अमेरिका का डब्ल्यूएचओ से अलग होना क्या भारत के लिए बुरी ख़बर है?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए
डब्ल्यूएचओ

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालते हुए कह दिया कि अमेरिका डब्ल्यूएचओ से अलग हो जाएगा.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से अलग होने के अमेरिका के फ़ैसले को स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक झटके की तरह देख रहे हैं.

उनका मानना है कि अमेरिका के पीछे हटने से डब्ल्यूएचओ की ओर से दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर असर होगा, जिसके लिए यह संगठन अपने बनने के साल 1948 से जाना जाता रहा है.

जन स्वास्थ्य से जुड़े हलकों में इस बात पर सहमति है कि भारत को महामारी से निपटने की तैयारियों, टीबी, एड्स, रोगाणुओं और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर निगरानी समेत कई अन्य कार्यक्रमों पर ज़्यादा ख़र्च करने के लिए तैयार रहना होगा.

पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन के पूर्व प्रमुख डॉक्टर के श्रीनाथ रेड्डी जैसे जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ अमेरिका के डब्ल्यूएचओ से बाहर निकलने को 'चीन के लिए बड़े अवसर' के तौर पर देखते हैं.

रेडलाइन

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

रेडलाइन

अमेरिका डब्ल्यूएचओ को सबसे ज़्यादा फ़ंड करता रहा है. 2022-23 में अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ को 128 करोड़ डॉलर से ज़्यादा दिए. चीन के लिए यह अपना योगदान बढ़ाने के अवसर की तरह है.

हालांकि, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ और एक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन के एशिया-पैसिफ़िक निदेशक डॉक्टर एसएस लाल चीन को लेकर आशंकित हैं.

वो कहते हैं, "चीन के साथ दरअसल समस्या ये है कि वो जानकारियां साझा नहीं करता है जबकि अमेरिका ऐसा करता है."

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) से जुड़े रहे डॉक्टर रमन गंगाखेड़कर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "इस बात में कोई शक नहीं है कि वित्तीय रूप से इसका बड़ा असर पड़ेगा और इससे उबरने के लिए स्वेदशी फ़ंडिंग बढ़ानी होगी."

गंगाखेड़कर अभी सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए हैं.

अमेरिका पर भी पड़ेगा इसका असर

 डोनाल्ड ट्रंप

इमेज स्रोत, Reuters

इमेज कैप्शन, हालांकि ट्रंप ने बाद में ऐसे भी संकेत दिए कि वो अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार कर सकते हैं.

हालांकि, डॉक्टर रेड्डी और डॉक्टर लाल दोनों ही इस बात से सहमत हैं कि अमेरिका पर भी इसका असर पड़ेगा.

डॉक्टर रेड्डी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "एक-दूसरे पर निर्भर और एक-दूसरे से जुड़ी इस दुनिया में इस फ़ैसले का विपरीत असर न केवल दूसरे देशों पर पड़ेगा बल्कि अमेरिका पर भी इसका असर देखने को मिलेगा."

"डब्ल्यूएचओ सबसे बड़े योगदानकर्ता को खो रहा है. दूसरे देशों को अपना योगदान अब बढ़ाने के साथ ही साथ वैज्ञानिक सहयोग को भी आपस में बढ़ाने की ज़रूरत होगी."

डॉक्टर लाल ने बीबीसी हिंदी को बताया, "इस बात में कोई शक नहीं है कि दूसरे देशों के साथ अमेरिका भी प्रभावित होगा. इन दशकों में अमेरिका में संक्रामक बीमारियों के स्रोत को रोकने की कोशिशों से उसे खुद को भी फ़ायदा पहुंचा है. चाहे वो टीबी हो या इबोला क्योंकि वायरस या बैक्टीरिया ये नहीं जानते कि वो किस देश में प्रवेश कर रहे हैं."

बीबीसी

डॉक्टर रेड्डी का कहना है, "अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आत्मनिर्भरता अब एक नए उद्देश्य का रूप लेगा और कामकाज का भी एक नया रूप होगा."

अमेरिका के इस फ़ैसले के बारे में अफसोस जताते हुए डब्ल्यूएचओ ने अपने बयान में कहा, ''डब्ल्यूएचओ बीमारियों की मूल वजहों का पता लगाने के अलावा मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बनाकर और हेल्थ इमरजेंसी को रोकने और उनके बचाव के कदम उठाकर अमेरिकियों समेत पूरी दुनिया के लोगों के स्वास्थ्य का बचाव करता है और उन्हें सुरक्षा मुहैया कराता है."

"बीमारियां फैलने पर वो ऐसी ख़तरनाक जगह जाता है जहां दूसरे लोग नहीं जा सकते.''

भारत में डब्ल्यूएचओ का काम

डब्ल्यूएचओ

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर जनरल टेड्रॉस एडहॉनम गेब्रिएसस (बाएं) चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करते हुए - फ़ाइल फ़ोटो
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ की फंडिंग बंद करने के पीछे ये तर्क दिया कि इसने कोविड-19 महामारी को संभालने में बदइंतज़ामी दिखाई.

अमेरिका के आरोपों में कहा गया है कि डब्ल्यूएचओ के सदस्य देशों के पास अनुचित राजनीतिक प्रभाव था. अमेरिका से बहुत ज़्यादा पैसा लिया गया. ये अनुचित था.अन्य बड़े देशों जैसे चीन की तुलना में ये फ़ंडिंग काफी अधिक थी.

इसका मतलब ये है कि अमेरिका 12 महीनों के अंदर डब्ल्यूएचओ छोड़ देगा और इसके कामों के लिए पैसे देना बंद कर देगा. अमेरिका डब्ल्यूएचओ को सबसे ज़्यादा पैसा देता है.

डॉ. लाल कहते हैं कि भारत में डब्ल्यूएचओ का सबसे बड़ा लाभ 1999 में हुआ. उस साल वह पता करने में कामयाब रहा था कि भारत का राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम, इस बीमारी से संक्रमित सिर्फ़ 30 फ़ीसदी लोगों का ही इलाज कर पा रहा है.

इसके कुछ समय बाद इस पूरे कार्यक्रम की फ़ंडिंग का जिम्मा भारत सरकार ने ले लिया.

डॉ. लाल उस 16 सदस्यीय टीम का हिस्सा थे जिसका नेतृत्व थॉमस रिडेल कर रहे थे. थॉमस रिडेल बाद में सेंटर फ़ॉर डिसीज़ कंट्रोल, न्यूयॉर्क के निदेशक बने.

डब्ल्यूएचओ 194 देशों में होने वाली रिसर्च और वहां से मिले विशेषज्ञों की सलाह पर गाइडलाइंस बनाता है. इससे पता चलता है कि डब्ल्यूएचओ कहां तक फैला है.

डॉ. लाल कहते हैं, ''चाहे टीबी का मामला हो या एचआईवी का, केरल, तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल के जिलों में इसकी समान ग्लोबल नीतियां लागू होती हैं. तो इसका मतलब है कि भारत में वित्तीय पहलू से ज्यादा तकनीकी पहलू अधिक प्रभावित होगा."

"सरकारी सिस्टम हमेशा काम नहीं करता. इसलिए हमें यह देखने के लिए बाहरी व्यक्ति की ज़रूरत रहती है कि काम हो रहा है या नहीं.''

सटीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल

डब्ल्यूएचओ

इमेज स्रोत, Getty Images

संक्षेप में कहें तो ये है डब्ल्यूएचओ को जो अंतरराष्ट्रीय अनुभव मिलता है उसका इस्तेमाल हर देश के फ़ायदे के लिए होता है.

डॉ. लाल कहते हैं, ''वित्तीय और तकनीकी दोनों पहलू से हम पर असर पड़ेगा लेकिन दूसरे ग़रीब देशों की तुलना में हम बेहतर स्थिति में होंगे.''

डॉ. रेड्डी ने कहा, ''फिलहाल हमें ये देखने की ज़रूरत होगी कि क्या अमेरिका के पीछे हटने के एलान के बाद यूरोपियन यूनियन और चीन कोई बड़ा कदम उठाने की मंशा लेकर आगे बढ़ रहे हैं. वैसे ये चीन के लिए बड़ा अवसर होगा."

अमेरिका के क़दम से भारत पर कितना असर होगा इसका सही-सही अंदाजा तभी लगेगा जब डब्ल्यूएचओ फ़ंडिंग से जुड़े अंतिम आंकड़े पेश करेगा.

अगर डब्ल्यूएचओ हमारी सवालों का जवाब देता है तो हम इस स्टोरी में इसे अपडेट करेंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)