इंडिया गठबंधन: पश्चिम बंगाल में सीट बंटवारे की कसौटी पर टीएमसी और कांग्रेस की दोस्ती

'इंडिया की बैठक. फ़ाइल फ़ोटो

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पश्चिम बंगाल में चुनावी गठबंधन को लेकर कांग्रेस और टीएमसी के बीच ज़ुबानी जंग लगातार जारी है.

विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ के लिए जिस राज्य में सीटों की साझेदारी सबसे मुश्किल दिखती है वह पश्चिम बंगाल ही है.

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बीते दिनों जब पत्रकारों ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी से पूछा कि ममता बनर्जी राज्य में कांग्रेस को केवल दो सीटें देना चाहती हैं तो इस पर अधीर रंजन चौधरी काफ़ी गुस्से में नज़र आए.

अधीर रंजन चौधरी ने कहा, "ये दोनों सीटें हमारे पास हैं. हमें उनकी दया की कोई जरूरत नहीं है. हम अपने दम पर लड़ सकते हैं. वे नहीं चाहतीं कि गठबंधन हो क्योंकि अगर गठबंधन नहीं होता है तो सबसे ज़्यादा खुशी पीएम मोदी को होगी और ममता बनर्जी आज जो कर रही हैं, वो पीएम मोदी की सेवा में लगी हुई हैं..."

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यही नहीं शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना में एक जाँच के लिए गई प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की टीम पर हुए हमले के लिए भी अधीर रंजन चौधरी ने ममता सरकार पर निशाना साधा है.

ममता बनर्जी अक्सर आरोप लगाती रही हैं कि वो केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रही हैं, लेकिन राज्य के कांग्रेस और वाम दलों के नेता उनके ख़िलाफ़ बोलते रहते है.

दरअसल ममता के कथित प्रस्ताव के पीछे राज्य में चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 42 सीटों में टीएमसी को 22, बीजेपी को 18 और कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं. जबकि वाम दल राज्य की एक भी सीट नहीं जीत सके.

पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे

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क्या कहते हैं आँकड़े

पिछले लोकसभा चुनाव के आँकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल की 42 में से क़रीब 40 सीटों पर बीजेपी और टीएमसी के बीच सीधा मुक़ाबला हुआ.

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उन चुनावों में कांग्रेस को केवल बहरामपुर और मालदा दक्षिण की सीट पर जीत मिली थी. जबकि राज्य की 34 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार को दस फ़ीसदी से भी कम वोट मिले थे. इनमें से ज़्यादातर सीटों पर तो कांग्रेस को 2 फ़ीसदी के आसपास ही वोट मिले थे.

राज्य की मालदा उत्तर सीट पर कांग्रेस को 22.52 फ़ीसदी वोट मिले थे. इस सीट पर टीएमसी दूसरे नंबर पर थी. उस वक़्त यह सीट बीजेपी के खाते में गई थी. ऐसे में ममता बनर्जी की पार्टी क्या इस सीट को कांग्रेस के लिए छोड़ देगी, यह सवाल भी बना हुआ है.

जंगीपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस 19.61 फ़ीसदी वोट हासिल करने में सफल रही थी. लेकिन यह सीट टीएमसी के खाते में गई थी, जबकि दूसरे नंबर पर बीजेपी रही थी. ऐसे में ममता अपने जीती हुई सीट छोड़ देंगी इसकी संभावना भी कम दिखती है.

इसके अलावा महज़ एक और सीट पर कांग्रेस अपना सम्मान बचान में सफल रही थी. यह मुर्शिदाबाद लोकसभा सीट थी, जहाँ कांग्रेस के उम्मीदवार को 25 फ़ीसदी वोट मिले थे. हालाँकि यह सीट भी टीएमसी के खाते में गई थी. यानी यह सीट भी ममता बनर्जी आसानी से छोड़ने वाली नहीं हैं.

ममता बनर्जी अक्सर अपने तेवर के लिए सुर्खियों में रहती हैं.

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क्या है चुनौती

ऐसा ही हाल वाम दलों का था. सीपीएम के उम्मीदवारों को पांच सीटों पर दस प्रतिशत या इससे ज़्यादा वोट मिले. लेकिन इनमें से 4 सीटों जादवपुर, कोलकाता दक्षिण, श्रीरामपुर और बर्दमान पूर्व में टीएमसी की जीत हुई थी. जबकि बर्दमान-दुर्गापुर की सीट बीजेपी के खाते में गई थी.

अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर से सांसद हैं और वो फ़िलहाल लोकसभा में कांग्रेस के नेता हैं. ज़ाहिर है एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और ममता बनर्जी के बीच रिश्तों की यह तल्ख़ी भी दोनों दलों के बीच गठबंधन के रास्ते में बड़ी रूकावट मानी जाती है.

ये माना जाता है कि अधीर रंजन चौधरी की नाराज़गी के पीछे उनके और ममता बनर्जी के बीच छत्तीस का आँकड़ा है. ये तनातनी उस दौर से है जब ममता बनर्जी कांग्रेस में हुआ करती थीं. ममता बनर्जी साल 1998 में कांग्रेस से अलग हुई थीं और उन्होंने अपनी पार्टी ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ (टीएमसी) बनाई थी.

ममता बनर्जी और राहुल गांधी

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वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक कहते हैं, “राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस अब भी चाहती है कि अंतिम बात वही बोले, जबकि मौजूदा समय में हिन्दुस्तान की हक़ीकत बदल गई है. अब कांग्रेस के पास ज़्यादा कुछ बचा नहीं है."

वो कहते हैं, “मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि अगर कांग्रेस की दुश्मन बीजेपी है और उसे हराना चाहती है तो कांग्रेस को उन इलाक़ों में पंगा करने की क्या ज़रूरत है, जहाँ क्षेत्रीय दल मज़बूत हैं. बंगाल को ममता अकेले संभाल सकती हैं. यहाँ कांग्रेस को जूनियर पार्टी का रोल अदा करना चाहिए.”

पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की 220 सीटों में बीजेपी को महज़ क़रीब 50 सीट मिलती हैं. क्योंकि इनमें से ज़्यादातर जगहों पर क्षेत्रीय दल बहुत ताक़तवर हैं. हालाँकि बीजेपी इन राज्यों में अपनी ताक़त बढ़ाने की कोशिश में लगातार लगी हुई है.

अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्जी के बीच पुरानी अदावत मानी जाती है.

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कांग्रेस की मांग कितनी सही?

वरिष्ठ पत्रकार समीर के पुरकायस्थ के मुताबिक़, “टीएमसी और कांग्रेस के शीर्ष नेता चाहते हैं कि दोनों दलों में गठबंधन हो, लेकिन अधीर रंजन चौधरी ऐसा नहीं चाहते हैं. वो 7 सीटों की मांग करते हैं, जबकि राज्य में कांग्रेस के बाक़ी नेताओं को भी पता है कि कांग्रेस की स्थिति क्या है इसलिए वो गठबंधन के पक्ष में हैं.”

सुबीर भौमिक कहते हैं कि ममता अगर राज्य की उस्ताद है तो अधीर रंजन चौधरी मुर्शिदाबाद के उस्ताद हैं. मुर्शिदाबाद के इलाक़े में उनका राज चलता है, जैसे पहले के समय में मुंबई के बारे में कहा जाता था कि यह इलाक़ा इसका है और वह उसका.

ममता बनर्जी केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री रही हैं और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में भी. जब ममता ने मनमोहन सिंह सरकार में रेल मंत्री का पद छोड़ा था तब माना जाता था वो टीएमसी कोटे से मुकुल रॉय को रेल मंत्री बनवाना चाहती थीं.

लेकिन उस वक़्त यूपीए सरकार में टीएमसी के कोटे से दिनेश त्रिवेदी के नाम पर सहमति बनी थी. जब दिनेश त्रिवेदी ने साल 2012 के रेल बजट में रेलवे के किराए में बढ़ोत्तरी कर दी थी तो ममता बनर्जी काफ़ी नाराज़ हुई थीं और दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था.

रेल बजट पेश करने के दिन ही दिनेश त्रिवेदी को लेकर जो कुछ हुआ था, वह उस समय की यूपीए सरकार के लिए सहज स्थिति नहीं थी. यानी कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से भी ममता का पुराना मनमुटाव रहा है. हालाँकि अब बदले राजनीतिक समीकरण में इसमें बदलाव भी आया है.

गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के बिनय तमांग के कांग्रेस में आने से दार्जिलिंग में कांग्रेस को फ़ायदा हो सकता है.

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अगर गठजोड़ नहीं हुआ तो...

ये माना जाता है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के पास मुसलमानों का बड़ा वोट बैंक है, जो कि 27 फ़ीसदी के क़रीब है. लेकिन पिछले कुछ चुनावों में उसके मुस्लिम वोट शिफ़्ट हुए हैं. इसलिए ममता बनर्जी चाहती हैं कि टीएमसी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाए ताकि मुस्लिम वोटों का विभाजन न हो सके.

मुर्शिदाबाद के इलाक़े में अगर अधीर रंजन चौधरी का असर है तो कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेता एबीए गनी खाँ चौधरी की वजह से मालदा के इलाक़े में आज भी कांग्रेस का असर दिखता है.

एबीए गनी ख़ाँ चौधरी के निधन के बाद इलाक़े में कांग्रेस का असर धीरे-धीरे कम होता गया है. साल 2019 में मालदा उत्तर लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद मौसम बेनज़ीर नूर के तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद मालदा में कांग्रेस की स्थिति और कमज़ोर ही हुई है.

इन सब के बाद भी मुर्शिदाबाद और मालदा में मुस्लिम वोट कांग्रेस को भले ही मिल जाए, लेकिन अगर टीएमसी और कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं हुआ, तो कांग्रेस जो भी वोट काटेगी उसका सीधा फ़ायदा बीजेपी को मिलेगा.

समीर के पुरकायस्थ का मानना है, “यहां बंगाल में कांग्रेस को ज़्यादा से ज़्यादा 3-4 सीटों पर लड़ना चाहिए. लेकिन अधीर रंजन चौधरी 7 सीट चाहते हैं और बात यहीं पर अटकी है. ममता बनर्जी कांग्रेस की दो जीती हुई सीटों के अलावा दार्जिलिंग की सीट दे सकती हैं, जो अभी बीजेपी के पास है.

दरअसल प्रमुख गोरखा नेता और दार्जिलिंग पहाड़ियों पर शासन करने वाली क्षेत्रीय स्वायत्त संस्था गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन यानी जीटीए के पूर्व अध्यक्ष बिनय तमांग पिछले साल नवंबर में कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

माना जाता है कि उनके कांग्रेस में शामिल होने से इलाक़े में कांग्रेस की ताक़त बढ़ी है. उनके कांग्रेस में शामिल होने के बाद से ही अटकलें हैं कि वो साल 2024 में कांग्रेस के टिकट पर दार्जिलिंग से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं.

सुबीर भौमिक कहते हैं, “कांग्रेस को बंगाल को छोड़कर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए और वहां से 100 सीटें लाकर दिखाना चाहिए.”

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में अपनी ताक़त काफ़ी बढ़ाई है. हालांकि स्थानीय निकाय के चुनावों में उसका प्रदर्शन कमज़ोर हुआ है.

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लेफ़्ट का संकट: ‘बाम से राम’

समीर के पुरकायस्थ के मुताबिक़, “साल 2018 में हुए पंचायत चुनावों में सीपीएम और टीएमसी के कार्यकर्ताओं के बीच ज़मीनी स्तर पर कई बार हिंसक झड़प हुई थी. इस हिंसा के बाद लेफ़्ट कार्यकर्ताओं को लगा कि बीजेपी केंद्र में शासन में है इसलिए उनको वोट देने से सुरक्षा मिलेगी और लेफ़्ट के वोटरों ने पिछले लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में बीजेपी को वोट दिया था.”

उसके बाद पश्चिम बंगाल में एक कहावत चल पड़ी थी, ‘बाम का राम होना’. यानी वामपंथी वोटरों का बीजेपी की तरफ चले जाना. लेकिन जानकार मानते हैं कि बीजेपी को मिले वामपंथी वोट अब धीरे-धीरे उससे दूर जा रहे हैं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी को 40 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे. उसके बाद साल 2021 में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 38 फ़ीसदी वोट मिले थे. लेकिन साल 2022 में राज्य में हुए नगरपालिका चुनाव और फिर साल 2023 में हुए पंचायत चुनावों में बीजेपी का वोट घटकर क़रीब 15 फ़ीसदी रह गया है.

समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, “लेफ़्ट भी चाहता है कि वह टीएमसी के साथ गठबंधन न हो क्योंकि पुरानी दुश्मनी की वजह से लेफ़्ट के वोटर टीएमसी को वोट नहीं देंगे. इससे वो फिर से बीजेपी की तरफ जा सकते हैं. जो टीएमसी और लेफ़्ट दोनों के लिए नुक़सान है.”

सुबीर भौमिक भी कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता को अब भी बीजेपी से ज़्यादा ख़तरा सीपीएम से है. उनका मानना है कि पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाक़ों और बिहार-झारखंड के सीमावर्ती इलाक़ों में बीजेपी 6-7 सीटें ला सकती है, लेकिन सीपीएम अब भी पूरे राज्य में मौजूद है.

पिछले लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट और कांग्रेस का गठबंधन था. लेकिन इस बार सीपीएम भी नहीं चाहती है कि वो ममता बनर्जी के साथ कोई गठबंधन करे. माना जाता है कि इससे सीपीएम को यह डर है कि उसके जो वोटर वापस आ रहे हैं, वो फिर से दूर जा सकते हैं.

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