मालदीव का भारत से दूर होना कितना बड़ा झटका है? - प्रेस रिव्यू

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप में पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल की तो यह सोशल मीडिया पर बहस विवाद के रूप में शुरू हो गई. इसका असर मालदीव से संबंधों पर सीधा पड़ा.
मालदीव में मोहम्मद मुइज़्ज़ू के राष्ट्रपति बनने के बाद से संबंधों में पहले से ही तनातनी थी.
पीएम मोदी को लेकर अपमानजनक टिप्पणी के कारण मालदीव में तीन मंत्रियों का निलंबन भी हुआ. आज की प्रेस रिव्यू में इसी पर पहली लीड ख़बर अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू का एक विश्लेषण पढ़िए.
भारत ने पूरे विवाद पर अपनी चिंता जताई और मालदीव में भारतीय पर्यटकों की बुकिंग्स रद्द होने की ख़बरें आने लगीं. सोशल मीडिया पर मालदीव का बहिष्कार ट्रेंड करने लगा.
मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने मालदीव की सत्ता में आने से पहले चुनाव में 'इंडिया आउट' कैंपेन चलाया था.
हिन्द महासागर में मालदीव भारत का एक अहम समुद्री पड़ोसी देश है. मालदीव की भौगोलिक स्थिति भारत की रणनीति के लिहाज से काफ़ी अहम है.
हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती दिलचस्पी के कारण मालदीव की अहमियत भारत के लिए और बढ़ गई है. पिछले कई सालों से भारत और मालदीव के संबंध गहरे रहे हैं.
मालदीव में 2013 से 2018 के बीच अब्दुल्ला यामीन सरकार रही और इस सरकार की क़रीबी चीन से थी.
यामीन की सरकार के दौरान ही मालदीव चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ड एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा बना था.
लेकिन 2018 में यामीन की सरकार गई और इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के नेतृत्व में मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) की सरकार बनी तो भारत के साथ संबंधों में तेज़ी से सुधार हुआ.

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मालदीव की अपनी राजनीति और भारत
इब्राहिम सोलिह ने अपनी विदेश नीति में भारत को तवज्जो देते हुए 'इंडिया फर्स्ट' की नीति अपनाई थी. सोलिह के नेतृत्व में मालदीव और भारत के बीच कई रक्षा और आर्थिक समझौते हुए.
सोलिह भारत के साथ गहरे संबंधों को लेकर प्रतिबद्ध रहे. लेकिन भारत के साथ बढ़ती क़रीबी को मालदीव के विपक्ष ने सोलिह सरकार के ख़िलाफ़ लोगों को गोलबंद करने का हथियार बनाया.
विपक्ष ने सोलिह की इंडिया फ़र्स्ट की नीति के ख़िलाफ़ इंडिया आउट कैंपेन चलाया.
सोलिह सरकार के आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया कि भारत के साथ संबंधों में संप्रभुता को किनारे रखा जा रहा है और भारत के सैनिकों को मालदीव की ज़मीन पर रहने की अनुमति दी गई.
जब सोलिह सरकार ने भारत के साथ 2021 में उथुरु थिला फलहु (यूटीएफ़) समझौते पर हस्ताक्षर किया तो विपक्ष और हमलावर हो गया. यह एक रक्षा समझौता था, जिसके तहत संयुक्त रूप से नेशनल डिफेंस फोर्स कोस्ट गार्ड हार्पर बनाना था.
मालदीव में पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव हुआ और भारत विरोधी अभियान एक लोकप्रिय मुद्दा बन गया.
कुछ ही महीनों में मोहम्मद मुइज़्ज़ू विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में उभरे क्योंकि कई मामलों के कारण पूर्व राष्ट्रपति यामीन चुनाव में हिस्सा नहीं ले सके. मुइज़्ज़ू राष्ट्रपति बनने से पहले मालदीव की राजधानी माले के मेयर थे.
मुइज़्ज़ू ने वोटरों को लुभाने के लिए 'इंडिया आउट' कैंपेन का नेतृत्व किया. मुइज़्ज़ू ने यह भी वादा किया था कि वह सत्ता में आएंगे तो मालदीव की ज़मीन से भारतीय सैनिकों को हटाएंगे और भारत से व्यापारिक रिश्तों को भी संतुलित करेंगे. ऐसा कहा जाता था कि सोलिह सरकार की ट्रेड पॉलिसी भारत की तरफ़ झुकी हुई थी.
मुइज़्ज़ू ने ख़ुद को चीन परस्त होने के आरोपों को ख़ारिज किया और ख़ुद को मालदीव परस्त कहा. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार मालदीव में भारत या चीन के अलावा किसी भी देश के सैनिकों की मौजूदगी की अनुमति नहीं देगी.
हालांकि चीन के साथ मज़बूत संबंधों के संकेत वो दे चुके थे. मुइज़्ज़ू चाहते हैं कि उनकी सरकार को चीन से आर्थिक मदद का फ़ायदा मिले.
पद पर आने के बाद मुइज़्ज़ू के फ़ैसले
पिछले साल सितंबर में 54 फ़ीसदी वोटों के साथ राष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद मुइज़्ज़ू को जीत मिली थी. नवंबर में मुइज़्ज़ू ने द्वीपीय देश मालदीव के आठवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी.
मुइज़्ज़ू ने राष्ट्रपति बनते ही संकेत दे दिया कि उनकी विदेश नीति में भारत से दूरी बनाना प्राथमिकता में है. उन्होंने पहला विदेश दौरा तुर्की का किया. मुइज़्ज़ू ने एक परंपरा तोड़ी क्योंकि इससे पहले मालदीव का नया राष्ट्रपति पहला विदेशी दौरा भारत का करता था.
तुर्की के बाद मुइज़्ज़ू यूएई गए और अभी चीन के पाँच दिवसीय दौरे पर हैं. मुइज़्ज़ू ने चीन को अहम साझेदार बताया है और कई महत्वपूर्ण समझौते किए हैं.
मुइज़्ज़ू ने शपथ लेने के बाद राष्ट्र के नाम पहले संबोधन में मालदीव से भारतीय सैनिकों की वापसी की बात दोहराई. उन्होंने कहा कि मुल्क की स्वतंत्रता और संप्रभुता उनकी सरकार के लिए ज़्यादा ज़रूरी है.
मुइज़्ज़ू के संबोधन को भारत के मीडिया में हाथोंहाथ लिया गया. मुइज़्ज़ू के इस रुख़ के मायने निकाले गए कि उनकी सरकार इंडिया फ़र्स्ट की नीति छोड़ चुकी है और इंडिया आउट को लागू करने लगी है. भारत ने मालदीव की नई सरकार से कहा कि वह भारतीय सैनिकों की मौजूदगी को सही संदर्भ में देखे.
मोदी से पहली मुलाक़ात में उठाया मुद्दा
मुइज़्जू़ ने पिछले साल दिसंबर में यूएई में आयोजित कॉप-28 जलवायु सम्मेलन में पीएम मोदी से मुलाक़ात की थी. उन्होंने इस मुलाक़ात के बाद कहा था कि पीएम मोदी के सामने भारतीय सैनिकों की वापसी की बात उठाई थी और भारतीय प्रधानमंत्री उनकी बातों से सहमत थे. भारत सरकार का कहना है कि इस मुद्दे पर अभी बातचीत जारी है.
मालदीव की नई सरकार भारत के साथ किसी भी रक्षा सहयोग से अब बच रही है. मॉरिशस में पिछले महीने कोलंबो सिक्यॉरिटी कॉन्क्लेव आयोजित हुआ था और इसमें मालदीव ने अपने किसी भी प्रतिनिधि को नहीं भेजा था.
साल 2019 में मालदीव के समुद्री इलाक़े में सर्वे को लेकर भारत से समझौता हुआ था, जिसे मुइज़्ज़ू की सरकार ने ख़त्म कर दिया. इब्राहिम सोलिह के राष्ट्रपति रहते पीएम मोदी ने मालदीव का दौरा किया था, तभी हाइड्रोग्राफिक सर्वेइंग को लेकर एमओयू हुआ था. इसका मक़सद समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाना था. सोलिह सरकार इस समझौते को लेकर भी विपक्ष के निशाने पर रही थी. दिसंबर में मुइज़्ज़ू सरकार ने घोषणा कर दी कि यह समझौता अब आगे नहीं बढ़ेगा.
इन समझौते से अलग होने को मुइज़्ज़ू की चीन से बढ़ती क़रीबी के रूप में देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि मालदीव में जो रक्षा बढ़त भारत को सोलिह सरकार में मिली थी वो अब पूरी तरह से चीन के साथ शिफ़्ट हो गई है.
असम: नई सरकारी योजना के लिए बच्चों की सीमा तय

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अख़बार द इंडियान एक्सप्रेस में छपी एक ख़बर के अनुसार, असम के मुख्यमंत्री हिमन्ता बिस्वा सरमा ने ग्रामीण इलाक़ों की महिला उद्यमियों के लिए नई वित्तीय सहायता की घोषणा की है.
हालांकि मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता अभियान (एमएमयूए) नाम की इस योजना के लिए उन्होंने एक शर्त भी रखी है जिसे लेकर चर्चा हो रही है.
असस सरकार ने सरकारी योजना की लाभ लेने के लिए बच्चों की संख्या की सीमा तय की है और कहा है कि सामान्य और ओबीसी कैटिगरी की जो महिलाएं इस योजना का फ़ायदा उठाना चाहती हैं, उनके तीन से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए.
वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए ये सीमा चार बच्चों की है.
2021 में हिमन्ता बिस्वा सरमा ने कहा था कि असम सरकार जल्द ही राज्य में योजनाओं का लाभ उठाने वालों के लिए दो बच्चों की सीमा लागू करेगी.
लेकिन एमएमयूए योजना के लिए उन्होंने फ़िलहाल मानदंडों में कुछ ढील दी है.
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में नहीं शामिल होंगे चारों शंकराचार्य
चारों शंकराचार्यों के 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में शामिल न होने की ख़बरों के बीच अब दो शंकराचार्यों के राम मंदिर के समर्थन में सार्वजनिक तौर पर बयान देने की बात सामने आई है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक ख़बर के अनुसार विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने गुरुवार को कहा है कि द्वारका और श्रृंगेरी के शंकराचार्यों प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम का स्वागत किया है.
उन्होंने कहा कि, "पुरी के शंकराचार्य भी इस कार्यक्रम का समर्थन करते हैं. उन्होंने कहा है कि सही समय पर वो यहां आकर राम लला के दर्शन करेंगे."
"केवल ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य ने कार्यक्रम के ख़िलाफ़ बयान दिया है लेकिन बाकी तीनों शंकराचार्यों से साफ कहा है कि उनके हवाले के आ रहे बयान भ्रमित करने वाले थे और वो कार्यक्रम का पूरा समर्थन करते हैं."
कर्नाटक में श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ महाराज और गुजरात में द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज ने कहा है कि सनातन धर्म मानने वालों के लिए ये खुशी की बात है.
द्वारका पीठ के शंकराचार्य की तरफ से एक बयान जारी किया गया है जिसमें उन्होंने कहा है कि मीडिया में उनके हवाले से आ रही ख़बरें उनकी अनुमति के बिना चलाई जा रही हैं. इसी तरह श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य ने बयान जारी कर कहा है कि उनके नाम से चलाए जा रहे बयान भ्रमित करने के इरादे से चलाए जा रहे हैं.
इससे पहले उत्तराखंड के जोशीमठ में ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने एक बयान जारी कर कहा था कि चारों में से कोई भी शंकराचार्य अयोध्या में होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे क्योंकि मंदिर निर्माण का काम अभी पूरा नहीं हुआ है और प्राण प्रतिष्ठा का काम किया जा रहा है.
'वन नेशन वन इलेक्शन' पर ममता बनर्जी बोलीं

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 'वन नेशन वन इलेक्शन' मुद्दे को लेकर अपना रुख़ साफ किया है.
उन्होंने बुधवार को कहा है कि ये भारत के संवैधानिक बुनियादी ढांचे के ख़िलाफ़ है और सही नहीं है.
अख़बार द इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इससे जुड़ी कमिटी की अध्यक्षता कर रहे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इस मामले में एक पत्र लिखा है.
उन्होंने लिखा है कि 1952 में ऐसी ही एक कोशिश की गई थी. उस वक्त आने वाले कुछ सालों तक लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए थे, लेकिन ये कोशिश लंबे वक्त तक कायम नहीं रह सकी थी.
उन्होंने लिखा, "देश में संघ और राज्य के चुनाव एक साथ नहीं होना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की मूल संरचना का हिस्सा है. ये शासन की वेस्टमिंस्टर प्रणाली की एक बुनियादी विशेषता है."
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