अवैध प्रवासियों को अमेरिका से निकालने का प्लान बनाने वाले 'मास्टरमाइंड' को जानिए

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- Author, एटाहौल्पा अमेराइज़
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सबसे कठोर आप्रवासन नीति के पीछे अगर कोई मास्टरमाइंड है तो वह हैं स्टीफन मिलर.
39 साल के इस धुर कंज़र्वेटिव रिपब्लिकन ने ट्रंप के पहले प्रशासन में कई कड़े नियम बनाए थे जैसे आप्रवासी परिवारों को अलग करना.
व्हाइट हाउस में मिलर ने अपनी ताक़त और रुतबे को और बढ़ा लिया है. वह अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और नीतिगत मामलों के डिप्टी डायरेक्टर हैं.
ट्रंप ने अपना दूसरा कार्यकाल जिस दिन संभाला, उसी दिन उन्होंने जिन कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए उन पर मिलर के हस्ताक्षर पहले से मौजूद थे. इन आदेशों में थे- जन्मसिद्ध नागरिकता को ख़त्म करना और दक्षिणी सीमा पर राष्ट्रीय इमरजेंसी घोषित करना.

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ये क़दम उस कट्टर राष्ट्रवादी नज़रिए को प्रतिबिंबित करता है, जिसे इस रिपब्लिकन सदस्य ने 'ट्रंपिज़्म' की शुरुआत से ही ज़ोर-शोर से आगे बढ़ाया था. वह मीडिया में अपने प्रस्तावों के बचाव को लेकर बहुत सक्रिय रहे.
उन्होंने बुधवार को फॉक्स न्यूज़ से कहा, "हम इस देश को इस कब्ज़े से बचाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप के कमांड और निर्देश के तहत संघीय बलों के पूरी ताक़त का इस्तेमाल करेंगे."
स्टीफन मिलर को व्हाइट हाउस में सबसे कठोर, निडर और रुतबे वाला शख़्स माना जाता है.
सत्ता तक उभार

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1985 में कैलिफ़ोर्निया के सैंटा मोनिका में एक यहूदी परिवार में जन्मे मिलर, कंज़र्वेटिव शख़्सियतों और मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों से प्रभावित थे और अपनी युवा अवस्था से ही उन्होंने राजनीति में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी थी.
16 साल की उम्र में ही उन्होंने एक स्थानीय अख़बार में चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने हाई स्कूल में देशप्रेम की कमी की आलोचना की थी. उन्होंने खुद को एक कंज़र्वेटिव एक्टिवस्ट के रूप में प्रस्तुत किया और तर्क दिया कि लैटिन मूल के छात्रों को क्लास में केवल अंग्रेज़ी बोलनी चाहिए.
उनका राजनीतिक प्रशिक्षण ड्यूक यूनिवर्सिटी में हुआ था, जहां से वो 2007 में राजनीतिक विज्ञान से ग्रेजुएट हुए.
कॉलेज के लैक्रोसी खिलाड़ियों के एक ग्रुप पर बलात्कार के आरोप लगे थे, मिलर उनके बचाव में मुखर होकर उतरे. आखिरकार ये खिलाड़ी निर्दोष साबित हुए, इससे मिलर को मीडिया की नज़रों में आने का मौका मिला.
यही वह समय था जब उन्होंने एक जाने-माने गोरे वर्चस्ववादी रिचर्ड स्पेंसर जैसे विवादास्पद शख़्सियतों से खुद को जोड़ना शुरू किया. हालांकि उन्होंने इससे इनकार किया कि उनके बीच कभी क़रीबी रिश्ता था.

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ग्रेजुएट होने के बाद, उन्होंने कांग्रेस में रिपब्लिकन सदस्यों के कम्युनिकेशन सलाहकार के रूप में काम किया और 2009 में उन्होंने तत्कालीन सीनेटर जेफ़ सेशंस का साथ पकड़ा, जोकि आप्रवासन के मुद्दे पर कट्टर रुख़ रखने के लिए जाने जाते हैं.
सेशंस के मातहत मिलर ने 2013 में आप्रवासन सुधार विधेयक का विरोध करने में केंद्रीय भूमिका निभाई और खुली सीमा की नीतियों के एक विरोधी के रूप में अपनी छवि को और मजबूत किया.
साल 2016 में वह एक नीतिगत सलाहकार और भाषण लिखने वाले के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुनाव प्रचार अभियान का हिस्सा बने.
ट्रंप के राष्ट्रवादी और आप्रवासन विरोधी लहज़े का श्रेय मिलर को दिया जाता है, उदाहरण के लिए ट्रंप का 2017 का शपथ ग्रहण भाषण, मुस्लिम बहुल देशों पर आप्रवासन प्रतिबंध और अनियमित प्रवासियों के परिवारों को अलग करना.
अख़बार पॉलिटिको के अनुसार, यह ट्रंप के विज़न की व्याख्या करने और उसे बढ़ाने की मिलर की क्षमता की ही देन थी जिसने 2017 से 2021 के बीच ट्रंप की पहली सरकार में एक ज़रूरी शख़्सियत के तौर पर उनकी स्थिति को मजबूत किया.
इसके बाद से मिलर को, आप्रवासन के प्रति अपने कट्टर नज़रिए और भयंकर विवादास्पद विचारों को ठोस नीतियों में तब्दील करने की उनकी क्षमता के लिए जाना जाने लगा.
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इस रिपब्लिकन एडवाइज़र ने गोपनीयता में काम करने और आंतरिक विरोधों से बचने की रणनीति में महारत हासिल कर ली, जिसने उन्हें 'ट्रंपिज़्म' के सबसे कट्टर क़दमों में से कुछ को लागू करने में मदद की.
क्या थी रणनीति?

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अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप ने आप्रवासन एजेंडे पर मिलर को, 'बॉर्डर ज़ार' टॉम हॉमैन के साथ मुख्य नीति निर्धारक बनाकर उन्हें और अधिक ताकतवर बनाया.
नीतिगत मामलों के डिप्टी डायरेक्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में मिलर ने ट्रंप के आप्रवासन एजेंडे को लागू करने के लिए कई कार्यकारी आदेशों का मसौदा तैयार करने की अगुवाई की, जिसमें अवैध प्रवासियों के आने पर रोक और अमेरिकी धरती पर पहले से मौजूद रहने वालों को प्रत्यर्पित करने का वादा किया गया है.
इन आदेशों में से एक है जन्म आधारित नागरिकता को ख़त्म करना. यह एक ऐसा क़दम है जो अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन में गारंटी दिए गए ऐतिहासिक अधिकार को नकारता है और इसे कोर्ट में चुनौती भी दी गई है.
उन्होंने टाइटल 42 को बहाल किया, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के नाम पर मेक्सिको बॉर्डर को बंद करने और साथ ही दक्षिणी सीमा पर राष्ट्रीय इमरजेंसी घोषित करने की इजाज़त देता है.
जानकारों का कहना है कि यह प्रत्यर्पण कार्रवाईयों को अंजाम देने के लिए अभूतपूर्व सैन्यीकरण को सही ठहराने के लिए किया गया है.
उन्होंने शरण मांगने वाले आवेदनों को रद्द कर दिया है. साथ ही और शरणार्थियों के प्रवेश से इनकार कर दिया है और ड्रग कार्टेल को 'विदेशी आतंकी संगठन' घोषित कर दिया है.

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एक साथ कई सारे आदेशों को जारी करने को कुछ जानकार 'सेचुरेशन स्ट्रैटेजी' कहते हैं और उनका मानना है कि इसके पीछे भी मिलर ही मास्टरमाइंड हैं- विपक्ष और मीडिया की प्रतिक्रिया को दबा देने और उन आदेशों को और असरदार बनाने के लिए कार्यकारी आदेशों की लगातार स्ट्रीमिंग की बाढ़ ला देना.
पॉलिटिको कहता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने नई नीतियों की रक्षा करने के लिए न्याय मंत्रालय पर भरोसा नहीं किया. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जितना संभव हो, कम से कम क़ानूनी बाधाओं के साथ इन्हें लागू किया जा सके. इसके लिए उन्होंने बाहरी वक़ीलों से मदद ली.
इस तरह का नज़रिया दिखाता है कि मिलर ने ट्रंप के पहले कार्यकाल से सबक लिया है, जब यात्रा प्रतिबंध जैसे क़दमों को क़ानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ा था.
अपने होमवर्क के अलावा, मिलर ने सरकार से बाहर प्रभावशाली शख़्सियतों से रणनीतिक संबंध स्थापित किए हैं, जैसे उद्योगपति एलन मस्क, जिन्होंने हाल ही में आप्रवासन को लेकर अपने नज़रिए को और कड़ा कर लिया है.
ट्रंप के नए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने ही कंज़र्वेटिव लीगल ऑर्गेनाइजेशन 'अमेरिका फ़र्स्ट लीगल' बनाया है, जो अवैध आप्रवासन को बढ़ावा देने या शह देने की अभियुक्त संस्थाओं और संगठनों के ख़िलाफ़ मुकदमों और मीडिया प्रचार अभियान को बढ़ावा देता है.
इस तरह, स्टीफन मिलर 'ट्रंपिज़्म' की सबसे कट्टर नीतियों के वास्तुकार ही नहीं हैं, बल्कि एक रणनीतिकार भी हैं, जिन्होंने इन्हें असरदार तरीक़े से लागू करने के दांवपेंच में महारत हासिल कर ली है.
ट्रंप के प्रति पूरी वफ़ादारी

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2016 के राष्ट्रपति चुनाव प्रचार अभियान के दौरान से ही, स्टीफन मिलर ने डोनाल्ड ट्रंप के प्रति अडिग वफ़ादारी दिखाई है और उनके सबसे क़रीबी और सबसे निःस्वार्थ दोस्त बन गए.
मिलर ने ट्रंप की टीम को तब ज्वाइन किया था जब उन्हें व्हाइट हाउस की रेस में गिना भी नहीं जाता था, और उनके कुछ शुरुआती भाषण भी लिखे थे. उन्होंने उनके लोकलुभावन और राष्ट्रवादी लहज़े को सफलतापूर्वक आकार दिया और बढ़ाया.
न्यूयॉर्क टाइम्सके अनुसार, ट्रंप के पहले कार्यकाल में, मिलर ने व्हाइट हाउस के अंदरूनी विवादों में शामिल होने से परहेज़ किया और प्रशासन के सबसे कट्टर और उदारवादी दोनों तरह के लोगों से अच्छे रिश्ते बनाए.
लेकिन ट्रंप के घेरे से बाहर जाने वाले किसी भी व्यक्ति का उन्होंने कभी पक्ष नहीं लिया, जैसा जेफ़ सेशंस के मामले में हुआ, जोकि उनके पूर्व गुरु और सीनेट में उनके बॉस थे.
2017 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति के साथ मनमुटाव के चलते एटार्नी जनरल के पद से सेशंस ने इस्तीफ़ा दिया, मिलर ने लीडर के प्रति अपनी वफ़ादारी को बदलने में कोई हिचक नहीं दिखाई और अपने पूर्व सहयोगी से दूरी बनाने में संकोच नहीं किया.
यह पूर्ण वफ़ादारी उनकी उस इच्छा में भी दिखाई देती है जब वो बिना किंतु परंतु के ट्रंप का आदेश मानने को तैयार दिखते हैं, ख़ासकर सार्वजनिक रूप से.
पोलिटिको के अनुसार, मिलर निजी बैठकों में भी कभी राष्ट्रपति की किसी बात को नहीं काटते हैं और ट्रंप जो भी फैसला लेते हैं, तेज़ी से उसके अनुसार खुद को ढाल लेते हैं. यही कारण रहा कि पहले कार्यकाल के दौरान कैबिनेट में कई बार हुए बदलावों और पार्टी के अंदर विवाद में वो खुद को बचाने में सफल रहे.
बेशक, मिलर ने लगातार सबसे विवादास्पद थ्योरी का समर्थन किया है कि 2020 में जो ट्रंप के ख़िलाफ़ बाइडन का चुनाव जीतना धांधली थी.
एक विभाजनकारी शख़्सियत

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डोनाल्ड ट्रंप के पहले और दूसरे कार्यकाल में स्टीफन मिलर द्वारा डिज़ाइन की गईं नीतियां, अमेरिकी राजनीति और समाज में तगड़ा विभाजन पैदा करती हैं.
उनके विरोधियों के लिए, जिनमें डेमोक्रेटिक जनप्रतिनिधि और मानवाधिकार संगठन हैं, उनका एजेंडा अमेरिका के बुनियादी सिद्धांतों और इसके सबसे कमज़ोर समुदायों पर एक सीधा हमला है.
अमेरिकन सिविल लिबर्टी यूनियन (एसीएलयू) और सदर्न पॉवर्टी लॉ सेंटर जैसे ग्रुप, इन नीतियों को चरम और भेदभावपूर्ण मानते हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने कुछ विश्लेषकों से बात की, जिसमें उन्होंने चेताया था कि मिलर द्वारा आगे बढ़ाई गईं नीतियां, आप्रवासन मुद्दे को संभालने के अमेरिकी तरीक़े में बड़ा बदलाव ला सकती हैं.
जैसे कि प्रवासियों के लिए दरवाज़े बंद करना, जोकि शरणार्थियों और शरण मांगने वालों के लिए ऐतिहासिक रूप से खुला रहा है.
आलोचकों का मानना है कि संभावित प्रत्यर्पण और सीमा का सैन्यीकरण, मेक्सिको जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में तनाव पैदा करेगा और एक नए मानवीय संकट को दावत देगा.
हालांकि ट्रंप समर्थकों के लिए वह एक दूरदर्शी रणनीतिकार हैं जिन्होंने आप्रवासन नीतियों को राष्ट्रवादी और कट्टर नज़रिए के साथ दोबारा परिभाषित किया है, जोकि अमेरिकियों की सुरक्षा और भलाई की रक्षा करेगा.
हालांकि आख़िर में उनकी विरासत का क्या असर होता है, वो आने वाला समय बताएगा.
लेकिन मिलर द्वारा डिज़ाइन की गई और आगे बढ़ाई नीतियों का असर यह है कि लाखों आप्रवासियों का भविष्य अधर में लटक गया है और इन नीतियों के अगले चार साल तक विवादास्पद रहने की संभावना है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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