हम देखेंगे
दक्षिण भारत के ताक़तवर राजनीतिक करुणानिधि की बेटी कनिमोड़ी भी जेल चली गईं. पू्र्व केंद्रीय मंत्री ए राजा और भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के पूर्व प्रमुख सुरेश कलमाड़ी पहले से ही तिहाड़ में हैं.
उनके अलावा रिलायंस जैसी ताक़तवर कंपनी के कई आला अफ़सर और ओलंपिक एसोसिएशन के कई पूर्व अधिकारी पहले से ही वहाँ हैं.
थोड़ा पीछे हटकर देखें तो हरियाणा के एक शक्तिशाली नेता विनोद शर्मा के बेटे मनु शर्मा और उत्तर प्रदेश में अपने कारनामों के लिए ख्यात राजनीतिज्ञ डीपी यादव के बेटे विकास यादव भी तिहाड़ में ही हैं.
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा भी क़ानून के फंदे में फँस चुके हैं और कई जेलों की दीवारें ऐसे ही बहुत से लोगों का इंतज़ार कर रही हैं.
ऐसे लोगों को सलाखों के पीछे देखकर उस जनता के एक बड़े हिस्से को सुकून मिलता है जो वोट देकर सरकारें चुनती हैं. कुछ उन लोगों को चिंता भी होती होगी जो वोट पाकर चुने जाते हैं या फिर सरकार को प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से चलाने में भूमिका निभाते हैं.
सतह पर तो दिखता है कि ये सबकी अपनी-अपनी करनी का फल है. वे अपने किए की सज़ा भुगत रहे हैं.
लेकिन व्यापक दृष्टि से देखें तो ये हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने के मानदंडों में से एक है. जनता के लगातार दबाव, अदालतों की सक्रियता और सरकार के लाख नानुकुर के बाद ही सही जनप्रतिनिधि और नौकरशाहों, व्यावसायियों और उद्योगपतियों और दलालों तक क़ानून की आँच आ तो रही है.
कहने को तो ये कहा जा सकता है कि लालू प्रसाद यादव और सुखराम भी तो गिरफ़्तार किए गए थे, उसके बाद क्या हुआ? लेकिन समझने वाले समझते हैं कि उन गिरफ़्तारियों और इन दिनों हुई गिरफ़्तारियों में अंतर है.
हालांकि अभी ए राजा, सुरेश कलमाड़ी और कनिमोड़ी पर सिर्फ़ आरोप हैं. उन पर लगे आरोपों को साबित करके तिहाड़ को इन सबका स्थाई पता बनाने के लिए अभी तंत्र को और मेहनत करनी पड़ेगी. और यक़ीन मानिए लोक का तंत्र वह भी करेगा.
वैसे ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपने लोकतंत्र से उकताए हुए दिखते हैं. वे मान बैठे हैं कि इस व्यवस्था में कुछ नहीं बदल सकता. उनके पास ऐसा मानने के कारण भी कम नहीं हैं. लेकिन एक लोकतंत्र के लिए साठ साल को शैशव काल ही मानना चाहिए. वह धीरे-धीरे ही परिपक्व होगा. और परिपक्वता एकाएक नहीं आएगी. धीरे-धीरे ही आएगी.
अगर लोकतंत्र को सचमुच का लोकतंत्र होना है तो तंत्र को लोक यानी लोगों की सोच और आवाज़ को मूर्त रूप देना होगा. इस तंत्र को पारदर्शी होना होगा और जनता के प्रति और जवाबदेह.
जिस रास्ते से हम गुज़र रहे हैं वह थोड़ा कठिन तो है और रफ़्तार भी कुछ कम है लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि हम एक दिन ऐसे मुकाम पर ज़रुर पहुँचेंगे जब न सिर्फ़ सरकारें जवाबदेह होंगीं बल्कि सरकारों को (कु)संचालित करने वाली सरकार के पीछे रहकर काम कर रहीं ताक़तें भी जनता के दरबार में हाज़िर की जाएंगीं.
और जब तक ऐसा होता है, चलिए हम फ़ैज़ का तराना गुनगुनाते हैं...लाज़िम है कि हम भी देखेंगे.

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विनोद जी जिस तरह आशावादी आप दिख रहे हैं वैसी आशाएँ देश के बहुत से लोग कर रहे हैं. लेकिन हम सबको पता है कि हमारे क़ानून में इतने दाँवपेंच हैं कि ये सब ज़्यादा दिन जेल के अंदर नहीं रहेंगे. किसी के सीने में दर्द होगा और वो फ़ाइव स्टार हॉस्पिटल पहुँच जाएगा या फिर किसी मुख्यमंत्री की सिफ़ारिश पर अपनी बीमार माँ को देखने के बहाने से बाहर घूम रहा होगा. किसी मीडिया वाले की नज़र पड़ने तक घूमता ही रहेगा और हो सकता है कि किसी डिस्को बार में पहुँच जाए. हमारा क़ानून जनतंत्र में मज़ाक बनकर रह गया है. शक्तिशाली लोग इसे कैसे घुमाते हैं ये हम देख ही रहे हैं. इससे एकदम से नई आशा करना बेकार है.
बेहद उम्दा लिखा है आपने. इसके लिए शुक्रिया.
आपने जितने लोगों के तिहाड़ जेल में होने पर जनता के बडे़ हिस्से को मिलने वाले सुकून की बात कही है. यह बात ठीक नहीं लगती है क्योंकि किसी के भी जेल जाने पर संतोष का क्या मतलब हो सकता है? जबकि इनमें से कई लोग तो बहुत सम्भावनाशील थे कोई जन्मजात अपराधी नहीं थे जैसे कि कलमाडी तो वायुसेना में पायलट थे. लालू जैसे लोग भी जिस हद तक आज पहुंच चुके हैं इनका अतीत ऐसा नहीं था, यह तंत्र लोगों को बर्बाद और भ्रष्ट कर रहा है और कुछ लोगों को जेल में डालकर न्यायपूर्ण होने का उपक्रम कर रहा है. हमारे लिए यह सन्तोष की बात नहीं है कि कितने लोग जेलों में पहुंच चुके हैं बल्कि यह बात दुखी करती है कि जेलों में लोगों की संख्या क्यों बढती जा रही है? दरअसल यह केवल परपीड़क होने जैसा है कि इन्होंने समाज को लूटा और समाज ने इन्हें दण्डित करके सुकून का अनुभव किया. यह प्रक्रिया कब तक चलेगी यह तय होना चाहिए. वास्तव में जितने भी अपराध हो रहे हैं यह सब किसी बुनियादी विसंगति का लक्षण हैं और हम लक्षण को ही समस्या मान बैठे हैं. अब यह आर्थिक घोटालों तक ही सीमित नहीं है लोगों के नैतिक पतन की बात है. इसके लिए लोगों को कैसे दण्डित कर सकेगें? समाज का बड़ा हिस्सा रोज़ी रोटी के संकट से गुज़र रहा है और कुछ लोग शेयर मार्केट में पैसा लगा रहे हैं. क्या इसे नैतिक पतन नहीं कहा जाना चाहिए? इसका एक बुनियादी कारण यह भी हो सकता है कि हमारे नेता समाज का नेतृत्व करने के काबिल नहीं है ये केवल प्रबन्धक जैसे हो गये हैं इन्होने हमें बताया कि हमने भ्रष्ट और लुटेरों को जेल में डाल कर एक प्रकार का प्रबन्ध कर दिया है. जबकि आवश्यकता इस बात की है कि नेतृत्व लोगों को नैतिक भी बनाए. स्थापित मानदण्ड यह है कि लोगों को सही मार्ग पर लाया जाए सिर्फ दण्डित करने का मतलब यह है कि अपराध करने का मार्ग भी प्रशस्त बना रहे और कभी कभार दो-चार लोगों को दण्डित करके लोगों को सन्तोष का प्रसाद भी मिलता रहे. दण्ड देने से कोई भी बदलता होगा इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है बल्कि अगली बार वह अपराध और अधिक कुशलता से करने की क्षमता हासिल कर लेता है. दण्ड देना समाज को झूठी दिलासा देने जैसा है. वास्तविक समाधान यह है कि जितने भी लोग पतित होने में आकर्षण महसूस करते हैं उन्हें सही मार्ग पर लाया जाए और समाज को कोई लूट ही न सके. यह मानसिकता भी ठीक नहीं है कि हम किसी के भी कष्ट में सुकून महसूस कर सकें चाहे वह कोई भी हो. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें सुकून में रखने के लिए कुछेक अपराधियों को जेल में डाल कर बडे अपराधी अपना खेल खेलने में लगें हों!
विनोद जी, उम्मीद तो हमें अपने मुल्क अपने मुल्क के क़ानून और लोगों से ही रखनी होगी, भले ही लोग इसे अतिआशावाद कहें, लेकिन अमरिका और चीन यहां सुधार करने नहीं आएंगे. ये ज़रूर लगता है कि करुणानिधि की हार से कनिमोझी के तिहाड़ का रास्ता रोशन हुआ है, फिर भी जिस तरह से मौज लेने के बाद भाई लोग तिहाड़ जा रहे हैं उससे कहीं तो कुछ अच्छा लग रहा है.
सिर्फ़ आरोप की वजह से सलाखों के पीछे भेजना उन भ्रष्टाचारियों के लिए सबक है जो देश को चूना लगाने की जुगत में हैं. रही बात लोकतंत्र में एक नई ऊर्जा क्रांति की तो ये सरकार की कड़ाई का प्रतीक है. इसमे कोई शक नहीं कि केंद्र की सरकार पहले की किरकिरी के बाद जवाबदेह सरकार की भूमिका निभा रही है. जो देश के लिए अच्छा संकेत है. आज एक से एक बाहुबली और सूरमा सलाखों के पीछे अपनी सेहत बना रहे हैं और सत्ता में रहकर देश को लूटने वाले भी वहीं पहुँच चुके हैं. अब सवाल उठता है कि सिर्फ़ लालू, सुखराम, ए राजा, कलमाड़ी और कनिमोड़ी ने ही अपराध किया है या बाक़ी लोग भी हैं जिन्हें सलाखों के पीछे होना चाहिए? कहाँ गए नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी जिन पर धार्मिक उन्माद फैलाने का आरोप है और वे आज संसद और विधानसभा में बैठे हैं क्या इन्हें भी सज़ा नहीं मिलनी चाहिए?
ए. राजा, कनिमोड़ी, कलमाड़ी आदि का जेल में पहुँच जाना जितना आशाजनक है उतना ही दुखद है उनके प्रति मीडिया का चाटुकार रवैया. वकालती पत्रकारिता से तब बहुत दुख हुआ जब कनिमोड़ी के गिरफ़्तार होने के अगली सुबह एक टीवी चैनल उनकी असुविधाओं के बारे में दिखाने लगा. युवा एंकर चिंता से बता रहीं थीं कि कनिमोड़ी को मच्छरों ने काटा, सेल से सटे, केवल पर्दे से ढँके बाथरूम से उन्हें दुर्गंध आई, उन्हें कंबल मिला. दक्षिण भारतीय खाने की जगह चपाती और सब्ज़ी मिली. आलीशान घर में रहनेवाली को 12/10 की कोठरी में रखा गया. कनिमोड़ी का मोबाईल, नगदी आदि रखवा लिया गया. एंकर बता रही थी कि तिहाड़ में कितने बड़े-बड़े लोग इस समय बंद हैं. उसने एक बार भी नहीं कहा कि बड़े आरोपी या अपराधी बंद हैं. दूसरे बड़े चैन में तो सेल के आकार को ही बदल दिया गया. उनकी एंकर ने कोठरी को 15/10 का बताया. ये अपराधियों के छुपे हुए समर्थक टीवी चैनल वास्तव में न्याय को असंभव बना रहे हैं. साफ़ दिखता है कि बड़े अपराधियों की तकलीफ़ों का महिमामंडन करनेवाले चैनल अपराधियों के पक्ष में माहौल बनाने का काम करते हैं. ताज्जुब की बात यह भी है जब आज तक और जी न्यूज सेल के आकार को ही अलग अलग बताते हैं तब उन्हें इस बात की पुख्ता जानकारी कैसे मिली कि कनिमोड़ी को क्या क्या असुविधाएँ हुईं? समर्थ आरोपियों के लिए टीवी चैनलों की यह वकालत सचमुच चिंताजनक है. यह सोचना और भयानक है कि हमारे समय का मीडिया जनता का साथी नहीं है.
जनता के दरबार में हाज़िरी शब्द बहुत ही आकर्षक है इसी से प्रेरित होकर कुछ नेता जनता दरबार भी आयोजित करते रहते हैं. लेकिन मूल रूप में यह वैसा ही दरबार होता है जैसा कि हाकिमों के समय से होता आया है. दरबार एक प्रणाली का नाम है चाहे वह किसी की भी हो, राजा की हो या जनता की, अन्ततः वह राजशाही पद्धति को ही लागू करती है. हमारे यहाँ भी लगभग पूरा तंत्र उसी मानसिकता से संचालित किया जा रहा है जिसमें नेताओं का दावा रहता है कि पूरी शक्ति जनता के हाथों में है और हम जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं इसलिए इस शक्ति का उपभोग करने के हम सहज अधिकारी हैं. क्योंकि ये ख़ुद को जनता साबित कर सकते हैं. इसलिए इन्हें जनता के दरबार में हाज़िर करना सम्भव नहीं है. और इसीलिए आज तक ऐसा हो भी नहीं पाया है. इस खामखयाली में रहना जनता के लिए भी नुकसानदायक है कि किसी दिन हम अपराधियों को अपने दरबार में खडा कर सकेगें. यह बदला लेने की चाहत और उस क्षण का इंतज़ार हमें रूग्ण कर सकता है. हमारे सामने चुनौती यह है कि लोग भ्रष्टाचार में इतने उत्सुक क्यों हो रहे हैं? इन्हें तत्काल रोकना होगा न कि घात लगाकर इनके शिकार करने की योजना बनाने में समय गंवाना ठीक होगा. चिकित्सक इस बात का इन्तजार नहीं करते कि किसी दिन बीमारियों को दरबार में खड़ा किया जा सकेगा बल्कि टीकों का आविष्कार करके जिस तरह अनेकों बीमारियों की जड़ समाप्त कर दी गईं उसी तरह भ्रष्टाचार की भी जड़ समाप्त करने की जरूरत है. भ्रष्टाचार को दूसरों में प्रतिस्थापित करके इन व्यक्तियों को हवालात में भेज देना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. बल्कि यह मानसिकता किन-किन रूपों में अपनी जगह बनाती जा रही है और कब हम अंगुली उठाकर हम आनंद अनुभव करने वाले लोग भ्रष्टाचारियों की जमात में खड़े हो जाएँगे. इसका भी किसी को भी पता नहीं.
विनोद जी बहुत अच्छा लिखा है आपने. लेकिन अब फैज़ का यह शेर कि 'लाज़िम है कि हम भी देखेंगे' गुनगुनाने से काम नहीं चलनेवाला.बल्कि अब कहना पड़ेगा कि 'लाज़िम है कि हम भी करेंगे' तभी स्थितियां बदलेंगी और लोकतंत्र परिपक्व हो पाएगा.
विनोद जी ने अपने ब्लॉग में कहा है कि तिहाड़ को राजा, कलमाडी और कनिमोडी जैसे लोगों का स्थाई पता बनाने में अभी और मेहनत करनी होगी और यह होगा भी. यदि इस दृष्टि से देखा जाए तो ऐसे लोग इतनी बड़ी संख्या में सक्रिय हैं कि इनको समेट पाना तिहाड़ के बस में नहीं है. इसके लिए तिहाड़ की दीवारों को फैलाना ही होगा. क्या यह हमारी असफलता नहीं है कि हम जेलों के फैलाव की हिमायत कर रहे हैं. यह भी हो सकता है कि हमारी रूचि लोगों को दण्ड देने में हो , भ्रष्टाचार मात्र एक बहाना हो. हम इस बात से चिंतित नहीं दिखते कि लोग कुमार्ग पर क्यों जा रहे हैं. लेकिन उन्हें दण्डित करने में हमारी उत्सुकता काफ़ी बढ़ जाती है और बहुत से लोगों को यह खेल पसंद भी आता है. भ्रष्टाचार की चर्चा अभी राजनीतिक लोगों, अधिकारियों ,पूंजीपतियों जैसे लोगों के संबंध में ही अधिकतर होती रही है कल यदि यही बात अदालतों, जेलखानों, पुलिस या दूसरे संवेदनशील प्रतिष्ठानों तक पहुच गई तो अपराधियों को दण्ड दिलाने का हमारा सारा उत्साह काफूर होने में कितना समय लगेगा? यह शोध का विषय है कि भ्रष्टाचार के कारण समाज पतित हो रहा है या फिर समाज के पतन के कारण भ्रष्ट लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. लेकिन यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हम अभी भी फलों की ही चर्चा में ही आंनन्दित हैं ,समस्या की जड़ों तक पहुंचने में न मालूम कितना समय लगेगा.
इस दफा आपको पढ़कर ऐसा लगा, जैसे वाकई कुछ सकारात्मक हो रहा है और हमें आगे भी बेहतरी की उम्मीद रखनी चाहिए। मैं नकारात्मक रुझान वाला इंसान हूं और खूबियों की जगह खामियों पर मेरी नजर जल्दी जाती है। बावजूद इसके इस बार आपको पढ़कर लगा कि लोकतंत्र एक ऐसा वृक्ष है, जिसे फलने-फूलने में काफी वक्त लगता है और संभवत: यह स्वभाविक भी है। मैं भी अब उम्मीद करने लगा हूं कि इस देश में मनमोहन सिंह जैसा इंसान दोबार प्रधानमंत्री नहीं बनेगा (माफ कीजिएगा, मैं उन्हें राजनेता नहीं मानता)।
विनोद जी, पुराने गाने गुनगुनाने से और ये कहने से कि हम देखेंगे - इससे काम चलने वाला नहीं. हम जो पहले देखते रहे हैं और आज जो देख रहे हैं उससे लगता है कि बदलाव आएगा. रास्ता लंबा और कठिन ज़रूर है पर असंभव नहीं. इसमें आप लोगों को भी हमसफ़र बनना पड़ेगा, यानि मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है.
विनोद जी, आपके लेख बहुत सुंदर होते हैं इसमें कोई शक नहीं. लेकिन पिछले कुछ लेखों से लगता है कि आप हम श्रोताओं को झूठा सपना दिखाने का प्रयास कर रहे हैं. क्या होगा इन लोगों को जेल में डाल देने से. आपके पास अगर जेल के भीतर जाने का पास हो तो जाकर देख लें इन्हें किस तरह दूसरे क़ैदियों से अलग पूरे ठाटबाट से रखा जाता है. ऐसे लोगों को जेल में रखने की बजाय सड़क पर खुले में मुंह काला करके घुमाना चाहिए.
एक लोकतंत्र के लिए साठ साल को शैशव काल ही मानना चाहिए. आप मजाक कर रहे हैं? अगर जेल में भेज देने से ये तमाम लोग सुधरने का मिज़ाज रखते तो बात ही क्या थी. कुछ दिन और देख लीजिए. बीमारी का बहाना बनाकर सारे के सारे बाहर होंगे. जनाब मेरी आधी उम्र ख़त्म हो गई है. मैंने आज तक किसी राजनेता या सरकारी अफ़सर को ऐसे गुनाहों में लिप्त होकर भी सजा पाते नहीं देखा क्योंकि उसे बचाने के लिए पूरा तंत्र उठ खड़ा होता है.
विनोद भाई, साधुवाद. आपने एक सुंदर, सकारात्मक और रचनात्मक विषय पर एक सधा हुआ ब्लॉग लिखा है.
मैं किन्हीं कारणों से इतना आशावादी नहीं हूं. फिर भी आपने शुरुआत अच्छी की है. 'चले थे अकेले - राह में साथी मिलते गए - कारवां बनता गया'. आप अभी इस विषय के गुप्त तंतुओं को देख नहीं पा रहे हैं या जानबूझ कर अनजान बन रहे हैं. जहां तक मुझे याद आता है - कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री जी और सिब्बल जी सीना ठोक-ठोक कर बयान देते थे कि कोई गड़बड़ नहीं है. वे सीएजी की रिपोर्ट पर ही सवाल उठा रहे थे. इसी मसले पर संसद की कार्यवाही ठप हो गई थी. सत्ता पक्ष भी राजा-कनिमोड़ी-कलमाडी को बचाने की पूरी कोशिश में था. लेकिन क्या हुआ ये सब के सामने है. मैं आपको ये बताना चाहता हूं कि भले ही भ्रष्टाचार के आरोप में कुछ लोगों की ग़िरफ़्तारी हो गई हो, आप कितने भी आशान्वित हो गए हों, मगर इस पूरे मामले में मोटी मछलियों कभी पकड़ में नहीं आएंगी.
आदरणीय विनोद जी, ये आप क्या लिख रहे हैं? अगर आप जैसे लोग ऐसा लिखेंगे तो लोग सच में आशावादी हो जायेंगे, और इस लोक (लूट) तंत्र से आशा करना अपने आप को धोखा देना है. शायद आप मज़ाक कर रहे हैं, बता दीजये, नहीं तो पाठक इस लेख को गंभीरता से पढ़ लेंगे. चार भ्रष्ट जेल में हैं तो चार लाख बाहर हैं. अगर अदालतें सक्रिय होती तो लाखों मामले सालों साल लंबित न होते. अन्याय सहना ठीक है लेकिन भारत में न्याय की उम्मीद करना ठीक नहीं है.
खाली गिरफ़्तार होने से क्या होता है सब छूट जायेंगे . अगर मान भी लिया जाए कि इन्हें स़जा हो भी जाती है तो इस बात की क्या गारंटी है कि ये लोग एक आम कै़दी की तरह स़जा काटेगे ? क्या ऐसा नहीं होगा कि स़जा मिलने पर केवल कागज़ों में ये लोग जेल में रहेंगे और किसी फार्म हाउस में ऐश करते रहेंगे ? इस देश में इतना भ्रष्टाचार है तो यह संभव है कि पैसे वाले कै़दी कुछ समय के लिए या वीकेंड में बाहर आ जाते हों और बाहर ऐश करके फिर वापस चले जाते हों . अगर ऐसे लोगों को सज़ा होती है तो इन लोगों को चौबीस घंटे कैमरे की निगाह में रखा जाना चाहिए और उसका सीधा प्रसारण होना चाहिए.
विनोद जी , लेखन काफी अच्छा कहा जा सकता है . परंतु सार तत्व जो आप समझ नहीं सके कि सत्ताधारी लोगों की अपराधी ,घोटालेबाज़ लोगों की साथ -गांठ , किसी को कभी दिखती ही नहीं . दो महीने पहले के सत्ताधीश नेताओं के बयान पेपर से निकल कर पढें , आप को सुगंध आ जाएगी .
मुझे लिपापोती में विश्वास नहीं है.जिस तरीके से जेपीसी की मांग का सत्तासीन लोग,उनके नेता,राजा का बचाव करते है कि जेपीसी की कोई आवश्यकता नहीं है.हमने एक चमचे के तौर पर लोकलेखा आयोग पाल कर रखा है जो जांच के लिए काफ़ी है.इस सारे प्रकरण के स्पष्ट हो जाता है कि सत्ता पक्ष,राज परिवार की ये मिलीभगत थी.
बोरी में छेद होगा तो अनाज तो निकलेगा ही या हमारे इस लोकतंत्र नामक बोरी में छेद अनगिनत है.मेरी मानिए जागरूकता की बात कीजिए ,बदलाव की नहीं.
विनोदजी बीबीसी और अगर आप की तारिफ़ लिख दो तो वह विचार तुरंत छप जाता है.लेकिन अगर किसी बीबीसी रिपोर्टर या आपके बारे में कोई विचार लिख दे तो पन्नें पर जगह ही नहीं मिलती..
ये बहुत ही अच्छा कदम है,पर जैसा की बहुत से लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि कितनी सज़ा मिल पाएगी इस बात पर संदेह है.हमारे देश का क़ानून इनको सज़ा दे पाएगा ये यक्ष प्रश्न है.ये राजनेता इतने शातिर है कि क़ानून का लाभ उठाकर बच जाएंगें,पर इस बार क़ानून को भी दिखाना होगा कि अपराधी को सज़ा मिलेगी चाहे वह कोई भी हो.
ये बहुत ही अच्छा लेख है लेकिन तथ्यों से परे है.हमें ये नहीं पता है कि इन लोगों को कब जेल में भेजा जाएगा.
विनोद जी अगर हम एक राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठ कर सोचें तो ये मन को सकून देता है, पर ऐसे कितने लोग हैं जो राजनीतिक विचारधारा में संलिप्त न हो, कल ऐसे ही विचार वाले लोग इससे मात्र एक षड़यंत्र का नाम देंगें.