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तेरे बिन लादेन....

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 02 मई 2011, 21:44 IST

ओसामा तुम नहीं रहे. जाने के बाद कितने याद आओगे ये नहीं पता लेकिन जाते जाते कई लोगों को बेरोज़गार और दुःखी ज़रुर कर गए हो.

अमरीका से लेकर अफ़गानिस्तान तक और ऑस्ट्रेलिया से लेकर पाकिस्तान तक. यहां तक कि भारत में भी सारे पत्रकार दुःखी हैं. कई सारे देश और नेता भी दुःखी हैं.

पत्रकार दुःखी हैं कि अब कौन टेप भेजेगा जिसे छाप छाप कर नौकरी बचाई जाएगी.कहां जाएंगे वो बेसिर पैर विश्लेषण के दिन और आतंकवाद विशेषज्ञ की उपाधियां. कहां जाएंगे वो दिन जब कुछ नहीं होने पर लादेन के नाम का वीडियो लेकर आधे आधे घंटे का कार्यक्रम बना लिया करते थे.

हम आज भले ही खुश हैं कि बहुत काम है लेकिन हमें पता है आने वाले दिन बड़े ख़राब होने वाले हैं. हमें भी अब दौड़ना पड़ेगा ख़बरों के लिए. तुम थे तो स्टूडियो में बैठ कर लाइव कर दिया करते थे. कि तुमने फलां फलां कहा और फलां फलां चीज़ चाहते थे.

तुम महान थे लादेन तुमने कभी पत्रकारों की बात नहीं काटी.

अभी तुम्हारी मौत को 12 घंटे भी नहीं हुए और क्या नौबत आ गई. एक चैनल को एक फ़िल्म (तेरे बिन लादेन) के हीरो से प्रतिक्रिया लेनी पड़ी कि तुम्हारी मौत पर उसको कैसा लग रहा है.

दुःखी पाकिस्तान भी हैं. कहते तो सब थे लेकिन अब पक्की बात हो गई कि देश में क्या हो रहा है इसका पता ज़रदारी से पहले ओबामा को होता है. पहले सिर्फ़ रेमंड डेविस घूम घूम कर गोलियां मार रहा था अब तालेबान भी घूम घूमकर पूरे पाकिस्तान में गोलियां चलाएंगे.

सुना है तालिबान वाले कह रहे हैं अब हमारा दुश्मन नंबर एक अमरीका नहीं बल्कि पाकिस्तान है. लीजिए ज़रदारी साहब और कियानी साहब आपके लिए और काम, जिसके पैसे अमरीका भी नहीं देगा.

टीवी पर बराक ओबामा घोषणा करते खुश दिखे होंगे लेकिन उनको भी पता है लादेन को मारने के बाद मुश्किल बढ़ गई है. अब उनको भी विकास के काम करने होंगे. मंदी से डराने के लिए लादेन का भूत नहीं मिलेगा. अगले चुनावों में अमरीका की जनता अफ़गानिस्तान से सेना वापस बुलाने की मांग करेगी.

वैसे ओबामा साहब तो वादा कर के मुकर जाते हैं. ग्वांतानामो बे बंद करने का वादा था. देखें लादेन के मरने के बाद जनता को क्या जवाब देंगे.

इसी बात से हामिद करज़ई भी दुःखी हैं. अमरीकी और नैटो सेना चली गई तो उनके प्रशासन का क्या होगा. शांति की बात कर रहे हैं लेकिन उनको पता है शांति तो सेना के साथ रहती है. उनकी बात ही नहीं मानती. उनकी शांति तो भारत की कामवाली बाई जैसी है जब मन छुट्टी ले लेती है.

तो इंतज़ार कीजिए एक और हौव्वे का ताकि सबकी रोज़ी चल सके. काम नहीं करने वालों को कुछ तो करना पड़े.


टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 22:14 IST, 02 मई 2011 माधव श्रीमोहन:

    खबर खत्म..अब बकवास का दौर शुरु होगा......
    :P

  • 2. 22:17 IST, 02 मई 2011 sumit:

    वाह सुशील जी, दिल खुश कर दिया आपने. वैसे आज हम सभी बैठक यही बातें कर रहे थे कि अब पाकिस्तान का क्या होगा. अब बाहर वाले कहेंगे कि तुम आतंकियों को छुपाते हो और हाथ खींचेंगे. भीतरे वाले ये कहेंगे कि हमारे अपनों को सुरक्षा नहीं देते हो. और उससे भी बड़ी बात. अमरीका से आने वाले अरबों डॉलर का क्या हगा.

  • 3. 22:47 IST, 02 मई 2011 amol agavekar:

    सुशील जी आपकी व्यंग्य कला मन को भा गई. वाकई में आपकी लेखन शैली मजेदार एवं आनंददायी है.

  • 4. 23:01 IST, 02 मई 2011 Vivek P Choraria:

    ऊफ्फ...तुम क्यूँ गए लादेन?
    बहुत खूब लिखा है, सुशील जी ...साधुवाद!!!

  • 5. 00:30 IST, 03 मई 2011 अनुराधा पौडेल :

    सुशील जी नमस्कार मै तो नेपाली लड़की हूं. पेरिस में रहती हूं.मेरी हिन्दी बहुत खराब है. मै आपके ब्लॉग की फैन हूं. ओसामा के बारे में आपने जो लिखा बहुत सच लिखा. मै जनर्लिस्टों को जानती हूं. आपके इन विचारों से मै बहुत प्रभावित हूं. बहुत बहुत शुक्रिया.

  • 6. 05:38 IST, 03 मई 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    सुशील जी को उनके सबसे अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद्.आपने ओसामा की मौत से पूरी दुनिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा का अच्छा व्यंग्यात्मक विश्लेषण किया है.मेरी समझ से इस परिघटना का सिर्फ सांकेतिक महत्त्व है.आतंकवाद के खिलाफ चलनेवाली लडाई अभी लम्बी चलने वाली है.आतंकियों ने भस्मासुर का रूप धारण कर लिया है और अब शायद सबसे ज्यादा मुश्किल उसे अमरता का वरदान देनेवाले पाकिस्तान को होनेवाली है.

  • 7. 08:06 IST, 03 मई 2011 dkmahto:

    जिस तरह से आनन फानन में ओसामा को समुद्र में डूबोने की ख़बर आई है उससे तो मेरी खोपड़ी में कुछ और ही समझ में आता है जैसे कहीं ओसामा ज़िंदा ही तो अमरीकियों के हाथ नहीं लग गया था और उसे गुप्त स्थान पर तो नहीं ले जाया गया है. ताकि बाद में वीडियो के ज़रिए उसकी गतिविधियों को दिखाने का प्रयास हो.

  • 8. 12:41 IST, 03 मई 2011 ms khan:

    वाह साहब आपने तो आईना दिखा दिया है. मैं सहमत हूं आपसे

  • 9. 13:31 IST, 03 मई 2011 manoj kumar:

    सुशील जी, हर बात के दो पहलू होते हैं. आपके ब्लॉग से इस ख़बर के दूसरे पक्ष का पता चला. बहुत अच्छा लगा...

  • 10. 13:40 IST, 03 मई 2011 ZIA JAFRI:

    सुशील जी आपने एक ख़ूबसूरत व्यंग्यात्मक श्रद्धांजलि दे दी है लेकिन आप मीडिया वाले और दूसरे परेशान न हों . पाकिस्तान में हर शाख पर लादेन बैठा है. एक के जाने से क्या होगा.

  • 11. 14:15 IST, 03 मई 2011 Vimmy Bhasin:

    सुशीलजी , इस तरह का पांच मिनटों वाला व्यंग्य लिखकर बीबीसी का मजाक न बनाईये. इस प्रकार का 'व्यंग्य' तकरीबन हर इस तरह की खबर के साथ मिल जाता है. फिर भी बात तो आपकी सच है. पत्रकार का पढ़ा-लिखा तथा अनुसंधानकर्ता न होना आज की पत्रकारिता का अभिशाप है!

  • 12. 14:21 IST, 03 मई 2011 Ashok Pandey:

    दुनिया बड़ी जालिम है ..पत्रकार की पीड़ा में भी रस लेती है ...

  • 13. 14:48 IST, 03 मई 2011 balbir:

    आप भी वही कर रहे हैं.....जो आपने अपने ब्लॉग में लिखा है.

  • 14. 14:52 IST, 03 मई 2011 TAHIR KHAN,PUTTHA(MEERUT).:

    सुशील जी आपका ब्लॉग अच्छा लगा. आखिरकार दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी का ख़ात्मा अमरीकी कमांडो ने कर दिया. लेकिन क्या अब आतंकवाद से दुनिया को निजात मिल जाएगी. ये परेशानी सबके दिमाग में चल रही होगी.आतंकवादियों को इस तरह से सज़ा मिलनी चाहिए ताकि आतंकवाद न फैले.

  • 15. 15:33 IST, 03 मई 2011 satyendra mishra:

    ओसामा तो सिर्फ़ एक संदिग्ध था लेकिन कसाब को तो रंगे हाथों पकड़ा गया था. क्या इस पर बहस तो नहीं हो सकती कि भारत में चरमपंथियों से मेहमानों जैसा सलूक क्यों किया जाता है. जबकि अमरीका अपना बदला ले रहा है.

  • 16. 15:56 IST, 03 मई 2011 jai singh jhala :

    बहुत अच्छे.. ये सही में न्यूज़ मेकर यानी पत्रकारों के लिए बुरी ख़बर है

  • 17. 16:04 IST, 03 मई 2011 raju:

    आपने तो ओसामा बिन लादेन की रोमांटिक कहानी लिख दी है. अच्छा है.

  • 18. 16:29 IST, 03 मई 2011 wantlionking:

    बहुत खूब लिखा आपने. वैसे ओसामा और ओबामा के न तो नाम में हेरफेर है और न ही काम में अधिक हेर फेर.

  • 19. 18:42 IST, 03 मई 2011 BHEEMAL dildar nagar/ mumbai:

    प्रिय श्री झा जी, लेख पढ़ कर पुष्टि हो गई कि आपकी सोच काफ़ी हद तक नकारात्मक हो गई है. और भी बहुत से गम हैं ज़माने मे कसाब-लादेन-अफज़ल गुरु के सिवा, कितना घात लगाकर कोबरा एशिया में शिकार कररहा है और हम लोग मूर्खता पूर्वक कोबरा को अपना दोस्त माने बैठे हैं. लोगों की सोच को सही दिशा देने का काम है आपके ऊपर. मेरी बात पर ध्यान दीजिएगा.

  • 20. 19:56 IST, 03 मई 2011 Navneet:

    बहुत सही. मुझे भी शक है कि अमरीकी सरकार ने ओसामा को मारा होगा. क्योकि उन्होंने न तो तस्वीरें दी हैं. सिर्फ कमरा देख रहे हैं जहां खून है. बिस्तर है. इन सबूतों को देखकर यह मानना बेवकूफी होगी कि ओसामा को मार दिया गया है. अगर ऐसा है तो तस्वीर क्यों नहीं जारी करते जैसा कि सद्दाम हुसैन के समय किया गया था.

  • 21. 23:02 IST, 03 मई 2011 Ram Bali Yadav :

    ओम पत्रकारिताय नम:

  • 22. 23:02 IST, 03 मई 2011 GM Khan:

    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने. पर अभी संदेह बाकी है. अमरीका ने अब तक कोई तस्वीर या वीडियो जारी नहीं किया है. इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि सचमुच लादेन मारे गए हैं. हां अमरीका को पब्लिसिटी तो मिल ही गई. अब देखना है कि इस बारे में कितने दिनों बाद लादने का वीडियो टेप आदि जारी होता है क्योंकि वो पहले भी चार पांच बार मारे जा चुके हैं. असली मुद्दे पर आपने बिल्कुल सही बात लिखी है. इसके लिए साधुवाद.

  • 23. 01:46 IST, 04 मई 2011 UMESH YADAVA:

    क्या सुशील जी !! आप तो बस मौका मिला की नहीं एक मौसमी ब्लॉग लिखने से नहीं चूके. अरे भाई इस पर तो करोड़ो ब्लोग्स, न्यूज़ और सामग्री मौजूद है फिर यह आप का ब्लॉग ? बिलकुल समय की बर्बादी है.

  • 24. 06:31 IST, 04 मई 2011 devendra singh:

    आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. मीडिया इस ख़बर को कम से कम एक महीने तक उछालेगी और तब तक कोई न कोई नया ओसामा मिल ही जाएगा.

  • 25. 10:22 IST, 04 मई 2011 upkar srivastav:

    सुशील जी आपने वाकई दिल को छू जाने वाला ब्लॉग लिखा,यह मेरा पहला कमेंट है,वैसे ओसामा के मरने के बाद अब दाउद का नंबर होना चाहिए.

  • 26. 10:59 IST, 04 मई 2011 KRISHNA:

    सुशील जी आपसे ऐसे ब्लॉग की उम्मीद नहीं थी. बीबीसी के मानदंडों पर खरा उतरने की ज़रुरत है.

  • 27. 12:26 IST, 04 मई 2011 kanupriya Gupta, plot no. 58,59.flat no 201,airoli sector 9b,navi mumbai 400708:

    बहुत अच्छा आर्टिकल सर . ओसामा चला गया वो ओसामा जिसके होने से ना जाने कितने पत्रकारों की रोजी रोटी चल रही थी
    कहा जा रहा है अमेरिकियों को ओसामा के हवेली नुमा मकान से एक हार्डडिस्क मिली है और मुझे शक है की इस हार्डडिस्क का डाटा जब दुनियां के सामने रखा जाएगा तो अमेरिका उसमे अपने फायदे के हिसाब से फेर बदल कर सकता है.शक तो इस बात पर भी है की ओसामा की मौत के पहले पाकिस्तान को कोई खबर नहीं लगी मेरे दिमाग की सुई बार बार इस बात पर अटक रही है की पाकिस्तान को पहले से सब पता था उसने अपने आका अमेरिका की मदद की और अब अलकायदा वालो के कहर से बचने के लिए ये बयां दे रहा है की हमे कुछ पता नहीं था ताकि आतंकवादियों का जो ढेर उसने अपने देश में लगा रखा है वो बारूद बनकर कही पाकिस्तान को राख ना कर दे .

    शक तो और भी है पर बात शक की नहीं बात ये है की सब का ध्यान इस बात पर है की अमेरिका ने ओसामा को मारा पर कोई शायद ये नहीं सोच रहा की अमेरिका इस तरह के कदम उठाकर तानाशाही की और बढ़ रहा है, ये कदम यही रुके तब तक ठीक है पर अगर आगे बढ़ते रहे तो दुनिया के सरे देशो पर असर पड़ेगा.मुझे इन्तेजार है इस सारे घटनाक्रम पर चीन की टिपण्णी का क्योकि वो पहले ही खार खाए बैठा है .

    अगर इसी तरह चलता रहा तो वो समय दूर नहीं जब हम सभी तीसरा विश्वयुद्ध देखेंगे और शायद तब शायद पत्रकारों के पास फिर ब्रेकिंग न्यूज़ हो

  • 28. 13:07 IST, 04 मई 2011 guddu:

    ये संगठन ऐसा संगठन है जो किसी भी देश की शांति को भंग करता है लेकिन उसे भी कुछ सोचना चाहिए कि वो ऐसा क्‍यों कर रहा है. असल बात सामने आऐगी तभी तो इस मसले का हल संभव है. मुझे तो लगता है बेरोज़गारी, जनसंख्‍या इसी से ये उत्‍पन्‍न होता है. सोचने की बात है कि यदि दुनिया के सभी देश इस विषय पर ज़रा हट के सोचें तो इस आतंकवाद का मसला हल हो सकता है. सबसे पहले तो इसकी आर्थीक स्थिति इतनी मज़बूत कैसे है इस संगठन को पैसे कहां से उपलब्‍ध होता है. पहले तो उन लोंगो पर अंकुश लगाया जाए जो इस संगठन को आर्थिक स्थिति में मदद करता हैं. कोई ना कोई तो कहीं पर है जो इस संगठन को चलाने में गुप्‍त रूप में है. हलांकि अब ये संगठन कुछ शांत होगा पर इस पर भरोसा करना ही नहीं चाहिए क्‍योंकि ये किसी का नहीं होता .

  • 29. 14:01 IST, 04 मई 2011 DINESH KUMAR SHARMA:

    अगर हम अपने घर में मौजूद लादेन से सावधान रहेंगे तो हम बाहर मौजूद लादेन का डटकर सामना तक सकते हैं.

  • 30. 18:51 IST, 04 मई 2011 Anand G.Sharma:

    तेरा जाना .. दिल के अरमानों का लुट जाना,
    कोई देखे - बन के तक़दीरों का मिट जाना,
    तेरा जाना ..
    तेरा ग़म - मेरी ख़ुशी - अमेरिकी ग़म - मेरी ख़ुशी,
    अमेरिकी डॉलर बरसाते थे - बेवकूफ खूब बनाते थे,
    करते थे तेरी बंदगी - तुझसे ही थी ज़िन्दगी,
    तेरा जाना ..
    हँस कर हमने था कहा,जीवन भर का साथ है
    ये कल ही की बात है (१ मई २०११ की)
    तेरा जाना ..
    जब-जब अमेरिकी खैरात नहीं आयेगी
    तेरी याद दिलाएगी,सारी रात जगाएगी
    हम रो कर रह जायेंगे,दिल जब ज़िद पर आयेगा
    दिल को कौन मनायेगा
    तेरा जाना

  • 31. 23:55 IST, 04 मई 2011 Satnam Singh:

    मुझे लगता है, ओसामा बिन लादेन के मरने से कोई फर्क नही पड़ेगा जैसा कि भारत में था कि एक भगत सिंह को मारोगे तो लाखों पैदा होंगे,क्योंकि ओसामा को पैदा करने वाला कौन है ? इराक में तबाही के लिए कौन ज़िम्मेंदार है?

  • 32. 14:50 IST, 05 मई 2011 akhlaq ahmed:

    झा साहब अगर आपके ब्लॉग को मज़ाक के तौर पर पढ़ लिया जाए तो थोड़ी गुदगुदी करता है.लेकिन इसे अगर गंभीरता से पढ़ लिया जाए तो कई सवाल खड़े करता है.जैसे अब अमरीका का क्या होगा.अब वो किसे डरा कर दूसरें देशों पर हमला करेगा.

  • 33. 16:03 IST, 05 मई 2011 Amit Thakur:

    दिल ख़ुश कर दिया आपने. मज़ाक़-मज़ाक़ में आपने बहुत बड़ी बात कह दी.

  • 34. 17:09 IST, 05 मई 2011 pawan negi:

    वाह सुशील भाई वाह. शब्द नहीं है धन्यवाद कहने के लिए.

  • 35. 18:00 IST, 05 मई 2011 Arvind kumar:

    भारत में लादेन के मरने का सबसे ज्यादा दुख आधुनिक भारत के जयचंद दिग्विजय सिंह को हुआ होगा.

  • 36. 11:22 IST, 06 मई 2011 ARYAN (India):

    ओबामा पिछले 10-12 सालों में एक व्यक्ति मात्र न कहकर एक सिंद्धांत बन गया है. जिसे मारना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. सच है कि अमरीका अपनी दादागिरी दिखाने में सफ़ल रहा है लेकिन कहानी यहाँ नहीं ख़त्म होती बल्कि एक दूसरी तरफ़ मुड़ जाती है.

  • 37. 12:50 IST, 06 मई 2011 ramesh meghwal:

    ओसामा तुमरे बिन

    ओसामा तुम चले गये सबको अकेला छोड़कर
    वहां जहाँ तुम ही कहते थे कि एक जन्नत है
    कई लड़ाके और दुनिया भर के कई मासूम
    उस जन्नत में तुम्हारे कारण पहुँचे थे
    तुम बताना हमें ये जन्नत कैसी है
    तुम हमेशा बातें बहुत कहते थे
    ऊँगली ऊंची कर कर के
    ऑडियो विडियो में जब बोलते थे
    सुनती, देखती थी थी दुनिया पूरी
    तुम से ज्यादा तुम्हारे टेप चलते थे
    अरबी में तुम्हारी वो आवाज़ कानो को भाती थी
    लगता था क्रांति की भाषा ऐसी ही होती है
    क्रांति आसानी से समझ में नही आती है न
    पर जोर्ज बुश की अंग्रेजी से तो अच्छी थी
    चलो कोई बात नहीं
    जहाँ तुम चले गये देखना वहां चे और सद्दाम भी होंगे
    वो भी ऐसे ही गए तुम्हारी तरह
    दुश्मन तुम सबका एक था पर और रहेगा
    पर लड़ाई चे की, तुम लोगो से अलग थी
    पर अब अल जजी़रा, सीएनएन और बीबीसी वाले क्या करेंगे
    ये बेचारे कई कई दिन तक
    तुम्हारी बातों के मतलब निकालते थे
    तुम्हारे होने ना होने पर बहस करते, लड़ते पूरा जो़र लगाके
    और तुम मजे़ से बैठ के देखते थे न उनको, मुझे पता है
    चलो कोई बात नहीं
    अब उन्हें कोई नया ओसामा बनाना पड़ेगा
    पर वो इतना आसान थोड़े ही है
    तुम्हे तो सब पता है
    कितना पैसा और ऊर्जा लगती है ( ऊर्जा को तेल पढ़े)
    पर ये लोग तो माहिर है इसमें
    बना देंगे फिर कोई नया ओसामा
    पहले भी खूब इन्होने बनाये है
    और फिर इनके सारे गुनाह तो माफ़ है
    तुम चिंता मत करो इस बात की
    बाय बाय ओसामा याद आओगे सबको कभी कभी
    हर साल सितम्बर के महीने में!

  • 38. 13:37 IST, 06 मई 2011 BHEEMAL dildar nagar/ Mumbai:

    आपके ब्लॉग और कमेंट्स पढ़के स्पष्ट हो जाता है कि बुद्धिजीवी वर्ग को सच्चाई से दूर दूर का संबंध नहीं. सरकारें जो घोषित कर देती हैं पत्रकार लोग सुर में सुर मिलाके गाते हैं. बुद्धिजीवी लोग रक्तपात करनेवालों को संत भिंडरवाले और शहीद के रूप में प्रस्तुत करते हैं. लगता है रावण जैसे लोगों ने समस्त बुद्धिजीवी लोगों को ख़रीद रखा है.


  • 39. 16:34 IST, 06 मई 2011 amith:

    सुशील जी इस गिलानी को भी ओसामा के पास भेजना है. ज़रा ओबामा को कहें कि अपने कमांडोज़ को उसका पता भी पास करें.

  • 40. 19:26 IST, 06 मई 2011 himmat singh bhati:

    आप धन्य हैं सुशील जी. जब ओसामा जिंदा थे और खून ख़राबा कर रहे थे तब तो मीडिया की कमाई हो रही थी. अब जबकि ओसामा नहीं रहे हैं, तो कुछ लोग भूखे नहीं रहे, इसीलिए ओसामा की खबर को ही मीडिया दिखाना चाहता है. दुखी न हो मीडिया वालों, ओसामा मरा है पर आप लोगों की दूकान चलने वालों की कोई कमी नहीं रहेगी. इसके लीए डरने की कोई ज़रुरत नहीं है.

  • 41. 15:37 IST, 07 मई 2011 PRAVEEN SINGH:

    भारत अगर इस इस तरह की कोई कार्रवाई करता तो सबसे पहले अमरीका शोर मचा देता की ये सब मानवाधिकारों के खिलाफ है. बाण की मून भी ऊंची आवाज़ में भारत की निंदा करते. और अपने संपादकीय लेखों में पत्रकार समुदाय भी भारत को कोसता. क्यूंकि अमरीकी खुद को इंसान और भारतियों को जानवर समझते हैं.

  • 42. 15:58 IST, 09 मई 2011 mahesh sharma:

    झा साहब, सुंदर व्यंगात्मक विश्लेशण किया है। साधुवाद

  • 43. 23:30 IST, 09 मई 2011 अवनीश:

    सुशील जी को साधुवाद.
    मैं सोचता हूं कि टीवी वालों को ओसामा की मौत पर आधे घंटे का एक मौन कार्यक्रम रखना चाहिए,ताकि ओसामा की आत्मा को शांति मिल सके। आखिर उसने टीवी वालों के लिए क्या कुछ नहीं किया। उनकी बे सिर-पैर की बातों को कभी भी उसने नहीं काटा। इतना तो बनता है..

  • 44. 10:06 IST, 10 मई 2011 salman khurshed:

    वाह, वाह सुशील जी, आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है और शीर्षक भी ख़ूब दिया है-तेरे बिन लादेन.

  • 45. 01:31 IST, 24 मई 2011 Anupam Shrivastava:

    ओसामा बिन लादेन तो मारा गया है लेकिन अल-क़ायदा अभी भी सक्रिय है.मेरा मानना है कि अल-क़ायदा इसका बदला लेगें.अब भारत,अमरीका और ब्रिटेन को अपनी सुरक्षा को बढ़ा लेना चाहिए.

  • 46. 11:21 IST, 11 अक्तूबर 2011 Abhishek Kumar Garg:

    आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है सुशील जी, और शीर्षक भी ख़ूब दिया - तेरे बिन लादेन.

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