भारत के बाद अब चीन जा रहीं शेख़ हसीना, बांग्लादेश क्या हासिल करना चाहता है?

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- Author, तारिकुज़्ज़मां शिमुल
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला संवाददाता, ढाका
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना इस महीने की आठ तारीख़ को चीन के आधिकारिक दौरे पर जा रही हैं.
लगातार चौथी बार सरकार के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालने के बाद ये उनकी दूसरी विदेश यात्रा है.
इससे पहले शेख़ हसीना द्विपक्षीय दौरे पर बीते महीने यानी जून 21-22 को भारत आई थीं.
भारत सरकार के साथ उन्होंने रेल यातायात समेत कई अलग-अलग मुद्दों पर क़रीब 10 समझौतों पर हस्ताक्षर किए.

भारत के दौरे के दो सप्ताह बाद शेख़ हसीना का चीन दौरा, बांग्लादेश के लिए कूटनीतिक और आर्थिक मायनों में काफ़ी अहम माना जा रहा है.
कहा जा रहा है कि इस यात्रा के ज़रिए अलग-अलग परियोजनाओं को पूरा करने के लिए देश को चीन से बड़ा कर्ज़ मिल सकता है. साथ ही इससे सरकार को नया बजट घाटा पूरा करने में भी चीन से मदद मिल सकती है.
पिछले 15 सालों में चीन ने बांग्लादेश में कई मेगा-प्रोजेक्ट्स के लिए क़र्ज़ देने के साथ-साथ परियोजनाओं में भी अहम भूमिका निभाई है.
बहुचर्चित पद्मा ब्रिज के बुनियादी ढांचे के निर्माण और कर्णफुली सुरंग के निर्माण के बाद, चीन अब तीस्ता परियोजना में भी शामिल होना चाहता है.
लेकिन सवाल यह है कि चीन, बांग्लादेश की विभिन्न विकास परियोजनाओं में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रहा है? इनमें उसका क्या हित है?
बांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री तौहीद हुसैन ने बीबीसी को बताया, "इस पूरे मामले में बांग्लादेश का जितना हित है, चीन का हित उससे कम नहीं है. इसके अलावा, भू-राजनीतिक रणनीति के नज़रिए से देखा जाए तो चीन के लिए बांग्लादेश ख़ासी अहमियत रखता है."
लेकिन असल में बांग्लादेश में चीन के कौन-से हित छिपे हैं और यहां अपनी मौजूदगी बढ़ाकर वो क्या हासिल करना चाहता है?
चीनी क़र्ज़ और निवेश

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बीते 15 सालों में बांग्लादेश ने एक दर्जन से अधिक बड़ी परियोजनाओं पर काम करना शुरू किया है.
इनमें पद्मा ब्रिज पर रेलवे लाइन, कर्णफुली नदी के नीचे से गुज़रने वाली बंगबंधु शेख़ मुजीबुर्रहमान टनल, ढाका में बस रैपिड ट्रांज़िट परियोजना सहित कई बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए चीन ने क़र्ज़ देकर बांग्लादेश की आर्थिक मदद की है.
दरअसल, चीन अब उन मुल्कों में शुमार हो गया है जिन्होंने बांग्लादेश को सबसे अधिक क़र्ज़ दिया है.
बांग्लादेश के वित्त मंत्रालय के आर्थिक संबंध विभाग (ईआरडी) के आंकड़ों के अनुसार बीते चार सालों में अकेले चीन ने बांग्लादेश को लगभग तीन अरब अमेरिकी डॉलर का क़र्ज़ दिया है.
वहीं वॉशिंगटन में मौजूद शोध संस्थान 'अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट' (एआई) के अनुसार, 2023 तक बांग्लादेश में चीन का निवेश सात अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है.
अमेरिका के लिए बांग्लादेश के पूर्व राजदूत एम हुमायूं कबीर ने बीबीसी को बताया, "चीन के पास अब ज़रूरत से ज़्यादा पैसा है और वो निवेश के लिए सही जगहों की तलाश कर रहा है."
वो कहते हैं, "इस मामले में, बांग्लादेश उसके लिए एक अच्छा विकल्प है क्योंकि बांग्लादेश ख़ुद भी अपनी विकास परियोजनाओं के लिए क़र्ज़ की तलाश में है."
केवल बांग्लादेश चीन से क़र्ज़ ले रहा है, ऐसा नहीं है. अफ्रीका से लेकर एशिया और यहां तक कि यूरोप तक के कई देश अब चीन से क़र्ज़ ले रहे हैं.
हालांकि विश्लेषक कहते हैं कि बाक़ियों की तुलना में बांग्लादेश को क़र्ज़ देना चीन के लिए अभी फायदेमंद है.
पूर्व विदेश मंत्री तौहीद हुसैन कहते हैं, "एक तरफ चीन को ब्याज का पैसा मिल रहा है, दूसरी तरफ ऐसा दिखता है कि इन प्रोजेक्ट्स पर चीनी ठेकेदार काम कर रहे हैं. इसके साथ-साथ आप ये भी देखें कि बांग्लादेश पर चीन का असर बढ़ रहा है."
बांग्लादेश को चीन से मिले क़र्ज़ का अधिकांश हिस्सा पिछले डेढ़ दशक में ही मिला है.
साल 2012 में वर्ल्ड बैंक ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए पद्मा ब्रिज प्रोजेक्ट से पीछे हटने का फ़ैसला किया था. इसके बाद से ही चीन के साथ बांग्लादेश के संबंध गहरे होने लगे.
बांग्लादेश ने खुद अपने दम पर पद्मा ब्रिज प्रोजेक्ट पूरा करने का फै़सला किया. साल 2014 में चीन की 'चाइना मेजर ब्रिज कंपनी' को इसके बुनियादी ढांचे के निर्माण का काम दिया गया.
इसके दो साल बाद, 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बांग्लादेश का दौरा किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि चीन क़रीब दो दर्जन से अधिक प्रोजेक्ट्स के लिए बांग्लादेश को लगभग 21 अरब अमेरिकी डॉलर का क़र्ज़ देगा.
दरअसल शी जिनपिंग के इस दौरे के बाद से ही बांग्लादेश को मिल रहे चीनी क़र्ज़ में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी गई.
बांग्लादेश में चीनी नागरिकों को रोज़गार

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बांग्लादेश को चीन केवल क़र्ज़ ही नहीं दे रहा बल्कि यहां के प्रोजेक्ट्स में चीनी नागरिकों को रोज़गार के मौक़े भी मिल रहे हैं.
पूर्व विदेश मंत्री तौहीद हुसैन कहते हैं, "चीन जिन प्रोजेक्ट्स के लिए क़र्ज़ दे रहा है, उनमें चीनी ठेकेदार भी काम कर रहे हैं. वो वहां की मैनपावर का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं."
क़रीब 141 करोड़ की आबादी वाले चीन में कोरोना महामारी के बाद बेरोज़गारी दर में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई.
चीनी सरकार के अनुसार, देश में 16 से 24 साल के युवाओं के बीच बेरोज़गारी दर पिछले साल के मध्य में 20 प्रतिशत से अधिक हो गई.
तौहीद हुसैन कहते हैं, "एक तरह से बांग्लादेश और दूसरे देशों में निवेश करके, चीनी सरकार अपने बेरोज़गार नागरिकों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा कर रही है."
बांग्लादेश सरकार के अनुसार, देश में काम करने वाले विदेशी नागरिकों में चीनी नागरिकों की संख्या सबसे अधिक है.
गृह मंत्रालय के अनुसार, परमिट लेकर बांग्लादेश में काम करने वाले चीनी नागरिकों की संख्या 6,000 से थोड़ी अधिक है. लेकिन कई लोगों का मानना है कि असल संख्या इससे कई गुना अधिक है.
दूसरी तरफ़, बांग्लादेश सरकार ने कहा है कि देश में अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग सात सौ चीनी कंपनियां काम कर रही हैं.
अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट के अनुसार, पिछले कुछ सालों में चीनी कंपनियों को निर्माण के सेक्टर में कई ठेके मिले हैं. इन ठेकों की कुल लागत लगभग 23 अरब अमेरिकी डॉलर है.
तौहीद हुसैन कहते हैं, "अगर चीन ने खु़द बांग्लादेश को क़र्ज़ नहीं दिया होता, तो क्या उसके ठेकेदार और नागरिक यहां के प्रोजेक्ट्स में इस तरह काम कर पाते जैसा अब कर रहे हैं?"
व्यापारिक हित

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अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट के अनुसार, चीन के साथ बांग्लादेश का सालाना द्विपक्षीय व्यापार लगभग 23 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है.
इसका अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश के आयात के रूप में है. एक देश के तौर पर बांग्लादेश सबसे अधिक सामान चीन से ही ख़रीदता है.
बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक के मुताबिक़ पिछले एक दशक में चीन से बांग्लादेश के आयात में क़रीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई है.
बैंक के आंकड़ों के मुताबिक़, वित्त वर्ष 2012-13 में चीन से सालाना सामान का आयात क़रीब 650 करोड़ अमेरिकी डॉलर था, जो अब बढ़कर क़रीब 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गया है.
अमेरिका के लिए बांग्लादेश के पूर्व राजदूत एम हुमायूं कबीर कहते हैं, "क्षेत्रीय स्तर पर चीन के लिए बांग्लादेश एक प्रमुख निर्यात स्रोत है. मुझे लगता है कि बांग्लादेश मुख्य रूप से वाणिज्यिक और आर्थिक कारणों से चीन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है."
अलग-अलग उत्पादों के अलावा बांग्लादेश चीन से बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण भी ख़रीदता है. साल 2016 में उसने चीन से दो पनडुब्बियां ख़रीदी थीं.
जानकार ये मानते हैं कि चीन के लिए हथियारों और सैन्य उपकरणों की बिक्री के लिहाज़ से भी बांग्लादेश बेहद महत्वपूर्ण है.
भू-राजनीतिक हित
जानकारों की मानें तो आर्थिक और व्यापारिक हितों के अलावा भू-राजनीति के रणनीति के पहलू से भी बांग्लादेश चीन के लिए ख़ास महत्व रखता है.
उनका कहना है कि इसकी प्रमुख वजह बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति है.
तौहीद हुसैन कहते हैं, "चीन सुपरपावर बनना चाहता है, ख़ासकर बंगाल की खाड़ी में वो खुद का आधिपत्य चाहता है."
इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका है. अमेरिका की 'इंडो-पैसिफ़िक रणनीति' के चलते चीन बंगाल की खाड़ी पर अपना शिकंजा कसना चाहता है.
2021 में अमेरिका ने 'इंडो-पैसिफ़िक रणनीति' पेश की थी. दुनिया की आधी से अधिक आबादी इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में रहती है, उत्पादों के बाज़ार के तौर पर ये इलाक़ा महत्वपूर्ण है.
वहीं समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार के लिहाज़ से भी ये क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण माना जाता है.
अमेरिका के इलिनॉय स्टेट यूनिवर्सिटी में राजनीति के प्रोफे़सर अली रियाज़ कहते हैं, "अगर आप साल 2040 तक का हिसाब करें तो आप देखेंगे कि दुनिया की 45 प्रतिशत से अधिक जीडीपी इस इलाक़े में होगी. एक और अहम बात यह है कि यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा के एक बड़े हिस्से की आपूर्ति भी करेगा."
जानकारों का मानना है कि यही वजह है कि अमेरिका ने इस इलाक़े को अधिक महत्व देते हुए इसके लिए अलग रणनीति की घोषणा की है.
हालांकि अमेरिका के इस इलाक़े को लेकर क़दम बढ़ाने से पहले साल 2013 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दुनिया के सामने अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (वन बेल्ट वन रोड) नाम की विकास रणनीति की रूपरेखा रख दी.

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बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के ज़रिए चीन एशिया, यूरोप समेत दुनिया के 60 देशों से सड़क और रेल मार्ग से सीधे जुड़ना चाहता है.
कई जानकार मानते हैं कि बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के ज़रिए दूसरे इलाक़ों में अपना प्रभुत्व बढ़ाने से चीन को रोकने के लिए ही अमेरिका ने एक रणनीति के रूप में 'इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रेटेजी' की घोषणा की.
इस स्ट्रेटेजी के तहत अमेरिका ने जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ एक सुरक्षा गठबंधन भी बनाया है, जिसे क्वाड (क्वाडिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग) कहा जाता है.
पूर्व राजदूत एम हुमायूं कबीर कहते हैं, "इसी का नतीजा है कि अपनी सुरक्षा और प्रभुत्व बनाए रखने के लिए, चीन अब बांग्लादेश और म्यांमार सहित पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में रखना चाहता है."
इसके तहत अमेरिका ने जापान, दक्षिण कोरिया, भारत, फिलीपीन्स, बांग्लादेश सहित अन्य देशों के साथ एक सुरक्षित 'इंडो-पैसिफिक क्षेत्र' बनाने की घोषणा की है. अमेरिका की 'इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रेटेजी' में चीन शामिल नहीं है.
चीन नहीं चाहता कि अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन में बांग्लादेश हिस्सा ले.
मई 2021 में, बांग्लादेश के लिए चीनी राजदूत ली ज़िमिंग ने चेतावनी दी थी कि अगर बांग्लादेश ने क्वाड में हिस्सा लिया तो चीन और बांग्लादेश के द्विपक्षीय रिश्ते "गंभीर रूप से खराब" हो सकते हैं.
चीन का क्या कहना है?

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चीन का कहना है कि वो बांग्लादेश के साथ मौजूदा रिश्तों को और गहरा कर इसे 'नई ऊंचाइयों' पर ले जाना चाहता है.
गुरुवार को शेख़ हसीना के चीन दौरे से जुड़े एक सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, "इस यात्रा के दौरान दोनों नेता मैत्रीपूर्ण संबंधों को गहरा करने और पारस्परिक हितों से जुड़े मामलों पर सहयोग के साथ-साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा करेंगे."
उन्होंने कहा कि शेख़ हसीना की यात्रा के ज़रिए दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के उद्देश्य से बांग्लादेश के साथ काम करने के लिए चीन तैयार है.
लेकिन बांग्लादेश के साथ चीन के रिश्ते 'नई ऊंचाई' पर कैसे पहुंचेंगे?
इस सवाल के उत्तर में माओ निंग ने चीन के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत और 'बेल्ट एंड रोड' प्रोजेक्ट में सहयोग को आगे बढ़ाने का ज़िक्र किया.
सात दशक पहले आर्थिक प्रगति और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए चीन ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों की घोषणा की थी. जानकार कहते हैं ये बौद्ध धर्म के पांच सिद्धांतों के समान हैं.
इनमें संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, गैर-आक्रामक रवैया, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और आपसी हित और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व शामिल हैं.
जानकार मानते हैं कि चीन के लिए अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और इलाक़े में अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए ये पांच सिद्धांत बेहद ज़रूरी हैं.

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चीन इसी नीति के तहत अपने पड़ोसियों और मित्र देशों के साथ काम कर रहा है.
मूल रूप से इसी नीति का पालन करते हुए वो रेल और सड़क मार्ग बढ़ाने के लिए 'बेल्ट एंड रोड' प्रोजेक्ट के तहत बांग्लादेश को कर्ज़ दे रहा है.
बांग्लादेश में चीन के राजदूत रहे याओ वेन चीन-बांग्लादेश संबंधों पर अपने एक लेख में कहते हैं, "2023 को चीन और बांग्लादेश के बीच बेल्ट एंड रोड सहयोग का लाभ लेने के लिए चिह्नित किया जा सकता है."
इस साल बांग्लादेश के कई बड़े प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं. याओ वेन कहते हैं कि इसके अलावा कई और प्रोजेक्ट्स का काम भी काफी आगे बढ़ा है.
पूर्व राजदूत एम हुमायूं कबीर कहते हैं, "चीन क्या चाहता है ये अलग बात है, हमारी सरकार को अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए और इस तरह काम करना चाहिए कि दूसरे देशों के साथ उसके संबंध न बिगड़े."
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