शुगर के मरीज़, 86 साल के अपने पिता के ख़िलाफ़ मामला दर्ज ना करने या उन्हें जेल जाने से बचाने की कोई कोशिश नहीं की.
दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं, "पिता के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करना और उन्हें जेल भेजना, भाई-भतीजावाद की नींव पर टिकी आज की राजनीति में एक विलक्षण उदाहरण है. एक ईमानदार राजनीति कैसी हो सकती है, भूपेश बघेल ने उसका उदाहरण पेश किया है. छोटे से छोटा नेता भी अपने प्रभाव का दुरुपयोग करता है और बड़े-बड़े मामलों में अपने परिजनों को बचा ले जाता है. लेकिन मुख्यमंत्री के पिता की गिरफ़्तारी और उन्हें जेल भेजे जाने की इस घटना को राजनीति में शुचिता के बचे होने की तरह भी देखा जाना चाहिए."

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ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी
86 साल के नंद कुमार बघेल चाणक्य, राहुल सांकृत्यायन और पंडित जवाहरलाल नेहरु को अपना आदर्श बताते रहे हैं. कभी सर्वोदय आंदोलन से जुड़े रहे नंद कुमार बघेल ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी भाग लिया. बाद के दिनों में वो कई सामाजिक आंदोलनों से जुड़े रहे.
1984 में उन्होंने जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में दुर्ग लोकसभा से चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.
बसपा और जनता दल से जुड़े रहे नंद कुमार बघेल की पहचान, पिछड़े वर्ग के कट्टर समर्थक और ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी नेता के तौर पर रही है और अपनी सैद्धांतिक लड़ाइयों को लेकर वे बेहद गंभीर माने जाते हैं.
नंद कुमार बघेल के समर्थक उन्हें 'छत्तीसगढ़ का पेरियार' कहते हैं.

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नंद कुमार बघेल अपने को कांग्रेस पार्टी का समर्थक बताते रहे हैं. लेकिन राज्य में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के ख़िलाफ़ अभियान चलाने और चुनाव में उनके ख़िलाफ़ प्रचार करने के लिए भी नंद कुमार बघेल की पहचान रही है.
उनकी अपनी संस्था 'मतदाता जागृति मंच' चुनाव में तरह-तरह के अभियान चलाती रही है.
भूपेश बघेल के विधानसभा क्षेत्र पाटन के अमलेश्वर के महेश चंद्राकर बताते हैं कि 2014 में जब अजीत जोगी महासमुंद से चुनाव लड़ रहे थे तो नंद कुमार बघेल ने उनके ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार करने की घोषणा की.
चंद्राकर कहते हैं, "भूपेश बघेल के लिए ये अजीब स्थिति थी. उन्होंने अपनी मां से कहा कि पिताजी को किसी भी हालत में नक़द पैसे न दिए जाएं. इसके अलावा गांव के सारे ड्राइवरों को कहा गया कि वे किसी भी हालत में पिता की गाड़ी ड्राइव न करें. लेकिन नंद कुमार बघेल अपने बेटे की सारी कोशिशों को धता बता कर जोगी के ख़िलाफ़ पिछड़ा वर्ग की सभा लेने के लिए महासमुंद पहुँच ही गए."
नंद कुमार बघेल लगातार यह दोहराते रहे हैं कि वे एक बुद्धमय भारत चाहते हैं.
कुछ महीने पहले एक आयोजन में उन्होंने कहा था, "ईश्वरवाद झूठ है. ईश्वर की आड़ में इस देश में एक पाखंड चलता रहा है, जिसमें ब्राह्मण अपना हित साधते रहते हैं. देवी-देवता और पत्थर की मूर्तियां हमारी समस्याओं का हल नहीं कर सकतीं. हमें तो बुद्ध की तरह अपने विवेक पर भरोसा करना पड़ेगा."

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'रावण को मत मारो'
रावण को पूजनीय बताने वाले नंद कुमार बघेल ने राज्य बनने के कुछ महीने बाद ही 'रावण को मत मारो' नाम से एक पुस्तक लिख कर सनसनी फैला दी थी.
236 पन्ने की इस किताब में आर्यों का आगमन, शूद्रों को ज्ञान बांटने, मनु की जाति व्यवस्था, यज्ञ कर्म, श्राद्ध कर्म, तुलसीदास, रावण, कबीर, वेद, रामायण जैसे विभिन्न मुद्दों की सर्वथा भिन्न दृष्टिकोण से व्याख्या की गई थी. 100 रुपये की इस किताब का पहला संस्करण ही 3000 प्रतियों का था. लेकिन किताब का राज्य में भारी विरोध हुआ.
कांग्रेस पार्टी की सरकार ने भी इस किताब को आपत्तिजनक माना और तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के आदेश के बाद 20 अक्टूबर 2001 को इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया और नंद कुमार बघेल को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया.
उनके बेटे भूपेश बघेल तब कांग्रेस पार्टी की इस सरकार में राजस्व, पुनर्वास, राहत कार्य व लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री थे.
हालांकि, 2001 में ही नंद कुमार बघेल ने इस प्रतिबंध के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की. लेकिन 17 सालों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने किताब पर प्रतिबंध को सही मानते हुए नंद कुमार बघेल की याचिका ख़ारिज कर दी.

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अपने मुख्यमंत्री बेटे के साथ विवाद
आर्थिक रुप से पिछड़े सवर्णों को 10 फ़ीसद आरक्षण दिए जाने का विरोध करने वाले नंद कुमार बघेल शुरु से कहते रहे हैं कि समाज में जिस वर्ग का जितना प्रतिनिधित्व है, उसे उतना ही आरक्षण दिया जाना चाहिए. वे विधानसभा और लोकसभा की टिकट भी इसी आधार पर दिए जाने को लेकर आंदोलन चलाते रहे हैं.
दिसंबर 2018 में बेटे भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद कई अवसरों पर उन्होंने ब्राह्मण विधायक, मंत्री यहां तक कि उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता तक की सार्वजनिक रुप से यह कहते हुए आलोचना की है कि इनके कारण राज्य के पिछड़े वर्ग को न्याय नहीं मिल रहा है.
उन्होंने भूपेश बघेल से एक बार सार्वजनिक मंच पर यह माँग रख दी कि बस्तर के इलाक़े में सारे सवर्ण अफ़सरों को बर्ख़ास्त किया जाए और उनकी जगह पिछड़े वर्ग के अधिकारियों की नियुक्ति की जाए.
भूपेश बघेल की सरकार ने भाजपा और संघ के 'राम वन गमन सर्किट' को आधार बनाकर जब राज्य में ये योजना शुरू की तो नंद कुमार बघेल उसके ख़िलाफ़ भी खड़े हुए. राज्य सरकार की अरबों रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना में एकाध जगह उन्होंने समर्थकों के साथ पहुँच कर सरकारी बोर्ड भी उखाड़ दिए.
नंद कुमार बघेल ने इस मुद्दे पर बीबीसी से बातचीत में कहा था, "ऐसा कोई पथ नहीं है, यह केवल ब्राह्मणों के दिमाग़ की उपज है और संघ का एजेंडा है. मैंने आदिवासी इलाक़ों का दौरा किया है. उन इलाक़ों में अपार जड़ी-बूटी है. अगर भूपेश बघेल को कुछ करना ही है तो इस इलाक़े में रिसर्च सेंटर बनाएं, जिससे दुनिया को उसका लाभ मिले. इस राम मंदिर और राम वन गमन पथ से किसको लाभ होगा?"
आदिवासी इलाक़ों में हर साल रावण दहन का विरोध करने वाले नंद कुमार बघेल किसी भी तरह की मूर्ति पूजा या व्यक्ति पूजा के ख़िलाफ़ हैं. वे कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने हमेशा से भूपेश बघेल को कहा कि मेरे सुझाव या आदेश को मानने की ज़रुरत नहीं है, जो उनका विवेक कहे, उसी के अनुरूप व्यवहार करें.
लेकिन इन राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों ने कई बार पारिवारिक फ़ैसलों को भी प्रभावित किया है.
जुलाई 2019 में जब नंद कुमार बघेल की पत्नी यानी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मां का निधन हुआ तो बौद्ध धर्म अपना चुके नंद कुमार बघेल उनका अंतिम संस्कार बौद्ध रीति रिवाज से करने को लेकर अड़ गये.
भूपेश बघेल ने अपनी मां का अंतिम संस्कार हिंदू विधि-विधान से किया और नंद कुमार बघेल बड़ी मुश्किल से अंतिम समय में इस आयोजन में शामिल हुए.
बाद में नंद कुमार बघेल ने अपने गांव में दूसरे समस्त संस्कार कार्यक्रम, बौद्ध मत के अनुसार संपन्न किए.
यहां तक कि नंद कुमार बघेल बहुत पहले अपने अंतिम संस्कार को लेकर भी घोषणा कर चुके हैं कि उनका अंतिम संस्कार बौद्ध रीति रिवाज़ से, उनके साथ बौद्ध धर्म अपना चुके छोटे बेटे ही करेंगे.
फ़िलहाल तो रायपुर में नंद कुमार बघेल की निःशर्त रिहाई की माँग को लेकर प्रदर्शन की शुरुआत हो चुकी है और राज्य के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे प्रदर्शन की तैयारियां शुरु हो गईं हैं.
दूसरी ओर नंद कुमार बघेल साफ़ कर चुके हैं कि वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे और अपने लिए ज़मानत याचिका लगाने का उनका कोई इरादा नहीं है. ऐसे में नंद कुमार बघेल की रिहाई किस तरह संभव होगी, इस पर सबकी नज़रें बनी रहेंगी.
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