सूअर के हार्ट के इंसान में ट्रांसप्लांट से जुड़े नैतिक सवाल क्या हैं

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- Author, जैक हंटर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अमेरिका के रहने वाले डेविड बेनेट दुनिया के पहले ऐसे शख़्स बन गए हैं जिन्हें अनुवांशिक रूप से परिवर्तित सूअर का हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया है.
डॉक्टरों का कहना है कि 57 साल के बेनेट इतने बीमार थे कि उन्हें इंसान का हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता था. अब 7 घंटे के एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट के तीन बाद उनके सेहत में सुधार है.
इस सर्जरी की कई लोग तारीफ़ कर रहे हैं, ऐसा कहा जा रहा है कि इस चिकित्सकीय प्रयोग के बाद हार्ट ट्रांसप्लांट में जो वक्त लगता था उसे कम किया जा सकेगा. साथ ही ये दुनियाभर के मरीज़ों की ज़िंदगी बदल सकता है.
लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो सवाल कर रहे हैं कि क्या इस पूरी प्रक्रिया को नैतिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सकता है. ऐसे लोग मरीज़ों की सुरक्षा, पशु अधिकारों और धार्मिक चिंताओं की तरफ इशारा कर रहे हैं.
ऐसे में आख़िर सूअर से हुआ ये ट्रांसप्लांट कितना विवादास्पद है?

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चिकित्सा के नज़रिये से
यह एक एक्सपेरिमेंटल सर्जरी है जिससे मरीज को जोख़िम उठाना पड़ सकता है. यहां तक कि मेल खाने वाले ह्यूमन डोनर ऑर्गन को भी ट्रांसप्लांट के बाद शरीर नकार सकता है. ऐसे में जब बात जानवरों के अंगों की है तो ख़तरा बढ़ सकता है.
मिली-जुली सफलता के साथ दुनिया के कई देशों के डॉक्टर दशकों से जानवरों के अंगों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं. इसे 'ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन' कहा जाता है.
साल 1984 में कैलिफ़ोर्निया में एक बच्ची को बबून (लंगूर) का हार्ट ट्रांसप्लांट करके बचाने की कोशिश की गई थी, लेकिन 21 दिन बाद बच्ची की मौत हो गई.
इस तरह के उपचार बहुत जोख़िम भरे होते हैं, लेकिन कुछ मेडिकल नैतिकतावादी कहते हैं कि अगर मरीज़ को जोख़िम के बारे में पता है तो आगे बढ़ा जा सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड में प्रैक्टिकल एथिक्स के यूहीरो चेयर प्रोफ़ेसर जूलियन सैवलेस्क्यू कहते हैं, ''आप ये नहीं जान सकते हैं कि इलाज के तुरंत बाद मरीज़ मरने वाला है या नहीं, लेकिन जोख़िम उठाए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते.''
प्रोफ़ेसर सैवलेस्क्यू का कहना है कि ये अहम है कि उन्हें सभी उपलब्ध विकल्प दिए जाएं, जिसमें मैकेनिकल हार्ट सपोर्ट और ह्यूमन ट्रांसप्लांट भी शामिल है. डेविड बेनेट के केस में काम करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि ऑपरेशन सही इसलिए था क्योंकि मरीज़ के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था, इसके बिना मरीज़ की मौत हो जाती.
प्रोफ़ेसर सैवलेस्क्यू कहते हैं कि किसी भी सर्जरी से पहले ''बेहद सख़्त टिश्यू और नॉन-ह्यूमन ऐनिमल टेस्टिंग'' की प्रक्रिया से गुज़रना ही चाहिए, जिससे ये सुनिश्चित हो सके कि प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है.
डेविड बेनेट का ट्रांसप्लांट क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा नहीं था, जैसा कि एक्सपेरिमेंटल ट्रायल में आमतौर पर ज़रूरी होता है और जो दवाएं उन्हें दी गई थीं उनकी टेस्टिंग अब तक गैर-मानव प्राइमेट पर नहीं की गई थी.
लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेरीलैंड मेडिकल सेंटर की डॉक्टर क्रिस्टिन लाऊ कहती हैं कि डेविड बेनेट के इलाज की पूरी तैयारी में कोई कोताही नहीं बरती गई है.
क्रिस्टिन लाउ बेनेट की इलाज की प्रक्रिया में शामिल थीं, वो बीबीसी से कहती हैं, "हमने लैब में दशकों तक ऐसा किया है, हम उस बिंदु तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जहां हमें लगता है कि इसे इंसान को देना सुरक्षित है.''

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पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का विरोध
ह्यूमन ट्रांसप्लांट के लिए सूअरों के इस्तेमाल का विरोध कई पशु अधिकार समूह करते आए हैं. अब डेविड के इलाज ने इस बहस को नई हवा दे दी है.
ऐसे ही एक संगठन पीपल फ़ॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ़ ऐनिमल्स (PETA) ने बेनेट के इलाज के लिए सूअर के हार्ट के इस्तेमाल को "अनैतिक, ख़तरनाक और संसाधनों की बर्बादी" कहकर निंदा की है.
कैंपेनर्स का कहना है कि जानवरों को इंसानों जैसा बनाने के लिए उनके जीन में बदलाव करना ग़लत है. जिस सूअर का हार्ट बेनेट को ट्रांसप्लांट होना था, वैज्ञानिकों ने उस सूअर के 10 जीन बदल दिए, जिससे कि बेनेट का शरीर उसे नकार न दे. ऑपरेशन वाले दिन सूअर का हार्ट निकाल लिया गया.
यूके के पशु अधिकार समूह एनिमल एड के प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि उनका समूह 'किसी भी स्थिति में' जानवरों के जीन में बदलाव या ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन का विरोध करता है.
कुछ कैंपनेर्स को सूअरों में जो अनुवांशिक परिवर्तन किए जा रहे हैं उनके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर भी चिंताएं हैं.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोएथिक्स फ़ेलो डॉक्टर कैट्रिएन डेवॉल्डर का कहना है कि हमें अंगों के लिए जीन-एडिटेड सूअरों का इस्तेमाल केवल तभी करना चाहिए जब हम "ये सुनिश्चित कर सकें कि उन्हें अनावश्यक नुक़सान नहीं सहना होगा."
वो कहती हैं, "मांस के लिए सूअरों का इस्तेमाल करना जीवन बचाने के लिए करने से कहीं अधिक दिक्क़त की बात है, लेकिन निश्चित तौर पर ऐनिमल वेलफ़ेयर को भी नज़रंदाज नहीं किया जा सकता."

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धर्म का नज़रिया
एक और उलझन उन लोगों के लिए पैदा हो गई है जो इस ट्रांसप्लांट की प्रकिया को आस्था के नज़रिये से भी देखते हैं और उनकी आस्था के हिसाब से जानवरों का अंग ट्रांसप्लांट करना सही नहीं है.
दरअसल, सूअरों को इसलिए चुना जाता है क्योंकि संबंधित अंग, इंसानों के अंग के आकार के होते हैं. साथ ही सूअरों को रखना और नस्ल बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान होता है.
लेकिन, अब सूअरों का विकल्प यहूदी और मुस्लिम मरीज़ों को कैसे प्रभावित करता है जिनके धर्म में इस पशु को लेकर सख़्त नियम हैं.
वैसे तो यहूदी नियम-क़ानून सूअरों को पालने या खाने से मना करता है, लेकिन यूके हेल्थ डिपार्टमेंट के मोरल एथिकल एडवाइज़री ग्रुप (MEAG) के सीनियर रब्बी डॉक्टर मोशे फ़्रीडमैन कहते हैं कि सूअर के हार्ट का ट्रांसप्लांट कराना यहूदियों के नियम का उल्लंघन नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में रब्बी फ़्रीडमैन ने कहा, "यहूदी क़ानून में पहली चिंता इंसान की ज़िंदगी को बचाना है, एक यहूदी मरीज़ का एक जानवर से अंग प्रत्यारोपित किया जा सकता है अगर ये उसके ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है और भविष्य में उसे बेहतर ज़िंदगी दे सकता है.''
इस्लाम में भी ऐसा ही है कि अगर बात ज़िंदगी बचाने की हो रही है तो जानवरों के अंग के इस्तेमाल की अनुमति है.
मिस्त्र में धार्मिक आदेश जारी करने के लिए दार अल-इफ़्ता नाम की सरकारी संस्था है. इस संस्थान ने एक फ़तवे में कहा है कि सूअर के दिल के वॉल्व की अनुमति है अगर ''मरीज़ की ज़िंदगी ख़तरे में है, उसका कोई अंग ख़राब हो जाए, बीमारी के बढ़ने का डर हो या सेहत में भारी गिरावट आ रही हो.''
प्रोफ़ेसर सैवलेस्क्यु कहते हैं कि अगर कोई मरीज़ धार्मिक या नैतिक आधार पर जानवर के अंग के प्रत्यारोपण से मना कर देता है तो उसे मानव अंग दाताओं की प्रतीक्षा सूची में कम प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए.
वो कहते हैं, "कुछ लोग कह सकते हैं कि एक बार आपके पास एक अंग के लिए मौक़ा है तो आपको सूची में नीचे जाना चाहिए; दूसरे लोग ये भी कहेंगे कि आपके पास उतना ही अधिकार होना चाहिए जितना कि किसी और के पास है. ये सब सिर्फ़ पस्थितियां हैं जिन्हें हमें सुलझाना होगा.''
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