राहुल गांधी की राजनीति
राहुल गांधी को बुधवार को बनारस के कांग्रेस सम्मलेन में दिन भर मंच पर बैठे, आम कांग्रेसजनों से मिलते-जुलते और फिर भारत की सबसे शक्तिशाली समझी जाने वाली महिला नेताओं में से एक मायावती के ख़िलाफ़ खुली जंग का ऐलान करते देख मुझे उनसे पहली मुलाक़ात याद आ रही है.
कुछ साल पहले की बात है , मेरे ख्याल से वर्ष 2004 के लोक सभा चुनाव से पहले की. राहुल ने राजनीति में पहला कदम रखा था.
वह जगदीशपुर से अमेठी जनसंपर्क के लिए निकले थे. रास्ते में सड़क के किनार एक जगह चाय पी. कई जगह उनका स्वागत हुआ. जीप के बगल पैदल चलते हुए मैंने कई बार उनसे इंटरव्यू की कोशिश की. मुंशीगंज तक वह टालते रहे. एक बार सिर्फ यह पूछा क्या सवाल पूछोगे? घबराहट साफ़ झलक रही थी. कहा मुंशीगंज गेस्ट हॉउस आइये वहाँ देखेंगे. खैर वह इंटरव्यू नही मिला.
पिछले विधान सभा चुनाव से पहले मुरादाबाद के एक होटल में दिल्ली से आए संपादकों के साथ मेरी भी राहुल गांधी से मुलाक़ात और चर्चा हुई.
बातचीत से साफ़ लगा कि अब राहुल उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने लगे हैं. पिछले पांच सालों में राहुल ने अपनी छवि ग़रीबों के हमदर्द की बनाई है, चाहे उनकी झोपड़ी में रात बिताकर, हैण्ड पम्प में नहाकर या फिर संसद में कलावती का दर्द बयान कर.
लेकिन पिछले कुछ ही हफ़्तों में राहुल गांधी ने अपनी छवि और हुलिया बदला है.
मायावती भले उन्हें कांग्रेस का युवराज और पार्टी का भावी प्रधानमंत्री कहें, मगर राहुल ने अपनी छवि एक ऐसे जुझारू युवक की पेश की है, जो हालत को बदलने के लिए पार्टी के आम कार्यकर्ता के साथ कामरेडशिप दिखाकर सड़क पर संघर्ष करना चाहता है.
हालांकि उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी नेता 22 साल से सरकार से बाहर रहने के बावजूद अपने को सत्तारूढ़ दल के नेता की तरह पेश करते हैं.
राहुल का भाषण शायद मायावती के लिए कम और कांग्रेसियों को झकझोरने के लिए ज्यादा था. मंच से उतर कर वह आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच गए. खाने पीने के बारे में पूछा. हाल चाल लिया.
राहुल ने शुरु में उद्घाटन भाषण देने बजाय, पहले सबकी बातें सुनीं. फिर अंत में बोले तो एकदम एंग्री मैन की तरह, सब कुछ बदल डालूँगा की तर्ज़ पर.
इससे पहले वह भट्टा परसौल गए और धूप में जमीन पर ही धरने पर बैठ गए. किसानों को प्रधानमंत्री से मिलाने ले गए और दूसरे नेताओं की तरह मीडिया को बुलाकर ज़बरदस्त बयान दिया, जिसकी सफ़ाई कांग्रेस को अभी तक देनी पड़ रही है.
वर्ष 1980 में उनके चचा संजय गांधी ने नारायणपुर कांड को लेकर भी तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास को ऐसे ही घेरा था.
पिछले चार सालों में राहुल गांधी और उनकी माँ सोनिया गांधी ने अपने को केवल अमेठी - राय बरेली तक सीमित रखा. वहाँ भी न तो वे जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं से जुड़ पाए और न ही मतदाताओं से सीधा संवाद कायम कर पाए.
अब लगता है कि माँ और बेटे दोनों को यूपी फ़तह करने की जल्दी है. फिर इसके लिए चाहे लखनऊ में किसी दफ़्तर जाकर आरटीआई की दरखास्त डालनी पड़े या भट्टा में दिन भर धूप में बैठना पड़े.
दरसल 2012 के यूपी चुनाव में उत्तर प्रदेश की अगली सरकार के भविष्य के साथ ही साथ 2014 के लोकसभा चुनाव की बिसात भी बिछ जाएगी.
अगर यूपी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं हुआ तो फिर राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने का क्या होगा?
लगता है कि राहुल गांधी की झिझक अब खत्म हो गई है. उन्हें एहसास हो गया है कि फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौथे नंबर की विपक्षी पार्टी है और अगर वह स्वयं मोर्चे पर आगे अगुआई नही करेंगे तो मायावती और मुलायम जैसे अनुभवी खिलाड़ियों और बीजेपी जैसी व्यापक संगठन वाली पार्टी से मुक़ाबले में कांग्रेस आगे नही बढ़ पाएगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
ये सत्य है कि राहुल को मीडिया में बने रहने की चाहत रहती है. लेकिन इसके लिए वो ग़रीबों की भावनाओं के साथ खेलते हैं. किसी भी मामले का ज़िक्र करके चलते बनते हैं और दोबारा पूछने नहीं जाते कि धरातल पर कुछ बदला या नहीं.
फिर भी इससे ग़रीब लोगों को थोड़ी आशा तो मिलती है भले ही झूठी ही सही. कांग्रेस की सरकार है, राहुल और सोनिया जी को ग़रीबों का हाल पता है तो फिर इतनी उदासीन नीति क्यों है केंद्र सरकार की? क्यों अनाज गोदामों में रखा सड़ जाता है और सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी कार्रवाई नहीं करते कांग्रेस वाले?
कांग्रेस चाह रही है कि वो राहुल के सहारे ही उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाने का इंतज़ाम कर लेगी.
राहुल गाँधी कोई महात्मा गाँधी नहीं हैं जो भट्टा-पारसौल को नोआखली की तरह किसी तार्किक परिणति तक पहुंचाएं. उनसे ज्यादा आशान्वित होने के जरुरत नहीं है. उनकी ऐसी पैराशूट यात्राओं से उनकी दिल्ली की बोरियत कम होती होगी, अन्तःकरण की धिक्कार कुछ टल जाती होगी और पिकनिक का आनंद भी आ जाता होगा.
ये वही राहुल गांधी हैं जो कथित हिंदू आतंकवाद को सबसे बड़ा ख़तरा मानते हैं.
त्रिपाठी जी उत्तर प्रदेश जैसे प्रान्त को वास्तव में एक बहुत बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है . ऐसा परिवर्तन केवल कोई जुझारू और जुनूनी लीडर ही ला सकता है . ऐसे लोग कभी-कभी ही राजनीति में देखने को मिलते हैं . यदि राहुल गाँधी राज्य के युवा वर्ग को जाग्रत कर सकते हैं तो मीडिया का भी फ़र्ज़ बनता हैं कि राज्य के विकास हेतु इस नव-नेता का साथ दे.
राहुल गांधी राजनीति के एंग्री यंग मैंन हो सकते हैं पार्टी के जुझारू नेता हो सकते हैं. यहाँ तक वह भारत की तमाशाप्रिय जनता के तथाकथित लोकतंत्र के एक मात्र सर्वमान्य राजघराने के राजकुमार हैं. इसके बाद भी एक परन्तु उनके साथ जुड जाता है कि वह भारत के नेता हैं या इंडिया के. वह भारत, जिसके किसान जो भट्टा गांव में रहते है, जिनके लिए राहुल जमीन में बैठते हैं. वह भारत जिसके दलित श्रावस्ती के तेलिहार गांव में जलवर्षा के रूप में रहते हैं जहां राहुल जाकर खाना खाते हैं. वह भारत जिसके प्रदेश महाराष्ट्र के गांव में एक महिला कलावती रहती है जिसके दर्द को राहुल संसद में बयां करते हैं. उसके नेता हैं या वह इंडिया जहां नीरा रडिया, अनिल अम्बानी, शाहरुख खान, ए राजा, सुरेश कलमाड़ी, विकिलीक्स के टेप में बात करने वाले अमरीकी राजनयिक या तमाम उद्योगपति और चमकते सितारे रहते हैं. किसान की बात करने वाले राहुल यह क्यों भूल जाते हैं कि जिस मायवती की सरकार पर वह किसानों को मारने का आरोप लगा रहे हैं उसी पार्टी के संसद उनकी सरकार को भी समर्थन दे रहे हैं. वर्ल्ड कप का मैच देखने वाले राहुल क्यों नहीं कभी हॉकी खिलाड़ियों की दुर्दशा को देखते हैं.
ऐसी तमाम बाते हैं जो राहुल को जनता का हीरो तो बनाती हैं. परन्तु राहुल उसी फ़िल्मी हीरो की तरह एंग्री यंग मैन की तरह हैं जो फिल्म में पचास आदमी को पीट देता है परन्तु वास्तविकता का एक मुक्का नहीं खा सकता.
यह आपकी राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी के प्रति श्रद्धा है अथवा आपकी यह विशिष्ट पत्रकारिता शैली है यह तो आप ही जानें, और आपके ये शब्द, "किसानों को प्रधानमंत्री से मिलाने ले गए और दूसरे नेताओं की तरह मीडिया को बुलाकर ज़बरदस्त बयान दिया, जिसकी सफ़ाई कांग्रेस को अभी तक देनी पड़ रही है." ये शब्द राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता का बखान करते हैं या अपरिपक्वता का यह भी आप ही जानें.
राहुल अन्य नेताओं के मुक़ाबले ज़्यादा जुझारू हैं. दलितों के अलावा उन्हें अल्पसंख्यकों के हितों की ओर भी ध्यान देना चाहिए. अन्य नेताओं के मुक़ाबले वे अधिक ईमानदार जान पड़ते हैं.
अगर यूपी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का प्रर्दशन अच्छा नहीं हुआ तो राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने का क्या होगा? रामदत्त जी ने यह सवाल उठाया है यह चिंता कांग्रेस को हो सकती है, राहुल और उनसे संबंधित लोगों को हो सकती है. वास्तव में यह उनके लिए चिंता जैसी भी कोई बात नहीं है केवल उनकी महत्वाकांक्षा है ,ज़िद है, शौक है, जनून है, सपना है आदि-आदि. लेकिन रामदत्त जी से उम्मीद रहती है कि वे देश की चिंता से उपजे सवालों को उठाएंगें ,लोगों के हालात पर कोई बात करेंगें. कांग्रेस या दूसरी किसी भी पार्टी की चिंता करने के लिए सभी के पास विचारकों की लम्बी चौड़ी फौज है. हांलाकि रामदत्त जी ने लिखा भी है कि राहुल ने अपनी छवि गरीबों के हमदर्द की बनाई, यह बात सौ फीसदी सच है कि इन लोगों को अपनी छवि बनानी पड़ती है जैसे ये नहीं होते, वैसा इनको दिखना पड़ता है. छवि और हुलिया भी बदलना पड़ता है. आपने इस बात को भी रखा है कि कैसे झोपड़ी में रात बिता कर हैंडपम्प में नहाकर और ससंद में कलावती का दर्द बयानकर राहुल उत्तरप्रदेश की राजनीति को समझने लगे हैं. लेकिन राहुल या कांग्रेस को अपने सपने पूरे करने के लिए किन समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है यह आम बीबीसी पाठकों के लिए कोई दिलचस्पी का विषय नहीं है. देश के लोग किस कदर अवसाद में जा रहे हैं इस बात को बीबीसी ने समय समय पर अपनी रिर्पोटिंग में उठाया है. शिक्षा पाने का अधिकार अब उन्हीं को है जिनके पास पैसा है यहाँ तक कि बीमारी से उबरने का भी अधिकार उन्हें ही है जो मुँहमांगी कीमत चुकाने की क्षमता रखते हैं. लोगों को दो रूपये किलो आटा और तीन रूपये किलो चावल में सरेआम दयनीय बनाकर पेश किया जा रहा है. कहने का आशय यह है कि हमारी आपकी चिंता या सरोकार किसी पार्टी या व्यक्ति तक सीमित नहीं रह सकता है. जो देश का मुद्दा है ही नहीं उस पर देशव्यापी बहस क्यों होनी चाहिए? राहुल देश के प्रधानमंत्री कैसे बने यह सवाल कुछ लोगों का हो सकता है देश का नहीं. यह सच है कि देश की हालत ख़राब न होती तो लोग इस तरह प्रधानमंत्री बनने के सपने न देख पाते.
त्रिपाठी जी के इस ब्लॉग से यह समझ नहीं आया कि राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश की राजनीति को कैसे समझने लगे? जो नेता सिर्फ चुनाव के समय प्रदेश का दौरा कर रहा है और वो भी सिर्फ विवादित जगहों पर जा रहा है वो कैसे एक जुझारू नेता हो गया ये समझना थोड़ा मुश्किल है. रही बात झोपड़ी में रात गुजरने की तो ये सभी जानते हैं कि वो एक मीडिया प्रायोजित इवेंट थी जिसको कांग्रेस समर्थित मीडिया ने सराहा था. उन दलित और ग़रीब लोगों के जीवन में उस रात के बाद कोई परिवर्तन आया ऐसा तो नहीं लगता. कांग्रेस अभी भी चौथे से तीसरे स्थान पर आने के लिए संघर्ष कर रही है और इसमें शायद सफल भी हो जाए क्योंकि बीजेपी चौथे स्थान पर जाने को तैयार है.. इससे अधिक राहुल कुछ कर पाएंगे इसमें संदेह है.
असल में यूपी के कोंग्रेसियों को लगता है कि उनके पास राहुल गाँधी नाम की कोई चाबी है जिससे वो यूपी की सता के सारे ताले खोल देंगे! और सही कहा आपने कोंग्रेसियों को सत्ता की आदत है न इसलिए सड़क पर संघर्ष करना इनके बस की बात नहीं. कांग्रेस के पास यूपी में संगठन इतना मज़बूत नहीं जिससे यूपी जैसे बड़े राज्य में चुनाव जीता जाए. रीता बहुगुणा जैसे नेता तो नेता कहीं से लगते नहीं! (कभी उनका बयान सुनकर देखिये ) अगर इनके भरोसे राहुल गाँधी यूपी के चुनाव में जा रहे हैं तो उम्मीदें कम ही हैं. वैसे भी आजकल तो छोटे स्तर के कार्यकर्त्ता भी उस पार्टी की और जुड़ जाते है जिस पार्टी के चुनाव जीतने के चांस होते हैं क्योंकी अब विचारधारा और मुद्दे तो इतने प्रासंगिक है नहीं जितनी कि सोशल इंजीनियरिंग......कांग्रेस अगर दूसरे या तीसरे स्थान पर भी आ जाए तो ये राहुल के लिए जीत के सामान ही होगी!
राहुल बड़े होने में बहुत ज्यादा समय लगा रहे हैं. अभी भी मैं नहीं मानता कि उनकी राजनीतिक समझ पूरी तरह से परिपक्व हो गयी है. अगर उन्हें यूपी में या बिहार में पार्टी को खड़ा करना है तो पहले केंद्र सरकार को दुरुस्त करना होगा जो पूरी तरह से भ्रष्ट और अक्षम सिद्ध हो रही है. साथ ही उन्हें पार्टी के कटु सत्यभाषी नेताओं को विश्वास में लेना होगा जो सच्चे कांग्रेस-हितैषी हैं. काम अधिवेशन बुलाने जितना आसान नहीं है इसलिए काफ़ी मेहनत और सूझ-बूझ की जरुरत होगी जो मुझे नहीं लगता कि राहुल के पास है.
राहुल गांधी भारत का भविष्य हैं. उन्हें ये साबित करना होगा कि वे पैराशूट लीडर नहीं हैं. मुझे लगता है कि वे इंडिया, भारत और हिंदुस्तान सभी की आवाज़ को समझ सकते हैं. हम युवा उन्हें पारंपरिक नेता नहीं बल्कि एक दिवास्वप्नदर्शी के रुप में स्वीकार करने को तैयार हैं. और मुझे विश्वास है कि वे हमारी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे.
कांग्रेस पार्टी इस समय तीसरे नंबर पर है. सही से चले तो समाजवादी भी हाशिए पर ही है, आजम खान के आने से थोड़ी हवा बनी है, फिर भी कांग्रेस को दूसरे नंबर पर पहुचने में कोई संकट नहीं है. भाजपा तो कहीं सीन में ही नहीं है.
ये बड़ा ही हास्यास्पद है कि राहुल उत्तर प्रदेश में मायावती पर आरोप मढ़ रहे हैं जबकि केंद्र में उनकी पार्टी की भ्रष्ट सरकार मौजूद है. ये दोग़लेपन की जीती जागती मिसाल है.
राहुल गाँधी तथाकथित युवा नेता हैं क्योंकि वो चालीस पार कर चुके है और राजनीति में सिर्फ़ इसीलिए हैं क्योंकि उनका तालुक्क़ गाँधी-नेहरू परिवार से है. उत्तर प्रदेश के किसानों को वो प्रधानमंत्री से मिलवाकर ये जताना चाहते थे कि देखों इनसे तुम्हें मैं ही मिलवा सकता हूँ. और मनमोहन सिंह मानो कह रहे हों इसको कौन समझाए मैडम से शिकायत हो जाएगी. ऐसा लगता है राहुल केवल उत्तर प्रदेश के नेता हैं उसके अलावा उन्हें कहीं कोई समस्या दिखाई ही नहीं देती है.
वाह त्रिपाठी जी. ख़ूब लिखा आपने. पर एक बात पर शायद आपका इशारा नहीं हुआ जो उत्तर प्रदेश के लिए अति महत्त्व का है. आज उत्तर प्रदेश दो तरह लोगों के लिए दुख देने वाला है. दो तरह के लोगों के लिए सुख. पहले में एक तो वे हैं जो घोर सवर्ण 'सोच' रखते हैं और मायावती जी उनको बिलकुल नहीं सुहा रही हैं. इसी में दूसरे यादव जी लोग जिनको इस राज्य में प्रताड़ित किया जा रहा है. उनकी चले तो उखाड़कर अभी फेंक दें. दुसरे में वो सुखी लोग हैं जो किसी समाज के हों खुली लूट में आस्था रखते हैं.
अब अपने राहुल जी उत्तर प्रदेश के पहली और दुसरी कतार वालों से अलग कौन सी अलग तीसरी ताकत है जिसे लेकर वो बदलाव करने की सोच रहे हैं?
एक बात और त्रिपाठी जी, आप लखनऊ में रहते हैं. उत्तर प्रदेश को अच्छी तरह समझते हैं. मायावती का मुक़ाबला रीता बहुगुणा कैसे कर सकती हैं? यह तो रीता भी जानती हैं और अपने राहुल जी की मम्मी भी कि उत्तर प्रदेश मज़बूत होगा तो दिल्ली कमज़ोर. ये कांग्रेसी किसके कितने साथ रहते हैं यह बात बहन जी से अच्छी तरह कोई नहीं जानता.
शायद मुलायम सिंह को भी किसी ने बता दिया होगा या याद आ गया होगा की इनका काम ही है 'यूज़ एंड थ्रो' सो वह भी कन्नी काट गए.
अब बनारस का अधिवेशन. पूरब में कहावत है जहाँ गई दूला रानी, उहाँ पड़ा पाथर पानी ..............
एक और कहावत है - माई धिया गौवनहर, बाप पूत बराती....
सो देख लीजिये इन कांग्रेसियों को आज कहाँ नहीं फैले हैं, समाजवादियों में, बहुजनों में और तो और भाजपा में भी. क्या राहुल जी इन्हें उत्साहित कर रहे हैं?
रामदत्त जी नमस्कार,
आपकी आवाज़ में कुछ 'स्मैक' टाईप का असर है. सुनते-सुनते लत लग जाती है.
इस फ़ोरम में पाठकगण, श्रोतागण का भी कुछ महत्व है. आपसे गुज़ारिश है कि ब्लॉग लिखते समय बीबीसी के सर्वव्यापक छवि का विशेष ध्यान रखें.
मैं लेखक के विचारों से सहमत नहीं... इतने सालों में राहुल गांधी तो नहीं बदले, उनमें तो कोई सुधार नहीं हुआ लेकिन आप ज़रूर बदल गए... आपका नज़रिया बदल गया...
अच्छा है, कहीं तो परिवर्तन आया...
जहां तक राहुल गांधी का सवाल है वह उत्तरप्रदेश में अच्छा काम तो कर रहे हैं लेकिन केंद्रीय सरकार के नाक के नीचे जो भ्रष्टाचार हो रहा है उसका क्या.भारत में समाजवादी हो या बहुजनसमाजवादी पार्टी दोनों ही जातिवादी राजनीति करती हैं.
त्रिपाठी जी आपके विचार बीबीसी की परंपरा से अलग लगे. आप ने एक ऐसे राजनीतिज्ञ के सपने पर चिंता जाहिर की है, जिसने उम्र के चालीस पड़ाव तक एक भी समस्या को तार्किक परिणति तक पहुंचाने का प्रयास नहीं किया है. इस देश को समस्या जानने वालों की नहीं बल्कि उनका समाधान लाने वालों की जरुरत है. राहुल की एक्टिंग ज्यादा कुछ कर पाने में सक्षम नहीं है.
राहुल गांधी सच में राजनीति में अभी भी अमूल बेबी ही है.यह लेख एक तरह से राहुल गांधी को राजनीति में उतरने के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए लिखा हुआ लगता है.यह एक विडंबना ही है की देश के जैतापुर में लोग पुलिस की गोली से मर रहे है और भट्टा पारसौल जैसे गांव में लोग पुलिस पर गोलियां चला रही है.राहुल गांधी जैतापुर जाना नहीं चाहते क्योंकि वह कांग्रेस का राज है.राहुल गांधी प्रधान मंत्री बनना चाहते है की भट्टा पारसौल के सरपंच को ये समझ में नहीं आता.जिसके पास गांधी परिवार की ताकत है जिसका राजनीतिक भविष्य सुखकर है सब चीज़ें मालूम होने की वज़ह से वह हैण्डपम्प पर नहाते है या फिर गरीबों का मसीहा होने दिखावा करते है.अगर वह सच में गरीबों के मसीहा है तो हमेशा के लिए गरीबी में रहकर उनकी सेवा करें.राहुल गांधी का क्या करिश्मा है ये सब हम अलग-अलग चुनावों में देखते ही रहते है.आज हमें युवकों को किसी युवराज के पीछे घुमाने की कोई आवश्यकता नहीं.सिर्फ राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री हो यह बहुत लोगो को लगता है क्योंकि अगर वह प्रधानमंत्री हुए तो वह सिर्फ नामधारी होंगे और राज और लोग चलाएगें.हमें मालूम है आज वह दिन नहीं रहे की कोई सामान्य कार्यकर्ता प्रधानमंत्री बन सकता है .मुझे ऐसा लगता है यह प्रचार तुरंत देशहित में बंद करना चाहिए.
मैं राहुल के साथ हूँ और तमाम उत्तरप्रदेश की जनता उनके साथ है.
रामदत्त जी अब राहुल गांधी भी वही कर रहे हैं जो अभी तक और नेता करते आ रहे हैं,फर्क सिर्फ इतना है कि राहुल गांधी एक प्रधानमंत्री के बेटे और इंदिरा गांधी पोते हैं.इसके आलावा राहुल गांधी के पास कोई योग्यता नहीं है.मेरा मानना है कि किसी राजनेता को यदि सेवा करनी ही है तो सबसे पहले अपने आस्था को आचरण में ढालने की कोशिश करे.उसके बाद सेवा के मार्ग पर बढ़े,अन्यथा मेरी नज़र में ये सब अन्य कांग्रेसियों की ही तरह किसी चोचलेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है.गरीब के घर खाने खाने और एक रात आराम करने से कुछ नहीं होना जाना है.इससे न तो कांग्रेस को कुछ मिलना है और न राहुल को.अच्छा होता कि राहुल अपने लोकसभा क्षेत्र के विकास के लिये कुछ करते,इसका फायदा आने वाले समय में उनको जरूर मिलता,लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया जा रहा है.भठ्ठा परसौल में जो कुछ हुआ वह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के लिये शर्मसार करने के लिये काफी है.और उससे कहीं ज्यादा राहुल का वह बयान कांग्रेसियो को शर्मसार करने के लिये भी काफी है जो बिना सोचे समझे राख में ग्रामीणों की हड़डी होने की बात कही.कम से कम मै इस बयान का विरोधी नहीं हूं,लेकिन इतना जरूर कहना चाहूंगा कि किसी लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ बिना सोचे समझे एक कद्दावर नेता ऐसी बयान दे जिससे सूबे मे मारकाट की नौबत आ जाये उचित नहीं है.राहुल को एक सलाह जरूर देना चाहूंगा वे एक बार बस्तर जरूर आयें और प्रदेश को नक्सलियों से मुक्त करें.रही बात उनकी प्रधानमंत्री बनने की तो उनके पास इसके लिेये जन्मजात पात्रता है,क्योंकि उनके नाम के साथ गांधी जुड़ा हुआ है.यदि ये योग्यता नहीं होती तो वे शायद पंच बनने लायक भी नहीं है.खासकर उनकी सस्ती राजनीति को देखकर