बांग्लादेश में क्यों उछला ‘इंडिया आउट’ का मुद्दा और इस पर क्यों तेज़ हुई राजनीति?

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ पीएम नरेंद्र मोदी

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बांग्लादेश की राजनीति में फिलहाल भारत का मुद्दा गरमा गया है. खासकर इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ अवामी लीग और विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेताओं के बीच राजनीतिक बहस चल रही है.

भारत के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष की दलीलें सोशल मीडिया पर भी छाई हुई हैं.

कुछ विपक्षी दलों की सक्रियता के कारण शुरू होने वाले कथित 'इंडिया आउट' या भारतीय उत्पादों के बायकाट के अभियान को सोशल मीडिया में काफी जगह मिल रही है.

इस अभियान का विरोध करने वाले कई लोग इसे भारत विरोधी पारंपरिक राजनीति का हिस्सा बता रहे हैं.

बांग्लादेश के विदेश मंत्री हसन महमूद ने रविवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि भारतीय उत्पादों के बायकाट की अपील का मक़सद बाज़ार को अस्थिर करना और वस्तुओं की क़ीमतें बढ़ाना है.

उनका सवाल था, क्या सभी भारतीय उत्पादों को बाहर रखकर बांग्लादेश की बाज़ार व्यवस्था को सही रखा जा सकता है?

लेकिन बीएनपी की स्थायी समिति के सदस्य गएश्वर चंद्र राय इस आरोप का बेबुनियाद बताते हुए कहते हैं कि भारत के मुद्दे पर आम लोगों में नाराज़गी के कारण ही यह राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है.

वह बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "चुनाव के समय भारत के बेहिचक सक्रिय होने की वजह से ही लोग मतदान नहीं कर सके या वंचित हुए हैं. उसी से नाराज़गी पैदा हुई है. बीएनपी तो लोगों की नाराज़गी नहीं दूर कर सकती."

उधर, अवामी लीग के अध्यक्ष मंडल के सदस्य और कपड़ा और पटसन मंत्री अब्दुर रहमान ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "यह बीएनपी की आजीवन भारत विरोधी राजनीति का हिस्सा है. वह राजनीतिक फायदे के लिए ऐसा कर रही है. लेकिन लोगों ने उसे ख़ारिज कर दिया है."

लेकिन भारत के मुद्दे पर बीएनपी और अवामी लीग आमने-सामने क्यों हैं?

राजनीतिक विश्लेषक औऱ ढाका विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जुबैदा नसरीन कहती हैं, "बीएनपी या समान मानसिकता वाली कोई पार्टी या उसके नेता जब भारतीय उत्पादों के बायकाट और भारत विरोध का मुद्दा उठाते हैं तो अवामी लीग राजनीतिक कारणों से अपने जवाब में भारत की भूमिका को उचित ठहराने की कोशिश करती है."

ढाका में भारत विरोधी प्रदर्शन
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बीएनपी के साथ भारत की कड़वाहट

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बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी बीएनपी की राजनीति में भारत विरोध का इतिहास नया नहीं है, लेकिन बीते 10-15 साल के दौरान पार्टी के एक गुट ने भारत के संबंधों की बेहतरी की दिशा में भी प्रयास किया है.

इसी तरह कभी पार्टी में भारत विरोधी गुट ने अपनी ताक़त के ज़ोर पर इस प्रयास का विरोध भी किया.

कई लोग साल 2013 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के ढाका दौरे के समय विपक्ष की तत्कालीन नेता और बीएनपी अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया के साथ मुलाकात को रद्द करने के फैसले को इसी का ज्वलंत उदाहरण मानते हैं.

हालांकि बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ढाका दौरे के दौरान ख़ालिदा ज़िया ने होटल में जाकर उनसे मुलाक़ात की थी.

साल 2014 में बीएनपी ने बांग्लादेश के आम चुनाव का बाय़काट किया था, लेकिन उस चुनाव से पहले भारतीय राजनयिकों की सक्रियता के बावजूद पार्टी ने इस पर कोई ख़ास टिप्पणी नहीं की थी.

लेकिन साल 2018 के चुनाव के बाद बीएनपी भारत के मुद्दे पर सक्रिय होती नज़र आई. साल 2019 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच हुए समझौते के ख़िलाफ़ भी वह सड़क पर उतरी थी.

विश्लेषकों की राय में बांग्लादेश की आज़ादी की स्वर्ण जयंती के मौके पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ढाका दौरे के ख़िलाफ़ बांग्लादेश में होने वाले हिंसक विरोध ने भी बीएनपी समेत तमाम राजनीतिक दलों की दिल्ली से दूरी बढ़ा दी है.

बीएनपी हाल में हुए बारहवें आम चुनाव के पहले से ही भारत की भूमिका पर नाराज़गी जताती रही थी.

उसके नेताओं का मानना है कि अमेरिका समेत पश्चिमी देशों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए अवामी लीग सरकार पर जो दबाव बनाया था वह भारत के अड़ियल रवैये के कारण बेअसर हो गया.

बीएनपी की स्थायी समिति के सदस्य गएश्वर चंद्र राय ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "चुनाव आते ही भारत के नेता सक्रिय हो जाते हैं. चार बार संसदीय चुनावों में मतदान नहीं कर पाने के कारण ही आम लोगों में नाराज़गी है. अब आम लोगों के इस आंदोलन पर अंकुश लगाना बीएनपी की ज़िम्मेदारी नहीं है."

चुनाव के कुछ दिनों बाद ही बीएनपी के साथ आंदोलन में शामिल ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट्स यूनियन (डक्सू) के पूर्व उपाध्यक्ष नुरुल हक नूर ने भारत के बायकाट की आवाज़ उठाई थी.

इसके बाद ही इंडिया आउट या भारतीय उत्पादों के बायकाट का आंदोलन शुरू हुआ. बीती 21 मार्च को बीएनपी के प्रवक्ता और वरिष्ठ संयुक्त सचिव रुहुल कबीर रिज़वी ने ख़ुद भी इस आंदोलन के प्रति एकजुटता जताई थी.

इसके जवाब में अवामी लीग के महासचिव अब्दुल कादेर ने एक समारोह में कहा कि फिलहाल पार्टी के पास कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं होने के कारण ही बीएनपी ने भारत विरोध शुरू किया है.

उनका कहना था, "पाकिस्तान का हिस्सा रहने के दौर से ही यह कुप्रचार सुनता रहा हूं. जब कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं होता तो बीएनपी अवामी लीग के ख़िलाफ़ इसी (भारत विरोध) को मुद्दा बनाती है. वह पहले बंगबंधु के ख़िलाफ़ इसे मुद्दा बनाती थी और अब शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ बनाती है."

सोशल मीडिया पोस्ट

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कादेर ने इससे पहले 16 मार्च को सोशल मीडिया पर जारी 'इंडिया आउट' अभियान की आलोचना की थी.

उन्होंने तब कहा था, "आख़िर भारत विरोधी भावनाएं भड़काने का प्रयास क्यों किया जा रहा है. जिन लोगों ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया, उन्होंने इस कुप्रचार को अपना कवच बना लिया है. अवामी लीग के सत्ता में रहने के दौरान एक गुट भारत विरोध में शामिल हो जाता है. फिलहाल बीएनपी यही कर रही है."

उन्होंने 22 मार्च को पार्टी के धानमंडी कार्यालय में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में भी इस मुद्दे पर बात की थी.

उस समय उनका कहना था, "भारतीय उत्पादों के बायकाट की आड़ में बीएनपी देश की बाज़ार प्रणाली को अस्थिर करने की गहरी साज़िश में शामिल है. लोग बीएनपी की अपील को अहमियत नहीं देंगे."

दूसरी ओर, बीएनपी के वाइस-चैय़रमैन मेजर (रिटा.) हफीज़ुद्दीन अहमद ने कहा, "एक देश के प्रति घुटने टेकने वाली विदेश नीति मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी की परंपरा रही है. दिल्ली है तो हम हैं.....अवामी लीग को ऐसी बातें कहने में शर्म भी नहीं आती."

गएश्वर चंद्र राय ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "बीएनपी किसी देश के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन वह वही करेगी जो राष्ट्रवादी राजनीति के लिए ज़रूरी है. हर बार हमारे देश के चुनाव में सक्रिय होकर भारत ने लोगों को मताधिकार से वंचित किया है. इसलिए लोग आंदोलन कर रहे हैं. हम इसमें बाधा क्यों पहुंचाएंगे?"

उधर, मंत्री अब्दुर रहमान का कहना था, "एक अशुभ ताक़त अचानक राजनीति में भारत विरोध को मुद्दा बना कर इसका राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास कर रही है. जनता ने उसे ख़ारिज कर दिया है."

उनका कहना था कि लोकतंत्र के हित में ही भारत समेत विकास में सहयोगी तमाम देशों ने 12वें संसदीय चुनाव के स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोजन में सहायता की है.

यह विवाद क्यों

बांग्लादेश में हाल ही में चुनाव हुए हैं

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राजनीतिक विश्लेषक और ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली जुबैदा नसरीन कहती हैं कि बांग्लादेश की राजनीति में भारत हमेशा महत्वपूर्ण है और मौजूदा परिस्थिति में भी उसकी भूमिका है.

नसरीन बीबीसी बांग्ला से कहती हैं, "यही वजह है कि बीएनपी और उसके समान विचारधारा वाली कोई पार्टी जब भारतीय उत्पादों के बायकाट की अपील करती हैं या भारत के ख़िलाफ़ बातें करती हैं तो राजनीतिक कारणों से ही अवामी लीग को जवाबी प्रतिक्रिया देनी पड़ती है."

उनकी राय में दोनों पार्टियों की राजनीति पर भी भारत का प्रभाव है.

वह कहती हैं, "बीएनपी इस मुद्दे पर आम लोगों की भावनाएं भड़का रही हैं. यही वजह है कि अवामी लीग को भारत के साथ अपने बेहतर संबंधों की दुहाई देनी पड़ रही है. बीएनपी आम लोगों को भड़का कर भारत विरोध के नाम पर अवामी लीग को घेरना चाहती है. यही वजह है कि अवामी लीग की ओर से भी जवाबी हमले हो रहे हैं."

हालांकि जुबैदा नसरीन मानती हैं कि भारत में आम चुनाव क़रीब होना भी देश के विपक्षी दलों के भारत विरोधी मुहिम को तेज़ करने की एक वजह हो सकती है.

उनका कहना था, "भारत के चुनाव पर हालांकि बांग्लादेश का वैसा असर नहीं है. उसके लिए बीएनपी और अवामी लीग की बातचीत भी महत्वपूर्ण नहीं है. लेकिन बीएनपी में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नाराज़गी पनपी है.

नासरीन कहती हैं, "हो सकता है कि विपक्षी पार्टी भारतीय चुनाव का ध्यान रखते हुए बांग्लादेश में मोदी-विरोधी भावना को और उकसाने का मौका तलाश रही हो. इसी वजह से भारत का मुद्दा राजनीति के मैदान में शीर्ष पर है."

इधर, बीएनपी और अवामी लीग के एक-दूसरे से उलट रवैये के बीच ही एक गुट ने फ़ेसबुक पर बायकाट इंडियन प्रोडक्ट्स नामक एक ग्रुप बना कर भारत विरोधी अभियान शुरू किया है. वहां हज़ारों लोग अपनी राय दे रहे हैं.

उस ग्रुप में इरफान अहमद नामक एक व्यक्ति ने लिखा है, "देशी उत्पाद ख़रीदकर ले आया हूं. मैंने भारतीय उत्पादों का बायकाट कर दिया है."

अहमद इमरान नामक एक अन्य व्यक्ति ने लिखा है, "लोग कहां घूमने जाएंगे, कहां खाएंगे और कहां इलाज कराएंगे, इन मुद्दों पर भी इतनी तकलीफ़ क्यों है? भारत नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य वाला देश है. पड़ोसी देश के तौर पर मैं बेहद कम ख़र्च में वहां घूम सकता हूं. हर मुद्दे पर टांग अड़ाना बंद करें."

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