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भारत में क़ानून के रखवालों के लिए एक ख़बर!

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|मंगलवार, 31 मई 2011, 13:25 IST

दुनिया के सबसे शक्तिशाली आदमी से, जो मेहमान भी था, सड़क पर गाड़ी चलाने का टैक्स माँगा गया है.

हाल में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा लंदन के दौरे पर थे. लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने बराक ओबामा के काफ़िले में शामिल सभी गाड़ियों को 'कन्जेशन चार्ज'भरने का नोटिस भेज दिया है.

सेंट्रल लंदन की संकरी सड़कों पर सोमवार से शुक्रवार के बीच कार चलाने पर प्रति दिन 10 पाउंड यानी लगभग 700 रुपए भरने पड़ते हैं. इस व्यवस्था का उद्देश्य मध्य लंदन को ट्रैफ़िक जैम से मु्क्ति दिलाना है.

मामला ज़रा पेचीदा है, अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के मुताबिक़ कूटनयिक और विदेशी मेहमान दूसरे देशों में स्थानीय टैक्सों से मुक्त होते हैं लेकिन विवाद इसी बात पर है कि कन्जेशन चार्ज टैक्स है या नहीं.

यह मुद्दा 10 पाउंड वसूलने का नहीं है, लंदन के मेयर की दलील है कि जब ब्रिटेन के कूटनयिक विदेशी पुलों और सड़कों पर टोल टैक्स देते हैं तो लंदन में विदेशी कूटनयिक कन्जेशन चार्ज क्यों न भऱें.

लंदन स्थित दस से अधिक दूतावासों के ऊपर स्थानीय प्रशासन का कन्जेशन चार्ज का पाँच करोड़ पाउंड बक़ाया है, बक़ाया चुकता करने से इनकार करने वालों में अमरीकी, स्पेनी, रूसी, जापानी दूतावासों के अलावा भारतीय उच्चायोग भी है.

लंदन के मेयर ने बराक ओबामा को नोटिस भेजकर दूतावासों को साफ़ संदेश देने की कोशिश की है कि हर किसी को नियमों का पालन करना चाहिए, भले ही वह अमरीका का राष्ट्रपति ही क्यों न हो.

मेयर जॉनसन की कन्जेशन चार्ज वसूलने की ज़िद सही हो या नहीं, उनका तरीक़ा शायद सही है.

अगर किसी भी व्यवस्था या क़ानून को लागू कराना है तो उसे शीर्ष पर सबसे पाबंदी से लागू किया जाना चाहिए ताकि नीचे वालों के लिए आनाकानी की कोई गुंजाइश न हो.

ज़रा सोचिए, अगर अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने काफ़िले का कन्जेशन चार्ज भर दिया तो लंदन में अमरीकी राजदूत और दूसरे दूतावासों पर बक़ाया रक़म चुकता करने का नैतिक दबाव कितना बढ़ जाएगा.

पता नहीं, भारत में क़ानून के रखवालों तक यह ख़बर पहुँची है या नहीं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:01 IST, 31 मई 2011 BHEEMAL Dildar Nagar:

    भाई प्रियदर्शीदजी ,आपने मीठे-मीठे अपना संदेश दे दिया है लेकिन भारत में इस संदेश का या क़ानून का सबसे ज्यादा माखौल नेता और उनके बच्चे की उड़ाते है.शायद आपको ये पता ही होगा.

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  • 2. 15:36 IST, 31 मई 2011 Baljeet Kiroriwal:

    राजेश भाई,भारत में क़ानून के रखवालों तक ये ख़बर पहुंच भी जाती है तब भी वह इस अनसुना कर देगें.भारत में राजनेताओं से अगर कोई भी टैक्स वसूल करना है तो वह उनकी तनख्वाह से काट लेना चाहिए.

  • 3. 15:46 IST, 31 मई 2011 Wasim Raza,Amrath Jamui,Delhi:

    क़ानून तो क़ानून होता है और उससे ऊपर कोई नहीं होता है.

  • 4. 16:09 IST, 31 मई 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेशजी भारत गुलामी से आज़ाद होकर भी सभी क़ानून और नियम जो अंग्रेज़ों ने बनाए है उन्हीं का पालन कर रहा है.फिर आप कौन से क़ानून की बात कर रहे है.

  • 5. 17:44 IST, 31 मई 2011 himmat singh bhati:

    राजेश जी, भारत के कानून के रखवालों के आगे ढोल बजा बजाकर फोड़ डालिए तब भी उन्हें न कुछ सुनाई देगा, न दिखाई देगा क्योंकि इसका एक नहीं, कई कारण हैं. ये लोग चिकने घड़े की तरह हैं.

  • 6. 23:08 IST, 31 मई 2011 अमित भट्ट:

    राजेश जी ने भारत में कानून के रखवालों के लिए लंदन की एक घटना को सबक के रूप में पेश किया है। लेकिन यह अधूरा सत्य है। किसी एक घटना को इस तरीके से व्याख्यायित करने के खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। हमारे नेता लाख बुरे हो सकते हैं लेकिन लंदन के नेताओं से तुलनात्मक रूप से करोड गुना ठीक हैं । इनका दूसरा पक्ष भी है जिस पर ध्यान देना जरूरी है काल्पनिक रूप से रसायनिेक हथियारों का हल्ला मचाकर इन्होनें सद्दाम हुसैन को मारा और सांस्कृतिक रूप से दुनियां की महत्वपूर्ण धरोहर इराक को मटियामेट किया हैं। पूरा इराक इन्हीं के कारण आज तक लहूलुहान है अफगानिस्तान, पाकिस्तान में जिस तरह निरीह लोग मारे जा रहे हैं क्या इसकी जिम्मेदारी से लंदन के ये नेता बच सकते हैं।जिन नेताओं को आप कानून का रखवाला कह रहे है इन्होनंे ही पूरी दुनियां में जंगल का कानून लागू किया हुआ है। यह भी इतना ही बडा सत्य है। कम से कम इस बात से सहमति नहीं जताई जा सकती है कि हमारे नेताओं को इनसे नैतिकता के सम्बन्ध में इनसे कोई सबक चाहिए। हमारे नेताओं को सबक हमारे समाज से ही सीखने होगें न कि इनका आयात करने की कोई आवश्यकता है जितनी अंग्रेजियत हमारे नेताओं में है भगवान करे वह भी जल्द से जल्द दूर हो।

  • 7. 23:21 IST, 31 मई 2011 jamil khan:

    क़ानून भारत में, ये हो नहीं सकता. घूस, नेता, पुलिस इन सबका चोली-दामन का रिश्ता है. क़ानून तो बस ग़रीबों का ख़ून चूसने के लिए होता है.

  • 8. 01:04 IST, 01 जून 2011 श्री प्रकाश ओझा :

    भारत में यह सोचना और करना संभव नहीं है,आपके विचारों में दम तो है पर भारत के सम्बन्ध में वास्तविकता से परे है.

  • 9. 01:40 IST, 01 जून 2011 chandra:

    जो भारतीय क़ानून के रखवाले हैं उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि वो अपराधियों पर क़ानून लागू करा पाएं. नेताओं को उस दायरे में ला पाना तो दूर की बात है.

  • 10. 06:30 IST, 01 जून 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    इन लोगों को मुफ़्तखोरी की आदत-सी हो गई है इसलिए इन तक बात पहुंच भी जाए तो कोई लाभ नहीं होनेवाला.

  • 11. 09:14 IST, 01 जून 2011 अमित प्रभाकर:

    बहुत दिनों बाद बीबीसी के ब्लॉग में कोई रोचक मुद्दा पढ़ा. भरना तो चाहिए पर बदले लेने की भावना से नहीं. इस तर्ज पर तो भारत आए अमरीका के सभी उच्चायुक्तों की तलाशी और फ़ॉर्म-भराई का काम करवाना चाहिए जैसाकि भारतीय नेताओं को अमरीका जाने पर अक्सर करना पड़ता है. पर इसमें बदले की भावना दिखती है और फिर ये भारत-पाक जैसी 'यथा-तथा' वाली कूटनीति लगती है. गहराई तो कौटिल्य जानें पर इससे बेहतर कोई तो उपाय होगा ऐसी एकतरफ़ा पूर्वाग्रहों से बचने का. बहरहाल इस आंकड़े के लिए धन्यवाद.

  • 12. 13:15 IST, 01 जून 2011 ZIA JAFRI:

    राजेश जी, मेयर बोरिस का उद्देश्य कन्जेशन चार्ज लेना नहीं बल्कि ये बताना है कि क़ानून सबके लिए बराबर है. चाहे वो अमरीकी राष्ट्रपति क्यों न हों.

  • 13. 14:42 IST, 01 जून 2011 chandan:

    राजेश जी अच्छा लिखा है आपने.

  • 14. 21:47 IST, 01 जून 2011 A. Kumar:

    राजनेताओं को कौन चुनता है? हम भारतवासी दूसरों पर दोष मढ़ना अच्छी तरह जानते हैं.

  • 15. 18:58 IST, 02 जून 2011 सृजन शिल्पी:

    भारत में क़ानून बनाने वाले और क़ानून की रखवाली करने वाले अपने लिए क़ानून का पालन करना जरूरी नहीं समझते.ख़ासकर, ट्रैफ़िक क़ानूनों के मामले में और आपको क्या लगता है कि इस ख़बर से वे कोई सबक लेंगे.

  • 16. 14:49 IST, 05 जून 2011 अनिल वर्मा:

    यहाँ अगर कानून का पालन हो रहा होता तो आज काला धन वापस लाने के लिए अनशन की जरूरत न पड़ती.

  • 17. 17:26 IST, 05 जून 2011 रोहित कुमार:

    आखिर किस कानून की बात करते है , वो कानून जो सचिन तेन्दुलकर जैसे लोगों का विज्ञापनों से होने वाली आय को करमुक्त कर देता है ? वो कानून जो डेढ़ लाख रूपये महीना पाने वाले और राष्ट्रपति भवन में रहकर तमाम सुविधाये उठाने वाले भारत राष्ट्र के महामहिम राष्ट्रपति का वेतन करमुक्त करता है |
    शायद ये बात बहुत कम लोगों को पता होगी की भारत के राष्ट्रपति का वेतक करमुक्त होता है और जो तमाम सुविधाये राष्ट्रपति भवन में है उसका खर्च सरकार वहाँ करती | मेरा प्रश्न है आखिर क्यों?
    आखिर ऐसी क्या कमी है माननीय सांसदों के पास की उन्हें कुछ अंतरराष्ट्रीय यात्राये, कई राष्ट्रीय विमान यात्रायें, रेलवे में मुफ्त यात्रा, मुफ्त टेलीफोन सुविधा प्रदान करता है | अगर आप संसद की कैंटीन में खाने के दाम देख लेंगे तो आपको पता लगेगा की भारत में सबसे सस्ता खाना यहीं उपलब्ध है मेरा प्रश्न है आखिर क्यों ? आखिर वो कौन सा कानून है जो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के अध्यक्ष (जिस पर अभी श्रीमती गाँधी विराजमान है) के पद को लाभ के पद से मुक्त करता है?
    इनमे से किसी प्रश्न का उत्तर अगर आपके पास हो तो बताये ?

  • 18. 23:51 IST, 05 जून 2011 sonu mishra:

    भारतीय नेताओं को इस से सबक़ लेना चाहिए. जो कुर्सी मिलते ही ख़ुद को संविधान से ऊपर समझने लगते हैं. जैसे ही कोई पदवी मिली बिजली, टेलीफ़ोन का बिल भरना भी छोड़ देते हैं.

  • 19. 19:01 IST, 06 जून 2011 Rais lucknow:

    वाह कानून हो तो ऐसा!

  • 20. 20:53 IST, 07 जून 2011 dhanraj purohit:

    राजेश जी यहाँ हिंदुस्तान में क़ानून लागू करवाने वाली एजेंसियाँ और उनके राजनीतिक आक़ा हद दर्जे के बेशर्मी और स्वार्थी दंभ से भरे हुए हैं. उनके कान पर जूँ नहीं रेंगती. मगर वक़्त आ गया है कि उनके सर पर डंडे बजाए जाएँ ताकि देश दुनिया के सामने अपनी नाक बच सके.

  • 21. 00:13 IST, 20 जून 2011 sa:

    यह तो जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात है. लाठी वालों को क़ानून की बात बता कर देखो क्या होता है.

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