मलेशिया में बांग्लादेशी मज़दूरों के दो-दो लाख में बिकने की कहानी

- Author, तफ़सीर बाबू
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
बांग्लादेश में कुष्टिया के भेड़ामारा उप-ज़िला के मासूम अली बीती जनवरी में मज़दूरी करने के लिए मलेशिया गए थे.
वहां पहले दो महीने तक उनको कोई काम नहीं मिला. उस दौरान मासूम को एक से दूसरे दलाल के हाथों से गुज़रते हुए लगभग क़ैदी के तौर पर दिन गुज़ारना पड़ा था.
तीसरे महीने में मासूम को एक कंपनी में काम मिला. लेकिन काम मिलते ही उनसे पासपोर्ट और तमाम दूसरे दस्तावेज़ छीन लिए गए. उस दौरान मासूम अपने साथ होने वाली घटनाओं के बारे में रोज़ाना कुष्टिया में रहने वाली अपनी पत्नी को बताते रहते थे.
उन्होंने अपनी पत्नी को बताया कि काम का बहुत ज़्यादा दबाव अब बर्दाश्त नहीं हो रहा है.
मासूम की पत्नी रत्ना बेगम बताती हैं, "वहां उनको सुबह से रात तक काम करना पड़ता था. अक्सर उनको आधी रात के समय भी काम करने के लिए बुला लिया जाता था. खाने-पीने का भी कोई भरोसा नहीं था. लगातार काम करने के बावजूद उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की जाती थी."
रत्ना ने बीबीसी को बताया कि नई कंपनी में क़रीब एक महीना काम करने के बाद उनके पति ने वहां से भागने का प्रयास किया था. लेकिन उनको पकड़ लिया गया.
उसके बाद उन पर शारीरिक अत्याचार का सिलसिला शुरू हो गया. रत्ना को बीते एक महीने से अपने पति के बारे में कोई सूचना नहीं मिली है.
दलाल के ज़रिए मलेशिया गए थे मासूम अली

वह बताती हैं, "अप्रैल में ईद से कुछ दिन पहले अचानक एक दिन मेरे पास पति का फ़ोन आया था. उन्होंने बताया कि उनके साथ काफ़ी मारपीट की जा रही है. कान के पास से ख़ून बह रहा है. पति ने वीडियो कॉल पर अपनी चोट दिखाई थी. उन्होंने उस दिन कहा था कि यह लोग मुझे मार डालेंगे, मुझे बचा लो. उसके बाद महीने भर से ज़्यादा समय बीत चुका है. लेकिन मुझे अपने पति के बारे में कोई सूचना नहीं मिली है."
मासूम अली जिस दलाल के ज़रिए मलेशिया गए थे वह ख़ुद भी वहीं रहता है. रत्ना ने अपने पति की जान बचाने के लिए उसके साथ भी संपर्क किया था. लेकिन वह भी मासूम के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सका है.
रत्ना बेगम को अब यह नहीं सूझ रहा है कि वे क्या करें और किससे अपने पति को बचाने की गुहार लगाएं?
बांग्लादेश से हर साल जिन देशों में सबसे ज़्यादा लोग मज़दूरी करने जाते हैं उनमें मलेशिया का स्थान काफ़ी ऊपर है. मोटे अनुमान के मुताबिक़, वहां मज़दूरी करने के लिए 14 लाख से भी ज़्यादा लोग जा चुके हैं.
वहां पहुंचने के बाद इन मज़दूरों में से कइयों के साथ धोखाधड़ी और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप नए नहीं हैं.
लेकिन हाल में ऐसी कई घटनाओं के सामने आने के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय समेत विभिन्न घरेलू और विदेशी अंतरराष्ट्रीय संगठन इस मामले में सक्रिय हुए हैं.
लेकिन मलेशिया जाने वाले बांग्लादेशी मज़दूरों को आख़िर किन हालात का सामना करना पड़ रहा है? यह भी एक बड़ा सवाल है कि वहां बांग्लादेश के मज़दूरों को अत्याचारों का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
दो-दो लाख की दर से बिकने का अनुभव
मन्नान मियां (बदला हुआ नाम) बांग्लादेश की राजधानी ढाका से आठ महीने पहले मलेशिया गए थे. उनके साथ एक ही कंपनी में काम करने के लिए एक ही उड़ान से 35 दूसरे लोग भी गए थे.
वहां जाने से पहले नियोक्ता एजेंसी के साथ उन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उसमें वेतन और नियोक्ता कंपनी के नाम का ज़िक्र किया गया था.
लेकिन मलेशिया पहुंचने के बाद उस समझौते को लागू नहीं किया गया. मन्नान मियां का दावा है कि उन सबको दो-दो लाख टका में विभिन्न कंपनियों को बेच दिया गया था. उन कंपनियों में तय वेतन के मुक़ाबले काफ़ी कम पैसे पर काम कराया जाता था.
मन्नान मियां बीबीसी बांग्ला को बताते हैं, "हमारा वेतन 25 हज़ार बांग्लादेशी टका था. हालांकि पहले हमसे 50 हज़ार टका से भी ज़्यादा मासिक वेतन देने की बात तय हुई थी. तीन महीने बाद हमने कंपनी के सुपरवाइज़र से ओवरटाइम देने की मांग की. लेकिन वेतन-भत्ते का सवाल उठाते ही सुपरवाइज़र ने लोहे की छड़ से हमारे साथ मारपीट शुरू कर दी. हमारे साथ काफ़ी मारपीट की गई. बाद में उसने धमकी दी कि बाहर किसी से मारपीट की बात बताने पर हमें जान से मार दिया जाएगा या फिर हमें बांग्लादेश वापस भेज दिया जाएगा."
मन्नान मियां समेत सात लोगों ने उस कंपनी से पलायन करने के बाद दूसरी कंपनी में काम शुरू किया है. लेकिन उनके पास अब तक कोई वैध दस्तावेज़ नहीं हैं. ऐसे में वह लोग फ़िलहाल पुलिस के हाथों गिरफ़्तारी के आतंक के बीच दिन काट रहे हैं.

मज़दूरों को कैसे धोखा दिया जा रहा है?
मलेशिया पहुंचने के बाद बांग्लादेशी मज़दूरों को सबसे पहले जिस धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ता है वह है वहां कोई काम नहीं होना. यानी जिस काम के लिए उनको वहां ले जाया जाता है वहां वह काम या नौकरी ही नहीं है. इसके बाद अपर्याप्त वेतन का मुद्दा आता है. समझौते में जितना वेतन देने की बात कही जाती है, हक़ीक़त में उतना नहीं दिया जाता.
तीसरी समस्या है उनके पासपोर्ट और वीज़ा को छीन लेना. एजेंसी के लोग मज़दूरों के मलेशिया पहुंचने के बाद वीज़ा की औपचारिकताएं पूरी करने के नाम पर उनके पासपोर्ट ले लेते हैं. उसके बाद वह लोग उसे लौटाना नहीं चाहते.
भुक्तभोगियों का आरोप है कि ज़्यादातर मामलों में पासपोर्ट और वीज़ा दोबारा हासिल करने के लिए 70 हज़ार से एक लाख टका की अतिरिक्त रक़म का भुगतान करना पड़ता है.
इसके अलावा एक छोटे कमरे में ठूंस-ठूंस कर रहना और तीन बार की बजाय दो बार कम मात्रा में खाना मिलने की समस्या है. इन सबके बाद अत्याचार के आरोप अलग हैं.
कुआलालंपुर में रहने वाले प्रवासी मजदूर खालेक मंडल (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि कुल मिला कर वहां पहुंचने के बाद ज्यादातर मजदूर बंधक जैसी स्थिति में रहने पर मजबूर हो जाते हैं.
वह बताते हैं, "दरअसल, यहां काम नहीं है. लेकिन सब लोग मज़दूरों को बुला रहे हैं. बांग्लादेश और मलेशिया की जिन कंपनियों के पास मज़दूरों को भेजने या बुलाने की अनुमति है, उनके लिए यह एक व्यापार बन गया है. जिनके पास 50 मज़दूरों को नौकरी पर रखने की क्षमता है वह सात सौ मज़दूरों को यहां बुला रहा है. यह कैसे संभव है. उनको आख़िर इसके लिए ज़रूरी अनुमति कैसे मिल रही है. उनकी क्षमता की जांच क्यों नहीं की जा रही है. दरअसल, हम सब लोग यहां बंधक हैं."
खालेक मंडल बताते हैं कि उनको ख़ुद भी आने से पहले हुए समझौते के मुताबिक़ तयशुदा कंपनी में नौकरी नहीं मिली थी. उनको एक दूसरी कंपनी में काम पर रखा गया है. लेकिन मलेशिया के क़ानून के मुताबिक़ यह ग़ैर-क़ानूनी है. इस वजह से वो फ़िलहाल ग़ैर-क़ानूनी रूप से वहां रहते हुए बंधक की हालत में हैं.
वह बताते हैं, "यहां पहुंचने में मुझे क़रीब छह लाख टका ख़र्च करना पड़ा था. फ़िलहाल जहां काम करता हूं वहां रहने की स्थिति में पैसे बचाना तो दूर, परिवार का ख़र्च निकाल कर जीवित रहना ही संभव नहीं है. मजबूरन यहां से पलायन करने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है. अगर ऐसा नहीं करना चाहते तो स्वदेश लौटना ही अंतिम विकल्प है. लेकिन वैसा करना भी संभव नहीं है. आख़िर बांग्लादेश लौटने के बाद कर्ज़ का बोझ कैसे उतारेंगे?"
संगठित आपराधिक गिरोह

बांग्लादेश से दुनिया के विभिन्न देशों में मज़दूरों के जाने की शुरुआत वर्ष 1976 से हुई थी.
ब्यूरो ऑफ़ मैनपावर, एम्प्लॉयमेंट एंड ट्रेनिंग (बीएमईटी) के आंकड़ों के मुताबिक़, वर्ष 1976 से 2023 तक बांग्लादेश से 1.60 करोड़ प्रवासी मज़दूर दुनिया के विभिन्न देशों में जा चुके हैं. इनमें से सबसे ज़्यादा क़रीब 57 लाख सऊदी अरब में गए हैं.
इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात में 26 लाख और ओमान में 18 लाख मज़दूर गए हैं. इन देशों के बाद ही मलेशिया का स्थान है. वहां अभी तक 14 लाख से ज़्यादा मज़दूर जा चुके हैं. लेकिन अकेले वर्ष 2023 में ही बांग्लादेश से 3.51 लाख प्रवासी मज़दूर मलेशिया गए थे.
उसी साल यानी वर्ष 2023 से ही मज़दूरों को काम नहीं मिलने और उन पर अत्याचार और उनके लापता होने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं.
उस साल मलेशिया में रहने वाले बांग्लादेशी मज़दूरों की दुर्दशा की तस्वीर मलेशिया की मुख्यधारा की मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट में भी सुर्खियों में रही थी.
उनमें कहा गया था कि बांग्लादेश के हज़ारों मज़दूर वहां अमानवीय जीवन बिता रहे हैं. इसके अलावा कम मज़दूरी मिलना, बेरोज़गार रहना, अत्याचार और ग़ैर-क़ानूनी स्थिति में फंस जाने जैसे मुद्दे भी उसी समय सामने आए थे.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन ने भी इस बारे में जारी अपनी एक रिपोर्ट में इस मामले पर चिंता जताई थी.
बीबीसी बांग्ला की ओर से संपर्क करने पर समसामयिक दासता पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक टोमोया ओबोकाटा ने कहा, "मलेशिया में रहने वाले बांग्लादेशी मज़दूरों की मौजूदा परिस्थिति पर चिंतित होने के ठोस कारण हैं. मज़दूरों को वहां भेजने के बाद उनसे धोखाधड़ी कर पैसे वसूलने के मामले में दोनों देशों में सक्रिय एक संगठित आपराधिक गिरोह शामिल है."

ओबोकाटा का कहना था, "बांग्लादेश और मलेशिया में एक ताक़तवर आपराधिक गिरोह पनप उठा है. इसके लोग बेहतर नौकरी और बढ़िया वेतन का लालच दिखा कर मज़दूरों को मलेशिया ले जाकर उनके साथ धोखाधड़ी करते हैं. ऐसे लोग मज़दूरों से पांच से छह गुनी ज़्यादा रक़म ले लेते हैं. इसके कारण मज़दूर कर्ज़ के जाल में फंस जाते हैं. इसके अलावा तयशुदा कंपनी में काम नहीं मिलने के कारण मज़दूरों की स्थिति ग़ैर-क़ानूनी हो जाती है. इन ग़ैर-क़ानूनी लोगों को नौकरी देने वाले लोग भी उनका शोषण करने से नहीं चूकते. नतीजतन यह समस्या काफ़ी गंभीर है."
उनका कहना था कि बांग्लादेश और मलेशिया की सरकार को मज़दूरों की नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया को बदलना चाहिए ताकि मज़दूरों को दुर्व्यवहार का शिकार होने से बचाया जा सके.
बांग्लादेश उच्चायोग क्या कहता है?
विस्तृत जांच-पड़ताल के बाद ही बांग्लादेश सरकार उन लोगों को अंतिम मंज़ूरी देती है. ऐसे मामलों में मलेशिया में जिन कंपनियों में नौकरी दी जा रही है उसकी वास्तविक स्थिति के बारे में पता लगाने की ज़िम्मेदारी मलेशिया स्थित बांग्लादेश उच्चायोग की है.
लेकिन इस मामले में मलेशिया स्थित बांग्लादेश के उच्चायोग की क्या भूमिका है? वह ग़लत कंपनियों की शिनाख्त क्यों नहीं कर पा रहा है?
वहां नियुक्त बांग्लादेश के उच्चायुक्त शमीम अहसन के सामने भी यही सवाल रखे गए थे. हालांकि छह महीने पहले ही उनकी तैनाती हुई है.
बीबीसी बांगाला के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने ऐसे तमाम आरोप सामने आने की बात स्वीकार की. उन्होंने बताया कि ऐसे आरोप नए नहीं हैं. ऐसे मामलों का निपटारा भी किया जा रहा है. लेकिन यह भी सच है कि कुछ कंपनियों के कारण लोगों को धोखाधड़ी का शिकार बनना पड़ रहा है.
उनका कहना था, "ऐसा नहीं है कि फ़र्ज़ी कंपनियों के कारण लोगों को धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ रहा है. यहां क़ानूनी रूप से ऐसी तमाम कंपनियां वैध हैं. लेकिन उनके अनैतिक आचरण और वादों को पूरा नहीं करने के कारण ऐसी घटनाएं हो रही हैं. अकेले दूतावास ऐसे मामलों का त्वरित समाधान नहीं कर सकता."
"इससे मलेशिया के नियोक्ताओं की ईमानदारी का मुद्दा भी जुड़ा है. उनको क़ानून के दायरे में लाने की ज़िम्मेदारी मलेशिया सरकार की है. लेकिन बांग्लादेश की ओर से भी इस मामले में कई क़दम उठाए गए हैं. जहां इतने मज़दूर काम कर रहे हैं वहां कुछ समस्या तो हो ही सकती है. लेकिन हम इन समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रयास कर रहे हैं."

बांग्लादेशी उच्चायुक्त ने यह स्वीकार किया कि नियोक्ता कंपनियों में ज़रूरत के मुक़ाबले अतिरिक्त वीज़ा हासिल करने की एक प्रवृत्ति ज़रूर है. यही प्रवासी मज़दूरों के साथ होने वाली धोखाधड़ी की सबसे बड़ी वजह है.
उन्होंने बताया कि इस मामले में मलेशिया के श्रम मंत्रालय के साथ संपर्क किया गया है. इसके अलावा जल्दी ही होने वाली दोनों देशों के सचिव स्तर की बैठक में भी इन समस्याओं को उठाया जाएगा.
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