मालदीव के राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू चीन से लौटते ही क्यों हुए और आक्रामक, भारत के लिए क्या संकेत

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने चीन की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा से लौटने के बाद भारत को लेकर आक्रामक तेवर अपना लिए हैं. वो भारत का नाम लिए बिना हमले कर रहे हैं.
ये माना जा रहा था मालदीव के मंत्रियों की ओर से भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों के बाद दोनों देशों के रिश्तों में जो खटास आई है, उसे दूर करने के लिए कोई सकारात्मक पहल की जा सकती है.
मालदीव के विपक्षी दल भी मांग कर रहे थे मंत्रियों को निलंबित करना काफ़ी नहीं है और मालदीव सरकार को भारत से इस विषय पर आधिकारिक तौर पर खेद प्रकट करना चाहिए.
मगर शनिवार को जब मुइज़्ज़ू पांच दिवसीय चीन यात्रा से स्वदेश लौटे तो उन्होंने पत्रकारों के सवालों के जवाब के दौरान कहा, "हम भले ही छोटे देश हैं, लेकिन इससे किसी को हमें धमकाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता."
उन्होंने हिंद महासागर को लेकर कहा कि 'ये समंदर किसी ख़ास देश का नहीं है. ये उन सभी देशों का है, जो यहां और इसके आसपास बसे हैं.'
मुइज़्ज़ू का यह भी कहना था कि 'हम किसी के बैकयार्ड में मौजूद देश नहीं हैं, हम एक स्वतंत्र और संप्रभु देश हैं.
इन सब बातों के दौरान मालदीव के राष्ट्रपति ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन भारत और मालदीव के बीच हाल में उभरे तनाव के बीच ये माना जा रहा है कि उनके बयानों का संदर्भ भारत से जुड़ता है.
इन बयानों के इतर, मुइज़्ज़ू के चीन से मालदीव लौटते ही वहां की सरकार ने कुछ ऐसे फ़ैसले किए, जिनका सीधा संबंध भारत से जुड़ता है.
जैसे कि मालदीव के मरीज़ों को उच्च स्वास्थ्य सुविधाओं और इलाज के लिए भारत और कुछ अन्य देशों में भेजा जाता रहा है, लेकिन चीन से लौटते ही मुइज़्ज़ू ने एलान किया कि उन्हें संयुक्त अरब अमीरात और मलेशिया भी भेजा जाएगा.
रविवार शाम को ताज़ा ख़बर यह आ गई कि मालदीव ने भारत को 15 मार्च तक मालदीव से अपने सैनिकों को वापस बुलाने को कहा है.

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मुइज़्ज़ू ने क्यों अपनाए ऐसे तेवर?
मोहम्मद मुइज़्ज़ू का भारत विरोधी रुख़ नई बात नहीं है. बीते साल जब वह चुनाव लड़ रहे थे, तब उनका चुनावी अभियान भारत के विरोध पर केंद्रित था.
उन्होंने 'इंडिया आउट' का नारा बुलंद करते हुए वादा किया था कि सत्ता में आते ही मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस भेज दिया जाएगा.
लेकिन चीन यात्रा से लौटते ही मुइज़्ज़ू ने भारत को लेकर जिस तरह की आक्रामकता दिखाई है, उसकी वजह क्या है?
दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं कि मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने भले भारत का नाम न लिया हो, लेकिन उनका इशारा भारत की ओर ही था, मगर इस बयान को ज़्यादा तरजीह नहीं दी जानी चाहिए.
वह कहते हैं, "सैद्धांतिक तौर पर कोई भी देश कभी भी यह बात कह सकता है कि हम संप्रभु देश हैं और हमें कोई धमका नहीं सकता. इसे सामान्य रूप से ही देखा जाना चाहिए क्योंकि छोटे देशों को हमेशा डर रहता है कि बड़ी शक्तियां हम पर दबाव डाल सकती हैं. लेकिन ये बात ज़रूर है कि मुइज़्ज़ू चीन से लौटे हैं और चीन ने आश्वासन दिया है कि हम आपकी मदद करेंगे, आप अपनी स्वतंत्र नीति पर चलिए. ऐसे में यह बात उनके दिमाग़ में रही होगी कि चीन का समर्थन है तो मैं बेबाक़ होकर यह बात कह सकता हूं."
चीन ने आश्वासन दिया है कि हम आपकी मदद करेंगे, आप अपनी स्वतंत्र नीति पर चलिए. ऐसे में यह बात मुइज़्ज़ू के मन में रही होगी कि चीन का समर्थन है तो मैं बेबाक़ होकर यह कह सकता हूं.
थिंक टैंक 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन' (ओआरएफ़) में एसोसिएट फ़ेलो आदित्य शिवमूर्ति भी मानते हैं कि चीन से मिली 'मदद और गारंटी' के कारण मुइज़्ज़ू ने इस तरह का रुख़ अपनाया है.
वह कहते हैं, "मुइज़्ज़ू का भारत विरोधी रुख़ पहले से चला आ रहा है. इसका एक कारण है वहां की आंतरिक राजनीति. उनकी विचारधारा ऐसी है कि वे भारत को दुश्मन की तरह पेश करते रहे हैं, जिससे राजनीतिक लाभ मिलता है. फिर वह ख़ुद को राष्ट्रवादी नेता के तौर पर दिखाना चाहते हैं और इसके लिए भी भारत का नाम लेते हैं."
आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं, "अब मुइज्ज़ू को चीन से मदद मिल चुकी है. पहले भारत पर मालदीव की ज़्यादा निर्भरता रहती थी, लेकिन अब चीन ने 13 करोड़ अमेरिकी डॉलर की मदद का वादा किया है. उसने मालदीव को दिए कर्ज़ को रीस्ट्रक्चर करने का भी वादा किया है. तो अब एक तरह से मालदीव को चीन से गारंटी मिली है. ऐसे में मुइज्ज़ू खुलकर यह रुख़ अपना रहे हैं और भारत पर दबाव बना रहे हैं."

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भारत पर निर्भरता घटाने का अभियान
यूरोपीय संघ के इलेक्शन ऑब्ज़र्वेशन मिशन ऑफ़ मालदीव ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें कहा गया था कि सत्ताधारी प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव (पीपीएम) और पीपल्स नेशनल कांग्रेस (पीएनसी) का रुख़ भारत विरोधी है.
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन पार्टियों ने साल 2023 में हुए राष्ट्रपति चुनावों के दौरान भ्रामक जानकारियां फैलाने की कोशिश की थी.
मुइज़्ज़ू और उनकी पार्टी ने चुनावों के दौरान 'इंडिया आउट' का नारा दिया था और फिर सत्ता में आने के बाद मुइज़्ज़ू ने कहा था कि मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस भेजने की दिशा में बात शुरू हो गई है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, सरकार के ताज़ा आंकड़ों के हिसाब से मालदीव में फिलहाल 88 भारतीय सैनिक हैं.
भारत का कहना है कि ये यहां रडार और हेलिकॉप्टरों को चलाने और उनके रख-रखाव के लिए तैनात हैं. मुइज्ज़ू इन्हें मालदीव की संप्रुभता के लिए ख़तरा बताते रहे हैं.
रविवार को राष्ट्रपति के मुख्य सचिव अब्दुल्ला नज़ीम इब्राहिम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बताया कि मालदीव सरकार ने भारतीय सैनिकों को देश छोड़ने के लिए 15 मार्च का समय दिया है.

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इससे पहले, मुइज़्ज़ू ने चीन से लौटने के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एलान किया था कि 'सरकार अपनी यूनिवर्सल हेल्थकेयर इंश्योरेंस स्कीम की कवरेज को यूएई और थाइलैंड तक बढ़ा रही है, ताकि चुनिंदा देशों पर निर्भरता कम की जा सके.'
अभी तक अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बड़ी संख्या में मालदीव के मरीज़ भारत का रुख़ करते हैं, क्योंकि भारत उन्हें नज़दीक पड़ता है.
इन सब फ़ैसलों को लेकर प्रोफ़ेसर एसडी मुनि कहते हैं कि भारत के साथ तनाव की जड़ें तो मुइज़्ज़ू के चुनावी अभियान में ही थीं.
वह कहते हैं, "इंडिया आउट" उनका नारा था. स्वाभाविक था जीतने पर उन्हें भारत पर निर्भरता कम करनी थी, उससे दूरी बनानी थी. अब वैसा ही हो रहा है."
अगर मालदीव अपनी निर्भरता भारत से घटाना चाहता है तो इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. हमारे सारे पड़ोसी देश- श्रीलंका, नेपाल और भूटान भी चाहते हैं कि वे एक देश पर निर्भर न रहें.
वह कहते हैं, "अगर मालदीव अपनी निर्भरता भारत से घटाना चाहता है तो इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. हमारे सारे पड़ोसी देश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान भी चाहते हैं कि वे एक देश पर निर्भर न रहें. कोई भी देश या उनका नेता नहीं चाहेगा कि उसके पास कोई विकल्प न हों. इसे भारत को लेकर किसी तरह का हमला नहीं मानना चाहिए."
ओएफ़आर में रिसर्च एसोसिएट आदित्य शिवमूर्ति बताते हैं कि भारत से निर्भरता पूरी तरह ख़त्म करना मालदीव के लिए संभव नहीं है, क्योंकि चीन से उसे मुफ़्त में मदद नहीं मिल रही.
वह कहते हैं, "मालदीव ने चीन के साथ कर्ज़ को रीस्ट्रक्चर करने प्रक्रिया पर बात की है. लेकिन श्रीलंका ने जो चीन के कर्ज़ लिया था, उसे लेकर डेढ़ साल प्रक्रिया चली मगर उसमें पारदर्शिता नहीं आई. मालदीव को चीन से राजनीतिक और आर्थिक क़ीमत पर मदद मिल रही है, मुफ़्त में नहीं. हो सकता है वह भारत से निर्भरता कम करे, लेकिन भारत को पूरी तरह दूर करना मालदीव के लिए संभव नहीं है."
मालदीव पर पहले से ही चीन का 1 अरब 37 करोड़ डॉलर का कर्ज़ है. वर्ल्ड बैंक के अनुसार, मालदीव के कुल कर्ज़ का 20 फ़ीसदी हिस्सा अकेले चीन से लिया गया है.
ये कर्ज़ सऊदी अरब और भारत से भी ज़्यादा है. इन दोनों देशों का मालदीव पर क़रीब 12-12 करोड़ डॉलर का कर्ज़ है.

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चीन ने क्यों किया इतना बड़ा निवेश?
मालदीव में भारत और चीन दोनों अपना दबदबा बनाने की कोशिश में दिखते हैं.
दरअसल, मालदीव हिंद महासागर में ऐसी जगह पर है, जहां इसका रणनीतिक महत्व बहुत बढ़ जाता है. यह एक अहम समुद्री रास्ते के क़रीब है.
जानकारों का कहना है कि भारत विरोधी रुख़ होने के कारण मुइज़्ज़ू का आर्थिक मदद के लिए चीन की ओर देखना स्वाभाविक था.
बीते साल हुए चुनाव में मुइज़्ज़ू पीपीएम के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे. उस वक्त पार्टी का नेतृत्व पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन कर रहे थे, जिन्हें चीन समर्थक के रूप में देखा जाता है.
लेकिन मुइज़्ज़ू से पहले जब मालदीव के उपराष्ट्रपति हुसैन मोहम्मद लतीफ़ बीते साल के अंत में चीन गए थे, मगर कई बैठकों के बावजूद मालदीव के लिए कुछ ख़ास हासिल नहीं कर पाए थे.
अब जब मुइज़्ज़ू ख़ुद चीन गए तो उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनसे मुलाक़ात की और मालदीव को चीन का पुराना दोस्त बताया. शी जिनपिंग ने मालदीव के पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए चीन से सीधी उड़ानें बढ़ाने का भरोसा दिया है.
इसके साथ ही, चीन ने हिंद महासागर के कई द्वीपों वाले इस देश में निवेश और रणनीतिक साझेदारी को और बढ़ाने का फ़ैसला किया है.
चीन से लौटने के बाद मालदीव के राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू ने बताया:
- चीन मालदीव को 13 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आर्थिक मदद देगा
- इस मदद के बड़े हिस्से से राजधानी में सड़कों का पुनर्निमाण होगा
- मालदीव की एयरलाइन 'मालदीवियन' चीन में घरेलू उड़ानें शुरू करेगी
- हुलहुमाले में पर्यटन क्षेत्र विकसित करने के लिए चीन 5 करोड़ अमेरिकी डॉलर देगा
- विलिमाले में 100 बेड के एक अस्पताल के लिए भी चीन अनुदान देगा
मालदीव की आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर नज़र रखने वाले आदित्य शिवमूर्ति बताते हैं कि मालदीव की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से चीन वहां निवेश बढ़ाने से बच रहा था, क्योंकि मुइज़्ज़ू संसद में बहुत मज़बूत स्थिति में नहीं थे.
आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं, "हाल में मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के एक दर्जन से ज़्यादा सांसद मुइज़्ज़ू की पार्टी में शामिल हो गए हैं और अब उनकी स्थिति संसद में मज़बूत हुई है. ऐसे में चीन को भी भरोसा मिला कि अब हम यहां निवेश कर सकते हैं. पहले वह अनिश्चितता भरे माहौल में मालदीव में निवेश नहीं करना चाहता था."

क्या संकट में हैं भारत के हित?
भारत उन पहले देशों में शुमार था जिसने मालदीव की आज़ादी के बाद उसे एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी और फिर 1965 में भारत ने यहां अपना मिशन खोला था. ऐसा करने वाला वह पहला देश था.
बाद के सालों में मालदीव में आई सरकारों का झुकाव या तो भारत की तरफ रहा या फिर चीन की तरफ. जैसे मुइज़्ज़ू से पहले राष्ट्रपति रहे इब्राहिम सोलिह भारत के क़रीबी माने जाते थे, हालांकि उन्होंने चीन और भारत के बीच संतुलन साधने की कोशिश की थी.
उनसे पहले मुइज़्ज़ू की ही पार्टी के अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति थे, जिन्हें चीन का क़रीबी समझा जाता था.
अब मुइज़्ज़ू ने फिर चीन की तरफ़ ज़्यादा झुकाव दिखाया है. इसका असर पर भारत पर और भारत-मालदीव संबंधों पर किस तरह से पड़ेगा?
आप भौगोलिक वास्तविकताओं को नहीं बदल सकते. मालदीव भले कहे कि वह तुर्की से अनाज लेगा, मरीज़ों को यूएई भेजा जाएगा. मगर ये सब व्यावहारिक नहीं है.
इस सवाल पर आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं, "साल 2015-17 में भारत और नेपाल के बीच तनाव बना था तो नेपाल ने कहा था कि हम भारत से निर्भरता घटाकर चीन से सहयोग बढ़ाएंगे. लेकिन अब भी कुछ ख़ास नहीं बदला है. चीनी बंदरगाहों से नेपाल ने आयात की पहल की, लेकिन भारतीय बंदरगाहों से आयात उसे सस्ता पड़ता है."
"तो बात यह है कि आप भौगोलिक वास्तविकताओं को नहीं बदल सकते. मालदीव भले कहे कि उसे चीन से मदद मिली है, तुर्की से अनाज मिलेगा, कहीं और से दवाएं लेंगे और मरीज़ों को यूएई और मलेशिया भेजेंगे, मगर ऐसा व्यवहारिक नहीं है."
आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं, "ये सब बोलने को ठीक है लेकिन इमर्जेंसी के मामले में किसी मरीज़ को 30 मिनट में भारत में तिरुवनंतपुरम या कोयम्बटूर पहुंचाया जा सकता है, न कि मलेशिया या दुबई. इसी तरह नज़दीक में भारत से अनाज का आयात ज़्यादा ठीक रहेगा, न कि आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे तुर्की से."

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'चाहकर भी दूर नहीं हो सकते दोनों देश'
भारत और मालदीव के बीच रिश्तो में इस साल तब अचानक तनाव आ गया था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लक्षद्वीप यात्रा की तस्वीरों पर मालदीव बनाम लक्षद्वीप की बहस छिड़ गई थी.
भारतीयों का कहना था कि भारत के लोगों को मालदीव के बजाय लक्षद्वीप जाना चाहिए. इस पर मालदीव की मंत्री मरियम शिउनी ने पीएम मोदी और भारत को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं.
इसके बाद उन्हें और दो अन्य मंत्रियों को मुइज़्ज़ू सरकार ने तुरंत निलंबित कर दिया था. भारत में सोशल मीडिया पर इसे लेकर बायकॉट मालदीव का ट्रेंड देखने को मिला.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं कि सोशल मीडिया पर हुई इस अनावश्यक बहस के कारण दोनों देशों के संबंधों में अकारण ही खटास आ गई.
वह कहते हैं, "यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि कुछ अख़बारों में ख़बर आई थी कि मालदीव के राष्ट्रपति भारत आना चाहते थे लेकिन भारत ने कहा था कि अभी वक़्त नहीं है. ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्योंकि भारत विरोधी अभियान चलाकर जीतने पर भारत में स्वागत होना मुश्किल है. फिर लक्षद्वीप वाली घटना हो गई. पीएम नरेंद्र मोदी वहां गए, उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन उनके समर्थकों ने इसे बेवजह मुद्दा बना दिया."
एसडी मुनि कहते हैं, "मालदीव के जिन मंत्रियों ने आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, उन्हें वहां तुरंत निलंबित कर दिया गया था. फिर हमने उनके राजनयिक को तलब कर लिया. कूटनीतिक मामले में ये सब ठीक है लेकिन इससे राजनीतिक संदेश यह जाता है कि आपस में तनातनी है. और फिर जब मुइज़्ज़ू दूसरे देशों में गए तो सबने कहा कि हम आपकी मदद करेंगे. तो फिर वो क्यों न ज़ोर-शोर से अपनी बात कहेंगे?"
हो सकता है कुछ समय के लिए भारत के हित प्रभावित हों, लेकिन हक़ीक़त यह है कि मालदीव और भारत, दोनों ही एक-दूसरे को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.
लेकिन क्या हाल के घटनाक्रम के कारण इन दोनों देशों की दोस्ती टूटने की कगार पर पहुंच गई है?
थिंक टैंक 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन' (ओआरएफ़) में एसोसिएट फ़ेलो आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं कि जब तक मुइज़्ज़ू हैं, हो सकता है कुछ ऐसी दिक्कतें आएं लेकिन बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं होगा.
उनका कहना है, "हो सकता है कुछ समय के लिए भारत के हित प्रभावित हों, लेकिन हक़ीक़त यह है कि मालदीव और भारत, दोनों ही एक-दूसरे को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते."
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