इस विषय के अंतर्गत रखें मई 2011

भारत में क़ानून के रखवालों के लिए एक ख़बर!

दुनिया के सबसे शक्तिशाली आदमी से, जो मेहमान भी था, सड़क पर गाड़ी चलाने का टैक्स माँगा गया है.

हाल में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा लंदन के दौरे पर थे. लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने बराक ओबामा के काफ़िले में शामिल सभी गाड़ियों को 'कन्जेशन चार्ज'भरने का नोटिस भेज दिया है.

सेंट्रल लंदन की संकरी सड़कों पर सोमवार से शुक्रवार के बीच कार चलाने पर प्रति दिन 10 पाउंड यानी लगभग 700 रुपए भरने पड़ते हैं. इस व्यवस्था का उद्देश्य मध्य लंदन को ट्रैफ़िक जैम से मु्क्ति दिलाना है.

मामला ज़रा पेचीदा है, अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के मुताबिक़ कूटनयिक और विदेशी मेहमान दूसरे देशों में स्थानीय टैक्सों से मुक्त होते हैं लेकिन विवाद इसी बात पर है कि कन्जेशन चार्ज टैक्स है या नहीं.

यह मुद्दा 10 पाउंड वसूलने का नहीं है, लंदन के मेयर की दलील है कि जब ब्रिटेन के कूटनयिक विदेशी पुलों और सड़कों पर टोल टैक्स देते हैं तो लंदन में विदेशी कूटनयिक कन्जेशन चार्ज क्यों न भऱें.

लंदन स्थित दस से अधिक दूतावासों के ऊपर स्थानीय प्रशासन का कन्जेशन चार्ज का पाँच करोड़ पाउंड बक़ाया है, बक़ाया चुकता करने से इनकार करने वालों में अमरीकी, स्पेनी, रूसी, जापानी दूतावासों के अलावा भारतीय उच्चायोग भी है.

लंदन के मेयर ने बराक ओबामा को नोटिस भेजकर दूतावासों को साफ़ संदेश देने की कोशिश की है कि हर किसी को नियमों का पालन करना चाहिए, भले ही वह अमरीका का राष्ट्रपति ही क्यों न हो.

मेयर जॉनसन की कन्जेशन चार्ज वसूलने की ज़िद सही हो या नहीं, उनका तरीक़ा शायद सही है.

अगर किसी भी व्यवस्था या क़ानून को लागू कराना है तो उसे शीर्ष पर सबसे पाबंदी से लागू किया जाना चाहिए ताकि नीचे वालों के लिए आनाकानी की कोई गुंजाइश न हो.

ज़रा सोचिए, अगर अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने काफ़िले का कन्जेशन चार्ज भर दिया तो लंदन में अमरीकी राजदूत और दूसरे दूतावासों पर बक़ाया रक़म चुकता करने का नैतिक दबाव कितना बढ़ जाएगा.

पता नहीं, भारत में क़ानून के रखवालों तक यह ख़बर पहुँची है या नहीं.

शालीनता में शान है

पिछले दिनों जब सोनिया गांधी ने तमिलनाडु में चुनाव हारने के बाद जयललिता को चाय का न्योता दिया तो सुखद आश्चर्य हुआ.

इसी तर्ज़ पर ममता बनर्जी ने अपने शपथ गृहण समारोह में बुद्धदेव भट्टाचार्य को आमंत्रित करने के लिए अपने ख़ास आदमी को भेजा और बुद्धदेव इस समारोह में आए भी.

पिछली दो बार से पश्चिम बंगाल में विपक्षी दल शपथगृहण समारोह का बहिष्कार करते रहे हैं.

भारतीय राजनीति में शालीनता का स्तर इस हद तक गिर गया था कि दो वर्ष पूर्व जब आडवाणी ने अपनी आत्मकथा प्रकाशित की थी तो सरकार की तरफ़ से एक व्यक्ति भी उस समारोह में नहीं गया था सिवाय शरद पवार के.

ऐसा हमेशा नहीं था. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी कैबिनेट में अपने धुर विरोधियों, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भीमराव अंबेदकर को जगह दी थी.

इसी तरह जब 1959 में उनके विरोधी बन चुके राजगोपालाचारी दिल्ली आए थे तो नेहरू ने उनकी पुत्री के निवास पर जाकर उनसे मुलाक़ात की थी.

साल 1977 में कांग्रेस पार्टी की ज़बर्दस्त हार के बाद जब जनता पार्टी के सदस्य राजघाट पर शपथ ले रहे थे तो इस जीत के कर्ताधर्ता जयप्रकाश नारायण 1, सफ़दरजंग रोड पर इंदिरा गांधी के निवास स्थान पर उन्हें सांत्वना दे रहे थे.

और तो और 1980 में जब इंदिरा गाँधी सत्ता में वापस आंईं तो उन्होंने चिकमंगलूर उप चुनाव में अपने प्रतिद्वंदी वीरेंद्र पाटिल को अपनी कैबिनेट में जगह दी.

इसका एक और उदाहरण उस समय भी देखने को मिला था जब नरसिम्हा राव की सरकार ने अपनी सरकार के विरोधी अटल बिहारी वाजपेयी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया था.

लेकिन अपने प्रतिद्वदियों के प्रति इस तरह का शिष्टाचार अब काफ़ी दुर्लभ हो गया है.

क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष के किसी सदस्य में इतना बड़प्पन है कि संसद में अपने विरोधी के अच्छे भाषण पर खड़े होकर ताली बजाए?

क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मुलायम सिंह और मायावती साथ साथ चाय पी सकते हैं?

या फिर जयललिता राज्य में अपने विरोधी करुणानिधि को उनके जन्मदिन पर मुबारकबाद दे सकती हैं?

अब सोनिया गाँधी और ममता बनर्जी ने इस ओर क़दम बढ़ाए हैं तो क्या ये उम्मीद की जाए कि आने वाले दिनों में शालीनता और शिष्टाचार की गरिमा फिर से वापस आएगी.

बेटियां ही बेटियां.......

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 25 मई 2011, 21:57

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आजकल बेटियां बहुत पैदा हो रही हैं, तीन दोस्तों के घर बेटियां हुई हैं.

विकास दर के नौ प्रतिशत पहुँचने से पहले बेटियों को जलाकर मारा जाता था, सुपरपावर बनने की राह पर चलने वाले देश में समस्या को जड़ से खत्म करने का चलन शुरु हो गया है.

विकास और टेक्नॉलॉजी ने लोगों को दूरदर्शी बना दिया है.

मेरे पिताजी साधारण कर्मचारी थे, तभी दूरदर्शी नहीं थे, उन्हें बेटी चाहिए थी. दो भाइयों के बाद जब मैं पैदा हुआ तो पापा नाराज़गी में मुझे देखने के लिए अस्पताल तक नहीं गए. पाँच साल की उम्र तक मुझे लड़कियों की फ्राकें पहनाई गईं और बाल लंबे रखे गए और चोटी बांधी जाती थी.

स्कूल छूटे लंबा समय बीत गया है, कोई पुरुष शिक्षक याद नहीं आता, सारी शिक्षिकाएँ याद आती हैं, एक थीं वंदना सान्याल जिन्होंने भाषण देना, निबंध लिखना सिखाया. 'यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता' अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का वास होता है....यह भाषण न जाने कितनी बार दिया.

रिपोर्टिंग और प्रसारण के गुर भी वरिष्ठ महिला सहकर्मियों ने ही सिखाए, मैं खुशकिस्मत हूं कि इतनी बेहतरीन महिलाओं के साथ काम करने का सीखने का अवसर मिला,

सगी बहन की कमी खलती है अपने व्यक्तित्व में अपूर्णता का एहसास है.

भले ही पैदा होने के बाद लड़की को कोसा जाता हो, मारा-पीटा जाता हो लेकिन गर्भ में झाँक लेने की दूरदर्शिता उन लोगों में अभी नहीं है जिन्हें इस देश में पिछड़ा समझा जाता है.

मेरे एक शिक्षित और समृद्ध दोस्त पुत्ररत्न पाने के लिए कोई भी जतन करने को तैयार हैं. मैंने कई बार समझाया कि ओबामा की दो बेटियां हैं, बिल क्लिंटन की एक ही बेटी है...सरोजिनी नायडू से लेकर इंदिरा गांधी तक की याद दिलाई मगर सब बेकार.

देश की सबसे बड़ी पार्टी की मुखिया महिला है उसको वोट देंगे. ममता बनर्जी,जयललिता, मायावती, वसुंधरा राजे, महबूबा मुफ्ती को नेतृत्व सौंप देंगे लेकिन अपने घर की लड़की को रात-दिन बड़ी होती देनदारी की तरह देखेंगे.

इस्लाम में नेमत हैं, हिंदुओं के लिए देवियाँ हैं, लेकिन पढ़े-लिखे लोग धर्म को मानते नहीं हैं. अच्छा विज्ञान को मान लीजिए, विज्ञान के अनुसार भी महिलाएँ मानव उत्पत्ति के क्रम (इवाल्यूशन के मामले में) में पुरुषों से अधिक विकसित हैं.

अनुभव से मान लीजिए कि वे अधिक सहनशील होती हैं, अक्सर माँ-बाप का अधिक खयाल रखती हैं.

मगर आप विकसित, शिक्षित, समृद्ध और दूरदर्शी हैं इसलिए यही मानेंगे कि बेटे से ही वंश चलता है, अगर विकास इसी तरह चलता रहा तो आप शायद ये भी मानने लगेंगे कि बेटे बेटा पैदा कर लेंगे, बहुओं की क्या ज़रूरत.

हम देखेंगे

दक्षिण भारत के ताक़तवर राजनीतिक करुणानिधि की बेटी कनिमोड़ी भी जेल चली गईं. पू्र्व केंद्रीय मंत्री ए राजा और भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के पूर्व प्रमुख सुरेश कलमाड़ी पहले से ही तिहाड़ में हैं.

उनके अलावा रिलायंस जैसी ताक़तवर कंपनी के कई आला अफ़सर और ओलंपिक एसोसिएशन के कई पूर्व अधिकारी पहले से ही वहाँ हैं.

थोड़ा पीछे हटकर देखें तो हरियाणा के एक शक्तिशाली नेता विनोद शर्मा के बेटे मनु शर्मा और उत्तर प्रदेश में अपने कारनामों के लिए ख्यात राजनीतिज्ञ डीपी यादव के बेटे विकास यादव भी तिहाड़ में ही हैं.

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा भी क़ानून के फंदे में फँस चुके हैं और कई जेलों की दीवारें ऐसे ही बहुत से लोगों का इंतज़ार कर रही हैं.

ऐसे लोगों को सलाखों के पीछे देखकर उस जनता के एक बड़े हिस्से को सुकून मिलता है जो वोट देकर सरकारें चुनती हैं. कुछ उन लोगों को चिंता भी होती होगी जो वोट पाकर चुने जाते हैं या फिर सरकार को प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से चलाने में भूमिका निभाते हैं.

सतह पर तो दिखता है कि ये सबकी अपनी-अपनी करनी का फल है. वे अपने किए की सज़ा भुगत रहे हैं.

लेकिन व्यापक दृष्टि से देखें तो ये हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने के मानदंडों में से एक है. जनता के लगातार दबाव, अदालतों की सक्रियता और सरकार के लाख नानुकुर के बाद ही सही जनप्रतिनिधि और नौकरशाहों, व्यावसायियों और उद्योगपतियों और दलालों तक क़ानून की आँच आ तो रही है.

कहने को तो ये कहा जा सकता है कि लालू प्रसाद यादव और सुखराम भी तो गिरफ़्तार किए गए थे, उसके बाद क्या हुआ? लेकिन समझने वाले समझते हैं कि उन गिरफ़्तारियों और इन दिनों हुई गिरफ़्तारियों में अंतर है.

हालांकि अभी ए राजा, सुरेश कलमाड़ी और कनिमोड़ी पर सिर्फ़ आरोप हैं. उन पर लगे आरोपों को साबित करके तिहाड़ को इन सबका स्थाई पता बनाने के लिए अभी तंत्र को और मेहनत करनी पड़ेगी. और यक़ीन मानिए लोक का तंत्र वह भी करेगा.

वैसे ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपने लोकतंत्र से उकताए हुए दिखते हैं. वे मान बैठे हैं कि इस व्यवस्था में कुछ नहीं बदल सकता. उनके पास ऐसा मानने के कारण भी कम नहीं हैं. लेकिन एक लोकतंत्र के लिए साठ साल को शैशव काल ही मानना चाहिए. वह धीरे-धीरे ही परिपक्व होगा. और परिपक्वता एकाएक नहीं आएगी. धीरे-धीरे ही आएगी.

अगर लोकतंत्र को सचमुच का लोकतंत्र होना है तो तंत्र को लोक यानी लोगों की सोच और आवाज़ को मूर्त रूप देना होगा. इस तंत्र को पारदर्शी होना होगा और जनता के प्रति और जवाबदेह.

जिस रास्ते से हम गुज़र रहे हैं वह थोड़ा कठिन तो है और रफ़्तार भी कुछ कम है लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि हम एक दिन ऐसे मुकाम पर ज़रुर पहुँचेंगे जब न सिर्फ़ सरकारें जवाबदेह होंगीं बल्कि सरकारों को (कु)संचालित करने वाली सरकार के पीछे रहकर काम कर रहीं ताक़तें भी जनता के दरबार में हाज़िर की जाएंगीं.

और जब तक ऐसा होता है, चलिए हम फ़ैज़ का तराना गुनगुनाते हैं...लाज़िम है कि हम भी देखेंगे.

राहुल गांधी की राजनीति

राहुल गांधी को बुधवार को बनारस के कांग्रेस सम्मलेन में दिन भर मंच पर बैठे, आम कांग्रेसजनों से मिलते-जुलते और फिर भारत की सबसे शक्तिशाली समझी जाने वाली महिला नेताओं में से एक मायावती के ख़िलाफ़ खुली जंग का ऐलान करते देख मुझे उनसे पहली मुलाक़ात याद आ रही है.

कुछ साल पहले की बात है , मेरे ख्याल से वर्ष 2004 के लोक सभा चुनाव से पहले की. राहुल ने राजनीति में पहला कदम रखा था.

वह जगदीशपुर से अमेठी जनसंपर्क के लिए निकले थे. रास्ते में सड़क के किनार एक जगह चाय पी. कई जगह उनका स्वागत हुआ. जीप के बगल पैदल चलते हुए मैंने कई बार उनसे इंटरव्यू की कोशिश की. मुंशीगंज तक वह टालते रहे. एक बार सिर्फ यह पूछा क्या सवाल पूछोगे? घबराहट साफ़ झलक रही थी. कहा मुंशीगंज गेस्ट हॉउस आइये वहाँ देखेंगे. खैर वह इंटरव्यू नही मिला.

पिछले विधान सभा चुनाव से पहले मुरादाबाद के एक होटल में दिल्ली से आए संपादकों के साथ मेरी भी राहुल गांधी से मुलाक़ात और चर्चा हुई.

बातचीत से साफ़ लगा कि अब राहुल उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने लगे हैं. पिछले पांच सालों में राहुल ने अपनी छवि ग़रीबों के हमदर्द की बनाई है, चाहे उनकी झोपड़ी में रात बिताकर, हैण्ड पम्प में नहाकर या फिर संसद में कलावती का दर्द बयान कर.

लेकिन पिछले कुछ ही हफ़्तों में राहुल गांधी ने अपनी छवि और हुलिया बदला है.

मायावती भले उन्हें कांग्रेस का युवराज और पार्टी का भावी प्रधानमंत्री कहें, मगर राहुल ने अपनी छवि एक ऐसे जुझारू युवक की पेश की है, जो हालत को बदलने के लिए पार्टी के आम कार्यकर्ता के साथ कामरेडशिप दिखाकर सड़क पर संघर्ष करना चाहता है.

हालांकि उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी नेता 22 साल से सरकार से बाहर रहने के बावजूद अपने को सत्तारूढ़ दल के नेता की तरह पेश करते हैं.

राहुल का भाषण शायद मायावती के लिए कम और कांग्रेसियों को झकझोरने के लिए ज्यादा था. मंच से उतर कर वह आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच गए. खाने पीने के बारे में पूछा. हाल चाल लिया.

राहुल ने शुरु में उद्घाटन भाषण देने बजाय, पहले सबकी बातें सुनीं. फिर अंत में बोले तो एकदम एंग्री मैन की तरह, सब कुछ बदल डालूँगा की तर्ज़ पर.

इससे पहले वह भट्टा परसौल गए और धूप में जमीन पर ही धरने पर बैठ गए. किसानों को प्रधानमंत्री से मिलाने ले गए और दूसरे नेताओं की तरह मीडिया को बुलाकर ज़बरदस्त बयान दिया, जिसकी सफ़ाई कांग्रेस को अभी तक देनी पड़ रही है.

वर्ष 1980 में उनके चचा संजय गांधी ने नारायणपुर कांड को लेकर भी तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास को ऐसे ही घेरा था.

पिछले चार सालों में राहुल गांधी और उनकी माँ सोनिया गांधी ने अपने को केवल अमेठी - राय बरेली तक सीमित रखा. वहाँ भी न तो वे जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं से जुड़ पाए और न ही मतदाताओं से सीधा संवाद कायम कर पाए.

अब लगता है कि माँ और बेटे दोनों को यूपी फ़तह करने की जल्दी है. फिर इसके लिए चाहे लखनऊ में किसी दफ़्तर जाकर आरटीआई की दरखास्त डालनी पड़े या भट्टा में दिन भर धूप में बैठना पड़े.

दरसल 2012 के यूपी चुनाव में उत्तर प्रदेश की अगली सरकार के भविष्य के साथ ही साथ 2014 के लोकसभा चुनाव की बिसात भी बिछ जाएगी.

अगर यूपी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं हुआ तो फिर राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने का क्या होगा?

लगता है कि राहुल गांधी की झिझक अब खत्म हो गई है. उन्हें एहसास हो गया है कि फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौथे नंबर की विपक्षी पार्टी है और अगर वह स्वयं मोर्चे पर आगे अगुआई नही करेंगे तो मायावती और मुलायम जैसे अनुभवी खिलाड़ियों और बीजेपी जैसी व्यापक संगठन वाली पार्टी से मुक़ाबले में कांग्रेस आगे नही बढ़ पाएगी.

छूट जाने का आनंद

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 18 मई 2011, 10:11

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ज़िंदगी में आगे बढ़ना मजबूरी है पीछे छूट जाना नियति. मजबूरी आपको बड़ा आदमी बना सकती है. नियति आपको वहीं रख सकती है जहां आप रह जाते हैं. लेकिन बड़े होने में वो आनंद कहां जो रुके होने में हैं. बुद्ध रुके रहे तो बुद्ध कहलाए. हम लोग चलते रह गए. बुद्ध तो क्या बुद्धिमान भी नहीं हो पाए.

मजबूरी में चले थे आज भी मजबूर हैं सो चल रहे हैं जब सूकून होगा तो रुकेंगे और बड़े बुजुर्ग कहते हैं. सूकून मिल जाए तो ज़िंदगी किस काम की.

आज याद आई है एक दोस्त की जिसके साथ दुपहरिया में कच्चे आम तोड़ा करते थे और पहा़ड़ों पर घंटों बैठकर ऊपर से छोटी लगने वाली कॉलोनी को घंटों निहारा करते थे.

झरने के पानी में पत्थर फेंक पर अपनी सपनों की रानी को याद किया करते थे और जब घर में बाइक आई तो दोनों उस पर बैठ कर कॉलोनी की एक गली के खूब चक्कर काटा करते थे.

माशूका को पता नहीं होता था और उसके लिए मार पीट करने पर आमादा होने पर यही दोस्त काम आता था. बिना किसी सवाल जवाब के. उसका एक ही धर्म था..मैंने जो कह दिया बस वही सही है. उसके मामले में मेरा भी यही धर्म था. उसने जो कहा वही सही. मां बाप भाई बहन सब बेकार.

ये खूब चलता है कुछ साल. नए कपड़े, बाइक, लड़कियां, दोस्ती वाली फ़िल्में...फिर या तो एक लड़की आती है या फिर ज़िंदगी आती है और रास्ते खुद ब खुद बदलते हैं.

मैं मजबूर था कॉलोनी छोड़ने को उसकी नियति थी वहीं रुकना. चार पांच साल तक संपर्क रखा फिर मैं बड़ा आदमी हो गया. वो इंसान ही रहा. बड़े शहर के शब्दों में बैकवार्ड और यू नो कॉलोनी पीपुल.

आखिरी बार उसका फोन आया था. उसे क़ानून की पढ़ाई करने के लिए पांच हज़ार रुपए चाहिए थे. मैंने वादा किया था मदद का लेकिन याद नहीं रहा. अब हर साल कॉलोनी जाता हूं और मेरी आंखें उसे तलाश करती हैं.

उसके पापा भी रिटायर हो चुके हैं. कॉलोनी से दूर वो कहीं रहता है. उधर से ट्रेन गुज़रती है तो खिड़की के पास बैठ जाता हूं. शायद वो कहीं दिख जाए. खोजने नहीं जाता हूं डरता हूं मिल जाए तो क्या जवाब दूंगा.

सुना है किसी कोर्ट में प्रैक्टिस करता है. शादी भी हो गई है. छोटे से कस्बे में वो रुका हुआ है. शायद खुश भी हो. रुकना उसकी नियति थी.. मैं अभी भी चल रहा हूं. क्योंकि मैं मजबूर हूं और चलते रहना ही शायद मेरी नियति है.

अब शासन चलाने की चुनौती

आख़िरकार 34 साल बाद वामपंथियों की पश्चिम बंगाल से विदाई हुई.

ममता बनर्जी इसकी सूत्रधार बनीं. उनको सब दीदी कहते हैं. दीदी यानी बड़ी बहन.

लेकिन कहाँ की बड़ी? कम से कम क़द में तो कतई नहीं!

बमुश्किल पाँच फ़ुट लंबी, आसमानी किनारी वाली तुड़ीमुड़ी सी सूती साड़ी और रबर की चप्पल पहने हुए.

भद्रलोक बंगाली संस्कृति से दूर-दूर का वास्ता नहीं लेकिन तुर्रा यह कि अब तक के सारे लोकसभा चुनाव उन्होंने पश्चिम बंगाल के शायद सबसे पॉश चुनाव क्षेत्र दक्षिणी कोलकाता से जीते हैं.

बंगाल में नौ करोड़ मतदाता हैं,जर्मनी के मतदाताओं से भी ज़्यादा और उनमें से बहुतों के लिए ममता एक तेज़ कुदाल की तरह हैं जिन्होंने उनकी 'बर्लिन की दीवार' को ढहा दिया है.

लेकिन क्या यह कारनामा करने वाली ममता में शासन करने की भी क्षमता है?

बंगाल की जानी मानी लेखिका महाश्वेता देवी का सवाल है, 'ममता की राजनीति क्या है यह कहना बहुत मुश्किल है.'

यह तो हमें पता है कि वह सीपीएम की दुश्मन हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं.

दिल्ली में ममता को दूसरी निगाहों से देखा जाता है.

वह पहले कई बार अलग-अलग सरकारों से अलग-अलग मुद्दों पर इस्तीफ़ा दे चुकी हैं. उनकी छवि घड़ी में तोला घड़ी में माशा वाले दोस्त की है.

कई बार तो वह अपनी सरकार के पेट्रोल के दामों में बढ़ोत्तरी के फ़ैसले का विरोध करने के लिए कैबिनेट की बैठक तक का बहिष्कार कर चुकी हैं.

ममता जिस मुक़ाम पर पहुँची हैं वहाँ तक पहुँचने के लिए उन्हें काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी है. वह तीन क़दम आगे बढ़ी हैं तो दो क़दम फिसली भी हैं.

सड़कों पर वामपंथियों से भिड़ने में वह उन पर बीस पड़ी हैं लेकिन क्या उनमें राज्य पर शासन करने की भी क्षमता है?

अपनी तुनकमिज़ाजी के लिए मशहूर ममता ने अब तक शालीन राजनीति का रास्ता तो नहीं ही अपनाया है.

लेकिन क्या वह भविष्य में बिधान चंद्र राय और ज्योति बसु जैसी राजनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शिता दिखा पाएंगी?

उनके पक्ष में एक बात ज़रूर है कि उनकी पार्टी में उनका कोई विरोध नहीं है.

उन्होंने अमित मित्रा, पूर्व मुख्य सचिव मनीष गुप्ता और डेरेक ओ ब्रायन जैसे कई योग्य लोगों को अपने दल की तरफ़ खींचा है.

अब सबकी निगाहें राइटर्स बिल्डिंग पर होंगी कि ममता बंगाल की जनता की उम्मीदों पर खरी उतर पाती हैं या नहीं.

ओसामा से ओबामा का फ़ायदा?

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|मंगलवार, 10 मई 2011, 08:42

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वर्ष 2012, अक्तूबर का महीना. बराक ओबामा राष्ट्रपति के चुनाव के प्रचार के लिए कई शहरों का दौरा कर रहे हैं. हर जगह उनके भाषण पर ज़ोरदार तालियाँ बज रही हैं.

वे चार साल के अपने काल की उपलब्धियाँ गिना रहे हैं- मैंने देश को गहरे आर्थिक संकट से निकाला. ग़रीबों के लिए मुफ़्त से लेकर सस्ती बीमा पॉलिसी का इंतज़ाम किया, स्वास्थ्य बिल पारित कराने में कामयाब हुआ. इराक़ से और बाद में अफ़ग़ानिस्तान से अपने बहादुर फ़ौजी वापस बुलाने का वादा पूरा किया.

लेकिन उन्होंने जब अपनी आख़िरी उपलब्धि का ज़िक्र किया तो उन्हें तालियाँ ही तालियाँ सुनने को मिलीं. "ओसामा का सफ़ाया करके हमने विश्व के सबसे ख़तरनाक चरमपंथी संगठन अल क़ायदा का सर काट दिया है."

डेढ़ साल पहले जब अमरीकी राष्ट्रपति ने सीआईए को पाकिस्तान के शहर ऐबटाबाद के एक घर में अल-क़ायदा के नेता बिन लादेन के ख़िलाफ कार्रवाई की अनुमति दी थी लेकिन यह एक बहुत कठिन फ़ैसला था.

ओसामा की मौत के बाद उनकी लोकप्रियता की चर्चा होने लगी. ओसामा के मारे जाने के चार दिन बाद राष्ट्रपति ओबामा की रेटिंग 11 फ़ीसदी बढ़ गई और वे देश के हीरो हो गए.

देश में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. बिन लादेन की मौत ने अमरीकी राष्ट्रपति का कल्याण कर दिया. इस हमले के बाद राष्ट्रपति की लोकप्रियता सातवें आसमान को छूने लगी.

बिन लादेन का सफ़ाया होने के एक सप्ताह बाद राष्ट्रपति ओबामा का राजनीतिक भविष्य ऐसा लगता है जैसा कि ऊपर ज़िक्र किया गया. छह नवंबर, 2012 के मतदान में वे दोबारा राष्ट्रपति चुने जा सकते हैं.

अगर उनकी हार हुई तो उनकी किसी भारी ग़लती से ही हो सकती है. ओसामा की मौत से ओबामा की दोबारा जीत? यहाँ के अधिकतर विशेषज्ञ ऐसा ही मानते हैं.

अमरीका होने की इच्छा

हॉलीवुड या बॉलीवुड का हीरो जब किसी गुंडे को पीटता है तो दर्शकों के भीतर एक अजीब सा रोमांच पैदा हो जाता है.

वह ख़ुद भी उत्तेजित हो जाता है. बहुत से लोगों के भीतर एक क्षण के लिए वह हीरो समा भी जाता है और वह कल्पना करने लगता है कि काश वह भी अपने दुश्मनों से इसी तरह निपट ले.

ऐसा ही रोमांच और उत्तेजना इस समय दुनिया के बहुत से हिस्सों में लोग महसूस कर रहे हैं. ख़ासकर भारत में.

पाकिस्तान में घुसकर अमरीकी कमांडो ने ओसामा बिन लादेन को मार दिया है.

बहुत से लोग चाहते हैं कि अब भारत भी अमरीका की तरह हीरो हो जाए और अपने कमांडो पाकिस्तान में भेजकर उन लोगों को मार आए जो कथित तौर पर भारत में चरमपंथी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार हैं.

बिना मुक़दमा चलाए और बिना सफ़ाई का मौक़ा दिए. क़ानून की सारी धाराओं और प्रावधानों को ताक पर धरकर.

ये अमरीकी न्याय का तरीक़ा है जो बहुत से लोगों को आकर्षित करता है. लुभाता है. शायद थोड़ा गुदगुदाता भी है और परपीड़ा का कुत्सित सुख देता है.

लेकिन वे शायद बहुत सी वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं.

लोग भूल जाते हैं कि इराक़ पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि अमरीका और उसके सहयोगी देशों को विश्वास था कि सद्दाम हुसैन महाविनाश के हथियार रखे हुए हैं. लेकिन इराक़ को तहस नहस करने के बाद भी वहाँ से महाविनाश का एक भी हथियार नहीं मिला.

इसके बाद सद्दाम हुसैन पर दुजैल में 148 शियाओं को मारने का मुक़दमा चलाया गया और दोषी ठहराकर फाँसी पर चढ़ा दिया गया. लेकिन वर्ष 2003 में इराक़ पर हुए हमले के बाद से वहाँ एक लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं उसका दोषी कौन है इस पर कभी चर्चा नहीं होती.

इसी तरह 9/11 के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीकी और मित्र देशों ने हमला किया. तालिबान सरकार का पतन हो गया. लेकिन इन हमलों के बाद से अब तक कितने निर्दोषों की जानें गई हैं इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है.

अमरीका पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में ड्रोन हमले करता है और इससे नाराज़ तालिबान लाहौर और कराची और दूसरी जगह विस्फोट करके उन निर्दोष नागरिकों की जान ले लेते हैं, जो अमरीका के साथ नहीं हैं. वे शायद अमरीका की दोस्त बनी पाकिस्तान की सरकार के साथ भी नहीं होंगे.

लेकिन इन सबसे अमरीका की चौधराहट कम नहीं होती.

'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' की तर्ज़ पर अमरीका और उसके साथी देश एक के बाद एक कार्रवाई करते जाते हैं और समर्थ संस्थाएँ इस पर सवाल भी नहीं उठातीं.

पता नहीं कि लोकतंत्र की स्थापना और दुनिया को एक सुरक्षित स्थान बनाने का यह अमरीकी तरीक़ा कब तक चलता रहेगा.

किसी भी क़ीमत पर अल-क़ायदा से लेकर लश्करे तैबा को सही नहीं ठहराया जा सकता. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ओसामा बिन लादेन से लेकर दाउद इब्राहिम तक सभी को सज़ा दी जानी चाहिए.

लेकिन हम एक सभ्य सुसंस्कृत समाज का हिस्सा हैं और हमने समाज को संचालित करने के लिए क़ानून बना रखे हैं. हम सबसे उम्मीद की जाती है कि हम क़ानून का पालन करेंगे.

लोकतंत्र की हिमायत करने वालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र की सभी संस्थाएँ सिर्फ़ अपने हिस्से का काम करें.

सुरक्षाबलों को सज़ा देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता और न सेनाएँ अदालतों का काम कर सकती हैं.

अमरीका चाहे जो कहे लेकिन जो कुछ उसने पिछले कुछ दशकों में किया है उसने दुनिया को सुरक्षित बनाया हो न बनाया हो, अमरीका के भीतर एक डर ज़रुर पैदा कर दिया है.

ये भी कम लोग जानते हैं कि चरमपंथी हमलों का डर जितना अमरीकियों को सताता है उतना शायद इस समय अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों को भी नहीं सताता होगा जहाँ इस समय आए दिन बम फट रहे हैं.

लेकिन फिर भी लोग अमरीका होना चाहते हैं.

भारत जैसे देश में अमरीका होने की ये इच्छा मन में एक डर पैदा करती है.

तेरे बिन लादेन....

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 02 मई 2011, 21:44

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ओसामा तुम नहीं रहे. जाने के बाद कितने याद आओगे ये नहीं पता लेकिन जाते जाते कई लोगों को बेरोज़गार और दुःखी ज़रुर कर गए हो.

अमरीका से लेकर अफ़गानिस्तान तक और ऑस्ट्रेलिया से लेकर पाकिस्तान तक. यहां तक कि भारत में भी सारे पत्रकार दुःखी हैं. कई सारे देश और नेता भी दुःखी हैं.

पत्रकार दुःखी हैं कि अब कौन टेप भेजेगा जिसे छाप छाप कर नौकरी बचाई जाएगी.कहां जाएंगे वो बेसिर पैर विश्लेषण के दिन और आतंकवाद विशेषज्ञ की उपाधियां. कहां जाएंगे वो दिन जब कुछ नहीं होने पर लादेन के नाम का वीडियो लेकर आधे आधे घंटे का कार्यक्रम बना लिया करते थे.

हम आज भले ही खुश हैं कि बहुत काम है लेकिन हमें पता है आने वाले दिन बड़े ख़राब होने वाले हैं. हमें भी अब दौड़ना पड़ेगा ख़बरों के लिए. तुम थे तो स्टूडियो में बैठ कर लाइव कर दिया करते थे. कि तुमने फलां फलां कहा और फलां फलां चीज़ चाहते थे.

तुम महान थे लादेन तुमने कभी पत्रकारों की बात नहीं काटी.

अभी तुम्हारी मौत को 12 घंटे भी नहीं हुए और क्या नौबत आ गई. एक चैनल को एक फ़िल्म (तेरे बिन लादेन) के हीरो से प्रतिक्रिया लेनी पड़ी कि तुम्हारी मौत पर उसको कैसा लग रहा है.

दुःखी पाकिस्तान भी हैं. कहते तो सब थे लेकिन अब पक्की बात हो गई कि देश में क्या हो रहा है इसका पता ज़रदारी से पहले ओबामा को होता है. पहले सिर्फ़ रेमंड डेविस घूम घूम कर गोलियां मार रहा था अब तालेबान भी घूम घूमकर पूरे पाकिस्तान में गोलियां चलाएंगे.

सुना है तालिबान वाले कह रहे हैं अब हमारा दुश्मन नंबर एक अमरीका नहीं बल्कि पाकिस्तान है. लीजिए ज़रदारी साहब और कियानी साहब आपके लिए और काम, जिसके पैसे अमरीका भी नहीं देगा.

टीवी पर बराक ओबामा घोषणा करते खुश दिखे होंगे लेकिन उनको भी पता है लादेन को मारने के बाद मुश्किल बढ़ गई है. अब उनको भी विकास के काम करने होंगे. मंदी से डराने के लिए लादेन का भूत नहीं मिलेगा. अगले चुनावों में अमरीका की जनता अफ़गानिस्तान से सेना वापस बुलाने की मांग करेगी.

वैसे ओबामा साहब तो वादा कर के मुकर जाते हैं. ग्वांतानामो बे बंद करने का वादा था. देखें लादेन के मरने के बाद जनता को क्या जवाब देंगे.

इसी बात से हामिद करज़ई भी दुःखी हैं. अमरीकी और नैटो सेना चली गई तो उनके प्रशासन का क्या होगा. शांति की बात कर रहे हैं लेकिन उनको पता है शांति तो सेना के साथ रहती है. उनकी बात ही नहीं मानती. उनकी शांति तो भारत की कामवाली बाई जैसी है जब मन छुट्टी ले लेती है.

तो इंतज़ार कीजिए एक और हौव्वे का ताकि सबकी रोज़ी चल सके. काम नहीं करने वालों को कुछ तो करना पड़े.


ब्रिटेन की राजसी शादी

हो गई शाही शादी जिसकी तैयारियाँ महीनों से चल रही थीं.

महारानी एलिज़ाबेथ के बड़े पोते की इस शादी को जितना पास से पत्रकार देख सकते थे, उतने पास से देखने का मौक़ा मुझे भी मिला.

कुछ छोटी-छोटी बातें जो पूरब और पश्चिम को एक-दूसरे से अलग करती हैं और कई बार जोड़ती भी हैं, इस शादी के दौरान ज़हन में आईं.

पूरब में शादी का मतलब ही है दावत यानी ढेर सारा और तरह-तरह का खाना, यहाँ खाने की कोई चर्चा नहीं थी, शादी में 1900 लोग बतौर मेहमान न्यौते गए लेकिन दोपहर के खाने के लिए सिर्फ़ 600 लोगों को बकिंघम पैलेस बुलाया गया.

बाक़ी के 1300 लोगों को पौने बारह बजे वेस्टमिंस्टर ऐबी से ही चलता कर दिया गया, शायद उन्होंने एक गिलास पानी भी नहीं पिया होगा, हमारे जैसे लोगों की तो ख़ैर बात ही छोड़िए.

पूरब में अच्छी से अच्छी शादी में थोड़ी बहुत अफ़रा-तफ़री और लेट-लतीफ़ी ज़रूर होती है लेकिन इस शादी में सब कुछ घड़ी की टिकटिक के साथ चल रहा था, लगभग दो घंटे में सब संपन्न हो गया.

कहीं कोई भूल नहीं, कोई ग़लती नहीं, चर्च में चलने के दो रिहर्सल दुल्हन पहले ही कर चुकी थी.

किसी के हाथ से फिसलकर भी कोई चीज़ गिरी नहीं, शादी कराने वाली पादरी की ज़बान भी नहीं लड़खड़ाई, सब कुछ इतना व्यवस्थित था कि अवास्तविक लग रहा था.

एक और ख़ास बात ये थी कि यह सही मायने में पब्लिक इवेंट था, आम जनता सड़क किनारे पत्रकारों से आगे खड़ी थी, पत्रकार भले ही थोड़े ऊँचे प्लेटफ़ॉर्म पर हों लेकिन थे आम जनता के पीछे.

सुरक्षा तो थी लेकिन बेवजह रोक-टोक नहीं थी लोग खा-पी रहे थे, बकिंघम पैलेस के बड़े गेट के बिल्कुल पास खड़े होकर लोग बीयर पीकर नाच रहे थे.

दूल्हे, उसके भाई और पिता को फौजी पोशाक में देखना भी थोड़ा विचित्र लग रहा था, ऐसा लगा कि प्रिंस विलियम शादी करने के नहीं बल्कि जंग लड़ने जा रहे हों लेकिन फ़ौरन ख़याल आया कि हमारे यहाँ भी तो कई शादियों में दूल्हा तलवार लेकर घोड़ी पर सवार होता है.

बहरहाल, इस शादी को देखने और भारत की शादियों को याद करने के बाद यही लगा कि अच्छा-बुरा कोई नहीं, ईस्ट इज़ ईस्ट, वेस्ट इज़ वेस्ट.

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