बर्फ़ीली चोटियों पर लगातार चौथे साल भारत-चीन की सेनाएं होंगी आमने-सामने

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लगातार चौथे साल सर्दियों में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने होंगी.
2020 में दोनों देशों के बीच शुरू हुआ सीमा विवाद आज भी पूरी तरह सुलझने से कोसों दूर है. सीमा के दोनों ओर हज़ारों की संख्या में सैनिक तैनात हैं.
दोनों पक्षों ने अब तक सैन्य स्तर की 20 दौर की वार्ताएं की हैं और कुछ इलाकों में पीछे भी हटे हैं.
जिन इलाक़ों में दोनों देशों के सैनिक पीछे हटे हैं उनमें गलवान, पैंगोंग त्सो के उत्तर और दक्षिण तट, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में पेट्रोलिंग पॉइंट 17 और पेट्रोलिंग पॉइंट 15 शामिल हैं. इन जगहों पर डी-मिलिटराइज़्ड 'बफ़र ज़ोन' बना दिए गए हैं.
पैंगोंग त्सो से हटने पर सहमति फ़रवरी 2021 में बन गई थी. इसी तरह गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में पेट्रोलिंग पॉइंट 17 से दोनों देशों की सेनाएं अगस्त 2021 में हट गई थीं. लेकिन उसके बाद से बातचीत के कई दौर गुज़र जाने के बाद भी डेमचोक और डेपसांग के इलाक़े को लेकर कोई समाधान नहीं निकल पाया.

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20वें दौर की सैन्य वार्ता में कोई प्रगति नहीं
भारत-चीन कोर कमांडर स्तर की बैठक का 20वां दौर नौ और 10 अक्टूबर को भारतीय सीमा पर चुशुल-मोल्डो सीमा मीटिंग पॉइंट पर आयोजित किया गया था.
बैठक के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा, "दोनों देशों के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के मुताबिक़ और 13-14 अगस्त 2023 को आयोजित कोर कमांडरों की बैठक के अंतिम दौर में हुई प्रगति के आधार पर दोनों पक्षों ने पश्चिमी क्षेत्र में एलएसी के साथ शेष मुद्दों के शीघ्र और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान के लिए स्पष्ट, खुले और रचनात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान किया. वे प्रासंगिक सैन्य और राजनयिक तंत्र के माध्यम से बातचीत और बातचीत की गति को बनाए रखने पर सहमत हुए. उन्होंने अंतरिम रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर पर शांति बनाए रखने की भी प्रतिबद्धता जताई."
इस बयान से यह स्पष्ट हो गया कि सीमा वार्ता पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर चल रहे गतिरोध को ख़त्म करने के लिए कोई ख़ास कामयाबी नहीं ला सकी.
ये माना जा रहा है कि चीन के डेमचोक और डेपसांग के इलाकों पर बातचीत करने से इनकार करने की वजह से दोनों देशों के बीच का सीमा गतिरोध नहीं सुलझ पा रहा है.
इस मुद्दे का समाधान निकट भविष्य में न हो पाने के पीछे राजनीतिक वजहें भी हो सकती हैं.
'चुनावी वर्ष में इस मामले का हल निकलना मुश्किल'
डॉक्टर अल्का आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के पूर्वी एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर हैं.
बीबीसी ने उनसे समझना चाहा कि भारत और चीन के बीच एलएसी पर चल रहा गतिरोध किस दिशा में जाता दिख रहा है.
उन्होंने कहा, "ज़ाहिर है कि दोनों देशों के बीच बने हालात लंबे समय तक चलेंगे. ये साफ़ है कि चीन ने उन जगहों पर कब्ज़ा कर लिया जिन्हें भारत अपना इलाक़ा कहता है. साल 2020 में शुरू हुआ ये मामला कोई सामान्य झड़प नहीं थी जहां चीनी सैनिक आये, भिड़े और वापस चले गए. ये वास्तव में उन जगहों पर क़ब्ज़ा करने के बारे में है जो पहले भारत के नियंत्रण में थीं. इसलिए ये मामला जल्दी सुलझने वाला नहीं है और चूंकि ये एक गंभीर घटना है इसलिए इसे हल करने में वक़्त लगेगा."
डॉ आचार्य के मुताबिक़ इस मुद्दे का समाधान निकट भविष्य में न हो पाने के पीछे राजनीतिक वजहें भी हो सकती हैं.
वे कहती हैं, "भारत चुनावी वर्ष में जा रहा है और घरेलू फैक्टर सत्तारूढ़ पार्टी को इस बात के लिए मजबूर करेंगे कि वो चुनावी माहौल में इस तरह के मामले में समझौता करते हुए या हार मानते हुए न दिखे."

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'दोनों देशों का सीमा को लेकर अपना-अपना नज़रिया'
भारत और चीन के बीच सीमा पूरी तरह से स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है. भारत का कहना है कि सीमा 3,488 किलोमीटर लंबी है लेकिन चीन इसे क़रीब 2,000 किलोमीटर बताता है. दोनों देशों का सीमा को लेकर नज़रिया एक दूसरे से काफ़ी अलग है.
भारतीय सेना के सेवानिवृत मेजर जनरल एसबी अस्थाना रक्षा और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं.
वे कहते हैं कि जहां तक सीमाओं और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का सवाल है तो दोनों पक्षों का अपना-अपना नज़रिया है.
मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं, "जहां तक भारत और चीन का सवाल है, जब वे बात करते हैं तो दोनों पक्ष ‘देना कुछ नहीं चाहते’ और ‘लेना सब कुछ चाहते’ हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो बातचीत कुछ ऐसी है: 'जो कुछ भी मैं दावा करता हूं वह मेरा है, आप कृपया समझौता करें'."
अस्थाना के मुताबिक़ ऐसे हालात में कोई गिव एंड टेक या लेन-देन नहीं हो पा रहा है. वे कहते हैं, "चूंकि दोनों देशों के बीच कोई लेन-देन नहीं होती तो वो इसका हल भी नहीं कर पाते हैं. लिहाज़ा ज़्यादातर बातें ये कहकर ख़त्म हो जाती हैं कि हम फिर बात करेंगे."

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'सीमा विवाद की जड़ें इतिहास में'
मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं कि ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच सीमा से जुड़े समझौतों पर दस्तख़त किए गए थे लेकिन आज़ाद भारत और चीन के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ.
वे कहते हैं, "भारत का कहना है कि समझौते के मुताबिक़ जॉनसन रेखा ही लद्दाख से सटी सीमा रेखा है. वहीं पूर्वी इलाक़े में ब्रिटिश इंडिया ने तिब्बत के साथ मैकमोहन लाइन समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. ये भारत का रुख़ है और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है क्योंकि ये दोनों दस्तावेज़ मौजूद हैं. जहां तक चीन का सवाल है तो उनका कहना है कि उन्होंने स्वतंत्र भारत के साथ किसी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए. चीन का यह भी कहना है कि जब मैकमोहन लाइन को भी अंतिम रूप दिया जा रहा था तो उसने इसका अनुमोदन नहीं किया था."
अस्थाना कहते हैं कि लदाख की बात करें तो चीन 1960 की क्लेम लाइन के बारे में बात करता है और उसका कहना है कि ये क्लेम लाइन ही दोनों देशों की सीमा है न कि लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी).
वे कहते हैं, "दोनों पक्षों के एक-दूसरे के रुख़ से असहमत होने की वजह से ज़मीनी स्थिति ये है कि दोनों पक्ष जहां हैं वहीं बने हुए हैं. चीन का रुख़ ये है कि उसने सिर्फ़ आगे बढ़कर अपनी उस सीमा पर क़ब्ज़ा किया है जो पहले उसके पास नहीं थी.”
अस्थाना कहते हैं, ''भारत के लिए सीमा जॉनसन रेखा है तो भारत का कहना है कि चीन ने विश्वास बहाली के उपायों का उल्लंघन किया है और यथास्थिति बदल दी है. भारत कह रहा है कि चीन को यथास्थिति पर लौटते हुए अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में आ जाना चाहिए.''
वे कहते हैं, ''भारत यथास्थिति के लिए बातचीत कर रहा है और चीन की धारणा है कि उसने केवल अपनी सीमा पर क़ब्ज़ा किया है और अब वहां से वापस नहीं जा सकता. यहीं पर दोनों देश फंस गए हैं और यही वजह है कि गतिरोध बना हुआ है."
जब तक चीन फ़ौज की तैनाती बनाए रखता है तब तक भारत के पास भी उसी तरह की फ़ौजी तैनाती बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा.
क्या है आगे की राह?
मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं कि जब तक चीन फ़ौज की तैनाती बनाए रखता है तब तक भारत के पास भी उसी तरह की फ़ौजी तैनाती बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा.
वे कहते हैं, "अगर डेपसांग और डेमचोक के डिसइंगेजमेंट से किसी तरह का समाधान निकलता है और चीन की ओर से किसी तरह की डी-एस्केलेशन होती है, तो भारत भी डी-एस्केलेशन करेगा."
"अगर चीन ये तय करता है कि वो सीमा पर उसी तरह काबिज़ रहेगा जैसा वो अभी है तो भारत को भी सीमाओं पर उसी तरह काबिज़ रहना पड़ेगा जैसा वो अभी है. इससे एक स्थायी तरह की स्थिति पैदा हो सकती है और भारत सीमावर्ती क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचे की विषमता को दूर करने का भी प्रयास करेगा."

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'जितना ख़तरा, उतनी तैनाती की ज़रूरत'
पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच सीमावर्ती इलाक़ों में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की दौड़ भी चल रही है. साल 2020 में शुरू हुए नवीनतम सीमा विवाद के बाद समय-समय पर आई ख़बरों में कहा गया कि चीन सीमा के पास कई इलाक़ों में न सिर्फ़ हवाई अड्डे, हेलीपोर्ट और वायु रक्षा स्थल बना रहा है बल्कि कई नए गाँव भी बसाए जा रहे हैं. इसके जवाब में भारत भी सीमा के क़रीब अपने इलाक़ों में इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है.
हाल ही में अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' में सूत्रों के हवाले से छपी एक ख़बर में कहा गया कि इस बार सर्दियों में पूर्वी लदाख की बर्फीली ऊंचाइयों से सैनिकों की संख्या में कमी की जा सकती है और नवीनतम निगरानी उपकरणों और हेलीकॉप्टरों से हवाई निगरानी का इस्तेमाल करके सीमा पर मज़बूती से दबदबा बनाया जाएगा. ज़रूरत पड़ने पर सीमित गश्त करने की बात भी कही गई है.
मेजर जनरल अस्थाना कहते हैं कि भारत को ख़तरे के आधार पर तैनाती का स्तर बनाए रखना होगा न कि किसी और वजह के आधार पर.
वे कहते हैं, "ख़तरा यह तय करता है कि कितने सैनिकों को तैनात किया जाना चाहिए. हां, भारत को टेक्नोलॉजी, निगरानी क्षमता और आधुनिकीकरण में सुधार करना चाहिए लेकिन जैसा कि हमने हाल ही में इसराइल में देखा कि आपके पास एक बहुत ही उच्च तकनीक वाली निगरानी दीवार हो सकती है लेकिन अगर उस पर सैनिकों की सही तैनाती नहीं है तो इसका कोई फ़ायदा नहीं है... जैसे हमास ने साबित कर दिया है."
टेक्नोलॉजी आपकी ताक़त को बढ़ाती है. वो आपको अपना काम बेहतर तरीक़े से करने में मदद करती है लेकिन किस इलाक़े में कितने सैनिकों की ज़रूरत है वो इस बात पर निर्भर करता है कि वहां ख़तरा कितना अधिक या कम है.
अनुमानों के मुताबिक़ चीन से गतिरोध के चलते भारत ने पूर्वी लद्दाख में क़रीब 50 हजार सैनिकों की तैनाती की हुई है. चीन की तरफ भी इतने ही सैनिकों की मौजूदगी का अनुमान है.

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पीएम मोदी के बयान से चीन को फ़ायदा?
जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सेना के 20 सैनिकों की मौत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रमुख राजनीतिक नेताओं के साथ बैठक करने के बाद कहा था, "न वहां कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के क़ब्ज़े में है."
सामरिक मामलों के जानकार कहते हैं कि चीन ने सीमा विवाद पर बातचीत के दौरान इस बात का फ़ायदा उठाया है.
डॉ आचार्य कहती हैं, "मुझे संदेह है कि इस वजह से भी चीनी हार्डबॉल खेल रहे हैं. और यही वजह है कि बातचीत के दौर सिरे नहीं चढ़ पा रहे हैं."
तो क्या चीन एलएसी को बदलने में कामयाब हो गया है?
डॉ आचार्य कहती हैं, "फिलहाल स्थिति कुछ हद तक चीन के पक्ष में नज़र आ रही है.''
वे कहती हैं, ''आशंका जताई गई कि चीन ने कुछ ऐसी जगहों पर क़ब्ज़ा कर लिया है जो पहले भारत के नियंत्रण में था.''
"दूसरी तरफ़ भारत ने कुछ ऐसी जगहों को खाली कर दिया है जो अब बफ़र ज़ोन बन गए हैं. तो इसलिए भारत कुछ जगहों पर पीछे चला गया है और जहाँ भारतीय सैनिक पहले तैनात थे वो एक तरह से नो-मैन्स लैंड बन गया है."
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