चीन क्या वाकई पनामा नहर चलाता है, ट्रंप के दावों में कितना दम है?

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- Author, शॉन युआन
- पदनाम, ग्लोबल चाइना यूनिट, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
डोनाल्ड ट्रंप ने जब अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद पहला भाषण दिया तो उन्होंने फिर से ये दावा किया पनामा नहर का संचालन चीन कर रहा है.
उन्होंने कहा, "चीन पनामा नहर का संचालन कर रहा है और हमने इसे चीन को नहीं दिया था. हमने इसे पनामा को दिया और हम इसे वापस ले रहे हैं."
51 मील यानी 82 किलोमीटर लंबी पनामा नहर मध्य अमेरिका के बीचों-बीच बहती है और यह प्रशांत और अटलांटिक महासागर को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी है.
हर साल लगभग 14,000 जहाज़ इस नहर को एक शॉर्टकट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. इस नहर के बनने से पहले उन जहाज़ों को दक्षिण अमेरिका से होते हुए लंबा और महंगा सफ़र तय करना पड़ता था.

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डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा नहर के बारे में क्या कहा?

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ऐसा नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार अपने भाषण में ही इस मध्य अमेरिकी देश और इसके नहर का ज़िक्र किया हो.
लगभग एक महीने पहले क्रिसमस यानी 25 दिसंबर 2024 को ट्रंप ने इस बारे में एक सोशल मीडिया पोस्ट लिखा था.
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा था, "चीन के सैनिक प्यार से लेकिन अवैध तरीके से पनामा नहर को चला रहे हैं." हालांकि इस दावे को पनामा सिटी और चीन के अधिकारियों ने तुरंत ख़ारिज भी कर दिया था.
उस समय, पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने ट्रंप के दावे को "बकवास" बताते हुए ज़ोर देकर कहा था कि पनामा नहर में ज़रा भी चीनी दख़ल नहीं है.
इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा नहर से गुज़रने वाले अमेरिकी जहाज़ों से ली जाने वाली कथित 'मोटी' फ़ीस का हवाला देते हुए बल प्रयोग से नहर को वापस लेने की धमकी भी दी है. हालांकि इस दावे को भी पनामा के अधिकारियों ने ख़ारिज कर दिया है.
डोनाल्ड ट्रंप के भाषण के बाद पनामा के राष्ट्रपति मुलिनो ने एक बार फिर ज़ोर देकर कहा कि पनामा नहर में दुनिया के ऐसे किसी भी देश की मौजूदगी नहीं है जो इसके संचालन में दखल देता हो.
पनामा नहर एक रणनीतिक रूप से अहमियत रखने वाला जलमार्ग है. इसके जरिए लगभग पांच फ़ीसदी वैश्विक समुद्री व्यापार होता है. इसका संचालन पनामा नहर प्राधिकरण करता है ना कि चीनी सैनिक. पनामा नहर प्राधिकरण पनामा सरकार के ही अंतर्गत आता है.
हालांकि ट्रंप का गलत दावा नहर और उसके आस-पास बने ढांचों में चीन के बड़े निवेश पर कुछ अमेरिकी अधिकारियों की चिंताओं को भी दिखाता है.
क्या है पनामा नहर का इतिहास

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ऐतिहासिक रूप से अमेरिका ने प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर को जोड़ने वाली पनामा नहर के निर्माण और प्रशासन में अहम भूमिका निभाई है.
इस नहर को बनाने में फ़्रांस के असफ़ल रहने के बाद अमेरिका ने इस परियोजना को पूरा करने के अधिकार हासिल कर लिए. नहर का निर्माण साल 1914 में पूरा हुआ.
साल 1977 तक पनामा नहर का अधिकार अमेरिका के पास ही था. लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर इसे पनामा को सौंपने के लिए एक समझौते पर दस्तखत किए थे. डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को "मूर्खतापूर्ण" कहा है.
साल 1999 से ही पनामा नहर प्राधिकारण अकेले इस नहर का संचालन कर रहा है.
अमेरिका और पनामा के बीच हुई संधियों के प्रावधानों के मुताबिक ये जगह किसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं होगी. लेकिन समझौते के तहत नहर की तटस्थता को किसी भी तरह के ख़तरे से बचाव के लिए सैन्य बल इस्तेमाल करने का अधिकार अमेरिका के पास है.
चीन की भूमिका क्या है?
इसके कोई भी सबूत मौजूद नहीं हैं कि चीनी सरकार या चीनी सेना पनामा नहर के संचालन पर किसी भी तरह का नियंत्रण रखती है. लेकिन पनामा में चीनी कंपनियों की अच्छी-ख़ासी मौजूदगी ज़रूर है.
अक्तूबर 2023 से सितंबर 2024 तक पनामा से होकर गुज़रने वाले जहाज़ों में 21.4 फ़ीसदी माल चीन का था. चीन अमेरिका के बाद पनामा नहर का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करने वाला देश है.
हाल के वर्षों में चीन ने नहर के पास बंदरगाहों और टर्मिनलों में भी भारी निवेश किया है.
नहर से सटे पांच बंदरगाहों में से दो को साल 1997 से ही चीनी कंपनी हचिसन पोर्ट होल्डिंग्स की सहायक कंपनी संचालित कर रही है.
ये दो बंदरगाह हैं प्रशांत महासागर तट पर स्थित बाल्बोआ और अटलांटिक के तट पर स्थित क्रिस्टोबल बंदरगाह.
बंदरगाहों का संचालन करने वाली कंपनी सीके हचिसन होल्डिंग्स की सहायक कंपनी है, जो हांग कांग स्थित एक समूह है जिसकी स्थापना हांगकांग के व्यवसायी ली का-शिंग ने की थी.
यह कंपनी ब्रिटेन सहित दुनिया भर के 24 देशों में बंदरगाहों का परिचालन करती है.
सेंटर फ़ॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में अमेरिका प्रोग्राम के निदेशक रेयान बर्ग कहते हैं कि हालांकि यह चीन की सरकारी कंपनी नहीं है. लेकिन अमेरिका में इस बात से चिंताएं हैं कि चीन का इस कंपनी पर किस सीमा तक नियंत्रण है.
इन बंदरगाहों से गुज़रने वाले जहाज़ों से रणनीतिक रूप से अहम जानकारी भी गुज़रती है, जो बेहद उपयोगी हो सकती है.
रेयान बर्ग कहते हैं, "अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है जिसकी प्रकृति आर्थिक है. अगर सप्लाई चेन को लेकर कोई संघर्ष छिड़ जाता है तो उस स्थिति में ऐसी जानकारियां बहुत उपयोगी साबित हो सकती हैं."
हालांकि अभी तक सीके हचिसन कंपनी ने बीबीसी के सवालों का जवाब नहीं दिया है.
पनामा नहर पर किताब लिखने वाले एक्रोन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एंड्रयू थॉमस के अनुसार, इन बंदरगाहों के संचालन के लिए लगी बोलियों में कंपनी के सामने कोई प्रतिस्पर्धी नहीं था.
वह कहते हैं, ''उस समय अमेरिका को वास्तव में इन बंदरगाहों की परवाह नहीं थी और हचिसन को किसी विरोध या आपत्ति का सामना नहीं करना पड़ा.''
निजी और सरकारी स्वामित्व वाली चीनी कंपनियों ने भी क्रूज़ टर्मिनल और नहर पर बनने वाले पुल सहित अरबों डॉलर के निवेश के माध्यम से पनामा में अपनी मौजूदगी मजबूत की है.
एंड्रयू थॉमस के अनुसार, "पनामा में इतनी सारी चीनी गतिविधियों की वजह से शायद ट्रंप ने पानामा नहर के बारे ऐसा बयान दिया कि उसे चीन संचालित कर रहा है. लेकिन बंदरगाहों के संचालन का मतलब यह नहीं है कि चीन का इसपर मालिकाना हक हो गया है."
चीन ने बार-बार यह कहा है कि लातिन अमेरिका के साथ उसके संबंध समानता, एक दूसरे के फ़ायदे, नई खोज, खुलेपन और लोगों की भलाई पर टिके हैं.
पनामा में चीन के कौन से हित हैं

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पनामा की रणनीतिक स्थिति के कारण, चीन कई सालों से देश में अपनी प्रभावी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. उस महाद्वीप पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जिसे पारंपरिक रूप से अमेरिका का पड़ोसी माना जाता है.
साल 2017 में पनामा ने ताइवान से अपने राजनयिक संबंधों को ख़त्म कर दिया और चीन के साथ अपने औपचारिक संबंध स्थापित कर लिए. जो चीन के लिए कूटनीतिक रूप से एक बड़ी जीत थी.
इसके कुछ ही महीनों बाद, पनामा चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में शामिल होने वाला पहला लातिन अमेरिकी देश बन गया. ये एक ट्रिलियन डॉलर की वैश्विक बुनियादी ढांचे और निवेश से जुड़ी योजना है.
पनामा की तरह ही डोमिनिकन रिपब्लिक, अल साल्वाडोर, निकारागुआ और होंडुरास ने भी ताइवान के साथ अपने संबंधों को ख़त्म करते हुए चीन के साथ अपने रिश्ते स्थापित कर लिए.
पनामा में चीन ने अपना कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट खोलकर और रेल लाइन बिछाने के लिए पैसे देकर धीरे-धीरे अपनी सॉफ्ट पावर का विस्तार किया है. चीनी कंपनियों ने पनामा के पत्रकारों के लिए "मीडिया ट्रेनिंग" का भी आयोजन किया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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