छूट जाने का आनंद
ज़िंदगी में आगे बढ़ना मजबूरी है पीछे छूट जाना नियति. मजबूरी आपको बड़ा आदमी बना सकती है. नियति आपको वहीं रख सकती है जहां आप रह जाते हैं. लेकिन बड़े होने में वो आनंद कहां जो रुके होने में हैं. बुद्ध रुके रहे तो बुद्ध कहलाए. हम लोग चलते रह गए. बुद्ध तो क्या बुद्धिमान भी नहीं हो पाए.
मजबूरी में चले थे आज भी मजबूर हैं सो चल रहे हैं जब सूकून होगा तो रुकेंगे और बड़े बुजुर्ग कहते हैं. सूकून मिल जाए तो ज़िंदगी किस काम की.
आज याद आई है एक दोस्त की जिसके साथ दुपहरिया में कच्चे आम तोड़ा करते थे और पहा़ड़ों पर घंटों बैठकर ऊपर से छोटी लगने वाली कॉलोनी को घंटों निहारा करते थे.
झरने के पानी में पत्थर फेंक पर अपनी सपनों की रानी को याद किया करते थे और जब घर में बाइक आई तो दोनों उस पर बैठ कर कॉलोनी की एक गली के खूब चक्कर काटा करते थे.
माशूका को पता नहीं होता था और उसके लिए मार पीट करने पर आमादा होने पर यही दोस्त काम आता था. बिना किसी सवाल जवाब के. उसका एक ही धर्म था..मैंने जो कह दिया बस वही सही है. उसके मामले में मेरा भी यही धर्म था. उसने जो कहा वही सही. मां बाप भाई बहन सब बेकार.
ये खूब चलता है कुछ साल. नए कपड़े, बाइक, लड़कियां, दोस्ती वाली फ़िल्में...फिर या तो एक लड़की आती है या फिर ज़िंदगी आती है और रास्ते खुद ब खुद बदलते हैं.
मैं मजबूर था कॉलोनी छोड़ने को उसकी नियति थी वहीं रुकना. चार पांच साल तक संपर्क रखा फिर मैं बड़ा आदमी हो गया. वो इंसान ही रहा. बड़े शहर के शब्दों में बैकवार्ड और यू नो कॉलोनी पीपुल.
आखिरी बार उसका फोन आया था. उसे क़ानून की पढ़ाई करने के लिए पांच हज़ार रुपए चाहिए थे. मैंने वादा किया था मदद का लेकिन याद नहीं रहा. अब हर साल कॉलोनी जाता हूं और मेरी आंखें उसे तलाश करती हैं.
उसके पापा भी रिटायर हो चुके हैं. कॉलोनी से दूर वो कहीं रहता है. उधर से ट्रेन गुज़रती है तो खिड़की के पास बैठ जाता हूं. शायद वो कहीं दिख जाए. खोजने नहीं जाता हूं डरता हूं मिल जाए तो क्या जवाब दूंगा.
सुना है किसी कोर्ट में प्रैक्टिस करता है. शादी भी हो गई है. छोटे से कस्बे में वो रुका हुआ है. शायद खुश भी हो. रुकना उसकी नियति थी.. मैं अभी भी चल रहा हूं. क्योंकि मैं मजबूर हूं और चलते रहना ही शायद मेरी नियति है.

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झा जी, बहुत सुंदर, पुरानी यादें ताज़ा हो गई. एक भावनात्मक लेख और ह्दय से निकले एक एक शब्द.
दिल को छू गयी लेकिन शीर्षक समझ में नहीं आया की आनंद कैसा..?
हां आप सही सुशील. समय के प्रवाह में ज़रुरतों के कारण कई दोस्त, यहां तक कि रिश्तेदार भी छूट जाते हैं. मैं आपके ब्लॉग को पढ़कर इतना भावुक हो गया कि पूछिए. मत. सारे पुराने दोस्त नज़रों के सामने आ गए. बहुत बहुत शुक्रिया
सुशील जी क्यूँ आप वो यादे हम सब को फिर वापस लाकर दे रहे हैं.... वो लम्हा तो बस रुला देती है हमें
कभी कभी तो मन करता है सबकुछ छोरकर वही चला जाऊ
धन्यवाद
कुछ मज़बूरी, कुछ आगे बढ़ने और ऊंचे उठने की ललक. खुद की नज़रों में भी और कुछ सबकी नज़रों में भी. बस यही सब चीज़ें ज़िम्मेदार हैं इन सब परिस्थितियों की. आप तो लिख कर अपने मन को सांत्वना दे सकते हैं. मैं तो वो भी नहीं कर सकता हूं. वैसे अब सारे दोस्त भी बाहर ही आ गए हैं और मेरे ख्याल से वो भी कुछ कुछ ऐसा ही महसूस करते होंगे.
दिल को छूने वाला ब्लॉग है. थैंक्यू सुशील
मैं आपसे सहमत हूं लेकिन ये रीत है कि हम हमेशा उन्हीं लोगों के साथ नहीं रह सकते हैं. यह जीवन है. संघर्ष है जीवित रहने का और जो मजबूत है वो आगे बढ़ जाता है. जो आज अपना है वो कल किसी और का होगा.
झा साहब, साढ़े सोलह साल का था जब भागना (चलना नहीं) शुरू किया था। आज उम्र के 38वें पायदान पर खड़ा हूं। इस भाग दौड़ में काफी कुछ खोया और पाया है। बचपन (शायद यह शब्द मेरे मामले में अपने मायने खो चुका है) के तीन दोस्तों से दोस्ती आज भी बरकरार है....स्कल के कुछ दोस्तों से मित्रता जारी है। वायुसेना के मित्र आज भी अपने हैं। कुछ खास नहीं खोया मैंने दोस्ती के फ्रंट पर, पर हां आर्थिक फ्रंट पर ये दोस्ती कभी आड़े नहीं आई। यदि समय निकाला जाए और मित्रों से संपर्क बनाए रखा जाए तो आप जैसा लेख लिखने की नौबत न आए। मैं तो कहूं कि अपने दोस्त से मिल लो जाकर......दिल खोलकर रख दो.....बात बन जाएगी। इंतजार मत करो मित्र।
सुशील जी इसके बजाय आप काश उन साथियों का ज़िक्र करते जो आप के साथ बीबीसी में काम करते थे और आज बीबीसी छोड़कर उनका अता-पता भी नहीं है कि वे कैसे हैं और कहां हैं. आप इस लेख से हम बीबीस स्रोताओं को क्या संदेश देना चाहते हैं, ये हम समझ नहीं पा रहे. बीबीसी ने जिन साथियों को खोया है या छोड़ा है उनकी कोई भी भरपाई नहीं कर सकता है.
आपने ठीक लिखा है सुशील. सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए अतीत की यादें वाक़ई पीछे छूटती जाती हैं.
आंखें नम हो गईं. सच पूछें तो बहुत रो रहा हूं. अपना भी यही हाल है. सब छूट गए धीरे धीरे. आज उस हर बात की याद आ रही है जो अपने दोस्तों के साथ गावं में गुज़ारा था. मेरा सबसे परम मित्र तो अब इस दुनिया में भी नहीं है. उसके साथ 12 बजे दोपहर में भी क्रिकेट खेलना और बगीचे से आम अमरूद चुरा-चुरा कर खाना भूल नहीं पाता. बाल्टी भर-भर के जामुन खाना - क्या अच्छे दिन थे. अभी जब गर्मी का मौसम है, उस समय गर्मियों में घंटों गंगा में छलांग लगाया करते थे. अब तो बस यादें बाक़ी हैं. बहुत रुला दिया आपने.
सुशील जी, ज़िंदगी के सफ़र में कई लोग मिलते हैं, कई बिछड़ते हैं. हम ख़ुद भी वही व्यक्ति नहीं रह जाते. पासपोर्ट पर लगी अपने फ़ोटो को ही देख लीजिए, चेहरा कितना बदल जाता है. तो उसी तरह से आपका वो दोस्त आपके सामने से गुज़रा होगा, आप उसे पहचान नहीं पाए होंगे. परेशान मत होइए, सबकी ज़िंदगी के साथ इसी तरह की घटनाएँ होती हैं.
आपने क्या लिखा है दोस्त. मैं भी गांव से ही हूं. बिहार के सीवान में रघुनाथपुर का रहनेवाला. अब मैं विदेश में रहता हूं. ये ज़िंदगी एक रेस की तरह है .अगर तेज़ नहीं दौड़ेंगे तो कोई आपको कुचलकर आगे निकल जाएगा. ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद.
शुक्रिया.
1. मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया...हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया.
2. जाने कहां गए वो दिन...कहते थे तेरी याद में पलकों को हम बिछाएंगे.
सुशील जी, बहुत अच्छा.
आपका ब्लॉग पढ़ कर आंखों के सामने बचपन घूम गया और आंखे नम हो गईं. सच में हम लोग सिर्फ़ दौड़ रहे हैं और जो पीछे छूट गए हैं वो फिर साथ नहीं आ पाते. बाराबंकी में पढता था. दोस्तों का ग्रुप था छह लोग थे. ट्यूशन पढते थे.एक बार मंदिर में प्रसाद बंट रहा था सबको दिया गया हमको नहीं तो सारे दोस्तों ने प्रसाद वापस कर दिया था. अब ज़िंदगी में परेशानी होती है तो ये सब बातें याद आती हैं. 24 साल बाद मालूम नहीं सब कहां हैं. कभी बारबंकी जाने का मौका मिलता है तो ये यादें मेरे सामने आ जाती हैं और आंखों में एक मुस्कुराहाट और आंसू दोनों साथ आ जाते हैं.
सुशील जी, बहुत ही भावुक कर दिया आपने. आंखें नम हो आई हैं और कुछ कहने का मन नहीं कर रहा.
जिंदगी के रंग कितने निराले हैं !
साथ देने वाला हर कोई है लेकिन हम अकेले हैं !!
पानी है मंज़िल हमें मगर रास्तों में रुकावटें हैं !
खुशियों में सब साथ हैं, ग़मों में सब पराये हैं!
झा सर, आपने तो बचपन के सारे दोस्तों की याद दिला दी. आज मैं उन्हें बहुत याद कर रहा हूं.
मित्र, आपने अपने मित्र के साथ जो कुछ भी किया अच्छा नहीं किया. हालांकि मेरे जीवन में ऐसी स्थिति आई ही नहीं, इसलिए ये नहीं कह सकता कि समान परिस्थिति में मैं क्या करता.
क्या बात झा साहब एक-एक शब्द दिल से निकला है कहीं कोई लाग लपेट नहीं....ऐसा लगा जैसे कि एक फ़िल्म चल पड़ी हो फ़्लैशबैक में और लग रहा था की अंत में आप दोस्त से मिलेंगे और कहानी का सुखद अंत होगा. पर कोई बात नहीं अभी भी समय है और वैसे भी आज के फेसबुक और ट्विटर वाले दौर में हर कोई पास में है. मिल नहीं सकते तो बात ही कर लीजिए.
खोजने नहीं जाता हूं डरता हूं मिल जाए तो क्या जवाब दूंगा........मेरे जीवन की सबसे भावुक पंक्ति.....
काफी अच्छा लिखा आपने. बस 'याद नहीं रहा' वाक्य बोल कर आप किसे धोखा दे रहे हैं. खुद को या पाठकों को. अतीत जब कचोटता है तो हमें पता होता है अपनी ग़लतियों का.
पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कहूंगा कि आपकी बात दिल को छू गई. सच में.
झा साहब फेस बुक पर ढूँढने की कोशिश कीजिये उसको ज़रूर ढूढ़ लेंगे आप
सुशील जी, किस जमाने में रह रहे हैं आप. आज के ज़माने में आप ओरकुट और फेसबुक पर अपने दोस्तों को खोज सकते हैं. मैंने तो अपने स्कूल कॉलेज और पुराने दोस्तों को खोज लिया है. मैं भी छत्तीसगढ़ के छोटे से इलाक़े से हूं जहां हमने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया था. कॉलेज आने के बाद इंटरनेट जाना. इंटरनेट नहीं तो सेलफोन तो सबके पास होता है. अगर आप कोशिश करेंगे तो खोज लेंगे.
बहुत खूब पुराने दिन याद आ गए.
बात सही है सुशील. जीवन एक रेस है जहां आप कभी तेज़ दौड़ते हैं और देख नहीं पाते कि दोस्त छूट गए हैं. मैं देहरादून से हूं और ब्रिटेन में रहता हूं.मैंने भी आपके जैसा जीवन देखा है और वही किया है जो बचपन में आप करते थे.मैं कोशिश करता हूं अपने उन सभी दोस्तों से फोन या किसी अन्य ज़रिए से संपर्क में रहने की.लेकिन उनसे वैसा रिस्पांस नहीं मिलता है. पिछली बार एक दोस्त को फोन किया. मिलने गया लेकिन मुलाक़ात नहीं हुई. वापस आया तो उसका मिस्ड कॉल था फोन पर. अच्छा लगा कि उसने याद किया. मैंने फोन किया तो पता चला उसे एक लाख रुपए चाहिए थे. मेरे पास पैसे नहीं थे क्योंकि मैं भारत यात्रा से लौटा ही था. उस बातचीत के बाद उसने कभी फोन नहीं किया. कभी कभी लगता है कि मैं ही टाइम वेस्ट कर रहा हूं पुराने दोस्तों से संपर्क में रहने की कोशिश कर के. लेकिन कुछ भी हो आपका लेख अच्छा लगा. गुरविंदर..
गजब झा जी. झकझोर देते हो
अच्छा लगा. आपका एक सकारात्मक विचार पढ़ कर. मैं भी उन सभी दोस्तों दुश्मनों का शुक्रिया अदा करता हूं जो मंजिल तक पहुंचने में कभी न कभी मिले थे.
सुशील जी, आपका ब्लाग वाकई दिल को छू गया । सही मायने मे शान्ति दुसरो को मदद करने मे जितनी मिलती है उतनी आपनी कामयाबी मे नही मिलती । सहायता यदि बच्पन के दोस्त को किया जाये तो कहना कि क्या.......
फिर वही किया सुशील आपने... रूला दिया! ढूंढ़ो अपने दोस्त को... नज़रे भले न मिला सको फिर भी मिलो उससे... यक़ीन मानो दोस्त, अच्छा लगेगा.
बहुत ही ज़बर्दस्त लिखा है. बुद्ध बनने की काबिलियत नहीं है तो चलता ही रहूंगा..
बहुत अच्छा लगा. इन दिनों मैं भी इसी दौड़ से गुज़र रहा हूँ. इस पर कुछ पक्तियां लिखी हैं -
जिन्दगी बहुत दूर जाती नज़र आती है मुझे,
साँझ भी सुबह नज़र आती हैं मुझे,
आज फिर इस क्रंकीट के जंगल में,
आकेलापन नज़र आता हैं मुझे,
हैं उम्मीद वे फिर मिलेंगे मुझे,
उस फुटपाथ पर जहाँ,
नज़र से नज़र फिर मिलेगी मुझे.
भावनाओं से ओत-प्रोत आपका ये लेख मन को छू गया. लगा बड़े हो जाना बहुत लोगों की नज़रों में हमें दोषी बना देता है.
ठीक कहा आपने.हम कई बार अपनी सफलता को बांट नहीं पाते है और हमारे अपने या दोस्त पीछे छूट जाते है.उन्हें उम्मीद होती है सफलता के इस मुकाम में उनका भी योगदान है और थोड़ा श्रेय उन्हें भी मिलेगा.जब हम पीछे देखते है तो दोस्तों से आंखें मिलाने में भी हिचकिचाते है.क्या कभी हमारे साथ भी ऐसा हुआ है...याद नहीं.
लिखा तो आपने बहुत अच्छा है.एक बात जो साफ-साफ आपके लेखन से महसूस होती है कि बाहर रहने के बाद भी आप अपने लोगों को या अपने पुराने दोस्तों को याद रखते हैं.
मन को छूने वाला लेख.
बहुत अच्छा सुशील जी. इंसान जब जन्म लेता है तो उसे सारे रिश्ते बने-बनाये मिलते है. माँ- बाप, भाई- बहन, दादा-दादी, चाचा-चाची आदि , लेकिन दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम अपनी सोंच , समझ , आदत के अनुसार बनाते हैं. दोस्ती का रिश्ता सब रिश्ते से बड़ा होता है.
सुशील जी आपने मुझे याद दिला दी अपने दिनों की.
कमाल है.. पुराने दिन याद आ गए.
आपने पुराने दिनों की याद ताज़ा कर दी.
आपके इस ब्लॉग ने भोलेपन की याद दिला दी जब किसी भी क़ीमत पर लोग दोस्तों की मदद करने के लिए तैयार रहते थे. लेकिन आज वही दोस्त जब किसी से मदद की आशा रखते हैं तो लोग उससे दूर रहना चाहते हैं. पता नहीं ऐसी भावनाएँ क्यों जाग गई हैं लोगों में एक दूसरे के प्रति.
आपकी प्रस्तुती में दोस्ती की धुंधली याद एवं दोस्त की समय पर व्यस्तता के कारण मदद न कर पाने की कसक दिखलाई पड़ रही है. भविष्य में समय पर ज़रुरतमंद की मदद करना न भूलें यही आपके लिए उस दोस्त के प्रति मदद न कर पाने का प्रायश्चित है.