भारत के पड़ोसी देशों में चीन के दबदबे से कैसे मुक़ाबला कर रही है मोदी सरकार

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आम तौर पर मालदीव के राष्ट्रपति सत्ता संभालने के बाद अपने पहले विदेश दौरे पर भारत आते रहे हैं.
लेकिन मालदीव के मौजूदा राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज़्ज़ू ने इस परंपरा को तोड़ दिया. नवंबर में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद, भारत आने के बजाय मुइज़्ज़ू ने तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और चीन के दौरे किए हैं.
मुइज़्ज़ू ने यह जता दिया है कि उनकी सरकार भारत से दूरी बनाने की नीति पर चलने वाली है.
विदेश नीति के जानकारों के मुताबिक मुइज़्ज़ू के चीन के पांच दिनों के दौरे से ज़ाहिर होता है कि मालदीव की विदेश नीति बदल रही है.
ख़ुद राष्ट्रपति ने अपने देश की विदेश नीति में इस बदलाव को दोहराया, जब चीन के दौरे से वापस आने के बाद उन्होंने ट्वीट किया कि, ‘हमारा देश छोटा भले ही है, लेकिन इससे किसी को इस बात की इजाज़त नहीं मिल जाती कि वो हमको धमकाए.'
मुइज़्ज़ू के इस ट्वीट का इशारा साफ़ तौर पर भारत की तरफ़ था.
भारत और मालदीव का झगड़ा

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जिस वक़्त राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू चीन के दौरे पर गए थे, उस समय भारत और मालदीव के बीच ऐसा कूटनीतिक टकराव देखने को मिला, जिसकी आशंका किसी को नहीं थी.
इसकी शुरुआत उस वक़्त हुई, जब प्रधानमंत्री मोदी ने चार जनवरी को अपने लक्षद्वीप दौरे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं.
सोशल मीडिया के कई यूज़र्स ने लक्षद्वीप में मोदी द्वारा बिताए गए वक़्त की तुलना मालदीव से की. ख़बरें बताती हैं कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मालदीव की सरकार, चीन से दोस्ती की पींगें बढ़ा रही थी.
भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लक्षद्वीप को 'बढ़ावा देने' का मालदीव के तीन उपमंत्रियों ने बुरा माना और सोशल मीडिया पर उन्होंने अभद्र बयानबाज़ी की.
बाद में मालदीव के उन मंत्रियों को निलंबित कर दिया गया. लेकिन, तब तक दोनों देशों के रिश्तों में खटास तो आ ही चुकी थी.
भारत के कई सेलेब्रिटीज़ ने अपने फैन्स से कहा कि वो घूमने जाने के लिए भारतीय द्वीपों के विकल्पों को भी आज़माएं. उनका संकेत था कि मालदीव जाने वालों के लिए लक्षद्वीप घूमने जाना भी एक विकल्प हो सकता है.
उसके बाद से ऐसा लग रहा है कि हालात बद से बदतर हो गए हैं.
मालदीव की कैबिनेट ने फ़ैसला किया कि वो भारत के साथ समुद्री सर्वेक्षण (हाइड्रोग्राफी) में सहयोग के उस समझौते का नवीनीकरण नहीं करेंगे, जो 2019 में किया गया था.
ये समझौता इसी साल यानी 2024 में ख़त्म होने जा रहा है. इससे पहले, चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज़्ज़ू ने मालदीव में इस वक़्त तैनात भारतीय सैनिकों को उनके देश वापस भेजने का वादा किया था.
मुइज़्ज़ू का ये क़दम, अपने पूर्ववर्ती इब्राहिम सोलिह सरकार की 'इंडिया फर्स्ट नीति' को पलटने के इरादे का एक और संकेत था. भारत के साथ रक्षा संबंध जारी रखने को लेकर मुइज़्ज़ू सरकार की ये हिचक उस वक़्त और उजागर हो गई, जब पिछले महीने मॉरिशस में हुए कोलंबो सिक्योरिटी कॉनक्लेव के ताज़ा संस्करण में मालदीव का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ.
कोलंबो सिक्योरिटी कॉनक्लेव की शुरुआत 2011 में हुई थी, और इसका मक़सद एक सुरक्षित, महफ़ूज़ और स्थिर हिंद महासागर के विचार को बढ़ावा देना था. इसमें भारत और मालदीव के साथ साथ, श्रीलंका और मॉरिशस भी शामिल हैं.
'इंडिया आउट' अभियान

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मालदीव में भारत विरोधी भावनाएं 2013 से ही सुलग रही हैं, जब यामीन अब्दुल गयूम राष्ट्रपति चुने गए थे. यामीन, अपने शासन काल में चीन के साथ रिश्ते मज़बूत करने की कोशिशें करते रहे थे.
2018 के चुनाव में भारत समर्थक इब्राहिम सोलिह ने यामीन को शिकस्त दे दी. उसके बाद से ही यामीन 'इंडिया आउट' अभियान की अगुवाई करते आ रहे हैं.
मुहम्मद मुइज़्ज़ू, यामीन के मातहत काम कर रहे थे. अगर. 2023 के राष्ट्रपति चुनाव में यामीन अब्दुल गयूम, अयोग्य क़रार नहीं दिए जाते, तो मुइज़्ज़ू की जगह वो ही मालदीव के राष्ट्रपति बनते.
मालदीव की राजधानी माले स्थित पत्रकार हामिद ग़फ़ूर कहते हैं कि बॉलीवुड फिल्मों और और सैलानियों की वजह मालदीव पर भारत का गहरा सांस्कृतिक प्रभाव रहा है.
हामिद कहते हैं कि, 'लेकिन, मालदीव में कुछ लोगों को लगता है कि भारत पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी दादागीरी चलाता रहा है. मुझे लगता है कि मालदीव में हर नागरिक की यही सोच है.'
हामिद ग़फ़ूर कहते हैं कि मुइज़्ज़ू, भारत विरोधी भावनाओं को भड़काकर ही सत्ता में पहुंचे हैं. अब उनको अपने इन भारत विरोधी समर्थकों को ये दिखाकर लुभाना होगा कि उनके रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है.
भारत और चीन के बीच दबदबे की जंग का मैदान बना दक्षिण एशिया

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भारत और मालदीव के लगातार बिगड़ते कूटनीतिक रिश्तों के पीछे सिर्फ़ दोनों देशों के आपसी समीकरण नहीं हैं. इस बात के तमाम संकेत दिख रहे हैं कि मालदीव अब दबदबा बढ़ाने की उस जंग का नया अखाड़ा बन गया है, जो भारत और चीन के बीच चल रही है.
दिल्ली के फ़ोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर, डॉक्टर फ़ैसल अहमद चीन मामलों के विशेषज्ञ हैं. वो कहते हैं कि, 'मालदीव को लेकर हालिया घटनाओं को देखकर ये साफ़ हो जाता है कि चीन और भारत के बीच एक दशक से भी ज़्यादा समय से चली आ रही होड़ अब मालदीव में नया रुख़ ले रही है.’
‘वैसे तो चीन और भारत, दोनों ही भू-आर्थिक और सामरिक तौर पर मालदीव से नज़दीकी बढ़ाने में जुटे हुए हैं. लेकिन, मालदीव की सरकार ने हाल के दिनों में चीन के पक्ष में जो रुख़ अपनाया है, उसकी वजह से दुनिया की भू-राजनीतिक अस्थिरता अब हिंद महासागर क्षेत्र में भी पहुंच गई है.'
कहा जा रहा है कि चीन, भारत के उन आठ पड़ोसी देशों पर लगातार अपनी वित्तीय और सियासी ताक़त का शिकंजा कस रहा है, जो दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सदस्य हैं.
चीन की ये गतिविधियां भारत के लिए बहुत असहज और चिंताजनक हैं. इसके लिए चीन, अपनी वित्तीय क्षमताओं और विशाल परियोजनाओं को ठोस आर्थिक सहायता देने की अपनी क्षमता का बख़ूबी इस्तेमाल कर रहा है.
इसी वजह से दक्षिण एशिया के कुछ देशों का झुकाव चीन के प्रति बढ़ रहा है, क्योंकि वो अपने मूलभूत ढांचे के विकास और आर्थिक फ़ायदों के लिए चीन से मदद हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.
दक्षिणी एशिया में भारत के पड़ोसी देशों और हिंद महासागर के द्वीपीय देशों में अपना दबदबा बढ़ाने के लिए चीन, अपनी पसंदीदा परियोजना, बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) को बख़ूबी इस्तेमाल कर रहा है.
चीन ने पहला बीआरआई शिखर सम्मेलन 2017 में बीजिंग में आयोजित किया था. उसमें तमाम एशियाई देशों के साथ साथ, कई पश्चिमी देश भी शामिल हुए थे. हालांकि, भारत ने इस शिखर सम्मेलन की ये कहकर आलोचना की थी कि, बीआरआई की परियोजनाओं में पारदर्शिता की कमी है.
भारत ने इस बहिष्कार के ज़रिए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की परियोजनाओं को लेकर अपनी चिंता साफ़ तौर पर ज़ाहिर की थी.
इस क्षेत्र में चीन और भारत दोनों ही अपना प्रभाव बढ़ाने और बढ़त हासिल करने के लिए, बहुत सधे हुए तरीक़े से संघर्ष कर रहे हैं. कई देशों ने भारत या फिर चीन के साथ तालमेल बढ़ाने के लिए अपनी विदेश नीतियों में तब्दीली की है.
लेकिन, ये सब कुछ उस भौगोलिक क्षेत्र में हो रहा है, जिसे भारत का अपना इलाक़ा कहा जाता है, जो उसके एकदम पड़ोस में स्थित है. इसी वजह से चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है.
इससे निपटने के लिए भारत ने पड़ोसी देशों में मूलभूत ढांचे के विकास की कई परियोजनाओं में भागीदार बनकर उनके साथ अपने आर्थिक संबंधों को नई धार दी है.
लेकिन, क्या भारत की ये कोशिशें, इस इलाक़े में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने और एक वैश्विक ताक़त बनने का उसका ख़्वाब पूरा करने के लिहाज़ से पर्याप्त हैं?
2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शपथ ग्रहण के कार्यक्रम में सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित करके एक शानदार क़दम उठाया था. इससे उम्मीद जगी थी कि भारत, पड़ोसी देशों के साथ अपने विवादों को सुलझाकर रिश्तों में नई जान डालेगा, और इससे इस क्षेत्र के भीतर व्यापार में भी सुधार होगा.
डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं कि मोदी की वो पहल अभी भी चल रही है. उनके मुताबिक़, 'जब प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता संभाली थी, तो उन्होंने अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट' की नीति से पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बेहतर करने की कूटनीति पर काफ़ी ज़ोर दिया था.’
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में साउथ एशियन स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर, डॉक्टर श्रीराधा दत्ता मानती हैं कि भले ही पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों का सफ़र उतार-चढ़ाव भरा रहा हो. लेकिन, जहां तक अपने सबसे नज़दीकी पड़ोसी देशों को लेकर नीति का मामला है, तो भारत ने बहुत अच्छा काम किया है.
वो कहती हैं कि, 'मैं कहूंगी कि पाकिस्तान को छोड़ दें, तो हम अपने बाक़ी सारे पड़ोसियों के साथ किसी न किसी रूप में टिकाऊ तौर पर संवाद करने में सफल रहे हैं.'
हालांकि, कुछ आलोचक ये भी कहते हैं कि भारत, अपने पड़ोसी देशों के विपक्षी नेताओं और दलों के साथ संवाद कर पाने में नाकाम रहा है. डॉक्टर श्रीराधा दत्ता भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं.
वो कहती हैं कि, 'हम सत्ताधारी दलों के साथ काम करने को तरज़ीह देते हैं. क्योंकि, हमें उन दलों के साथ काम करना आसान लगता है, जो भारत समर्थक माने जाते हैं. और इस तरह, हम दूसरे पक्ष यानी विपक्षी दलों को अपने हाथ से निकल जाने देते हैं.’
भारत-बांग्लादेश दोस्ती

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'बांग्लादेश तो अलग ही दिशा में जा रहा है, और वो बहुत जल्दी एक ही पार्टी वाले देश में तब्दील होने जा रहा है. भारत का केवल सत्ताधारी दल के साथ संवाद करना, उसके संकीर्ण रवैये को दिखाता है.'
डॉक्टर दत्ता मानती हैं कि भारत को अपनी 'नेबरहुड फ़र्स्ट' नीति में अपने पड़ोसी देशों के विपक्षी दलों और विरोधी नेताओं के साथ बातचीत को भी शामिल करना चाहिए.
उनको लगता है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के साथ संपर्क बढ़ाने में कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए. आख़िर वो बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी है.
लेकिन, बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट की अग्रणी वकीलों में से एक तानिया अमीर इस तर्क का विरोध करती हैं. तानिया कहती हैं कि भारत, बीएनपी से किसी भी तरह का संपर्क करे, उससे पहले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को चाहिए कि वो ख़ुद को दक्षिणपंथी जमात-ए-इस्लामी से दूर करे.
भारत में दक्षिणपंथी विचारक डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता कहते हैं कि भारत सरकार के लिए बीएनपी या जमात-ए-इस्लामी से किसी भी तरह का संबंध रखना असंभव है. वो कहते हैं कि, 'ये कहना ग़लत होगा कि मोदी सरकार केवल पड़ोसी देशों की उन्हीं सरकारों के साथ सहज है, जो मोदी समर्थक हैं.’
‘पाकिस्तान के सियासी दलों और बांग्लादेश में बीएनपी को छोड़ दें, तो बाक़ी सभी पड़ोसी देशों की पार्टियों के साथ भारत के रिश्ते हैं, फिर चाहे वो सरकार में हों या विपक्ष में. मालदीव के विपक्षी दलों के साथ भी हमारे बड़े अच्छे संबंध हैं.'
पाकिस्तान, हमेशा से ही चीन का बेहद क़रीबी साथी रहा है. वहीं इस पूरे इलाक़े में भूटान, भारत का सबसे नज़दीकी देश है. तो हमने इस विश्लेषण में इन देशों के साथ भारत के संबंधों को शामिल नहीं किया है.
इन सभी देशों की सीमाएं भारत से मिलती हैं और सभी देशों के साथ भारत का एक साझा इतिहास भी रहा है. पांरपरिक रूप से ये सारे देश व्यापार, आर्थिक मदद और सांस्कृतिक लेन-देन के लिए भारत पर निर्भर रहे हैं.
दो नावों की सवारी करने की कोशिश में मालदीव

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अक्सर जब भारत और उसके किसी पड़ोसी देश के बीच तक़रार होती है, तो भारत पर हमेशा दादागीरी करने या बड़े भाई जैसा बर्ताव करने का इल्ज़ाम लगता रहा है.
जानकार, अपने दक्षिण एशिया के बेहद छोटे पड़ोसी देशों के साथ भारत की नीति पर सवाल खड़े करने लगते हैं.
लेकिन, इस बार जब मालदीव के साथ भारत की तक़रार हुई, तो भारतीयों ने कहा कि मालदीव ने भड़काने का काम किया है.
यही नहीं, नवंबर में जब से मुहम्मद मुइज़्ज़ू ने चुनाव जीता है, तब से ही मालदीव लगातार भारत से दूरी बनाने की कोशिश कर रहा है.
मालदीव, जिसकी आबादी भारत के किसी मध्यम दर्ज़े के शहर से भी कम है, उसने भारत का ग़ुस्सा भड़काते हुए कहा कि भारत 15 मार्च तक उसके यहां से अपने सैनिक वापस बुला ले.
मालदीव में भारत के केवल 88 सैनिक तैनात हैं, और उन्हें तो इसलिए मालदीव भेजा गया है कि वो ज़रूरत पड़ने पर मानवीय या मेडिकल सहायता दे सकें.
पिछले गुरुवार को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने युगांडा की राजधानी कंपाला में मालदीव के विदेश मंत्री मूसा ज़मीर से मुलाक़ात की थी.
इस मुलाक़ात के बाद जयशंकर ने ट्वीट किया कि, उन्होंने 'मालदीव और भारत के संबंधों को लेकर खुलकर बातचीत की.'
जयशंकर ने यह नहीं बताया कि मालदीव ने भारत के सैनिकों को वापस बुलाने की जो समय-सीमा दी है, उसको लेकर भारत का क्या रुख़ है. बाद में मूसा ज़मीर ने जो ट्वीट किया, उससे संकेत मिला कि दोनों नेताओं ने 'भारत के सैनिकों को वापस बुलाने' के मुद्दे पर भी चर्चा की थी.
मालदीव के राष्ट्रपति ने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए 15 मार्च की जो समय-सीमा तय की है, उसे भारत के लिए चेतावनी माना जा रहा है.
ज़ाहिर है कि भारत ने तनाव कम करने के लिए बहुत संभलकर प्रतिक्रिया दी है.
राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू के राजनीतिक गुरू यामीन अब्दुल गयूम (अब दोनों के बीच दूरी बन गई है) 2013 से 2018 तक शासन में थे. जब यामीन सत्ता में थे, तो वो भी चीन के क़रीबी थे, और विपक्ष के मुख्य नेता के तौर पर यामीन ने 'इंडिया आउट' अभियान भी शुरू किया था.
जब 2018 में इब्राहिम मुहम्मद सोलिह सत्ता में आए, तो उन्होंने अब्दुल्ला यामीन सरकार की चीन समर्थक नीति को बदला और मालदीव में भारत के भरोसेमंद साझीदार बन गए.
सबूत तो इस बात के भी हैं कि मुइज़्ज़ू अपने ही बुने हुए जाल में फंस गए हैं. वो 'इंडिया आउट' के जोशीले अभियान की मदद से सत्ता में आए थे.
आरोप है कि चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने मालदीव में मौजूद भारत के सैनिकों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और लोगों को बरगलाया था.
मालदीव के पत्रकार हामिद ग़फ़ूर ने बीबीसी से फ़ोन पर कहा कि, ‘राष्ट्रपति चुनाव के अभियान के दौरान, उस वक़्त विपक्ष में रही पीपल्स नेशनल कांग्रेस (पीएनपी) ने दावा किया था कि भारत ने मालदीव में अपने हज़ारों सैनिक तैनात कर रखे हैं. और उनकी हर जगह मौजूदगी मालदीव के लिए एक ख़तरा है.’
‘असल में पीएनपी के नेता जान-बूझकर भारत के सैनिकों की तादाद बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे थे, ताकि लोगों के बीच राष्ट्रवादी भावनाएं भड़का सकें.’
हामिद ग़फ़ूर ने कहा कि सच्चाई ये है कि मुइज़्ज़ू को उस वक़्त भारतीय सैनिकों की मालदीव में तैनाती से कोई दिक़्क़त नहीं थी, जब 2013 से 2018 के दौरान वो मंत्री रहे थे. ग़फ़ूर ने कहा कि, ‘मुइज़्ज़ू ने अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए राष्ट्रवादी बयानबाज़ी शुरू की.’
ग़फ़ूर के मुताबिक़, चूंकि अब राष्ट्रपति अपनी ही हरकतों और बयानों के जाल में फंस गए हैं, तो अब उनके पास भारत विरोधी मुहिम जारी रखने के सिवा कोई और चारा नहीं है.
हालांकि ऐसा लग रहा है कि मुइज़्ज़ू का ये रवैया उन्हीं पर भारी पड़ रहा है. क्योंकि, पिछले हफ़्ते ही एक मेयर के चुनाव में मुइज़्ज़ू की पार्टी को विपक्ष के हाथों क़रारी शिकस्त मिली. जीतने वाली पार्टी भारत समर्थक मानी जाती है.

सबसे अहम बात ये कि मुइज़्ज़ू ने जिस वक़्त भारतीय सैनिकों को अपना देश छोड़कर जाने का फ़रमान सुनाया, वो महत्वपूर्ण है.
मालदीव में 17 मार्च को संसद के चुनाव होने वाले हैं. भारत के सैनिकों को उससे दो दिन पहले मालदीव छोड़ना होगा. ग़फ़ूर कहते हैं कि राष्ट्रपति पर संसदीय चुनाव जीतने का दबाव है और इसीलिए, वो ख़ुद को ऐसे निर्णायक नेता के तौर पर पेश करना चाह रहे हैं, जो ‘भारत जैसी बड़ी ताक़त से भी दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है.’
डॉक्टर श्रीराधा दत्ता का मानना है कि भारत विरोध की ये नीति लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है. वो कहती हैं कि, ‘मुइज़्ज़ू उन मतदाताओं को ख़ुश करना चाहते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया और वो चीन को भी लुभाना चाहते हैं. लेकिन, मुझे नहीं लगता कि ये नीति लंबे समय तक जारी रखी जा सकती है.’
मालदीव के पत्रकार हामिद ग़फ़ूर की सलाह है कि उनके देश को भारत और चीन, दोनों के साथ अच्छे रिश्ते क़ायम करके चलना सीख लेना चाहिए.
वो मानते हैं कि, ‘हमारे राजनेता बौद्धिक स्तर पर ये मानते हैं कि सिर्फ़ भारत या फिर सिर्फ़ चीन के साथ अच्छे या बुरे संबंध रखना अच्छी बात नहीं है. लेकिन, ज़मीनी स्तर पर एक के बाद दूसरी सरकारों ने अपनी तरज़ीह के साझीदार के हिसाब से अपनी विदेश नीति में बदलाव किया है. विदेश नीति में बार-बार बदलाव करके मालदीव को दो बड़ी ताक़तों की लड़ाई का मैदान बनाने में मुझे कोई अक़्लमंदी नहीं दिखाई देती.’
हामिद ग़फ़ूर ये स्वीकार करते हैं कि उनके देश के नज़दीक होने और अपने सांस्कृतिक प्रभाव की वजह से भारत को, चीन पर हमेशा ही बढ़त हासिल रहेगी.
हालांकि मालदीव में मुइज़्ज़ू के साथ सबकुछ ठीक होता नहीं दिख रहा है. नवंबर, 2023 में वे राष्ट्रपति चुने गए हैं और मालदीव की मीडिया में इस तरह की ख़बरें आने लगी हैं कि संसद में उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव आ सकता है.
ऐसी रिपोर्टें रविवार को मालदीव के संसद में सत्ता और विपक्ष के सांसदों के बीच आपसी धक्कामुक्की के बाद आयी है. देश की मुख्य विपक्षी पार्टी मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी है और उसका संसद में बहुमत है.
भारत और नेपाल के रिश्ते पर असर

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महात्मा गांधी ने एक बार कहा था, ‘मुझे अपने नज़दीकी पड़ोसियों की क़ीमत पर अपने दूर-दराज़ के पड़ोसी के हित नहीं साधने हैं.’
भारत की ‘नेबरहुड फ़र्स्ट की नीति’ इसी सिद्धांत पर निर्भर है. लेकिन, क्या ये नीति ज़मीनी स्तर पर भी लागू की जा रही है?
भारत और नेपाल के बीच बरसों से अनूठे रिश्ते रहे हैं. इस संबंध की सबसे प्रमुख ख़ूबी दोनों देशों के बीच खुली सीमा और भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती रही है.
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे का मानना है कि दोनों देशों के इस ख़ास और अनूठे रिश्ते में पिछले कुछ वर्षों में बदलाव आया है.
वो कहते हैं कि, ‘जो खुली सरहदें, जो आपसी संबंधों में अनूठी बात मानी जाती हैं, उनको लेकर हाल के दिनों में बहस बढ़ी है. और, लगातार 75 साल तक चले सिलसिले के बाद अब भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती भी बंद कर दी गई है.’
नेपाल को लेकर भारत की नीति में भी बदलाव आया है. इस बदलाव के बारे में युवराज घिमरे कहते हैं कि, ‘भारत को अक्सर नेपाल की अंदरूनी राजनीति में ज़बरन दख़ल देने का इल्ज़ाम झेलना पड़ता था. अब भारत ने विकास पर ज़ोर देना शुरू किया है, जो दोनों पक्षों को मुफ़ीद लगता है.’
‘इसी महीने की शुरुआत में भारत और नेपाल ने बिजली के व्यापार का समझौता किया है. इसके तहत नेपाल अगले दस वर्षों में भारत को दस हज़ार मेगावाट बिजली बेचेगा.’
लेकिन, नेपाल और भारत के रिश्तों पर भी चीन के साये का असर बढ़ता जा रहा है. चीन ने नेपाल में अपना निवेश लगातार बढ़ाते हुए भारत के लिए स्थिति असहज बना दी है.
इसी महीने की शुरुआत में भारत और नेपाल ने बिजली के व्यापार का समझौता किया है. इसके तहत नेपाल अगले दस वर्षों में भारत को दस हज़ार मेगावाट बिजली बेचेगा.
युवराज घिमरे कहते हैं कि, ‘नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता, सरकार और राजनीतिक दलों में जवाबदेही की कमी है. ख़ास तौर से 2006 में आया क्रांतिकारी सियासी बदलाव, जिसे अमरीका और यूरोपीय देशों ने मदद और समर्थन दिया था, और उसमें भारत ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. लेकिन, चीन ने ऊर्जा, पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी और व्यापार, और भूकंप के बाद से रक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति बढ़ाई है. ये बातें भारत के लिए चिंताज़नक हैं.’
चीन और भारत के बीच पहाड़ियों में बसे नेपाल के मौजूदा प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल एक पूर्व माओवादी हथियारबंद नेता रहे हैं. वो तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाल चुके हैं. भारत के साथ साथ अमेरिका भी नेपाल में हो रहे इन बदलावों को लेकर सहज नहीं है.
अब आप इसे विडम्बना कहें या भारत का व्यवहारिक रवैया, लेकिन, अब उसे नेपाल में एक साम्यवादी सरकार के साथ काम करना पड़ रहा है.
जैसा कि युवराज घिमरे कहते हैं, ‘भारत में बीजेपी की सरकार के सामने सबसे बड़ी दुविधा तो उन वामपंथी दलों की सरकारों के साथ सहयोग और तालमेल करना है, जिनका रुख़ भारत और अमरीका विरोधी रहा है.’
निजी दोस्ती पर टिके भारत-बांग्लादेश के संबंध

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ऐसा लगता है कि भारत और बांग्लादेश के बीच दो अच्छे पड़ोसियों से भी बेहतर रिश्ते हैं. तानिया अमीर कहती हैं कि भारत और बांग्लादेश के संबंध अनूठे हैं.
उनका कहना है कि, ‘भारत और बांग्लादेश के संबंध सबसे अलग हैं. उनके रिश्तों की तुलना किन्हीं अन्य दो देशों के संबंध से नहीं की जा सकती, क्योंकि बांग्लादेश की सीमा भारत के पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा और असम राज्यों से मिलती है.’
भारत और बांग्लादेश आपस में 54 नदियों का पानी साझा करते हैं. दोनों के बीच सैकड़ों किलोमीटर लंबी ज़मीनी और समुद्री सीमा है.
इस वक़्त ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को पूरा समर्थन दे रहे हैं. शेख़ हसीना ने हाल ही में चुनाव जीता है, जिसे विवादास्पद कहा जा रहा है.
76 बरस की शेख़ हसीना की ये लगातार चौथी चुनावी जीत है. प्रधानमंत्री मोदी के आंख मूंदकर समर्थन करने की वजह से शेख़ हसीना की आलोचना भी होती रही है.
नेपाल और मालदीव की तरह, बांग्लादेश में भी भारत विरोधियों का एक कट्टर और बड़ा तबक़ा है. तानिया अमीर, बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाओं के पीछे तीन प्रमुख कारण बताती हैं.
वो कहती हैं, ‘पहला तो ये कि मोदी सरकार बांग्लादेश की ऐसी सरकार का आंख मूंदकर समर्थन कर रही है, जो एक तरह से भ्रष्ट पूंजीवाद और पैसे की लूट, भ्रष्टाचार और बांग्लादेश से पूंजी बाहर जाने का समर्थन है. बांग्लादेश में बहुत से लोगों का ये मानना है कि मोदी सरकार शेख़ हसीना का समर्थन करके इन्हीं बातों को बढ़ावा दे रही है.’
‘दूसरा कारण ये है कि बांग्लादेश में बहुत से लोगों को लग रहा है कि उनका देश एक तानाशाही, अ-लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है और भारत इसका समर्थन करके ये दिखा रहा है कि वो लोकतंत्र का समर्थक नहीं है.’
‘और तीसरी वजह ये है कि प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष वर्ग ये महसूस करता है कि मोदी सरकार जिस तरह अवामी लीग सरकार का अंधा समर्थन कर रही है, उससे एक तरह से अवामी लीग में उग्रपंथियों की घुसपैठ को भी बढ़ावा दे रही है.’
तानिया अमीर मानती हैं कि भारत के लिए शेख़ हसीना की सरकार का समर्थन करना सबसे अक़्लमंदी का काम है, क्योंकि उनके मुताबिक़, ‘भारत सत्ताधारी दल पर बहुत अधिक दबाव नहीं बनाना चाहता कि वो चीन की गोद में चली जाए.’
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते जिस एक क्षेत्र में और बेहतर हो सकते हैं, वो दोनों देशों के आम लोगों के बीच संपर्क को औपचारिक रूप से बढ़ावा देना है.
तानिया अमीर कहती हैं, ‘अगर आप भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की बात करते हैं, तो मैं कहूंगी कि सबसे ज़्यादा ज़ोर दोनों देशों के आम लोगों के बीच आवाजाही और संवाद को बढ़ाने पर दिया जाना चाहिए. हम अपनी बातचीत में अक्सर इस पहलू की अनदेखी कर जाते हैं.’
‘हम केवल दोनों देशों की सरकारों और सत्ताधारी दलों और वास्तविकता तो ये है कि दोनों नेताओं- मोदी और शेख़ हसीना- के आपसी संबंधों को ही दो देशों का रिश्ता समझ बैठते हैं. हमने छात्रों की आवाजाही, वैधानिक रूप-रेखा के अंतर्गत सीमा के ज़रिए व्यापार की साझेदारियों को बढ़ाने जैसी ज़रूरतों के बारे में पर्याप्त बातचीत नहीं करते, न ही इन पर ज़ोर देते हैं.’
भारत-श्रीलंका के रिश्ते पर चीन की मौजूदगी का बढ़ता साया

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डॉक्टर सुव्रोकमल दत्ता ये मानते हैं कि श्रीलंका, भारत के बेहद क़रीब आया है. ख़ास तौर से कोविड-19 महामारी के बाद से, जब भारत ने उस वक़्त श्रीलंका को वित्तीय और मेडिकल सहायता दी थी, जब वो भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा था और चीन समेत ज़्यादातर देश, श्रीलंका की मदद के लिए आगे नहीं आए थे.
वो कहते हैं, ‘श्रीलंका के साथ हमारे संबंध असाधारण रूप से मज़बूत हैं. दोनों देशों के बीच सदियों पुराने रिश्ते रहे हैं और एक भरोसेमंद साझीदार के तौर पर चीन कभी भी भारत की जगह नहीं ले सकता है.’
निश्चित रूप से चीन के इस क्षेत्र का बड़े खिलाड़ी बनने के साथ ही भारत और श्रीलंका के संबंधों में भी चुनौतियां खड़ी हुई हैं.
श्रीलंका के साथ हमारे संबंध असाधारण रूप से मज़बूत हैं. दोनों देशों के बीच सदियों पुराने रिश्ते रहे हैं और एक भरोसेमंद साझीदार के तौर पर चीन कभी भी भारत की जगह नहीं ले सकता है.
कुछ वर्षों पहले श्रीलंका ने आर्थिक साझेदारियों, मूलभूत ढांचे की परियोजनाओं और सामरिक सहयोग के ज़रिए चीन के साथ नज़दीकी रिश्ते विकसित कर लिए थे.
लेकिन, इस वक़्त तो ऐसा लग रहा है कि श्रीलंका पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिहाज़ से भारत की नज़र में हालात क़ाबू में आ गए हैं.
हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी और मूलभूत ढांचे की अहम परियोजनाओं में उसकी भागीदारी के सामरिक प्रभावों ने श्रीलंका और भारत के रिश्तों में एक जटिल आयाम और जोड़ दिया है.
चीन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए भारत के लिए श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते को आर्थिक संबंधों और सामरिक चिंताओं के बीच संतुलन बिठाकर साधना पड़ रहा है.
भारत और चीन के बीच दबदबे की होड़

कुल मिलाकर, भारत के पड़ोस में उभरते समीकरण भारत के लिए चुनौती भी हैं और अवसर भी. जहां आर्थिक सहयोग से विकास के अवसर प्राप्त होते हैं, वहीं तनाव बढ़ने और संघर्षों छिड़ने का ख़तरा भी आशंकित करता रहता है.
लेकिन, सच्चाई ये है कि आज जब दक्षिण एशिया एक सामरिक युद्ध क्षेत्र बनकर उभर रहा है, तब भारत और चीन के बीच प्रभाव बढ़ाने की ये होड़ आने वाले समय में भी इस इलाक़े के भू-राजनीतिक मंज़र को तय करती रहेगी.
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