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अब शासन चलाने की चुनौती

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शनिवार, 14 मई 2011, 14:58 IST

आख़िरकार 34 साल बाद वामपंथियों की पश्चिम बंगाल से विदाई हुई.

ममता बनर्जी इसकी सूत्रधार बनीं. उनको सब दीदी कहते हैं. दीदी यानी बड़ी बहन.

लेकिन कहाँ की बड़ी? कम से कम क़द में तो कतई नहीं!

बमुश्किल पाँच फ़ुट लंबी, आसमानी किनारी वाली तुड़ीमुड़ी सी सूती साड़ी और रबर की चप्पल पहने हुए.

भद्रलोक बंगाली संस्कृति से दूर-दूर का वास्ता नहीं लेकिन तुर्रा यह कि अब तक के सारे लोकसभा चुनाव उन्होंने पश्चिम बंगाल के शायद सबसे पॉश चुनाव क्षेत्र दक्षिणी कोलकाता से जीते हैं.

बंगाल में नौ करोड़ मतदाता हैं,जर्मनी के मतदाताओं से भी ज़्यादा और उनमें से बहुतों के लिए ममता एक तेज़ कुदाल की तरह हैं जिन्होंने उनकी 'बर्लिन की दीवार' को ढहा दिया है.

लेकिन क्या यह कारनामा करने वाली ममता में शासन करने की भी क्षमता है?

बंगाल की जानी मानी लेखिका महाश्वेता देवी का सवाल है, 'ममता की राजनीति क्या है यह कहना बहुत मुश्किल है.'

यह तो हमें पता है कि वह सीपीएम की दुश्मन हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं.

दिल्ली में ममता को दूसरी निगाहों से देखा जाता है.

वह पहले कई बार अलग-अलग सरकारों से अलग-अलग मुद्दों पर इस्तीफ़ा दे चुकी हैं. उनकी छवि घड़ी में तोला घड़ी में माशा वाले दोस्त की है.

कई बार तो वह अपनी सरकार के पेट्रोल के दामों में बढ़ोत्तरी के फ़ैसले का विरोध करने के लिए कैबिनेट की बैठक तक का बहिष्कार कर चुकी हैं.

ममता जिस मुक़ाम पर पहुँची हैं वहाँ तक पहुँचने के लिए उन्हें काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी है. वह तीन क़दम आगे बढ़ी हैं तो दो क़दम फिसली भी हैं.

सड़कों पर वामपंथियों से भिड़ने में वह उन पर बीस पड़ी हैं लेकिन क्या उनमें राज्य पर शासन करने की भी क्षमता है?

अपनी तुनकमिज़ाजी के लिए मशहूर ममता ने अब तक शालीन राजनीति का रास्ता तो नहीं ही अपनाया है.

लेकिन क्या वह भविष्य में बिधान चंद्र राय और ज्योति बसु जैसी राजनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शिता दिखा पाएंगी?

उनके पक्ष में एक बात ज़रूर है कि उनकी पार्टी में उनका कोई विरोध नहीं है.

उन्होंने अमित मित्रा, पूर्व मुख्य सचिव मनीष गुप्ता और डेरेक ओ ब्रायन जैसे कई योग्य लोगों को अपने दल की तरफ़ खींचा है.

अब सबकी निगाहें राइटर्स बिल्डिंग पर होंगी कि ममता बंगाल की जनता की उम्मीदों पर खरी उतर पाती हैं या नहीं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:04 IST, 14 मई 2011 निर्मला जोशी:

    ये सभी के लिए दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी राइटर्स बिल्डिंग का काम किस तरह कर पाती हैं, लेकिन इस तथ्य से अधिकाशं लोग सहमत हैं कि ममता को सत्ता उनकी किसी योग्यता के कारण नहीं सौंपी गई बल्कि लोग वामपंथियों से ऊब चुके थे और परिवर्तन चाहते थे. इस सबके बीच एक सवाल ये उठता है कि ममता और वामपंथियों के बीच जो संघर्ष चला उसमें आम लोगों के लिए क्या नतीजा निकला. कल को ममता असफल हो गई तो वामपंथी फिर उसी उत्साह से लौट आएंगे जैसे आज ममता सत्ता पर काबिज हुई हैं. सत्ता के खेल में लोगों की कुछ हैसियत है भी या नहीं, ये सवाल महत्वपूर्ण है.

  • 2. 17:14 IST, 14 मई 2011 ZIA JAFRI:

    ममता चाहे सत्ता में रही हों या विपक्ष में, उनकी भूमिका हमेशा तुनकमिज़ाजी और विपक्ष वाली रही है जहां करना-धऱना कुछ नहीं होता केवल नौटकीं कर दूसरों को भड़काना होता है. लेकिन अब उनके सामने कड़ी चुनौती है लोगों की अपेक्षाओं पर खऱा उतरने की. उन्हें खुद को सिद्ध करना होगा. वामपंथी ज़्यादा दिन इंतज़ार नहीं करेंगे.

  • 3. 17:22 IST, 14 मई 2011 anjani kumar:

    अच्छा विश्लेषण रेहान साहब. दीदी अगर चुनाव जीतना जान गई है तो धीरे-धीरे सरकार चलाना जान ही जाएगी.

  • 4. 17:53 IST, 14 मई 2011 vimal kishor singh:

    बंगाल की जनता 34 साल से एक ही सरकार को देखते-देखते ऊब-सी गई थी और वो बदलाव चाहती थी. ममता बनर्जी के रूप में जनता ने बदलाव को चुना है और यही उम्मीद कर रही है कि वो उनकी उम्मीदों पर खरी उतरेंगी.

  • 5. 19:38 IST, 14 मई 2011 pradeep:

    दीदी का मतलब हिंदी और बंग्ला में वही होता है जो उर्दू में आप का और तमिल में अक्का का . इसमें कद की बात क्यों कर रहें हैं रेहान साहब . वो सादगी की परिचायक है .रही बात शासन चलाने की तो वो सीख जाएंगी , इतना विश्वास है लोगों को.

  • 6. 21:13 IST, 14 मई 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेहान साहब, चिंता न करें बेईमान नेताओ के लिए बहुत बेईमान अधिकारी और कर्मचारी हैं जो शासन तो क्या महाशासन चलवा देंगे .रहा सवाल ममता जी का तो क्या मौजूदा समय में वो कांग्रेस की ग़लत नीतियों का साथ नही दे रही है ? कितना जनता को बेवकूफ बना कर 34 साल बाद ही सही सता पर विराजमान तो हो गई हैं ,लेकिन ग़रीबो का कितना साथ देगीं उस समय का इंतजार है .

  • 7. 21:57 IST, 14 मई 2011 प्रशांत शर्मा :

    यूपी, बिहार और फिर पं.बंगाल के चुनावों को देखकर तो लगता है कि अब देश की जनता विकास चाहती है. कुशासन से मुक्ति चाहती है. ममता से बंगाल के लोगों को बहुत ज़्यादा आस है लिहाज़ा लोगों ने दीदी पर ममता उड़ेली दी है. अब ममता दीदी बंगाल की दादा बन गई है. लेकिन देखने वाली बात होगी कि क्या दीदी, दादा जैसा शासन दे पाती है या नहीं? रेहान जी आपने अपने ब्लाग में ममता दीदी के सभी पहलुओं को बखू़बी समेटा है.

  • 8. 02:11 IST, 15 मई 2011 prem raj:

    ये सब आत्मशक्ति से है. ममता दीदी ने 34 सालों में अपनी आत्मशक्ति बढ़ाई है . उन्हें मालूम है कि बंगाल की आम जनता उनसे क्या चाहती है.आम जनता तरक्की चाहती है.वो दुनिया के साथ खड़ी होना चाहती है. ममता दीदी इसे ज़रूर पूरा करेंगी.

  • 9. 05:10 IST, 15 मई 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    आपने बिलकुल सही कहा रेहान भाई.चुनाव जीत जाना दूसरी बात है और अच्छा शासन देना दूसरी बात.जहाँ इतिहास में बिन तुगलक और औरंगजेब जैसे विद्वान अच्छा शासन नहीं दे पाए वहीँ अलाउद्दीन और अकबर जैसे अनपढ़ों को सफलता हाथ लगी.ममता को अपने मिजाज़ में ढेरों बदलाव लाने पड़ेंगे.यहाँ तुनुकमिज़ाज़ी से काम नहीं चलनेवाला;विरोधियों-विपक्षियों को भी साथ में लेकर चलना पड़ेगा.सबसे दिलचस्प तो यह देखना होगा कि वे नक्सलवादियों से कैसे निपटती हैं.हमें उन्हें कम-से-कम एक साल का वक़्त देना चाहिए तब उनकी शासन क्षमता का विश्लेषण करना बेहतर रहेगा,अभी कुछ भी कहना अपरिपक्वता होगी.

  • 10. 06:43 IST, 15 मई 2011 shridatt sharma:

    ममता ने कहा कि बंगाल को आज़ादी मिल गई! हमें हैं इनसे उम्मीद-ए-वफ़ा, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है!

  • 11. 14:18 IST, 15 मई 2011 Gurpreet:

    जिस तरह से ममता बनर्जी भारतीय रेलवे को संभाल रही हैं, उसे देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बंगाल में नई सत्ता कैसी होगी. वामपंथी और ममता, सब एक से ही हैं, जिन्हें लोगों की इज़्ज़त करना आता.

  • 12. 14:48 IST, 15 मई 2011 नवल जोशी:

    रेहान जी ने जैसा कि ब्लॉग में लिखा है कि ममता बंगाल की जनता की उम्मीदों पर खरी उतर पाती हैं या नहीं।दरअसल चुनाव में जीतने का यह मतलब नहीं है कि लोगों को इनसे अपनी उम्मीदें पूरी होने की कोई आशा है। चुनाव का अब जनता के पास कोई अवसर ही नहीं है केवल अदला बदली का विकल्प है। आज यह पार्टी है तो कल दूसरी होगी। भारतीय चुनाव प्रणाली से इन सभी पार्टियों का इतना तालमेल हो गया है है कि अब हार-जीत का कोई खास मतलब नहीं है। बंगाल में बामपंथी कितनी ही बुरी तरह पराजित हुए हों लेकिन नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से वे अब जनता की आवाज बन जाऐगें। जो दल चुन कर दुबारा सत्ता में आ जाते हैं वे भी कोई लोकप्रियता के कारण चुने गये हों ऐसी बात नहीं ,बल्कि उसके दूसरे अनेकों कारण होते है। यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीतिक दल कॉरपोरेट युग में प्रवेश कर गये हैं । अब जनता की मजबूरी है कि वह इनमें से ही किसी को चुने और खुशियां मनाये, फिर से दुखी होने के लिए।

  • 13. 18:18 IST, 15 मई 2011 sanjay nagia:

    रेलवे में जबतक ततकाल की टिकट ख़त्म नहीं हो जाती घर में रेलवे की वेवसाईट नहीं खुलती है. ममता को भी मेल किया कोई सुनवाई नहीं है. भारत में लोकतंत्र फ़ेल हो गया है. हमारे नेताओं में बिल्कुल क़ाबिलियत नहीं है. देश राम भरोसे ही चल रहा है.


  • 14. 10:58 IST, 16 मई 2011 Bansi Butta:

    बिल्कुल नहीं, नाच न जाने आंगन टेढ़ा.

  • 15. 12:48 IST, 16 मई 2011 Hemant:

    ममता दीदी?

    चुनाव के फ़ौरन बाद बदलाव साफ़ दिख रहा है. पेट्रोल की क़ीमत सरकार ने पाँच रूपये बढ़ा दिए लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. उनका एक ही मक़सद है कैसे गद्दी पर बैठे रहा जाए.

    कांग्रेस तो लोगों के जीवन से खेल रही है. पेट्रोल की क़ीमते बढ़ने के बाद अब रसोई गैस और डीज़ल का नंबर है. उनके हिसाब से भष्ट्रचार जैसे मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाए रखने के लिए सबसे बेहतर है कि लोग दाल-रोटी में ही उलझे रहें.

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