अमरीका होने की इच्छा
हॉलीवुड या बॉलीवुड का हीरो जब किसी गुंडे को पीटता है तो दर्शकों के भीतर एक अजीब सा रोमांच पैदा हो जाता है.
वह ख़ुद भी उत्तेजित हो जाता है. बहुत से लोगों के भीतर एक क्षण के लिए वह हीरो समा भी जाता है और वह कल्पना करने लगता है कि काश वह भी अपने दुश्मनों से इसी तरह निपट ले.
ऐसा ही रोमांच और उत्तेजना इस समय दुनिया के बहुत से हिस्सों में लोग महसूस कर रहे हैं. ख़ासकर भारत में.
पाकिस्तान में घुसकर अमरीकी कमांडो ने ओसामा बिन लादेन को मार दिया है.
बहुत से लोग चाहते हैं कि अब भारत भी अमरीका की तरह हीरो हो जाए और अपने कमांडो पाकिस्तान में भेजकर उन लोगों को मार आए जो कथित तौर पर भारत में चरमपंथी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार हैं.
बिना मुक़दमा चलाए और बिना सफ़ाई का मौक़ा दिए. क़ानून की सारी धाराओं और प्रावधानों को ताक पर धरकर.
ये अमरीकी न्याय का तरीक़ा है जो बहुत से लोगों को आकर्षित करता है. लुभाता है. शायद थोड़ा गुदगुदाता भी है और परपीड़ा का कुत्सित सुख देता है.
लेकिन वे शायद बहुत सी वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं.
लोग भूल जाते हैं कि इराक़ पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि अमरीका और उसके सहयोगी देशों को विश्वास था कि सद्दाम हुसैन महाविनाश के हथियार रखे हुए हैं. लेकिन इराक़ को तहस नहस करने के बाद भी वहाँ से महाविनाश का एक भी हथियार नहीं मिला.
इसके बाद सद्दाम हुसैन पर दुजैल में 148 शियाओं को मारने का मुक़दमा चलाया गया और दोषी ठहराकर फाँसी पर चढ़ा दिया गया. लेकिन वर्ष 2003 में इराक़ पर हुए हमले के बाद से वहाँ एक लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं उसका दोषी कौन है इस पर कभी चर्चा नहीं होती.
इसी तरह 9/11 के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीकी और मित्र देशों ने हमला किया. तालिबान सरकार का पतन हो गया. लेकिन इन हमलों के बाद से अब तक कितने निर्दोषों की जानें गई हैं इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है.
अमरीका पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में ड्रोन हमले करता है और इससे नाराज़ तालिबान लाहौर और कराची और दूसरी जगह विस्फोट करके उन निर्दोष नागरिकों की जान ले लेते हैं, जो अमरीका के साथ नहीं हैं. वे शायद अमरीका की दोस्त बनी पाकिस्तान की सरकार के साथ भी नहीं होंगे.
लेकिन इन सबसे अमरीका की चौधराहट कम नहीं होती.
'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' की तर्ज़ पर अमरीका और उसके साथी देश एक के बाद एक कार्रवाई करते जाते हैं और समर्थ संस्थाएँ इस पर सवाल भी नहीं उठातीं.
पता नहीं कि लोकतंत्र की स्थापना और दुनिया को एक सुरक्षित स्थान बनाने का यह अमरीकी तरीक़ा कब तक चलता रहेगा.
किसी भी क़ीमत पर अल-क़ायदा से लेकर लश्करे तैबा को सही नहीं ठहराया जा सकता. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ओसामा बिन लादेन से लेकर दाउद इब्राहिम तक सभी को सज़ा दी जानी चाहिए.
लेकिन हम एक सभ्य सुसंस्कृत समाज का हिस्सा हैं और हमने समाज को संचालित करने के लिए क़ानून बना रखे हैं. हम सबसे उम्मीद की जाती है कि हम क़ानून का पालन करेंगे.
लोकतंत्र की हिमायत करने वालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र की सभी संस्थाएँ सिर्फ़ अपने हिस्से का काम करें.
सुरक्षाबलों को सज़ा देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता और न सेनाएँ अदालतों का काम कर सकती हैं.
अमरीका चाहे जो कहे लेकिन जो कुछ उसने पिछले कुछ दशकों में किया है उसने दुनिया को सुरक्षित बनाया हो न बनाया हो, अमरीका के भीतर एक डर ज़रुर पैदा कर दिया है.
ये भी कम लोग जानते हैं कि चरमपंथी हमलों का डर जितना अमरीकियों को सताता है उतना शायद इस समय अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों को भी नहीं सताता होगा जहाँ इस समय आए दिन बम फट रहे हैं.
लेकिन फिर भी लोग अमरीका होना चाहते हैं.
भारत जैसे देश में अमरीका होने की ये इच्छा मन में एक डर पैदा करती है.

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बिलकुल ठीक कहा आपने. मैं इन विचारों से सहमत हूँ.
मैं विनोद वर्मा जी के विचारों से सहमत हूँ. अमरीका ख़ुद ही दुनिया भर में चरमपंथी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है. लेकिन दुर्भाग्यवश अमरीकी फौजों द्वारा किए जा रहे संहार को कोई हिसाब किताब नहीं है
आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.भारत या विश्व के अन्य देशों और अमेरिका में बहुत फ़र्क है. दूसरा उसने कई वर्षों तक कूटनीतिक और आर्थिक दबाव भी बनाया है तब जाकर ऐसा हमला पाकिस्तान में हो पाया अन्यथा नहीं हो सकता. इस मामले को लेकर भारत को बेफज़ूली के बयान जारी नहीं करने चाहिए. ये बात पूर्णत: सत्य है कि भारत पाकिस्तान में घुस कर इस तरह का हमला नहीं कर सकता, ये एक बड़े युद्ध में तब्दील हो सकता है . अगर ऐसा था तो कंधार विमान अपहरण में भारत को ये करके दिखाना चाहिए था. या बाद में ऐसा कुछ करना चाहिए था जो इसरायली मोससाद ने म्यूनिख के दोषियों के खिलाफ किया. एक बात जो है वो ये कि अमरीका कट्टरपंथिओं के लिए शक्ति संतुलन का काम तो कर ही रहा है. हालाँकि जो हो रहा है वो भले ही मन को न सुहाता हो, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि एक शांतिपूर्ण समाज की रचना हम लोग कभी नहीं कर पाएंगे.
बहुत ही अच्छा लगा आपके द्वारा लिखा हुआ.
सर आपके विचारों से सहमत हूं साथ ही ये कहना चाहूँगा जो आपने हीरो का उदाहरण दिया है वो वाकई लाजवाब है और लोगों को आसानी से समझ में आ जाएगा.
विनोद जी आपका ब्लॉग अमरीका को शर्मसार करता है, पर ये बेशर्मी अमरीका होने की इच्छा करने वाले भारतीयों में भरपूर है यही कारण है कि इस नई नैतिकता से भरपूर लोग अमरीका का समर्थन करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. पर आप चिंतित मत होइए ये अमरीका बनने वाले पाकिस्तान किसी कमांडो को नहीं भेज रहे हैं, घर में भौंकने की इनकी आदत है वही कर सकते हैं अन्यथा इन्हें तो सब पता है कि भीतर और बाहर का हमलावर कौन है. यहाँ तो सर्वोच्च न्यायलय के कहने पर भी बहुत से क़ानून को अमल में नहीं लाया जा रहा है. अमरीका नैतिकता की नाहक दुहाई देता है गुंडों जैसा आचरण करता है. आपने ठीक लिखा है कि "लेकिन हम एक सभ्य सुसंस्कृत समाज का हिस्सा हैं और हमने समाज को संचालित करने के लिए क़ानून बना रखे हैं. हम सबसे उम्मीद की जाती है कि हम क़ानून का पालन करेंगे. लोकतंत्र की हिमायत करने वालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र की सभी संस्थाएँ सिर्फ़ अपने हिस्से का काम करें."
पाकिस्तान में ओसामा को शहीद बताकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं. एक सभ्य सुसंस्कृत समाज का ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए. आपने कितना उपयुक्त लिखा है "सुरक्षाबलों को सज़ा देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता और न सेनाएँ अदालतों का काम कर सकती हैं." सुन्दर लिखने और विश्लेषण के लिए बधाई.
मुझे तो इस बात में सच्चाई नहीं लगती. ये सच है कि अमरीका ने बहुतों को मारा है पर राष्ट्र हित समाज और व्यक्ति से ऊपर है. अमरीका ने लादेन जैसे व्यक्ति को मारकर एक उदाहरण दिया है जो लोगों में भय पैदा करेगा.
विनोद जी आपके लिखे कई बातों से मैं सहमत नहीं हूँ. इसमें कोई शक नहीं है कि अमरीका दुनिया के आतंकवाद के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार है और आज वो अपने फ़ायदे के लिए जिस मुल्क में जाना चाहे वहाँ जाकर कार्रवाई कर सकता है. लेकिन ये हिम्मत किसी दूसरे मुल्क में नहीं है और आगे होगी. लगता है आपने बेईमान नेताओं की आवाज़ में आवाज़ मिलाना शुरु कर दिया है.
भाई साहब कुछ भी लिख दिया जो मन में आया. शीर्षक लिखा अमरीका होने की इच्छा और शुरु हो गए अमरीका को कोसने और आतंकवादियों को ख़ुश करने में. भारत सभ्य है इसका मतलब ये नहीं कि निर्दोष लोगों का ख़ून बहे और शांति की बात करें. महाभारत की हमारी ही सभ्यता की कहानी है जो बताती है कि दोषी को दंडित करना हमारा कर्तव्य है.
बोरिंग और मूर्खतापूर्ण.
विनोद वर्मा जी का ये कहना बिल्कुल ठीक है कि अमेरिका दुनिया को सुरक्षित और विनाश से बचाने की आड़ में अपने जाती हित साध रहा है. हालांकि यह बात अलग है कि इस क्रम में वह नित नए दुश्मन पैदा कर रहा है. इस आंशका से इनकार नहीं किया जा सकता कि निकट भविष्य में हम ओसामा बिन लादेन जैसी विचारधारा वाले कई और शख्सों से रुबरु हों.
विनोद जी, ओसामा मारा गया. लगातार इसकी समीक्षा हो रही है. कई लेख, टिप्पणी, सुझाव रोज आ रहे हैं. कहीं अमरीका को हीरो, तो कहीं इसे बेलगाम बताया जा रहा है. आप ने भी अपने इस लेख में सभ्य सुसंस्कृत समाज को उल्लेखित किया है तथा अमरीका को लोकतंत्रत के साथ जोड़कर परिभाषित करने के साथ- साथ समर्थ्यवान के लिए सब जायज़ होने कई बात कही है. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि वर्तमान परिवेश में इसके लिए वास्तविक दोषी पाकिस्तान है? पाकिस्तान अपनी आज़ादी के कुछ ही समय के बाद से अमरीका के टुकड़ों पर निर्भर रहा है. बदले में उसके हुक्मरानों ने हमेशा अपने आवाम के स्वाभिमान को गिरवी रखा, भारत जैसे पड़ोसी (भाई) से गद्दारी की. छोटे छोटे मुस्लिम देशों को अपनी ताक़त का धौंस दिखाकर उन्हें गुमराह किया और आतंकवाद का पनाहगार बनकर इस्लाम को धोखा दिया. वह अकेले एशिया महाद्वीप में अमरीका जैसे मतलबी राष्ट्र को अपना पाँव ज़माने में उसके तलवों के नीचे अपने स्वाभिमान की कालीन बिछाता रहा. लेकिन पाकिस्तान शायद यह भूल गया कि दूसरो के टुकड़ों पर पलने वाला सबसे पहले अपना ज़मीर खो देता है फिर ग़ुलाम कि भांति सिर्फ आदेशपालक होता है और उसके पश्चात अपना सर्वस्व लुटा देता है. अगर आपके लेख में अमरीका तमाम कुकृत्यों के लिए दोषी है तो सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान की बदौलत. अमरीका ने पाकिस्तान के कलेजे से ओसामा को तो निकाल लिया लेकिन पाकिस्तान आज भी गीदड़ भभकी हिंदुस्तान को दिखा रहा है. निःसन्देह लोकतंत्र की स्थापना और दुनिया को एक सुरक्षित स्थान बनाने का यह अमरीकी तरीक़ा तब तक चलता रहेगा जब तक पाकिस्तान जैसे स्वार्थी देशों की मानसिक परिवर्तन नही़ होता.
अमरीका दोषियों को दंडित करता है और भारत कसाब और अफ़ज़ल गुरू की खातिरदारी में लगा है. अब आप ही बताइए किसका तरीका सही है?
ये बात से मैं पूर्ण रुप से सहमत हू , विनोद जी ने बहुत सटीक लिखा है !!
दुनिया में दो सिद्धांतों पर काम होता है...एक नैतिक, दूसरा अनैतिक. लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देना वाला खुद अलोकतांत्रिक हो जाए, तो न्याय की क्या उम्मीद की जा सकती है? आतंकवाद के नाम पर बेकसूरों की जान अमरीकियों ने अफ़्ग़ानिस्तान सहित दूसरे देशों में ली है. 'अपनी नीति अपना फ़ायदा' की तर्ज पर अगर ये देश चलते रहे तो तीसरे विश्व युद्ध से इंकार भी नहीं किया जा सकता. पहले हमें ये समझना होगा कि आखिर क्या वजह है कि लोग आतंक का रास्ता चुनते हैं. दुनिया में जब जब असमानता रहेगी और न्याय के नाम पर गोलियां मिलेंगी, तो ओसामा की तरह दूसरे भी पैदा होंगें. भले ही ओसामा का रास्ता ग़लत हो, लेकिन उनकी अमरीकियों सहित मुसलमानों पर ज़ुल्म करने वाले देशों के खिलाफ आवाज़ उठाने को जायज़ ठहरा सकते हैं.
मैं इन विचारों से सहमत नहीं हूं. हर बार अमरीका को ग़लत ठहराना सही नहीं है. अमरीका की आलोचना करना आपको एक आसान विकल्प लगता है, जिससे आपको पाठकों की सहानुभूति मिलती है. मैं इस मसले को दूसरे नज़रिए से देखता हूं. कभी कभी परिणाम पाने के लिए एकतरफ़ा कदम उठाना ज़रूरी हो जाता है.
मैं आपकी बातों से सहमत हूं, क्योंकि इन देशों का मतलब ही यही है कि अलग करो, चीरो और खाओ.
आपको सद्दाम और तालिबान के काले कारनामो पर भी गौर करना चाहिए.कोई तो होना चाहिए या फिर सब खुदा पर छोड़ने से काम चल जाएगा. क़ानून एक सभ्य व्यक्ति और समाज के लिए होता है. तालिबान और ऐसे अनेक लोगों का क़ानून कुछ नही कर सकता, ऐसे लोग समाज के लिए कॅन्सर की तरह है और दुनिया को ऐसी मानसिकता रखने वालो से जितनी जल्दी निदान मिले उतना अच्छा होगा.
निस्संदेह आज अमेरिका के भय से ज्यादा अमेरिकियों में भय है. समर्थ होकर भी निश्चिंत तो वे नहीं हो पाये. अमेरिका होने की इच्छा, साहस नहीं कुंठा है जिसे वे लोग ही बढावा दे रहे हैं जिन्होंने हथियारों और आतंक की दुकानें लगा रखी हैं. आपके विचारों से बहुत कुछ सहमति है.
विनोद जी ने अपने ब्लॉग में अमेरिकी मानसिकता पर चिंतायें व्यक्त की हैं. आपका आभार कि इतने गम्भीर मुद्दे पर बहस की शुरूआत की है. जैसा कि आपने कहा है कि भारत जैसे देशों में अमेरिका होने की इच्छा डर पैदा करती है तो मुझे लगता है कि इस देश में यह बहुत पहले से हो रहा है. दूसरे देश में न सही अपने ही देश में आदिवासियों के घरों में क्या बन्दूकों के जोर पर कब्जा नहीं किया जा रहा है. किसानों की जमीनें बिना उनकी सहमति के औने-पौने दामों में नहीं हडपी जा रही है? हमारे शासकों की हैसियत इतनी नहीं है कि ये अपने देश के बाहर अमेरिका जैसा कुछ कर सकें लेकिन देश के भीतर तो ये अमेरिका से भी गये-गुजरे हैं. डा0 विनायक सेन देश द्रोही हैं या नहीं इसको साबित करने के लिए इन्हें कितनी कीमत चुकानी पडी यह दिल दहला देने वाली बात है. जैसा समर्थन डा0 सेन को राष्ट्रीय और अन्तर्राराष्ट्रीय स्तर पर मिला ऐसा सौभाग्य तो हर किसी का होता नहीं कम से कम समर्थन के संदर्भ में. आज भी मालेगॉव काण्ड के नाम पर परस्पर विरोधि लोगों को जेलों में बन्द किया किया गया है. इनके परिवारों के उपर यह इल्जाम किसी बमबारी से कम नहीं है. अमेरिका ने लादेन को मारा, सद्दाम को तो निर्दोष ही मारा और बहुत बडे क्षेत्र में बेकुसूर आम लोगों की हत्यायें की जा रही है. लेकिन हमारे यहॉ भी लाखों किसानों को आत्म हत्या करनी पड रही है लेकिन कोई जिम्मेदार लेने को तैयार ही नहीं है,जबकि कानून में इस बात का प्रावधान है कि आत्महत्या के लिए जो परिस्थिति बनाता है वह भी हत्यारा ही है. जिन लोगों से उम्मीद थी कि इनके दिशा निर्देशन में लोगों को बीमारियों से मुक्ति मिल जाऐगी इन्होंने ही चिकित्सा को उद्योग बना दिया और बीमार लोगों से मुनाफा कमाने लगे हैं. कहने का आशय यह है कि अमेरिका को एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं माना जाना चाहिए यह एक मानसिकता है, कहीं भी हो सकती है और पूरा अमेरिका नफरत करने लायक भी नहीं है उसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे सराहा जा सकता है. अमेरिका होना या न होना ,यह अमेरिका को खारिज करने या स्वीकार करने की बाध्यता जैसा है जबकि मामला इतना स्पष्ट नहीं है।मामला यह भी हो सकता है कि हम हत्याओं में रस लेने के आदि हों लादेन,सद्दाम या ऐसे ही दूसरे लोगों के लिए अमेरिका ने हमें तर्क दिया उसमें हम इसमें मजा लेने लगे. लेकिन हमारे देश के अन्दर ही जो हत्यायें की जा रहीं है. और जो लूट-खसोट चलाई जा रही है,इससे हम तय कर सकते हैं कि हम अमेरिका हैं या बमबारी झेलते लोग हैं. हमारी इच्छा क्या है शायद इससे आज बहुत फर्क नहीं पडता है हमारी वास्तविकता क्या है,यह निर्णायक बात है. लेकिन जो लोग हमें यह समझा रहें हैं कि हमें भी अमेरिका की तरह होना चाहिए तो यह दिल बहलाने का ख्याल भर है. कभी-कभी ऐसा होता है कि अपनी पीडा भुलाने के लिए हम दूसरी बातों में मजा लेने लेते हैं. यहॉ भी कुछ ऐसा ही लगता है.
अमरीका चाहे जो कर सकता है. उसके पास शक्ति है, लेकिन भारत ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि सत्ता यहां किसी एक के पास नहीं है. हम अपने देश के अपराधियों को तो सज़ा दे नहीं सकते, और चले हैं हीरो बनने. पहले अपना घर संभालें, फिर बाहरी मसला. और रही बात अमरीका की, तो चाहे वो कुछ भी कर ले, वो ही आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है. इराक में जो कुछ किया, वहां क्या कसूर था किसी का? अमरीका की नीति पूरी दुनिया पर राज करने की है. इतिहास अपने आप को दोहरात है. जैसा भारत में अंग्रेजों के साथ हुआ, वैसे ही इनके साथ हो सकता है. हो सकता है कोई और उद्धम सिंह और भगत सिंह पैदा हो...
भय बिन होए ना प्रीति....आज पाकिस्तान भारत को एक कमजोर राष्ट्र समझता है, तभी तो चरमपंथियों को खुला समर्थन , और उनको फलने-फूलने का भरपूर अवसर दिया जा रहा है .
और हम क्योंकि एक सभ्य सुसंस्कृत समाज का हिस्सा हैं इसलिए तो क्या हम पाकिस्तान को वो सब करने देंगे जिससे हमारे निर्दोष और बेबस जनता की हत्याएं होती रहें. विनोद जी यहाँ बात अमेरिका बनने की नहीं बल्कि उस चुनौती से लड़ने की हो रही है जो पाकिस्तान ने अप्रत्यक्ष रूप से हमें दी है, ये देश जहाँ गांधीवाद का आदर करता है वहां सुभाष जैसे लोगो के आगे भी नित्य शीश झुकाया जाता है.
विनोद जी, आपने अपने लेख से दिल जीत लिया है. हमें आप पर नाज़ है.
अगर कोई अदृश्य चीज़ मेरे ऊपर हमला करे, तो मुझे A पर ही शक होगा. अगर मैं A को मार दूं, तो मुझे पुलिस सलाखों के पीछे भेज देगी. असल में मुझसे ये ही उम्मीद की जाएगी कि मैं पुलिस स्टेशन जा कर शिकायत दर्ज करूं और अदालत का दरवाज़ा खटखटाऊं. लेकिन अगर मैं अपनी मर्ज़ी के मुताबिक इंसाफ़ करने की कोशिश करूं, तो मेरे ऊपर जुर्म का आरोप लगेगा. इसी तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के लिए भी एक अदालत है.
अमरीका जो करे, वो अदा होती है. हम जो करें वो खता होती है.
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कतल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती.
अल-क़ायदा और ओसामा की लड़ाई अमरीकियों से चल रही है. अल-क़ायदा के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत नहीं है कि वह भारत का दुश्मन है. अल-क़ायदा या ओसामा के वीडियो में भी कभी भारत को धमकी नहीं दी गई है. वो सिर्फ़ अमरीका का दुश्मन है. अमरीका की गलत नीतियों की वजह से आज अल-क़ायदा उनका दुश्मन है. अमरीका ने अपने पाले हुए दुश्मन को मारा है. उसने दुनिया का कोई भला नहीं किया है. भारत को ख़ुश तब होना चाहिए जब अमरीका लश्करे तैबा जैसे आतंकियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे. अमरीका सिर्फ़ अपने हित देखता है. अगर मान लिया जाए कि भारत पाकिस्तान की सरज़मीं पर अपने दुश्मनों को मारने के लिए अमरीका जैसा ऑपरेशन करे तो पाकिस्तान से ज़्यादा अमरीका भारत के विरोध में खडा हो जाएगा. दुनिया में जो आतंकवाद बढ़ रहा है, वो अमरीका की गलत नीतियों के बिनाह पर बढ़ रहा है. अमरीका ने इराक़, अफ़गानिस्तान और कई देशों को बर्बाद कर सैकड़ों लोगों की जान ली है. क्या उसकी अमरीका को सभी सज़ा मिलेगी?
वर्मा जी, मैं आपसे से शत प्रतिशत सहमत हूं. लेकिन जल्द ही आपको लिखते वक़्त सावधान रहना पड़ेगा क्योंकि वो दिन दूर नहीं जब आपको लिखने के लिए अमरीका की अनुमति लेनी पड़ेगी, नहीं तो अमरीका आपको 'आतंकवादी' घोषित कर देगा.
वर्मा जी, मैं आपसे शत प्रतिशत सहमत हूँ लेकिन आपको इस बात को डर-डर कर कहना चाहिए. वह दिन दूर नहीं है जब आपको कुछ भी अमरीका से अनुमति लेने के बाद लिखना होगा वरना आप पर आतंकवादी होने का ठप्पा लग जाएगा.
वाह विनोद जी बहुत शानदार लेख है. इससे अमेरिका की असलियत ज़ाहिर होती है और भारत को सबक मिलता है कि हीरो न बने. आख़िर अमरीका की तरह सडक बिजली पानी अस्पताल स्कूल आदि की सुविधा भारत में क्यों नहीं दी जाती.
बहुत अच्छा लिखा है. आपने अपना काम तो कर ही दिया अब अमरीका की चौधराहट कम हो या न हो. क्या फ़र्क़ पड़ता है. भारत में रह कर इतना साहस जुटाना भी जीवट की बात है. कोई मुसलमान यही बात लिखे तो शायद उसे चरमपंथी कहा जाएगा या देश द्रोह का मुक़दमा चल जाएगा. धन्यवाद.
विनोद जी, बुरा मत ना मानें, ये एक बेहुदा तर्क है. मैं आपके पहले के ब्लॉगों का सम्मान करता हूं लेकिन इसबार आपसे सहमत नहीं हूं.
लादेन की हत्या के बाद जितने भी विश्लेषण किये जा रहे हैं, उनमें या तो अमेरिका की भाषा है या फिर उसका विरोध है. कोई पाकिस्तान को कटघरे में खडा कर रहा है तो इस घटना को उसकी नियति बता रहा है. ये सारी बातें रेडिमेड फास्ट फूड जैसी हैं. दरअसल सबके अपने-अपने सत्य हैं और विश्लेषक इनमें से कुछ उठाकर या इनकी खिचडी बनाकर हमारे सामने पेश कर रहे हैं. यह सिर्फ उबाउ प्रलाप जैसा है. सत्य किसी का नहीं होता है उसे समझने के लिए हमें सत्य के पास आना होगा. अमेरिका ,पाकिस्तान या अलकायदा को उनका सत्य मुबारक. हमें यह समझना है कि रहस्य,रोमांच, एक्शन ड्रामा से भरपूर इस नाटक में हमारे लिए कुछ भी नहीं है. वास्तव में अलकायदा और पाकिस्तान का आतंकवाद प्राईवेट लिमिटेड कम्पनी जैसा है और अमेरिका का आतंकवाद बहुराष्ट्रीय अनलिमिटेड कम्पनी जैसा. हमारे पास अपनी बहुत सी गम्भीर समस्याएं हैं जिसमें आतंकवाद भी है. हमें आतंकवाद को उसके मूल में समझना होगा न कि स्वरूप में. विनोद जी ने ब्लॉग में लिखा है कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं. यह आपने जिस मंशा से कहा वह ठीक हो सकती है लेकिन कहावत गलत है क्योंकि गुसाईं का दोष तो होता था लेकिन कोई उसे कहने की हिम्मत नहीं करता था. अब ऐसा नहीं है पूरे मध्यपूर्व में जो कुछ हो रहा है वो न सिर्फ गुसाईं के दोष बता रहे हैं बल्कि उन्हें गद्दी से उतार कर देश निकाला भी दे रहे हैं. मुहावरे और कहावतें भी समय के हिसाब से नये अर्थ ग्रहण करती रहती हैं.
मैं प्रण करता हूं कि आगे से बीबीसी हिन्दी के किसी भी ब्लॉग लिंक पर नहीं जाउंगा. अपने बुकमार्क से भी इस वेबसाईट को हटा रहा हूं. मैं देख रहा हूं कि ब्लॉग का इस्तेमाल इश्तेहार के लिए किया जा रहा है.
माफ़ कीजियेगा विनोद जी मैं आपके विचार से सहमत नहीं हूँ. आज अमरीका द्वारा पाकिस्तान में घुस कर किए गए हमलों का ही नतीजा है की पाकिस्तानी सेना में एक डर बना है
जोकि बहुत जरूरी था. जब तक पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार सेना पर हावी नहीं हो जाती है तब तक पाकिस्तान का विकास संभव नहीं है .पाकिस्तानी सेना का मनोबल तोड़ने के लिए
ऐसे हमले जरूरी हैं.
हाय रे इंसाफ़ !!! अगर अलक़ायदा और तालिबान अमरीका के हज़ारों निर्दोषों को मारे (जिसके बारे में सही पता भी नहीं कि सच है या झूठ) तो वे आतंकवादी, और अगर अमरीका इराक़ और अफगानिस्तान के लाखों निर्दोषों को मारे (जो कि बिलकुल सच है) तो शांतिवाद !!
विनोद साहब, आपने वह सब लिखा है जो अमरीका दिखाना चाहता है. पर सही नहीं है. कौन नहीं जानता कि इराक़ पर हमला हथियारों के लिए नहीं तेल के लिए किया गया था. इसी तरह अफ़ग़ानिस्तान से उनको अफ़ीम मिल रही है, अन्य फ़ायदे हो रहे हैं. पर आपने वही पहलू लिखा है जो झूठा चेहरा है अमरीका का. कुछ अपनी प्रतिक्रिया दें और ब्लॉग लिखने की जगह वह लिखें जो हक़ीक़त है ना कि वह जो दिखाया जा रहा है, पूरी सच्चाई और ईमानदारी से. शुक्रिया.
अगर लिखना नही आता तो क्यों लिखते हो. इस तरह के लेख केवल डर पैदा करते हैं और कुछ नहीं.
यह लेख अच्छा है पर लोगों को संतुष्ट करने वाला नही हैं, भारत मे बहुत बड़ी संख्या मे एसे लोग हैं जो वास्तविकता से बिल्कुल परिचित नही हैं. और वही लोग भारत को अमेरिका 'नहीं' बनने के लिए भारत सरकार को कोसते रहते हैं. इस लेख मे यह अवश्य स्पष्ट करना चाहिए था कि अमेरिका अमेरिका क्यों है तथा भारत अमेरिका क्यों नही बन सकता? अमेरिका की विशाल सैन्य शक्ति, उसका धनबल और अर्थव्यवस्था, उसकी तकनीकी दक्षता तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका कूटनीतिक तथा राजनैतिक वर्चस्व; इनमे एक भी दक्षता भारत के पास नही है, और पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति (जो भारत को बहुत भीषण हानि पहुचाने मे सक्षम है) तथा अपने आणविक हथियारों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कूटनीति की बराबरी करने की स्थिति मे है.
आप किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं? उस लोकतंत्र की जो संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु को अब तक फांसी नहीं दे पाया या उस लोकतंत्र को जो अब तक कसाब जैसे आतंकवादी की सुरक्षा पर सौ करोड़ से ज़्यादा खर्च कर चुका है. भारत जैसे देश में जहाँ के नेता आतंकवादियों की मौत पर उसे 'जी' लगाकर संबोधित करते हैं और उनकी अंतिम संस्कार के लिए मानवता की बात करते हैं. ऐेसे देश, ऐसी सरकार और ऐसे नेताओं से हम कोई उम्मीद नहीं रख सकते. पाकिस्तान में जाकर एक्शन लेना तो दूर की बात पहले नक्सल और कश्मीर के अलगाववादियों से निपटने की ताक़त तो बनाओ. जो सरकार 126 विमान ख़रीदने में दस साल का समय लगाती है, तोपख़ाने के लिए तोप ख़रीदने में 30 साल तक सोचती रहती है, ऐसी सरकार के लोकतंत्र में हम कभी सुरक्षित नहीं रह सकते.
इस्लाम धर्म ही इस समस्या का मूल कारण है. आज नहीं तो कल हमें इसे मानना पड़ेगा. ग़ैर इस्लमामिक देशों में इस्लामिक धर्मावलंबियों को जो धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है वही स्वतंत्रता ग़ैर मुसलमानों को (यदि को धर्मांतरण से बच गया हो) इस्लामिक देशों में क्य़ों प्राप्त नहीं है?
बिलकुल सही. और ओसामा के मामले में वो शायद पहले ही मर चुका होगा या पाकिस्तान ने अपने आका से पूछा होगा कि क्या करें इसका. अगर ये हमारे यहाँ से निकला या इसका ज़नाज़ा हमारे पाकिस्तान से निकला तो हंगामा हो जाएगा. कई मज़ारें बन जाएंगीं इसलिए तुरंत दो हेलीकॉप्टर भेज कर मुर्दा ओसामा का काम तमाम किया गया. लेकिन अगर हम ऐसी कार्रवाई करने जाएंगे तो उन्होंने हाथ मे चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं. तुरंत जवाबी कार्रवाई होगी. पहले भी हम बांग्लादेश बनवा कर भुगत चुके हैं. हमारे हाथ कुछ नहीं आया. आज बांग्लादेश हमारे विरुद्ध ही है. उस एक कार्रवाई का जवाब हम पंजाब से लेकर कश्मीर तक भुगत ही रहे हैं.
विनोद जी, आपने सही कहा कि विश्व में अमरीका की ओर से क़ायम किया गया जंगल राज़ यही दर्शाता है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस. अमरीका का गुंडा राज़ कहाँ जाकर ठहरेगा कोई नहीं जानता. अब तक जो उसके शिकार नहीं हुए हैं वो देश सोचते हैं कि हमें क्या मतलब? जबकि अमरीका और उसके सहयोगी देशों की आंतरिक अर्थव्यवस्था आसियान देशों के बाज़ार पर ही पूरी तरह से आश्रित है. तब ये हाल है. विसंगति है कि आसियान देश छोटी-छोटी बातें पर एक दूसरे से उलझ रहे हैं.
विनोद जी परेशान न हों अभी भगवान हैं. बाइबिल में कहा गया है कि जो लोग तलवार उठाएंगे वो तलवार से ही मारे जाएँगे. बुद्ध ने कहा है कि अगर आँख के बदले आँख लेना ही क़ानून है तो सारा विश्व एक दिन अंधा हो जाएगा. तो हज़रत पैंगबर ने कहा है कि तुम भोजन करने से पहले पड़ोसी को भोजन कर देना नहीं तो तुम्हारा भोजन बेकार जाएगा.
लेकिन दृश्य देखने से लगता है कि न तो ईसाई बाइबिल की फ़िक्र करते हैं और न ही अपने दादा परदादा और पुरखों की बातों का ध्यान रखते हैं. बाइबिल में कहा गया है कि जो अपने को बड़ा बनाने की कोशिश करेगा उसे छोटा बनाया जाएगा और जो अपने आपको छोटा बनाएगा उसे बड़ा समझा जाएगा. लेकिन दोनों ही मदांध हो चुके हैं. इन लोगों को कौन समझाएगा कि हथियार के प्रयोग से न अब तक शांति हो पाई है और न आगे हो पाएगी. हथियार के दुकानदार अपनी दुकान का नाम रक्तपात दुकान लिख चुके हैं. तुम ये ना कहो कि दाल में काला है अपितु सारी दाल ही काली है. लगता है कि मानव पागल और अंधा दोनों हो गया है. हे राम!
एक मेरा दोस्त है (दोस्त है नहीं, बताता है कि दोस्त है). कुछ सफ़ेद, भूरा, क़रीब 71 साल से हथियारों के बल पर शांति लाना चाहता है, पर अब तक शांति स्थापित नही हो पाई है और न ही कभी हथियार शांति दे सकते हैं. आज उसका हरेक नागरिक चोर की तरह डरता रहता है. शांति स्थापित करने के लिए तो गांधी जी का फ़ॉर्मूला ही अपनाना एकमात्र विकल्प है. वह दोस्त झूठ कहता है कि वह गांधी जी से प्रेरणा लेता है.
विनोद जी, मैं आपसे 100 प्रतिशत सहमत हूँ.
अमरीका कुछ भी कर सकता है. जिसकी लाठी उसकी भैंस.
आप किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं. जिस देश की सरकार क़साब और अफ़ज़ल की दामादा की तरह सेवा कर रही है उसकी...या उन बेईमान नेताओं की जो वोट के लिए एक आतंकवादी को जी लगा कर बुलाते हैं.
विनोद जी पहले अच्छे लेख लिखते थे लेकिन इस बार उनको पता नहीं क्या हुआ कि वह अमरीका को इतने नकारत्मक नज़रिए से देख रहे हैं. क्या विनोद जी यह बता सकते हैं कि यदि अमरीका आतंवाद फैला रहा है तो कौन सा देश उस पर नियंत्रण पाने का काम कर रहा है. मैं इराक़ में मौतों की संख्या से सहमत हूँ लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर कोई इन बढ़ते हुए आतंकवादी ठिकानों को रोकने का काम नहीं करता तो कितनी लाख जानें और जातीं. मैं तो यह कहूँगा कि अमरीका ने जो काम शुरू किया है उसमें अन्य देशों को भी हाथ बंटाना चाहिए और दुनिया को एक बेहतर और सुरक्षित जगह बनाना चाहिए.
बेकार और उबाऊ