डॉ. पद्मावती: ‘मदर ऑफ़ कार्डियोलॉजी’ की 103 वर्षों की सार्थक जीवन यात्रा पूरी

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- Author, प्रदीप सरदाना
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले करीब 70 बरसों से भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में नित नए कीर्तिमान स्थापित करके शिखर पर पहुंची, पदमविभूषण डॉ. एस. पदमावती के निधन से एक युग का अंत हो गया है.
29 अगस्त की रात 103 बरस की उम्र में डॉ पद्मावती ने अपने उसी अस्पताल 'नेशनल हार्ट इन्स्टीट्यूट' में अंतिम सांस ली जिस अस्पताल को बनाना उनका बड़ा सपना था.
जो काम, जो नाम और जो सम्मान डॉ सिवारामाकृष्णा अय्यर पद्मावती को मिला वह बहुत ही गिने-चुने डॉक्टरों को मिला है. सही कहा जाये तो डॉ. बीसी रॉय के बाद यदि किसी भारतीय चिकित्सक ने सचमुच अपार प्रतिष्ठा पाई तो वो डॉ. पद्मावती ही हैं.
यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था कि 100 बरस की उम्र के बाद भी वह काफी सक्रिय थीं, प्रशासनिक कार्यों के साथ मरीज देखती थीं, लेख और किताबें लिखती थीं, शोधपत्र पढ़ती थीं, लोगों की मेल के जवाब देती थीं, योग करती थीं और यहाँ तक कि मेडिकल सेमिनारों में हिस्सा लेती थीं.
विश्व हृदय दिवस और अन्य मेडिकल कॉन्फ्रेंसों में उनका लेक्चर सुनकर देश के नामी-गिरामी डॉक्टर खुद को धन्य समझते थे.
डॉ पद्मावती कितनी फिट थीं इस बात का अंदाज़ इस बात से भी लगाया जाता है कि 95 बरस की उम्र तक तो वह नियमित रूप से स्वीमिंग भी करती थीं, उनकी फिटनेस और दिनचर्या देखकर अक्सर लगता था कि पद्मावती अभी कुछ समय तक मौत को मात देती रहेंगी लेकिन कोरोना ने उनकी सांसें छीन ली.

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रंगून में बनीं डॉक्टर
भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में अपने नए-नए शोध, नयी-नयी उपलब्धियों से नया इतिहास लिखने वाली डॉ. एस पद्मावती का जन्म 20 जून 1917 को रंगून में हुआ था. इनके पिता वहाँ मशहूर बैरिस्टर थे लेकिन पदमावती का सपना एक डॉक्टर बनने का था. पद्मावती शुरू से ही प्रतिभाशाली और पढ़ाई में होशियार थीं इसलिए अपनी पढ़ाई में आगे बढ़ते हुए उन्होंने रंगून विश्वविद्यालय से एमबीबीएस कर लिया.
दूसरे विश्व युद्द के दौरान वह तो सन 1942 में अपनी माँ दो भाई और दो बहनों के साथ भारत आ गईं लेकिन यह सब इतनी अफरातफरी में हुआ कि पद्मावती के पिता और एक भाई वहीं रह गए. भारत आगमन के चार बरस तक पद्मावती को यह पता नहीं था कि उनके पिता और भाई कहाँ हैं, जीवित भी हैं या नहीं, लेकिन बाद में उनका पता लगा और वह भारत आ गए, यहाँ आकर उनके पिता ने कोयंबटूर में वकालत भी की.
डॉ.पद्मावती की एक और बहन एस. जानकी भी डॉक्टर थीं लेकिन उनका अब कोई भी बहन-भाई जीवित नहीं है लेकिन यह दिलचस्प है कि उनकी माँ का निधन भी 105 वर्ष की उम्र में हुआ था. पद्मावती बताती थीं कि उनकी माँ कभी किसी को लंबी उम्र का आशीर्वाद नहीं देती थीं, वह बस कहती थीं कि सदा स्वस्थ रहो, यदि स्वस्थ रहेंगे तो उम्र अपने आप लंबी होगी.
डॉ पद्मावती अक्सर अपने माता-पिता की बहुत प्रशंसा करने के साथ उन्हें सम्मान भी बहुत देती थीं. वे कहती थीं, "उनके माता पिता खुले और आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति थे तभी मैं उस दौर में डॉक्टर बन सकीं."
"जब मैंने एक दिन डरते-डरते अपने पिता से तैराकी सीखने की इच्छा व्यक्त की तो उन्होंने ज़रा भी ना-नुकुर किए बिना, खुशी-खुशी मुझे तैराकी सीखने की अनुमति दे दी वरना उस दौर में दक्षिण भारतीय लड़की का स्वीमिंग सीखना तो दूर, स्वीमिंग के बारे में सोचना भी संभव नहीं था.''
जब पद्मावती के पिता बर्मा (अब म्यांमार) में रह गए तो उन्हीं की दी हिम्मत का असर था कि उसके बावजूद भी भारत लौटने पर उन्होंने अपना आत्मविश्वास नहीं खोया. पद्मावती को भरोसा था वे जरूर लौटेंगे क्योंकि उनके पिता एक बार पहले भी मौत के मुंह में जाते-जाते बच गए थे.
वह बताती थीं कि उनके जन्म से पहले सन 1912 में उनके पिता भी चर्चित जहाज टाइटैनिक में साउथैम्प्टन से अमरीका जाने वाले जहाज में यात्रा के लिए प्रस्थान करने वाले थे लेकिन पोर्ट तक पहुँचने के बावजूद अंतिम समय में वह जहाज़ पर सवार नहीं हो सके, जब कुछ दिन बाद टाइटैनिक एक चट्टान से टकराने पर डूब गया तो उन्होंने ईश्वर को शुक्रिया कहा.

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क्यों कहा जाता है 'मदर ऑफ कार्डियोलॉजी'
उन्हें 'मदर ऑफ कार्डियोलोजी ऑफ इंडिया' का खिताब भी आज के दौर के नामी हृदय रोग विशेषज्ञ और 'फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इन्स्टीट्यूट' के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ ने दिया था.
डॉ. सेठ से जब मैंने पूछा कि आप स्वयं 'कार्डियोलॉजी वर्ल्ड में एक बड़ा नाम हैं लेकिन आपने डॉ पद्मावती को यह 'खिताब' क्यों दिया? तो इस पर डॉ. सेठ ने कहा वह देश की पहली महिला कार्डियोलॉजिस्ट तो हैं ही, फिर उनका इस क्षेत्र में जो योगदान है, उतना योगदान किसी का नहीं है, हम सभी उन्हीं के दिखाये मार्ग पर ही आगे बढ़ रहे हैं."
डॉ. सेठ एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं- ''मैं कई बरस से इंग्लैंड में ही प्रैक्टिस करता था और मेरा भारत वापस आने का कोई इरादा नहीं था लेकिन करीब 7 बरस के अंतराल के बाद जून 1987 में, मैं कुछ दिन के लिए भारत आया तो मैंने देखा उस समय दिल्ली में एक ही प्राइवेट अस्पताल था 'नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट' जिसे डॉ पदमावती चला रही थीं."
"उनके नाम और काम के चर्चे मैंने सुने हुए थे इसलिए मैंने उनसे मिलने का समय मांगा तो उन्होंने मुझे अपने घर पर मिलने का समय दे दिया, अपनी आधे घंटे की बातचीत में उन्होंने मुझे एक सलाह दी कि तुम भारत वापस आ जाओ, यहाँ आकर चाहो तो मेरे साथ काम कर सकते हो.''
डॉ अशोक आगे बताते हैं, ''मुझे डॉ पद्मावती ने इतना प्रभावित किया कि मैं 1988 में भारत वापस आ गया हालांकि जब मैं वापस आया तो तब एस्कॉर्ट अस्पताल शुरू होने को था, तब मैं उस अस्पताल से जुड़ गया. मैंने चाहे डॉ पदमावती के साथ सीधे रूप से काम नहीं किया लेकिन मैं उन्हें अपना 'मार्गदर्शक' मानता रहा हूँ."
"डॉ पद्मावती मुझे जहां भी मिलती थीं, मैं उनके पैर छूता था, वह भी मेरी सफलता देखकर बहुत खुश होती थीं. साथ ही, इस बात पर भी गर्व करती थीं कि मैं उनकी सलाह मानकर भारत वापस आ गया. मैं मानता हूँ मेरी सफलता में उनका ही आशीर्वाद है.''
कैसे चमका पद्मावती का नाम
पद्मावती एमबीबीएस तो हो गईं थीं लेकिन उन्हें इससे संतुष्टि नहीं थी, इसलिए वह इसी क्षेत्र में आगे की पढ़ाई के लिए 1949 में लंदन और एडिनबरा चली गईं जहां से पद्मावती एफआरसीपी की डिग्री हासिल की, साथ ही वहाँ नेशनल हार्ट हॉस्पिटल में काम भी किया.
यहीं से उनके मन में दिल के रोगों के प्रति रुझान और बढ़ गया, उसके बाद कार्डियोलॉजी में और भी दक्षता प्राप्त करने के लिए उन्होंने अमरीका के जॉन्स हॉपकिंस और हार्वर्ड में फ़ेलोशिप के लिए आवेदन किया, और वह 1952 में अमरिका चली गईं जहां उन्हें उस समय के विश्व विख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ पॉल डुडले के साथ काम करने का मौका मिला.
भारत की प्रथम महिला हृदय रोग विशेषज्ञ बनकर जब वह दिल्ली पहुंची तो उनके नाम की चर्चा धीरे-धीरे सभी ओर होने लगी थी, यहाँ तक भारत की प्रथम और तत्कालीन स्वास्थ मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को भी जब उनकी योग्यता के बारे में पता लगा तो उन्होंने पद्मावती को अपने यहाँ बुलाया.
राजकुमारी अमृत कौर ने पहचाना प्रतिभा को
पद्मावती से मिलने पर अमृत कौर काफी प्रभावित हुईं और उन्होंने पद्मावती को शुरू में दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में लेक्चरर बनने का प्रस्ताव दे डाला, उनका प्रस्ताव मानकर सन 1953 से डॉ पद्मावती ने लेडी हार्डिंग कॉलेज से लेक्चरर के रूप में अपना करियर शुरू किया. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. जल्द ही वह इसी मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर बन गईं.
लेडी हार्डिंग में पद्मावती ने जहां उत्तर भारत की पहली कार्डियोलॉजी पैथ लैब खोली वहाँ 1954 में पहले कार्डियोलॉजी क्लीनिक की स्थापना भी कर दी, यहाँ यह भी दिलचस्प है कि महिलाओं का अस्पताल होने के बावजूद पद्मावती ने अपने प्रयासों से वहाँ पुरुषों को भी अलग से देखने की व्यवस्था करा दी, जिससे पुरुष रोगी भी इस सुविधा का लाभ उठा सकें.
अपने इन दो-तीन प्रयासों की सफलता से पदमावती रोगियों में लोकप्रिय होने लगीं लेकिन डॉ. पद्मावती का नाम एकदम सुर्खियों में तब आया जब 1966 में अपने प्रयासों से दिल्ली में 'वर्ल्ड कॉंग्रेस ऑफ कार्डियोलॉजी' का आयोजन कराने में सफलता प्राप्त कर ली.
इंदिरा गांधी भी करने लगी थीं पसंद
तब इंदिरा गांधी पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनी थीं, वह भी डॉ. पद्मावती के कार्यों से इतना प्रभावित हुईं कि सन 1967 में एस पद्मावती को पद्मभूषण से सम्मानित किया. साथ ही, इसी वर्ष इन्हें मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल में निदेशक भी बना दिया, बाद में वह जीबी पंत अस्पताल में कंसलटेंट कार्डियोलॉजी के साथ वहाँ की भी निदेशक बन गईं.
जीबी पंत अस्पताल में रहकर डॉ पद्मावती ने इतने बड़े-बड़े कार्य किए कि उन्हें आज तक नहीं भुलाया जा सका है, इन कार्यों में एक बड़ा काम यह था कि पंत अस्पताल में पद्मावती ने अपने प्रयासों से एम्स से भी पहले सन 1971 में उत्तर भारत का पहला सीसीयू बनवा दिया, साथ ही दिल के रोगियों के लिए 30 बिस्तर का पहला वातानुकूलित वार्ड भी वहाँ बनवा दिया.
साथ ही, मेडिकल के विद्यार्थी जीबी पंत अस्पताल में ही कार्डियोलॉजी में एमडी कर सकें इसके लिए पद्मावती ने वहाँ एमडी का पाठ्यक्रम भी शुरू करा दिया और शोध संस्थान के रूप में भी ज़ोर-शोर से कार्य शुरू किए गए.
डॉ. पद्मावती ने वहाँ रियूमैटिक बुखार को लेकर भी शोध करके इस रोग के उपचार तलाशे.

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25 लाख के कर्ज़ से शुरू किया था हार्ट इंस्टीट्यूट
इंग्लैंड के नेशनल हार्ट हॉस्पिटल में काम करते हुए ही पद्मावती के मन में यह बात कहीं घर कर गई थी कि अपने देश में वह इसी की तर्ज पर अपना एक ऐसा अस्पताल बनाएँगी इसलिए जब वह 1978 में अपनी सरकारी नौकरी से रिटायर हुईं तो उन्होंने अपने 'ब्रेन चाइल्ड' के लिए काम शुरू कर दिया.
पहले उन्होंने 'ऑल इंडिया हार्ट फाउंडेशन' की स्थापना की फिर अस्पताल बनाने की योजना पर काम शुरू किया.
देश के एक और जाने माने हृदय रोग विशेषज्ञ और नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ अनंत एस दवे इस अस्पताल की स्थापना के समय से ही पद्मावती के साथ जुड़े रहे हैं, वह भी डॉ पद्मावती को अपना गुरु मानते हैं.
डॉ अनंत दवे बताते हैं, ''मुझे याद है कि इस अस्पताल की ईस्ट ऑफ कैलाश में ज़मीन खरीदने के लिए डॉ पदमावती ने पंजाब नेशनल बैंक से पहले-पहल 25 लाख रुपए का कर्ज लिया था हालांकि बाद में बेनेट कोलमेन समूह से इन्दु जैन और उनके परिवार के सदस्य भी इस नेक काम में उनके साथ जुड़ गए. देखते-देखते अपने प्रयासों और अथक परिश्रम से पद्मावती जी ने इसे दिल्ली का एक प्रतिष्ठित हृदय रोग संस्थान बना दिया.''
डॉ. दवे यह भी बताते हैं कि डॉ. पद्मावती एक अच्छी डॉक्टर होने के साथ एक अच्छी प्रशासक भी थीं लेकिन बड़ी बात यह थी कि वह कभी गुस्सा नहीं करती थीं. अपने स्टाफ का बहुत ख्याल रखती थीं.
''साथ ही डॉ. पद्मावती चैरिटी के लिए भी बहुत काम करती थीं, उन्होंने अपनी बहन और अपने नाम से 'जानकी पद्मावती फाउंडेशन' नाम से एक ट्रस्ट बनाया था जिसके तहत गरीब बच्चों की दिल की निशुल्क सर्जरी के साथ गरीब लोगों के लिए मुफ्त पेसमेकर बैंक भी बनाया है.
अविवाहित रहीं पद्मावती
डॉ. एस पद्मावती ने अपना पूरा जीवन सेवा में लगाया, उन्होंने शादी नहीं की. उन्होंने इतनी सफलता और लोकप्रियता पाने के बाद विवाह क्यों नहीं किया, यह तो कभी नहीं बताया लेकिन वह इतना जरूर कहती थीं कि लड़कियों की शादी समय रहते कर देनी चाहिए.
नेशनल हार्ट इन्स्टीयूट की स्थापना के बाद से डॉ. पद्मावती बहुत खुश रहती थीं क्योंकि उनका बड़ा सपना पूरा होने के साथ अच्छी दिशा की ओर अग्रसर हो चुका था.
तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी पद्मावती को कितना पसंद करती थीं उसकी मिसाल इस बात से भी मिलती है कि उनके इस अस्पताल का उद्घाटन इंदिरा गांधी ने ही किया था.
डॉ. पद्मावती को उनकी अति विशिष्ट सेवाओं के लिए पदमभूषण के बाद 1975 में जहां डॉ बीसी रॉय जैसा प्रतिष्ठित सम्मान मिला, जिसको पाने की इच्छा बड़े बड़े चिकित्सक रखते हैं, साथ ही 1992 में पद्मावती को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया.
पिछले वर्ष जब डॉ. पद्मावती से मुलाक़ात हुई तो मैंने उनसे पूछा कि आपकी लंबी उम्र का राज़ जानने को मन करता है, इस पर वह हँसते हुए बोलीं - कोई खास राज नहीं है, बस अनुशासित जीवन जीती हूँ, खुश रहती हूँ और अपने काम में खुद को व्यस्त रखती हूँ और यदि कभी रिलैक्स करना होता है तो कर्नाटक संगीत सुनती हूँ.
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