« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

शालीनता में शान है

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शनिवार, 28 मई 2011, 11:54 IST

पिछले दिनों जब सोनिया गांधी ने तमिलनाडु में चुनाव हारने के बाद जयललिता को चाय का न्योता दिया तो सुखद आश्चर्य हुआ.

इसी तर्ज़ पर ममता बनर्जी ने अपने शपथ गृहण समारोह में बुद्धदेव भट्टाचार्य को आमंत्रित करने के लिए अपने ख़ास आदमी को भेजा और बुद्धदेव इस समारोह में आए भी.

पिछली दो बार से पश्चिम बंगाल में विपक्षी दल शपथगृहण समारोह का बहिष्कार करते रहे हैं.

भारतीय राजनीति में शालीनता का स्तर इस हद तक गिर गया था कि दो वर्ष पूर्व जब आडवाणी ने अपनी आत्मकथा प्रकाशित की थी तो सरकार की तरफ़ से एक व्यक्ति भी उस समारोह में नहीं गया था सिवाय शरद पवार के.

ऐसा हमेशा नहीं था. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी कैबिनेट में अपने धुर विरोधियों, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भीमराव अंबेदकर को जगह दी थी.

इसी तरह जब 1959 में उनके विरोधी बन चुके राजगोपालाचारी दिल्ली आए थे तो नेहरू ने उनकी पुत्री के निवास पर जाकर उनसे मुलाक़ात की थी.

साल 1977 में कांग्रेस पार्टी की ज़बर्दस्त हार के बाद जब जनता पार्टी के सदस्य राजघाट पर शपथ ले रहे थे तो इस जीत के कर्ताधर्ता जयप्रकाश नारायण 1, सफ़दरजंग रोड पर इंदिरा गांधी के निवास स्थान पर उन्हें सांत्वना दे रहे थे.

और तो और 1980 में जब इंदिरा गाँधी सत्ता में वापस आंईं तो उन्होंने चिकमंगलूर उप चुनाव में अपने प्रतिद्वंदी वीरेंद्र पाटिल को अपनी कैबिनेट में जगह दी.

इसका एक और उदाहरण उस समय भी देखने को मिला था जब नरसिम्हा राव की सरकार ने अपनी सरकार के विरोधी अटल बिहारी वाजपेयी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया था.

लेकिन अपने प्रतिद्वदियों के प्रति इस तरह का शिष्टाचार अब काफ़ी दुर्लभ हो गया है.

क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष के किसी सदस्य में इतना बड़प्पन है कि संसद में अपने विरोधी के अच्छे भाषण पर खड़े होकर ताली बजाए?

क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मुलायम सिंह और मायावती साथ साथ चाय पी सकते हैं?

या फिर जयललिता राज्य में अपने विरोधी करुणानिधि को उनके जन्मदिन पर मुबारकबाद दे सकती हैं?

अब सोनिया गाँधी और ममता बनर्जी ने इस ओर क़दम बढ़ाए हैं तो क्या ये उम्मीद की जाए कि आने वाले दिनों में शालीनता और शिष्टाचार की गरिमा फिर से वापस आएगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:45 IST, 28 मई 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेहान साहब मेरे ख़्याल से आपको यह काम दे दिया जाए तो बेहतर होगा बीबीसी और आप रिपोर्टरों के पास इन नेताओं की शान में क़सीदे लिखने के अलावा कोई दूसरे मुद्दे नहीं हैं. नेताओं का हाल यह है कि ज़रूरत पड़ने पर यह कुछ भी कर सकते हैं. जैसा सोनिया गांधी और जयललिता ने हाल ही में किया है. मायावती और मुलायम सिह अगर ज़रूरत हुई तो एक पार्टी में आकर जनता को बेवकू़फ़ बना देंगे जैसे आप इनकी शान में क़सीदे लिखकर बीबीसी श्रोताओं को बेवक़ूफ़ बना रहें हैं.

  • 2. 17:16 IST, 28 मई 2011 नवल जोशी:

    सोनिया गॉधी और ममता बनर्जी द्वारा व्यक्त किए गए शिष्टाचार ने रेहान जी को आशावादी बना दिया है.यह सभी को अच्छा लगा काश! ऐसा स्वाभाविक रूप से होता इसमें अभिनय,दॉव-पेंच,रणनीति या कोई चाल न होती. लेकिन चाहने भर से कुछ नहीं होता है.जिसे रेहान जी शिष्टाचार समझ रहे हैं यह अवसरवादिता से अधिक कुछ नहीं है सोनिया जी अवसर पड़ने पर मायावती जी के घर में जन्मदिन की बधाई देने गई थीं वह समय ऐसा ही था इसमें कोई महानता का कर्म किसी भी ओर से किया गया हो ऐसा नहीं था.शिष्टाचार का मतलब इतना ही है कि जिनके आचरण में शिष्टता परिलक्षित होती हो .लेकिन इसमें धोखा तब होता है जबकि लोग लम्बे समय तक शिष्टता का अभिनय कर लेते हैं ओर हम इसे उनका स्वभाव समझ बैठते हैं. इसी तरह की सभ्यता की पोल ब्रिटेन के चुनावों में खुल गई थी जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन ने एक बुजुर्ग महिला से समर्थन मांगा थोडी देर बहस के बाद वे उस महिला के प्रति बड़बड़ाते हुए अपनी कार में बैठ गए दुर्योग या संयोग से उनका यह बड़बड़ाना रेडियो पर सजीव प्रसारित हो गया और पूरी दुनियां ने इसे सुना कि एक राजनीतिज्ञ कितनी दोगली जिन्दगी जीता है.हमारे नेता किसी भी मायने में इनसे भिन्न नहीं हैं.यह हमारा कुसूर है कि हम इनकी किसी अदा पर फ़िदा हो जाते हैं कभी किसी अदा पर. इनके हर क़दम के लिए दसियों निर्देशक हैं जो इनको नफ़े और नुक़सान के बारे में बताते रहते हैं कि कब किसे चाय पर बुलाना है और कब किसे मिलने का समय भी नहीं देना है, सारी गतिविधि इसी तरह से संचालित होती है.लेकिन नेहरू जैसे लोग इसमें शामिल नहीं हैं वे शिष्टाचार का अभिनय नहीं करते थे शिष्टाचार उनका स्वभाव था और इसकी जड़ें आत्मा की गहराई तक पहुंचती थी.यह उस दौर में राजनीतिज्ञों के लिए कोई चर्चा करने योग्य गुण नहीं माना जाता था बल्कि यह सामान्य सी बात थी.लेकिन यह बात अच्छे संकेत नहीं देती है कि राजनीतिज्ञों में ढूंढ-ढूंढ कर गुणों की चर्चा करनी पड़ रही है. यह ओस से प्यास बुझाने जैसा है.


  • 3. 17:56 IST, 28 मई 2011 ZIA JAFRI:

    वाह रेहान साहब आप भी जाल में फ़स गए.अरे भाई यह सारे एक हैं चाहे मुंह से कुछ भी बोलें. आप नीतीश और लालू को भूल गए. मुलायम और आरएसएस को भूल गए. राजनीति में सब एक थाली के चट्टे बट्टे हैं .बेवक़ूफ़ तो जनता है जो अपने हिसाब से सत्ता परिवर्तन करती रहती है.

  • 4. 18:23 IST, 28 मई 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    रेहान जी आपने इस मुद्दे के तंज़ को पकड़ा है.ये शालीनता स्वभाविक है और एक तरह का छलावा भी है.भले कितनी भी शालीन नेतागिरी क्यों न हो पूर्वाग्रह कहीं न कहीं छुपा रहता है. और वैसे भी नेतागिरी का उसूल है "हम सब एक हैं" .यानि कि ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर. अगर यह शालीनता स्वार्थहीन है तो स्वागत है.

  • 5. 23:19 IST, 28 मई 2011 सिद्धार्थ जोशी:

    सोनिया और ममता जी के जिन कदमों से रेहान जी शालीनता और शिष्टाचार की गरिमामयी वापसी की उम्मीद करने लगे हैं वह अपने आप को धोखे में डालने जैसा है. दूसरा हमें गुमराह करे तो सही मार्ग में लौटने की उम्मीद की जा सकती है लेकिन जब हम खुद ही धोखा खाने पर आमादा हैं तो उम्मीद की कोई गुंजाइस नहीं रह जाती है. यह तो मामूली बात है चुनाव के समय राजनीतिज्ञों की शालीनता और शिष्टाचार आप देखते ही रह जाऐगें,जब ये लोग रोजा इफ्तार की पार्टियां आयोजित करते हैं,रामलीलाओं में दर्शकदीर्घा में बैठकर भक्ति-भाव में डूब जाते हैं. बेहिसाब कम्बल और साडियां बॉटते हैं. उस समय का विष्लेषण यदि रेहान साहब करने लगें तो वाकई कबीर का वह दोहा भी फीका लगने लगेगा जिसमें उन्होनें गुरू की महिमा में सब धरती कागद करू कहा था. हमारे राजनीतिज्ञों की महिमा भी उस समय ऐसी ही लगती है जिसका कोई भी बखान नहीं कर सकता है. आपने सोचा कि ब्लॉग लिख कर इनकी महिमा समेटी जा सकती है यह तो इनकी शान में गुस्ताखी करने जैसा है. खैर आप इनसे उम्मीद कर सकते हैं और लोगों को दिलासा भी दे सकते हैं कि शालीनता और शिष्टाचार की गरिमा फिर से वापस आ सकती है. लेकिन यहां पर आपसे थोडा चूक हुई है क्योंकि शालीनता और शिष्टाचार में गरिमा होती ही है उसके लौटने या न लौटने पर कोई प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न यह था कि नेताओं में शालीनता और शिष्टाचार की वापसी कैसे हो? यह असम्भव है क्योंकि एक मुखोटे की तरह तो ये इन गुणों का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन किसी भी गुण को इनके द्वारा आत्मसात करने की बात किसी के भी समझ में नहीं आ सकती है. अन्यथा 70 करोड लोग जिस देश में 20 रूपये औसतन आमदनी पर गुजारा कर रहे हैं,वहॉ किस तरह ये लोग मिशन 2012 या मिशन 2020 की बात सोच भी लेते हैं कहना तो बहुत बडा गुनाह हैं देश की जो हालत है उसमें इनको नींद किस तरह आ जाती होगी यह सोचने का विषय है. कोई कांग्रेस को सत्ता में लाने का अभियान चला रहे हैं कोई भाजपा को लाने का ,देश की चिंता किसे है? ममता जी का तो इससे बडा कोई सपना था भी नहीं कि उन्हें बंगाल की सत्ता मिल जाए,यही हाल हर क्षत्रप का है. जहॉ सपने इतने तुच्छ हों वहॉ रेहान जी बेवजह ही उम्मीद के सब्जबाग दिखाने लगे हैं.

  • 6. 06:47 IST, 29 मई 2011 chandan:

    ये राजनीती है रेहान जी, जिसका एक ही मतलब होता है. ..जीत किसी भी हाल में. थोड़े से राजनीतिक लाभ के लिए ये लोग बंदर को भी बाप बना सकते हैं.


  • 7. 07:26 IST, 29 मई 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    निश्चित रूप से ये भारतीय लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत हैं.असहमति में सहमति का नाम ही तो लोकतंत्र है.

  • 8. 12:42 IST, 29 मई 2011 ramesh meghwal:

    बात नई और पुरानी पीढ़ी की नहीं है असल में हर काल,कौम में कुछ लोग अच्छे होते और कुछ बुरे! वैसे हर नई पीढ़ी के लिए बुजुर्ग लोग कहते है कि ये नई पीढ़ी तो खत्म है या इससे कोई उम्मीद नहीं है परन्तु फिर भी दुनिया तो चल रही है ना....

  • 9. 16:04 IST, 29 मई 2011 sachin damle:

    मुझे लगता है कि अब राजनीति में शिष्टाचार जैसे शब्द का कोई मतलब नहीं रह गया है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर हम जा रहे हैं. फिर राजनीति की विचारधारा में फ़र्क तो होना ही है.

  • 10. 16:34 IST, 29 मई 2011 himmat singh bhati:

    रेहान फ़ज़ल साहब, ये ब्लॉग आपने किसी भी हालत में बीबीसी के अनुकूल नहीं लिखा. आप किस भावना में बह गए, ये तो आप ही ज़्यादा जानते हैं. आखिर जयललिता सोनिया जी की कोई रिश्तेदार तो नहीं है. जो रिश्ते मेनका गांधी से हैं वे उसे नहीं भूलती, तो इसे कैसे भुला रही है. यही जयललिता और ममता अटल जी के समय उनके साथ थी. यहां ममता ने नज़ाकत को समझा और उस का फायदा उठा लिया और सत्ता सुख पा रही है. राजनीती में लोगों का कोई आचरण नहीं होता. ये सभी अवसरवादी लोग हैं. कौन कब किसकी गोद में बैठता है, पता नहीं रहता. हां, ये सही है कि पहले के लोगों में शिष्टाचार रहा था.

  • 11. 19:26 IST, 29 मई 2011 Amit Kumar:

    प्रिय रेहान जी,
    मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ, लेकिन आप आज के राजनीतिज्ञों को लेकर बहुत ही आशावादी प्रतीत होते हैं | राजनीति इस समय सबसे फायदेमंद व्यवसाय है और इसमें सांस्कृतिक मूल्यों की कोई आवश्यकता नहीं है | आज का राजनीतिक परिदृश्य हम युवाओं की तरह उन्मत्त और दिशाहीन है| हम अपने ही आचरण को लें तो आप शिष्टता की कमी पाएंगे | हमारे मूल्यों में कमी आई है|
    आज हम अपने बुजुर्गों को तो इज्ज़त बख्शते नहीं जो हम पर आशीषों से भरा हाथ रखते हैं फिर प्रतिद्वंदियों को क्या इज्ज़त दे पाएंगे| आपने तो कुर्सी, मेज़, चप्पल, जूते चलते हुए देखा ही होगा हमारे सभ्य समाज में और लोकतंत्र के मंदिर में फिर भी आप आशावादी हैं तो मुझे भी आशावादी होने का दिल करता है| इश्वर हम सबको सदबुधि दे ! खासकर इन राजनीतिज्ञों को और उससे पहले हमें जो सोच समझ कर इन्हें चुन सकें और देश के साथ साथ अपने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा कर सकें |
    धन्यवाद ... जय भारत!!!

  • 12. 16:40 IST, 30 मई 2011 sudhir saini:

    ये शिष्टाचार नहीं है,मिल बांट कर खाने की पंरपरा है.और किसे कहे कि आप पत्रकारों से तो कोई बात छिपी नहीं है.

  • 13. 20:50 IST, 30 मई 2011 Rakesh Srivastava (zurich):

    मैं रेहान के इस ब्लॉग से बिल्कूल सहमत हुं,मुझे नही पता क्यों लोग इसकी आलोचना कर रहे है.अगर आप राजनीति में गलत कदमों की आलोचना करते है तो अच्छें कदमों की भी प्रशंसा होनी चाहिए.

  • 14. 16:13 IST, 31 मई 2011 Vivek Mishra, Delhi, India:

    प्रिय रेहान जी ,
    मेरे विचार से भी इस तरह के कदम राजनैतिक ही सही किन्तु सदैव ही प्रशंसनीय हैं. जिस तरह से आज राजनीति में शिष्टता का पतन हो रहा है
    उस दृष्टि से इस तरह की घटनाएं निश्चय ही एक शुभ संकेत देती हैं .रही बात स्वार्थ तथा अवसरवादिता की तो बिना किसी स्वार्थ हम तो ईश्वर को भी याद करने का कष्ट नहीं करते हैं आजकल . यह बात सही है की पहले के समय में शिष्टता, प्रेम व सौहार्द्र अधिक था किन्तु इस बात से तो हम अनभिज्ञ नहीं हैं की आजकल तो पुरे समाज का ही " शिष्टता गुणांक " कम हो गया है ऐसे में रामराज्य जैसे आचरण की कल्पना करना निश्चय ही प्रासंगिक नहीं है.
    अतः मेरे विचार से छोटा ही सही किन्तु समाज में होने वाले सभी सकारात्मक परिवर्तनों का समर्थन करना चाहिए .
    धन्यवाद ...|

  • 15. 21:31 IST, 01 जून 2011 ANIL YADAV:

    सोनिया का जयललिता को चाय का न्यौता देना सिर्फ मौका परस्ती है...
    और ममता बनर्जी वामपंथियों के प्रति कितनी शालीन हैं इसके बारे में बात करना भालू को बाल दिखाने की तरह है....

  • 16. 16:03 IST, 02 जून 2011 HANEEF LODHI:

    शालीन तो हमारे सारे नेता है.जब भी इनके भत्ते,तनख्वाह बढ़ने की बात संसद में आती है कितनी शलीनता से इस बढ़ा लेते है.वो शालीनता एकता देखते ही बनती है.

  • 17. 11:41 IST, 06 जून 2011 lalta prasad khare gomti nagar lucknow:

    रेहान ने अच्छी जानकारी दी है. ऐसे लेख और होने चाहिएं.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.