शिशु के दिल की धड़कन सामान्य थी, लेकिन कैसे पकड़ में आई दिल की एक दुर्लभ बीमारी

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए

गौतम (बदला हुआ नाम) की आवाज़ में ख़ुशी की खनक है क्योंकि हृदय प्रत्यारोपण के बाद उनका बेटा अब 'बोलने की भी कोशिश' कर रहा है.

गौतम के बेटे राहुल (बदला हुआ नाम, उम्र- क़रीब सात-आठ महीना) के लिए आवाज़ पर प्रतिक्रिया देना और बोलने की कोशिश करना या उसकी किलकारियां एक सामान्य बात थी. लेकिन उन्हें ऐसी बीमारी है जिसे कार्डियोलॉजिस्ट 'दुर्लभ' बताते हैं.

इस दुर्लभ बीमारी में राहुल का दिल, खून को अच्छे से पम्प तो करता है लेकिन दिल में पम्प करने के लिए पर्याप्त खून नहीं होता.

बेंगलुरु के नारायण हृदयालय में हर्ट फ़ेल्योर और ट्रांसप्लांट, पीडियाट्रिक और एडल्ट सीएचडी विभाग के प्रमुख डॉक्टर शशिराज ने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस बीमारी को 'रेस्ट्रिक्टिव कार्डियोमायोपैथी' कहते हैं और इस बीमारी में हर्ट फ़ेल्योर का ख़तरा होता है."

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राहुल का मामला एक ऐसा उदाहरण है जो बताता है कि मां पिता को क्यों अपने नवजात बच्चे के शारीरिक विकास की बहुत बारीक़ी से निगरानी करनी चाहिए.

33 साल के गौतम और 27 की उनकी पत्नी ने यही किया.

असल में, नन्हा राहुल बिस्तर पर बिना हाथ पैर हिलाए लेटा रहता था और उसका चेहरा भावहीन होता था.

यह देख कर गौतम और उनकी पत्नी परेशान हो गए और उसे डॉक्टर के पास ले गए.

पहली बार के संकेत क्या हैं?

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गौतम ने बीबीसी हिंदी को बताया, "जब वह सात-आठ महीने का था, हमने ध्यान दिया कि बच्चा चल नहीं रहा है. और वो अन्य सामान्य बच्चों की तरह भाव भंगिमा भी नहीं बना रहा है. कुछ समय बाद, हमने देखा कि उसका पेट फूल रहा था."

डॉक्टर ने गौतम को बताया कि उनके बच्चे के विकास में चार से पांच महीने की देरी हुई है.

गौतम कहते हैं, "उन्होंने हमें कुछ टेस्ट कराने को कहा और बच्चे में कुछ समस्या होने की बात बताई. उन्होंने ये भी संकेत दिया कि बच्चे को आरसीएम था लेकिन इसके बारे में और कुछ नहीं बताया, क्योंकि हम माता-पिता थे."

गौतम और उनकी पत्नी इस बीमारी की डायग्नोसिस को लेकर संतुष्ट होना चाहते थे. वो बेंगलुरु से अपने गृह राज्य झारखंड वापस गए और अपने फ़ैमिली डॉक्टर से सलाह ली, जिन्होंने पुष्टि की कि उनके 'बच्चे के दिल में समस्या' है.

कुछ और टेस्ट के लिए राहुल को उसके माता-पिता नारायण हृदयालय में भर्ती कराया था. उसी दौरान राहुल के शरीर से पानी निकालना पड़ा था.

डॉक्टर ने गौतम और उनकी पत्नी को बताया कि इस बीमारी में बच्चे के पेट में पानी जमा होना आम बात है, इसका पूरा इलाज दिल के प्रत्यारोपण से संभव है.

गौतम बताते हैं, "एक सप्ताह बाद, राहुल का पेट दोबारा फूलने लगा और उसके शरीर में पानी इकट्ठा होना शुरू हो गया. उसी समय हमने हृदय प्रत्यारोपण (हार्ट ट्रांसप्लांटेशन) कराने का फै़सला कर लिया."

पानी क्यों इकट्ठा हो रहा था?

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डॉ. शशिराज ने कहा कि इस समस्या में बच्चे खाना पचा नहीं पाते हैं. उनमें सांस की दिक्कत शुरू हो जाती है और दबाव की वजह से फेफड़ों में पानी जमा होने लगता है.

उन्होंने कहा, "क्योंकि हृदय सामान्य दबाव महसूस नहीं कर पाता, इसलिए फेफड़े पर दबाव पड़ता है. जब ऐसा होता है तो बच्चे को सांस लेने में दिक्कत होती है. इसके बाद उसके पेट में पानी जमा होने लगता है."

डॉक्टर सबसे पहले इस तरह के लक्षणों के साथ आने वालों बच्चों का "इको टेस्ट कराते हैं, इससे रेस्ट्रिक्टिव मायोपैथी आसानी से पकड़ में आ जाता है."

डॉ. शशिराज कहते हैं, "जैसे ही लक्षण सामने आते हैं बीमारी तेज़ी से फैलने लगती है. यह बच्चों और किसी भी उम्र के वयस्कों में हो सकता है. लेकिन प्रत्यारोपण के बाद लगाया गया हृदय बच्चों में तेज़ी से शरीर के साथ तालमेल बिठा लेता है क्योंकि शरीर का प्रतिरोधक तंत्र उसे जल्द स्वीकार कर लेता है."

हृदय प्रत्योरोपण में एक और फ़ैक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

वो कहते हैं, "बिना प्रत्यारोपण के, छह महीने के अंदर मौत का ख़तरा 25 प्रतिशत के क़रीब होता है. इसका मतलब एक साल में, मान लीजिए इस दिल की बीमारी वाले 100 बच्चे हैं तो, आधे बच्चे वापस नहीं लौटते क्योंकि वे नहीं बच पाते."

अमेरिका के मायो क्लीनिक में सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. शशिराज ने अमेरिका में एक साल की बच्ची का हार्ट ट्रांसप्लांट किया था.

वह कहते हैं, "वह लड़की अब इंजीनियर है और अपने परिवार के साथ खुश है."

नवजात के लिए हृदय तलाशना कितना मुश्किल?

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दिल्ली के एम्स में कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. संदीप सेठ ने बीबीसी हिंदी को बताया, "एक बार जब ट्रांसप्लांट हो जाता है, तो नवजात शिशु या बच्चे के शरीर में दिल को स्वीकारने में कोई समस्या नहीं होती है."

डॉ. सेठ ने कहा कि नवजात शिशुओं में प्रत्यारोपण के लिए दिल तलाशने में मूल समस्या यह है कि "शिशुओं में अंगदान बहुत प्रचलित नहीं है."

उन्होंने कहा, "वयस्कों के मामले में, सबसे आम स्रोत एक्सीडेंट होते हैं. इस तरह के ट्रॉमा मामले शिशुओं में नहीं होते. ट्रांसप्लांट के लिए, आपको एक ऐसा शिशु चाहिए जो ब्रेन डेड हो और जिसका हृदय सामान्य रूप से काम करता हो. इसलिए शिशुओं में हृदय प्रत्यारोपण काफ़ी मुश्किल होता है."

हालांकि राहुल के मामले में बहुत इंतज़ार नहीं करना पड़ा. उसी अस्पताल में न्यूरोलॉजी की समस्या के लिए एक शिशु का इलाज़ हो रहा था. डॉक्टरों ने उस शिशु को ब्रेन डेड घोषित कर दिया था.

डॉ. शशिराज ने बताया, "यह एक ऐसी हालत है जिसमें कुछ नहीं किया जा सकता. इसके बाद ही काउंसिलिंग और स्थिति का आकलन करने जैसी प्रक्रिया शुरू हुई. ट्रांसप्लांट से पहले कर्नाटक के अंगदान क़ानून के तहत सारी प्रक्रियाएं पूरी की गईं."

प्रत्यारोपण के बाद का क्या प्रभाव होता है?

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राहुल के पिता गौतम बताते हैं, "बच्चा अब ठीक है. प्रत्यारोपण से पहले के मुक़ाबले हम लोग उसमें काफ़ी बदलाव देख रहे हैं. अब वो अपना सिर हिला पा रहा है और रेंगने की कोशिश कर रहा है. यहां तक कि वह खड़ा होने और चलने की भी कोशिश करने लगा है."

उन्होंने कहा, "अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद हम डॉक्टर से मिले. कुछ टेस्ट किए गए और वो सब ठीक निकले."

राहुल को लेकर गौतम सकारात्मक हैं. वो कहते हैं, "डॉक्टर ने हमें बताया था कि बच्चे में विकास के सभी संकेतकों के विकसित होने में कुछ वक़्त लगेगा. ऑपरेशन के बाद से ही राहुल में काफ़ी सुधार हो रहा है."

डॉक्टर ने गौतम और उनकी पत्नी को बताया था कि फ़रवरी तक ट्रांसप्लांट का असर दिखने लगेगा.

फ़िलहाल, उसे 13-14 दवाएं दी जा रही हैं, जिसमें विटामिन भी हैं. हो सकता है कि अगली बार ये दवाएं भी कम हो जाएं.

डॉक्टरों ने गौतम को बताया कि ये दवाएं मरीज़ के स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी हैं क्योंकि ये प्रत्यर्पित अंग के रिजेक्शन को रोकती हैं.

डॉ. शशिराज ने कहा, "इसीलिए किसी भी प्रत्यारोपण के बाद हमें ये दवाएं देनी पड़ती हैं, चाहे लीवर हो, किडनी या हार्ट."

वो कहते हैं, इससे बच्चे की वृद्धि और विकास में हुई देरी की भी भरपाई हो जाती है. और ऐसा "ट्रांसप्लांट के बाद तीन से छह महीने के अंदर" तेज़ी से होता है.

क्या वह एक सामान्य बच्चे की तरह बड़ा होगा?

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इस सवाल के जवाब में कि क्या एक प्रत्यर्पित अंग के साथ बच्चा अब एक सामान्य बच्चे की तरह बड़ा होगा, डॉ. शशिराज ने कहा, "हां, बिल्कुल. असल में, अगर बच्चा स्कूल जाने वाली उम्र में है तो हम ट्रांसप्लांट के तीन महीने के अंदर इसकी इजाज़त दे देते हैं."

हालांकि शिशुओं के हार्ट ट्रांसप्लांटेशन की सिर्फ एक समस्या है कि इसका कोई सुनियोजित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

पिछला हार्ट ट्रांसप्लांटेशन, एक पांच महीने के शिशु का कुछ महीने पहले दिल्ली में हुआ था.

डॉ. सेठ ने कहा, "इस बात के कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि भारत में कितने शिशुओं का हार्ट ट्रांसप्लांटेशन हुआ है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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