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बेटियां ही बेटियां.......

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 25 मई 2011, 21:57 IST

आजकल बेटियां बहुत पैदा हो रही हैं, तीन दोस्तों के घर बेटियां हुई हैं.

विकास दर के नौ प्रतिशत पहुँचने से पहले बेटियों को जलाकर मारा जाता था, सुपरपावर बनने की राह पर चलने वाले देश में समस्या को जड़ से खत्म करने का चलन शुरु हो गया है.

विकास और टेक्नॉलॉजी ने लोगों को दूरदर्शी बना दिया है.

मेरे पिताजी साधारण कर्मचारी थे, तभी दूरदर्शी नहीं थे, उन्हें बेटी चाहिए थी. दो भाइयों के बाद जब मैं पैदा हुआ तो पापा नाराज़गी में मुझे देखने के लिए अस्पताल तक नहीं गए. पाँच साल की उम्र तक मुझे लड़कियों की फ्राकें पहनाई गईं और बाल लंबे रखे गए और चोटी बांधी जाती थी.

स्कूल छूटे लंबा समय बीत गया है, कोई पुरुष शिक्षक याद नहीं आता, सारी शिक्षिकाएँ याद आती हैं, एक थीं वंदना सान्याल जिन्होंने भाषण देना, निबंध लिखना सिखाया. 'यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता' अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का वास होता है....यह भाषण न जाने कितनी बार दिया.

रिपोर्टिंग और प्रसारण के गुर भी वरिष्ठ महिला सहकर्मियों ने ही सिखाए, मैं खुशकिस्मत हूं कि इतनी बेहतरीन महिलाओं के साथ काम करने का सीखने का अवसर मिला,

सगी बहन की कमी खलती है अपने व्यक्तित्व में अपूर्णता का एहसास है.

भले ही पैदा होने के बाद लड़की को कोसा जाता हो, मारा-पीटा जाता हो लेकिन गर्भ में झाँक लेने की दूरदर्शिता उन लोगों में अभी नहीं है जिन्हें इस देश में पिछड़ा समझा जाता है.

मेरे एक शिक्षित और समृद्ध दोस्त पुत्ररत्न पाने के लिए कोई भी जतन करने को तैयार हैं. मैंने कई बार समझाया कि ओबामा की दो बेटियां हैं, बिल क्लिंटन की एक ही बेटी है...सरोजिनी नायडू से लेकर इंदिरा गांधी तक की याद दिलाई मगर सब बेकार.

देश की सबसे बड़ी पार्टी की मुखिया महिला है उसको वोट देंगे. ममता बनर्जी,जयललिता, मायावती, वसुंधरा राजे, महबूबा मुफ्ती को नेतृत्व सौंप देंगे लेकिन अपने घर की लड़की को रात-दिन बड़ी होती देनदारी की तरह देखेंगे.

इस्लाम में नेमत हैं, हिंदुओं के लिए देवियाँ हैं, लेकिन पढ़े-लिखे लोग धर्म को मानते नहीं हैं. अच्छा विज्ञान को मान लीजिए, विज्ञान के अनुसार भी महिलाएँ मानव उत्पत्ति के क्रम (इवाल्यूशन के मामले में) में पुरुषों से अधिक विकसित हैं.

अनुभव से मान लीजिए कि वे अधिक सहनशील होती हैं, अक्सर माँ-बाप का अधिक खयाल रखती हैं.

मगर आप विकसित, शिक्षित, समृद्ध और दूरदर्शी हैं इसलिए यही मानेंगे कि बेटे से ही वंश चलता है, अगर विकास इसी तरह चलता रहा तो आप शायद ये भी मानने लगेंगे कि बेटे बेटा पैदा कर लेंगे, बहुओं की क्या ज़रूरत.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 22:29 IST, 25 मई 2011 Ajit Kumar Das:

    क्या खूब लिखा है आपने. लेकिन आज के पढ़े लिखे मूर्खों को कौन समझाए. लेकिन फिर भी हम चुप नहीं बैठ सकते. जनम से पहले ही बेटियों को मार देने वाले लोगों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. ताकि समाज के किसी अन्य लोगों की हिम्मत न हो ऐसा करने की.

  • 2. 23:34 IST, 25 मई 2011 vikas kushwahakanpur:

    अच्छा ब्लॉग है

  • 3. 00:41 IST, 26 मई 2011 ramesh meghwal:

    गर्भ में ही मादा भ्रूण की हत्या- अपने स्वार्थ के लिए विज्ञानं और तकनीक के सबसे घटिया उपयोग के उदाहरणों में से एक है! गरीब और अनपढ़ लोग बेटे की चाहत में अधिक बच्चे पैदा करते है जबकी तथाकथित अध् पढ़े लिखे और स्यूडोमोडर्न लोग बेटे की चाहत के साथ परिवार को छोटा रखने के लिए वैज्ञानिक शोर्टकट अपनाते है! देश के कुछ राज्यों में पुरुष/स्त्री अनुपात भयावाह स्थिती में पहुँच गया है!परन्तु दुःख की बात यह है कि सरकार भी केवल कुछ पब्लिक सर्विस एडवरटाइजिंग को प्रसारित करवाने के अलावा कुछ ठोस करती हुई नहीं लग रही है!

  • 4. 00:43 IST, 26 मई 2011 Ashok:

    बड़ा भाग्यशाली हूं कि एक बेटी का पिता हूं. और वो मेरी अकेली संताना है. बड़ा भाग्यशाली हूं कि चार बहनों का प्यार भी पाता हूं.

  • 5. 11:19 IST, 26 मई 2011 sarfaraz hajipur bihar:

    अच्छा लेख है. आम तौर पर पहले गर्भ मे लोग बेटे और बेटी में अंतर या भ्रूण हत्या नहीं कर सकते थे शायद इसीलिए भगवान ने अपनी नीति बदल दी है और आजकल कन्याओं को भ्रूण में ही मारा जा रहा है.मेरे 15 दोस्तों में से 14 को पहली बार बेटी हुई है. मारने वाले से बड़ा बचाने वाला है.

  • 6. 11:28 IST, 26 मई 2011 Ajeet S Sachan:

    इस बार आपके ब्लॉग का शीर्षक और लेख में बिल्कुल समानता नहीं है. पहले तो लगा कि आप लोगों को ये कहना चहा रहे है कि ज्यादा बेटियां हो रही हैं लेकिन पढ़ने पर लगा कि आप कुछ और ही कहना चाह रहे है.

  • 7. 12:13 IST, 26 मई 2011 Mithilesh Kumar jha:

    सुशील जी
    मैं आपका हर ब्लॉग पढ़ता हूं. हर बार दिल को छू जाता है. मैं बीबीसी से लगभग 20 साल से जुड़ा हूं. पहले रेडियो फिर नेट. हर दिन आपका नया ब्लॉग खोजता हू.कृपया थोड़ा जल्दी जल्दी ब्लॉग लिखा करें क्योंकि इंतज़ार नहीं हो पाता है.

  • 8. 13:05 IST, 26 मई 2011 BHEEMAL DILDAR NAGAR:

    झा जी, आपकी लेखन शैली व्यंगपरक है किंतु व्यंग्य तीर जैसा तलवार जैसा होता है. विषय वस्तु सही चुनी है. किंतु अपनी बात इस प्रकार लिखें कि पाठक के मन को छू जाए. ये मेरी विनती और सुझाव है. बाकी आपकी लेखनी फ्री है.

  • 9. 13:11 IST, 26 मई 2011 Hashmat Ali:

    भारत में भ्रूण हत्या की दो वजह हैं पहली दहेज़ और दूसरी समाज की मान्यताओ के खिलाफ शादी, इसका हल यही है की भारत में पैदा होने वाली सभी लड़कियों की शादी की ज़िम्मेदारी सरकार उठाये चाहे वे किसी भी तबके से ताल्लुक रखती हों और सबकी शादियाँ एक जैसी हों दूसरा शादी के लिए सऊदी अरब जैसा क़ानून हो जिसमे लड़की की अम्मा या अब्बा या बड़े भाई की रजामंदी जरूरी हो ताकि इज्ज़त के नाम पर हत्या ना हो

  • 10. 15:23 IST, 26 मई 2011 rahul sharma:

    बुद्धि विकास हुआ है क्यों यदि नाश हुआ है चेतन का. ज्यादा पढ़े लिखे होने का ये मतलब नहीं है की उसकी चेतना जाग्रत है,

    हम तीन भाई बहनों में मेरे बहन सबसे बड़ी है..उसके पैदा होने पर पापा तो बहुत खुश थे पर दादी का हाल बुरा था.. बेटा क्यों नहीं हुआ बार बार माँ से बोलती थी... छठी- बरही पर जश्न नहीं मनाया गया और जब मैं हुआ तो पूरे गाव में मीठा बांटा गया.. जैसे जैसे हम बड़े हुए घर की सारी जिम्मेदारी उसके सर पर आ गयी..सरे अधिकार भी उसके ही पास थे.. मेरा रिजल्ट भी लेने स्कूल वही जाती थी, कम नंबर आने पर मुर्गा भी वही बनती थी, पापा तो सिर्फ दस्तखत कर देते थे.. आज वो खुद एक सरकारी अधिकारी है.. जबकि मेरे माँ अनपढ़ थे... दो बार फर्स्ट क्लास MA किया है दीदी ने.. आज मैं वैसा हु जैसा वो मुझे बनाना चाहती थी.. आज भी दीदी का वर्चास्वा है घर में .. एक भी पत्ता नहीं हिलता है उसको बिना बताये.. शादी क बाद उसके दो बेटे है.. तरसती है एक बेटी क लिए .. जिसे वो अपने जैसा बना सके...

  • 11. 16:12 IST, 26 मई 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    सुशील जी ! भ्रूण हत्या ने समूचे देश में एक विकराल समस्या का रूप ले लिया है ! बात घूम फिर कर वहीं आ जाती है की एक तरफ देवियाँ पूजीं जाती हैं तो दूसरी तरफ देवी सामान बेटी की कोख में ही बलि दे दी जाती है ? यही हमारे समाज का दोगलापन है ! और ये समस्या संभ्रांत परिवारों और आर्थिक दृष्टी से सम्पूर्ण लोगों में ज्यादा देखी जाती है ! अपने आस पास पंजाब में आजकल दो समस्याएं अति गंभीर रूप ले चुकीं है ! एक तो नौ जवानों को नशे की लत और आम समाज में कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन ! मैं तो यह समझ पाने में असमर्थ हूँ एक तरफ तो देवी के दर पर जाकर लोग नाक रगड़ते हैं तो दूसरी ओर देवी समान बिटिया के बारे में इतने बुरे ख्याल क्यों ? हमारा सभ्य समाज बगुला भक्त बना बैठा है !

  • 12. 17:11 IST, 26 मई 2011 Nitesh Pathak:

    मैं एक भाई हुँ और चाहता हुँ कि सबको एक बहन जरुर मिले.

  • 13. 19:06 IST, 26 मई 2011 Kamran Zaidi:

    सुशील जी ! क्या खूब लिखा है आपने.

  • 14. 21:41 IST, 26 मई 2011 Dr.Lal Ratnakar Jaunpur/Ghaziabad:

    सुशील जी आप भाग्यशाली है की आपका 'लड़की' बनने का शौक पूरा हो गया, नहीं तो लोग पूरे जीवन लड़की बनना नहीं छोड़ते हैं. अक्सर लड़कों के रूप में लड़कियों ने ही अपना रूप बदलना शुरू किया था, इस पूरी कथा में मुझे एक बात समझ नहीं आ रही है वह यह की इन लड़कियों को किसने राय दी की तुम लड़की ही न रहो, लड़कों जैसा रूप बना लो ! लड़कियां लड़कियों की तरह अच्छी लगती हैं और परिवारों में प्यार भी पाती हैं पर यह सच है की लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को ज्यादा तरजीह दी जाती हैं, जो लड़की बहु बनकर आती है वह भी चाहती है की उसकी पहली संतान लड़का ही हो. इसका कारण क्या है ? जो आसानी से समझ आता है वह है जिम्मेदारी और लड़कियों के बारे में जिम्मेदारियां - यथा दहेज़, सुयोग्य वर - घर, जिनके पास दौलत है उन्हें तो 'दूल्हा' मिल जाता है, जो मध्यम आय वर्ग का है लड़कियाँ उनके लिए बोझ बन जाती हैं. यही कारण है की इस देश में बहुत तरह की औरतें, स्त्रियाँ, नारियां, महिलाएं आदि आदि हैं पर उनका स्ततित्वा कितना है यह मुख्य मुद्दा है - बहुएं न मिलने का .

  • 15. 03:36 IST, 28 मई 2011 यूसुफ अली अजीमुदीन खाँ (भीँचरी):

    भ्रूण हत्या के लिए सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है । सरकार साँप को नहीं मार रही उसकी लकीर को पीट रही है । जब तक सरकार दहेज लेने व देने पर और लङकी की शादी में फिजूल खर्चे पर सख्ती से पाबन्दी नहीं लगायेगी तब तक लङकी माँ-बाप के लिए बोझ रहेगी और इसी तरह कन्या भ्रूण हत्या होती रहेगी । अरब देशों में न दहेज प्रथा है और न ही शादी ब्याहों में फिजूल खर्ची है इसीलिए यहाँ लङका लङकी एक समान हैं । न भ्रूण परिक्षण पर पाबन्दी है और न ही कोई भ्रूण हत्या करवाता है ।

  • 16. 06:39 IST, 28 मई 2011 Abhisheka Anand:

    बहुत अच्छा कहा आपने!!! लेकिन सुधार जरूर हो रहा है

  • 17. 07:34 IST, 28 मई 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    लड़कियों की घटती संख्या निश्चित रूप से चिंता का विषय है.मैं नहीं मानता कि इसमें तकनिकी प्रगति का कोइ दोष है.तकनीक तो निरपेक्ष होता है मेल तो हमारे मन में होता है.भविष्य में लगता है कि फिर से द्रौपदी प्रथा का प्रचालन बढनेवाला है और अगर ऐसा नहीं हुआ तो अभी तक झगडे संपत्ति को लेकर होते थे आगे से स्त्रियों पर कब्जे को लेकर हुआ करेंगे.जहाँ तक मर्दों के गर्भ से बच्चों के जन्म लेने का सवाल है तो ऐसा संभव ही नहीं है क्योंकि मर्दों के गर्भ होता ही नहीं है अगर कृत्रिम तरीके से ऐसा संभव हो भी गया तो इसकी भी अपनी जटिलताएँ होंगी.

  • 18. 14:54 IST, 28 मई 2011 divyesh vyas:

    क्या खूब लिखा है आपने. बड़ा भाग्यशाली हूं कि एक बेटी का पिता हूं.

  • 19. 00:23 IST, 29 मई 2011 श्री प्रकाश ओझा :

    झा साहब,बहुत ही संवेदनशील ब्लॉग है, साधूवाद के पात्र हैं,

  • 20. 07:46 IST, 30 मई 2011 Kushiram Raturi:

    सुशीलजी बहुत अच्छा.आज गांवों की हालत बहुत दयनीय है.मुझे खुशी है कि मैं दो बेटियों का पिता हुँ.आपका ब्लॉग अच्छा लगा

  • 21. 13:24 IST, 30 मई 2011 shyamal kishor jha:

    बहुत बढ़िया.आपने मेरे दिल की बात कह दी......

  • 22. 15:36 IST, 24 जून 2011 Inderjeet Singh:

    सरकारी तंत्र के प्रचार माध्यमों द्वारा‘‘बेटा-बेटी एक समान’’ के कितने ही ढोल पीट लिये जायें, भले ही दूरदर्शन की पहुंच भारत के अधिकांश गांवों तक हो, परन्तु समाज में लिंग के आधार पर भेदभाव, नफरत, घृणा आज भी कायम है। पहले भू्रण हत्या जहां गरीब वर्ग में प्रचलित समझी जाती थी वहीं आज अपने आप को मार्डन, आधुनिक, सभ्य कहलाये जाने वाले उच्चस्तरीय वर्ग में भी बहुतायत से हो रही है। और तो और औरत ही औरत की दुश्मन बनी हुई है। मुझे याद है मेरे जीजा जी जोकि दिल्ली में रहते हैं, अपनी दूसरी संतान बेटी होने पर भी समस्त काॅलोनी में गुलाबजामुन बांट कर उतनी ही खुशी मनाई थी जितनी पहली बेटी के होने पर थी। उनकी सोच आज भी कायम है कि लिंग के आधार पर केवल बेटी को कमजोर मान लेना बिल्कुज नाजायज है। बेटियां कहीं भी बेटों से कम नहीं है। उन्होंने कभी भी तीसरी औलाद (बेटे) के बारे में नहीं सोचा। आज ऐसे ही विचारधारा की आवश्यकता है। लेखक द्वारा इस विषय को उठाये जाने पर साधुवाद।

  • 23. 02:19 IST, 05 अगस्त 2011 Durgesh Tiwari (Noida):

    सुशील जी, मैं आमतौर पर बीबीसी के ब्लॉग पढ़ता हूँ और हमेशा कुछ बेहतर मिलता है. ये ब्लॉग भी बहुत अच्छा है लेकिन एक ज़रिया बताइए जिससे कि हम अपनी बात भारत सरकार तक भी पहुँचा सकें. इंटरनेट का उपयोग करने वाले तो आपका ब्लॉग पढ़ सकते हैं लेकिन जो इंटरनेट का उपयोग नहीं करते उनके लिए इसे रेडियो पर भी प्रसारित करना चाहिए.मेरा बेटा और बेटी दोनों हैं और हम दोनों के जन्म पर बराबर ख़ुश हुए थे.

  • 24. 16:54 IST, 08 अगस्त 2011 Wasi Mohammad:

    बहुत अच्छा लगा आपका लेख पढ़कर. अगर ऐसी ही जागरुकता हर पढ़े-लिखे इनसान में हो जाए तो समाज में कोई बुराई ही नहीं होगी.

  • 25. 07:33 IST, 12 अगस्त 2011 श्याम:

    बहुत अच्छा.

  • 26. 16:05 IST, 12 अगस्त 2011 सुरेंद्र रावत:

    झा साहब लिखा आपने बढ़िया मगर ये दो पैराग्राफ मेरी समझ में नहीं बैठे. क्या ये निम्नलिखित कोई मानक हैं, तब ही आपको बेटी को जन्म देना चाहिए, क्या इनके बिना काम नहीं चलेगा? शायद भाव आपका सही हो मगर बात कुछ जंची नहीं कि आखिर बेटी पैदा होने के लिए ये दलीलें क्यों? क्या इसलिए कि एक बार इंसान समझे तो सही या मन को दिलासा, कि हाँ फलां-फलां को देखो उनकी भी बेटियां हैं और किन-किन बेटियों ने क्या-क्या नाम कमाया. मेरे एक शिक्षित और समृद्ध दोस्त पुत्ररत्न पाने के लिए कोई भी जतन करने को तैयार हैं. मैंने कई बार समझाया कि ओबामा की दो बेटियां हैं, बिल क्लिंटन की एक ही बेटी है...सरोजिनी नायडू से लेकर इंदिरा गांधी तक की याद दिलाई मगर सब बेकार. देश की सबसे बड़ी पार्टी की मुखिया महिला है उसको वोट देंगे. ममता बनर्जी,जयललिता, मायावती, वसुंधरा राजे, महबूबा मुफ्ती को नेतृत्व सौंप देंगे लेकिन अपने घर की लड़की को रात-दिन बड़ी होती देनदारी की तरह देखेंगे.

  • 27. 05:42 IST, 08 मई 2012 दिनेश सिंह, चिली:

    सुशील जी आप निगेटिव ही नहीं बहुत निगेटिव हैं. समाज में तो बहुत बुराइयाँ हैं और सभी लोग जानते हैं. फिर आप लोग क्यों लिखते हैं क्यों बोलते हैं क्यों मुद्दा उठाते हैं. दूसरे पर उंगली उठाना बहुत आसान होता है. आप ही आज तक क्यों नहीं समाचार पत्र या अपने किसी लेख के माध्यम से रोक दिया इसे. लोगों को जागरूक करने और एहसास दिलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा. और ये काम आमिर खान ने बखूबी किया है. हो सकता है कि इससे व्यापक असर न पड़े. लेकिन अगर एक भी बेटी इस सीरियल से बचती है तो समझ लीजिए कि सीरियल सफल हो गया.और आमिर का योगदान आपके जीवनभर की पत्रकारिता से बढ़कर हो गया.

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