ओसामा से ओबामा का फ़ायदा?
वर्ष 2012, अक्तूबर का महीना. बराक ओबामा राष्ट्रपति के चुनाव के प्रचार के लिए कई शहरों का दौरा कर रहे हैं. हर जगह उनके भाषण पर ज़ोरदार तालियाँ बज रही हैं.
वे चार साल के अपने काल की उपलब्धियाँ गिना रहे हैं- मैंने देश को गहरे आर्थिक संकट से निकाला. ग़रीबों के लिए मुफ़्त से लेकर सस्ती बीमा पॉलिसी का इंतज़ाम किया, स्वास्थ्य बिल पारित कराने में कामयाब हुआ. इराक़ से और बाद में अफ़ग़ानिस्तान से अपने बहादुर फ़ौजी वापस बुलाने का वादा पूरा किया.
लेकिन उन्होंने जब अपनी आख़िरी उपलब्धि का ज़िक्र किया तो उन्हें तालियाँ ही तालियाँ सुनने को मिलीं. "ओसामा का सफ़ाया करके हमने विश्व के सबसे ख़तरनाक चरमपंथी संगठन अल क़ायदा का सर काट दिया है."
डेढ़ साल पहले जब अमरीकी राष्ट्रपति ने सीआईए को पाकिस्तान के शहर ऐबटाबाद के एक घर में अल-क़ायदा के नेता बिन लादेन के ख़िलाफ कार्रवाई की अनुमति दी थी लेकिन यह एक बहुत कठिन फ़ैसला था.
ओसामा की मौत के बाद उनकी लोकप्रियता की चर्चा होने लगी. ओसामा के मारे जाने के चार दिन बाद राष्ट्रपति ओबामा की रेटिंग 11 फ़ीसदी बढ़ गई और वे देश के हीरो हो गए.
देश में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. बिन लादेन की मौत ने अमरीकी राष्ट्रपति का कल्याण कर दिया. इस हमले के बाद राष्ट्रपति की लोकप्रियता सातवें आसमान को छूने लगी.
बिन लादेन का सफ़ाया होने के एक सप्ताह बाद राष्ट्रपति ओबामा का राजनीतिक भविष्य ऐसा लगता है जैसा कि ऊपर ज़िक्र किया गया. छह नवंबर, 2012 के मतदान में वे दोबारा राष्ट्रपति चुने जा सकते हैं.
अगर उनकी हार हुई तो उनकी किसी भारी ग़लती से ही हो सकती है. ओसामा की मौत से ओबामा की दोबारा जीत? यहाँ के अधिकतर विशेषज्ञ ऐसा ही मानते हैं.

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ज़ुबैर साहब जिस तरह यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि 9/11 की घटना की असलियत क्या है उसी तरह यह भी साफ़ नहीं है कि ओसामा की घटना में कितनी सच्चाई है. या तो मालिक जानता है या फिर ओबामा. कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा ओबामा दोबारा बनें या न बनें. एक बात साफ़ है कि अमरीका को ओसामा का भूत हमेशा याद रहेगा.
कोई अगर अच्छा काम करेगा तो उसे बताएगा भी. और अगर वह राजनीतिज्ञ हो तो उस काम का फ़ायदा भी उठाएगा चुनाव के दौरान. यह तो अच्छी बात है. भारत की तरह नहीं कि घोटाले पर घोटाले किए जाओ और चुनाव के समय पर नरेगा का नाम ले कर वोट लेने की कोशिश करो क्योंकि वोट देने वाली ग़रीब जनता तो यह भी नहीं समझ पाती कि यह घोटाला हुआ कैसे है.
ओबामा जानते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कुछ नहीं किया इसलिए अमरीकी नागरिकों को मूर्ख बनाने के लिए उन्होंने यह नाटक किया. ओसामा मरा नहीं है. यह वैसा ही ड्रामा है जैसा अपोलो 11, चाँद पर मानव का पहुँचना, 9/11, इत्यादि. यह तो बुश भी जानता था कि उसमें ओसाम का हाथ नहीं है. बरसों से अमरीकी नागरिक बेवक़ूफ़ बन रहे हैं.
आपने बिलकुल ठीक कहा ओसामा की मौत के बाद बराक ओबामा का फिर से राष्ट्रपति बनना तय है. क्योंकि यह एक ऐसी ख़बर थी जिसका हर अमरीकी को बरसों से इंतज़ार था.
ओसामा का जो हश्र हुआ उससे भी बुरा होना चाहिये था ... लेकिन इस बात से ज्यादा खुशी हुई कि ओसामा की हत्या एक आतंकवादी देश में हुई ... अब इसका फायदा अगर ओबामा उठाते हैं तो अच्छा है ... कम से कम मुस्लिम आतंकवादी संगठन के सरगना की हत्या के बाद सभ्य समाज ने राहत की सांस तो ली ही है ... अब तो जितने भी आतंकी संगठन हैं उन्हें भी ऐसे ही खत्म किया जाना चाहिये ... भारत की असंवेदनशील (डरपोक) सरकार को भी ऐसे ही कदम उठाने चाहिए ... अगर भारत सरकार में ज़रा सी गैरत बाकी है तो सीमा पार आतंकी संगठन को उखाड़ फेंके ...
जो लोग तलवार उठाएँगे वे तलवार से ही कट कर मरेंगे-बाइबिल.
अगर आँख का बदला आँख लेने का क़ानून हो तो सारा विश्व ही एक दिन अंधा हो जाएगा-बुद्ध.
तुम भोजन करने से पहले अपने पड़ोसी को भोजन करा लेना, वरना तुम्हारा भोजन खाना बेकार जाएगा-पैग़ंबर.
सीन कुछ यह है कि न तो ईसाई बाइबिल की बात मानता है न ही अपने पुरखों की. प्रभु यीशू के समर्थक कब तक समझाएँगे कि हथियार से न कभी शांति स्थापित हो पाई है, न कभी हो सकती है.
सभी का एक ही सिद्धांत है-चीरो, फाड़ो, खाओ.
लगता है मानव पागल और अंधा दोनों ही हो गया है.
मित्र निश्चित रूप से ओसामा के मरने का श्रेय ओबामा लेना चाहेंगे और इसका चुनावों में उन्हें फायदा भी होगा. भारत में सियासतदान इस तरह की घटनाओं का लाभ उठाते रहे हैं. लेकिन मैं यह नहीं मानता कि सिर्फ इसी के बल पर वे चुनाव जीत सकते हैं.
जुबैर साहब ने ओसामा की मौत से ओबामा की सम्भावित जीत को जोडने की कोशिश की है,आम लोग भी लगभग इसी तरह सोचते समझते हैं,कि ओसामा के मारे जाने से आतंकवाद का खात्मा हो गया है,अमेरिकी जनता चाहे कुछ भी सोचे या ओबामा इसी को मुद्दा बनाकर फिर चुनाव जीत जांए लेकिन इससे यह साबित नहीं होता है कि वे ठीक हैं, और अब दुनिया में आतंकवाद की जड़ समाप्त हो गयी है।जिस तरह भारत में चुनावी मुद्दे उछाल कर लोग चुनाव जीतते रहे हैं उसी तरह ओबामा भी इस मुद्दे पर चुनाव तो जीत सकते हैं लेकिन आतंकवाद का मुद्दा लम्बे समय तक न सिर्फ अमेरिका बल्कि पाकिस्तान का भी पीछा करता रहेगा।यह बात ही हास्यास्पद है कि हम यह मान लें कि लादेन के मारे जाने से आतंकवादियों का मनोबल गिरेगा। ये लोग तो खुद ही आत्मघाती बनने को तत्पर हैं फिर इन्हें मरने का मलाल इन्हें कैसे हो सकता है?बात इसके उलट भी हो सकती है कि आतंकवाद इतने नये और घातक रूपों में भी प्र्रगट हो कि अनुमान लगाना भी कठिन हो। जब तक हम उनकी मनोदशा को समझने की कोशिश नहीं करेंगें तब तक कभी हम जश्न मनाऐगें कभी वे, यह दौर इसी तरह चलता ही रहेगा,इससे हासिल कुछ भी नहीं होगा।
यह हमारे लिए शर्म की बात है कि किसी के मरने पर हम खुश हो सकते हैं। बात आतंकवाद की है यह समाप्त होना चाहिए लेकिन हम लादेन की हत्या पर खुश होते हैं, बहुत से लोग चटखारे लेकर इस चर्चा में लगे हैं कि उसे कैसे मारा गया, इनके लिए आतंकवाद कोई मुद्दा नहीं है इन्हें किसी की हत्या में रस मिलता है और ऐसी हत्या जिसे समाज का समर्थन हो तो अपने को अभिव्यक्त करने की जैसे छूट मिल जाती है। हत्या अपने-आप में घृणित कर्म है यदि मजबूरी में यह करनी भी पडी है तो इसका महिमामंडन नहीं किया जा सकता है,और न खुश हुआ जा सकता है।ऐसा करना केवल विक्षिप्तता है।किसी भी तरह और किसी भी परिस्थिति में हत्या का जश्न उचित नहीं है।यह बात नहीं है कि हमें उचित व्यवहार करना चाहिए बात यह है कि हम अमानवीय तरीके से कैसे सोच भी पाते हैं।हांलाकि यह अमेरिकी लोगों का सोचना है कि ओसामा की हत्या के लिए ओबामा को पुरस्कृत किया जाना चाहिए लेकिन यह बहुत रोचक विषय नहीं है कि इस पर बात की जाए और जुबैर साहब इस पर ब्लॉग लिख कर बिना वजह इस मानसिकता को हवा दें।
ओसामा की कहानी अभी बाक़ी है. इसमें कुछ न कुछ ऐसा है जो अमरीका छिपा रहा है. लेकिन एक बात तय है कि या तो ओसामा पहले ही मारा जा चुका है या फिर अमरीका के क़ब्ज़े में है और अगर इसमें से कोई भी बात सच है तो इसका फ़ायदा आने वाले चुनाव में ओबामा को होगा.
जुबैर सहाब सही बात तो यह भी है कि अमरीका के सर्वौच्च पद पर चाहे कोई भी क्यों न बैठा हो उसे अमरीका की सभी नीतियों के अनुसार ही चलना पड़ता है.यह भी सही है कि बुश इसलिए दोबारा चुने गए क्योंकि केरी ने भी यही कहा था कि बुश जिस नीति पर चल रहे है मैं भी चुनाव जीतने के बाद उसी नीति के तहत काम करूंगा.इस बात से अमरीका की जनता डर गई थी क्योंकि बुश के समय में इराक़ पर हमला किया गया था.केरी को ये कहना चाहिए था कि मैं सभी देशों को अपने साथ लेकर आगे की कार्रवाई करूंगा तो शायद वह जीत जाते.जब बुश दोबारा चुने गए तो अपने दूसरे कार्यकाल में भी उन्होंने लोगों को निराश ही किया.वह बदलाव चाहती थी और इसलिए जनता ने ओबामा को चुना.ओबामा ने अमरीका के हित में बहुत से कदम उठाए.उन्होंने ओबामा को ख़त्म करवाया और अमरीका में ख़ौफ़ का साया भी समाप्त हो गया.
अगर ओसामा से ओबामा को फ़ायदा मिल रहा है तो क्या तक़लीफ़ है.ओबामा को इसका श्रेय तो मिलना चाहिए.आख़िर ये एक सफल ऑपरेशन था.अगर ताकत है तो उसका इस्तेमाल करना चाहिए.
अगर वह दोबारा राष्ट्रपति चुनें जाते है तो यह राजनीतिक मामला बनाने की बात नही है. राष्ट्रपति ओबामा जैसा होना चाहिए अगर वो फिर से चुनें जाते है तो ये बहुत ही गर्व की बात है क्योंकि उन्हें आतंक को नियंत्रित करना बखुबी आता है.ऐसा नेता किसी भी देश में नहीं है जिसने अपनी जनता को चैन सुकून दिया हो.आदर्श व्यक्ति ही अच्छा शासक हो सकता है.जिसमें विकासशील प्रतिभा हो.जो उनमें है ,अगर वो फिर से नेता बनते है तो जनता निश्चित सुरक्षित और आतंकवाद नियंत्रण में रहेगा. ओबामा महान नेता है.
घटनाक्रम का अवलोकन करोगे, तो ज्ञांत होगा...
1. पाकिस्तान अपना एक मूर्खानंद भाई और विक्षिप्त पड़ोसी है. इस बात का अनुमान साफ साफ लगाया जा सकता है कि वो कितनी हद तक क्षति कर सकता है. अपना मुह तो वो लहूलुहान कर चुका है.
2. किंतु अमरीका कितना खतरनाक है, या मूर्खता की किस हद तक जा सकता है, शायद बडे बड़े विद्वान भी इस बात का अनुमान कर ही नहीं सकते.
3. सारांश ये कि अमरीका, भारत और पाकिस्तान को लड़ाने के अपने मकसद में कामयाब होता दिख रहा है. धीरे धीरे कैल्कुलेट कर के अपना एक एक कदम रख रहा है.
4. इस प्रकार उसकी हथियारों की दुकान की अच्छी बिक्री होने की उम्मीद है.
5. अमरीका की गतिविधियों को देख कर लगता है तीसरे विश्व युद्ध का अभ्यास किया जा रहा है.
वो इस बात से डरता है, कि झूठ बोलता है.
वो कन्फ़्यूज्ड है कि हथियार से शांति हो जाएगी.
वो धोखा देने के लिए खुद को गांधी के अनुयायी कहता है.
ये लोग तो खुद ही आत्मघाती बनने को तत्पर हैं फिर इन्हें मरने का मलाल इन्हें कैसे हो सकता है? बात इसके उलट भी हो सकती है कि आतंकवाद इतने नये और घातक रूपों में भी प्र्रगट हो कि अनुमान लगाना भी कठिन हो। जब तक हम उनकी मनोदशा को समझने की कोशिश नहीं करेंगें तब तक कभी हम जश्न मनाऐगें कभी वे, यह दौर इसी तरह चलता ही रहेगा,इससे हासिल कुछ भी नहीं होगा।
यह हमारे लिए शर्म की बात है कि किसी के मरने पर हम खुश हो सकते हैं। बात आतंकवाद की है यह समाप्त होना चाहिए लेकिन हम लादेन की हत्या पर खुश होते हैं, बहुत से लोग चटखारे लेकर इस चर्चा में लगे हैं कि उसे कैसे मारा गया, इनके लिए आतंकवाद कोई मुद्दा नहीं है इन्हें किसी की हत्या में रस मिलता है और ऐसी हत्या जिसे समाज का समर्थन हो तो अपने को अभिव्यक्त करने की जैसे छूट मिल जाती है। हत्या अपने-आप में घृणित कर्म है यदि मजबूरी में यह करनी भी पडी है तो इसका महिमामंडन नहीं किया जा सकता है,और न खुश हुआ जा सकता है।ऐसा करना केवल विक्षिप्तता है।किसी भी तरह और किसी भी परिस्थिति में हत्या का जश्न उचित नहीं है।यह बात नहीं है कि हमें उचित व्यवहार करना चाहिए बात यह है कि हम अमानवीय तरीके से कैसे सोच भी पाते हैं।हांलाकि यह अमेरिकी लोगों का सोचना है कि ओसामा की हत्या के लिए ओबामा को पुरस्कृत किया जाना चाहिए लेकिन यह बहुत रोचक विषय नहीं है कि इस पर बात की जाए और जुबैर साहब इस पर ब्लॉग लिख कर बिना वजह इस मानसिकता को हवा दें।
तुम भोजन करने से पहले अपने पड़ोसी को भोजन करा लेना, वरना तुम्हारा भोजन खाना बेकार जाएगा-पैग़ंबर.
सीन कुछ यह है कि न तो ईसाई बाइबिल की बात मानता है न ही अपने पुरखों की. प्रभु यीशू के समर्थक कब तक समझाएँगे कि हथियार से न कभी शांति स्थापित हो पाई है, न कभी हो सकती है.
सभी का एक ही सिद्धांत है-चीरो, फाड़ो, खाओ.
लगता है मानव पागल और अंधा दोनों ही हो गया है.
आज हमारे लिए अमेरिकी चुनावी मुद्दे पर आम बहस का कोई खास मतलब नहीं है क्योंकि जब ओसामा की हत्या ही मुद्दा हो जाए तो कुछ भी कहना कठिन है यह सिर्फ भावनात्मक मुद्दा है। कुछ लोगों को लगता है कि ओसामा की हत्या के बाद ओबामा हीरो बन गये हैं । यह हीरोवाद बहुत से लोगों को लुभाता भी है । इसी तरह से ओसामा का भी एक हीरोवाद है जो दूसरे प्रकार के लोगों को आकर्षित करता है। हमें यह देखना है कि कहीं इन दोनों के बीच हम अपना होना तो नहीं खो रहे हैं। हमारी चुनौतियां अलग हैं और आंतकवाद के मुद्दे पर हम न तो ओसामा की तरह सोचते हैं और न ही ओबामा की तरह। इसलिए इन दोनों में से हम किसी के भी साथ नहीं हैं, कि कभी इस ओर से वाह-वाह करें और कभी दूसरी ओर से। हमें इन दोनों से आपत्ति यह है कि अपनी राजनीति के चक्कर में इंसान का मारा जाना इनके लिए उल्लास और हर्ष का विषय बना दिया जाता है।कोई कितना ही निकृष्ठ हो जाए उसको मारे जाने में खुशी मनाने का कोई कारण नहीं हो सकता है।इसका खतरा यह भी है कि हम जल्द ही मुद्दे को भूल जाते हैं और इंसान को मारे जाने की वैधानिकता स्थापित करने लगते है।
ओसामा बिन लोदेन की हत्या के नाम पर ओबामा अपने मतदाताओं से कह सकते हैं कि उन्होनें आतंकवाद को हरा दिया है और अमेरिकी उन्हें अपना हीरो भी मान सकते हैं,यह स्थानीय राजनीति के हथकंडें इससे अधिक कुछ नहीं वास्तव में यह आतंकवाद की पराजय नहीं बल्कि अमेरिकी आंतकवाद की जीत और ओसामा आंतकवाद की पराजय है। अन्यथा ओसामा की खोज के नाम पर जिस तरह दुनियां भर में मासूम लोगों की हत्यायें की गयी लोगों को अपमानित किया गया यह भी भयानक किस्म का आतंक है,यदि हम अभी ओबामा के साथ अपना समर्थन व्यक्त करते हैं तो दुनियां भर में अमेरिकियों ने आंतकवाद के नाम पर जो भी किया है उसकी भी जिम्मेदारी हमारे ही सिर होगी ,हम मीठा-मीठा गप्प ,और कडवा-कडवा थू नहीं कर सकते है।आतंक किसी का भी हो, वह समाप्त होना चाहिए यह जरूरी है। हम इस या उस किस्म के आतंक के समर्भक नहीं हो सकते हैं।ओसामा के तरीके से अधिकतर लोग असहमत हैं।लेकिन इस असहमति का यह आशय नहीं है कि हम अमेरिका के समर्थक हो गये हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने जब कहा था कि जो हमारा समर्थन नहीं करते वे हमारे दुश्मन हैं, और अब ओबामा ने कहा कि ओसामा कहीं भी होता तो हम उसे वहीं मार देते ,यह बातें क्या आतंकी लहजे में नहीं कही गयी हैं? क्या हम इसके भी समर्थक हैं?
निष्कर्ष ये है कि अब तक सबसे ज़्यादा इनसानों की हत्या का रिकॉर्ड भी अमरीका के ही नाम हो गया. यानि हर क्षेत्र में नंबर वन.
अमेरिका अपने लोगों को सुरक्षित रखने के लिए आतंकवादियों को मार रहे है. इससे हम भारतीयों का ही भला होगा , क्योंकि हम सबसे ज्यादा पीड़ित है , पिछले बीस पचीस साल से ये लोग आतंक फयला रहे हैं , लेकिन हमारा भारत सरकार का आजतक पाकिस्तान के अंदर जाके इन लोगों को मारने की हिम्मत नहीं हुई, उस हिसाब से अमेरिका की हिम्मत की दात देनी होगी. हम भारतियों को सीखना चाहिए कैसे अपने लोगों को बचाने के लिए क्या करना चाहिए. भारत का डिफेन्स बजेट पाकिस्तान से ज्यादा है लेकिन फिरभी हम अपने लोगों को बचाने में असमर्थ है. इस तरह अगर चलता रहा तो पाकिस्तान कभी आतंकवादियों को भेजना बंद नहीं करेगा और चीन भी पाकिस्तान की सहायता करता रहेगा . चीन पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखकर गोली चला रहा है . जबतक हम इसका उचित जवाब देना नहीं सीखेंगे तब तक लोगों की जान जाती रहेगी. कोई ऐसा नेता नहीं है जो इन लोगों का मुहतोड़ जवाब दे.